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  • अजमेर का इतिहास - 21

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 21

    मुहम्मद जलादुद्दीन अकबर (2)


    अकबर और उसका हरम

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजमेर को अधिकार में लेने के बाद अकबर ने अजमेर को मुगलिया सल्तनत की सांस्कृतिक राजधानी बनाने के प्रयास आरंभ किये। ई.1464 तक अजमेर में ख्वाजा की कोई समाधि बनी हुई नहीं थी। ई.1562 में अकबर आगरा के जंगलों में शिकार करने के लिये गया। शिकार से लौटते समय मिढुकर गांव में अकबर ने ख्वाजा की प्रशस्ति के गीत सुने। उसी समय उसने अजमेर जाने का निर्णय लिया। 14 जनवरी 1562 को वह आगरा से अजमेर के लिये रवाना हुआ। पूरे मार्ग में वह शिकार खेलता हुआ आया। अजमेर पहुँचकर उसने खवाजा की दरगाह के दर्शन किये तथा वहीं से माहम अनगा को निर्देश भिजवाये कि वह हरम की औरतों को लेकर अजमेर आ जाये। कुछ ही दिनों में माहम अनगा, अकबर के हरम को लेकर अजमेर पहुँच गई। अकबर के हरम ने ख्वाजा की दरगाह के दर्शन किये।

    मुगलिया हरम की एक झलक इससे पहले भी अजमेर नगर देख चुका था किंतु उस समय हुमायूं अपने हरम के साथ भारत छोड़कर ईरान की तरफ भाग रहा था। इसलिये उसके हरम के साथ वह मुगलिया शानोशौकत नहीं थी जो अकबर के हरम के साथ थी। इतनी सारी औरतें, इतना भारी लवाजमा, भारी-भरकम भाले और नंगी तलवारें उठाये हुए पर्दाधारी स्त्री सिपाही! अजमेर समझ गया कि आने वाले डेढ़ सौ साल तक इसी हरम से निकली औलादें अजमेर की मालिक होने वाली हैं। कुछ दिनों तक अजमेर में रहने के बाद अकबर अपने हरम को लेकर आगरा लौट गया।

    शर्फुद्दीन हुसैन का विद्रोह

    अजमेर से ही अकबर ने अजमेर के सूबेदार शर्फुद्दीन हुसैन को मेड़ता के विरुद्ध सैन्य अभियान पर भेजा। शर्फुद्दीन ने मेड़ता के शासक जयमल को मेड़ता से निकाल दिया। इस विजय के बाद अकबर ने शर्फुद्दीन को अमीर उल उमरा बना दिया। इस कारण शर्फुद्दीन दिल्ली में रहने लगा। कुछ समय बाद शर्फुद्दीन अकबर की मां के साथ मक्का की यात्रा को गया। वहां एक विदेशी पीर था जिसके दर्शन केवल सुहागन स्त्री ही कर सकती थी। इसलिये अकबर की माँ ने शर्फुद्दीन के दुपट्टे से अपने आंचल का छोर बांधकर विदेशी पीर के दर्शन किये।

    यह बात अकबर को पता चल गई तथा उसने शर्फुद्दीन को खत्म करने की आज्ञा दी। शर्फुद्दीन को अकबर के क्रोध के बारे में ज्ञात हो गया। इसलिये शर्फुद्दीन 5 अक्टूबर 1562 को दिल्ली छोड़कर अजमेर आ गया तथा अजमेर पर अधिकार करके बैठ गया। अकबर ने हुसैन कुली बेग को उसके पीछे भेजा ताकि वह शर्फुद्दीन को समझाकर फिर से दिल्ली ले आये और यदि वह न समझे तो उसे दण्डित करे। शर्फुद्दीन किसी भी स्थिति में दिल्ली जाने को तैयार नहीं था। इसलिये वह अजमेर का प्रभार अपने विश्वस्त अधिकारी तारखां दीवान को देकर जालोर भाग गया। हुसैन कुली बेग ने तारागढ़ को घेर लिया। तारखां ने उसे तारागढ़ समर्पित कर दिया। हुसैन कुली बेग ने अपने विश्वस्त अधिकारी को तारागढ़ का प्रभार सौंप दिया और स्वयं आगरा लौट गया।

    अकबर की पैदल यात्राएँ

    ई.1564 में अकबर ने हुसैन कुली बेग को अजमेर का नाजिम बनाया। ई.1567 में अकबर ने मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के लिये 17 गॉंव प्रदान किये तथा सांभर झील के नमक से होने वाली आय का एक प्रतिशत भाग दरगाह को दिया जाना निश्चित किया।

    ई.1568 में अकबर ने जब चितौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया तो उसने मनौती मांगी कि यदि दुर्ग फतह हो जाये तो वह ख्वाजा की दरगाह पर जायेगा। चितौड़ विजय के बाद 28 फरवरी 1568 को वह आगरा से अजमेर के लिये रवाना हुआ। उसने काफी रास्ता पैदल ही तय किया। उसने अपने अमीरों तथा हरम की औरतों को निर्देश दिया कि वे अपनी सवारी पर बैठकर यात्रा करें किंतु जब बादशाह पैदल चल रहा था तो उसके अमीर और हरम की औरतें कैसे सवारियों पर सवार होकर चल सकती थीं। इसलिये जब तक अकबर पैदल चलता तब तक लगभग हर व्यक्ति पैदल ही चतला।

      अकबर प्रतिदिन 12 से 14 मील चला। जब दरगाह के खादिमों ने अकबर की पैदल यात्रा के बारे में सुना तो वे घोड़ों पर चढ़कर अकबर के पास पहुंचे तथा उससे प्रार्थना की कि ख्वाजा ने स्वप्न में दर्शन देकर उनसे कहा है कि अकबर घोड़े पर चढ़कर अजमेर आ सकता है, उसे पैदल चलने की आवश्यकता नहीं है। अकबर ने खादिमों की बात अस्वीकार कर दी और पैदल चलता हुआ 6 मार्च 1568 को अजमेर पहुंचा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार खादिमों के इस स्वप्न पर विश्वास कर लिया गया। कोई भी इस सूचना की तार्किक समीक्षा करने को तैयार नहीं था। इसलिये सब अपनी-अपनी सवारियों पर चढ़ गये। यात्रा का अंतिम हिस्सा फिर से पैदल तय किया गया।

    अजमेर पहुँचकर अकबर बिना कोई क्षण गंवाये ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित हुआ। उसने दरगाह के बुलंद दरवाजे के दक्षिण-पश्चिम में विशाल कढ़ाव बनवाया तथा खादिमों को उदारता पूर्वक उपहार दिये। अजमेर में ही नये साल का उत्सव मनाने तथा नौ दिन तक अजमेर में रुकने के बाद 14 मार्च 1568 को अकबर पुनः आगरा के लिये रवाना हो गया तथा 13 अप्रैल 1568 को आगरा पहुँच गया।

    ई.1569 में रणथंभौर को परास्त करने के बाद अकबर अजमेर आया। वह एक सप्ताह तक अजमेर रहा और लगभग प्रतिदिन दरगाह गया। 30 अगस्त 1569 को अकबर के पुत्र सलीम का जन्म हुआ। अकबर एक बार पुनः ख्वाजा को धन्यवाद देने के लिये 20 जनवरी 1570 को आगरा से पैदल ही चल पड़ा। वह अपनी यात्रा के 16वें दिन 5 फरवरी 1570 को अजमेर पहुँचा। उसे अजमेर पहुँचने की शीघ्रता इसलिये भी थी क्योंकि वह ख्वाजा के वार्षिक समारोह में सम्मिलित होना चाहता था। अकबर 10 से 12 मील प्रतिदिन पैदल चला।

    इस बार उसने खादिमों को इतने पुरस्कार दिये कि खादिमों में पुरस्कारों पर अधिकार को लेकर झगड़ा हो गया। एक तरफ वे लोग थे जो स्वयं को ख्वाजा का निकटतम वंशज बताते थे तथा दूसरी ओर वे लोग थे जो ख्वाजा की दरगाह में खिदमत करते थे। दरगाह के प्रभारी शेख हुसैन ने समस्त पुरस्कारों पर अधिकार कर लिया। उसने इन पुरस्कारों को अपना बताया। उसके इस दावे को दरगाह के अन्य खादिमों ने चुनौती दी। उनका यह भी कहना था कि शेख ने न केवल वास्तविक राशि छिपा ली है अपितु बंटवारा भी नहीं किया है।

    इस पर अकबर ने कुछ विश्वस्त लोगों को इन दावों और आरोपों की जांच करने के आदेश दिये। इस जांच में पाया गया कि शेख का दावा सही नहीं है। अकबर ने, शेख हुसैन के ख्वाजा का वंशज होने के दावे को खारिज कर दिया तथा शेख मुहम्मद बोखारी को दरगाह का मुतवल्ली नियुक्त किया जो कि शिक्षित सैयद था। अकबर ने कुछ और लोगों को भी दरगाह पर नियुक्त किया तथा अजमेर में एक सराय बनाने के निर्देश दिये। जब यह सराय बनकर तैयार हुई तो इसे इसे अकबरी सराय कहा जाने लगा। बाद में इस सराय के प्रवेश द्वार के ऊपर गणपति की मूर्ति लगा दी गई जिससे यह स्थान गणपतपुरा के नाम से जाना गया। कुछ दिन अजमेर में रहने के बाद अकबर 2 मई 1570 को आगरा लौट गया। ई.1570 से 1579 तक अकबर प्रतिवर्ष अजमेर आया।

    जून 1570 में अकबर का दूसरा पुत्र मुराद उत्पन्न हुआ। सितम्बर 1570 में अकबर पुनः ख्वाजा को धन्यवाद देने अजमेर आया। अब उसने राजस्थान के उन भागों पर अधिकार करने का निर्णय लिया जो अब तक उसके अधिकार में नहीं आ पाये थे। इसलिये उसने अजमेर में अपनी स्थिति मजबूत करने का निर्णय लिया। अकबर को तारागढ़ पसंद नहीं था। तारागढ़ तक पहुँचने के लिये उपलब्ध पहाड़ी दुर्गम पथ को भी वह पसंद नहीं करता था। वह फतहपुर सीकरी की भांति मैदानी दुर्ग में रहने का अभ्यस्त था। इसलिये उसने अजमेर में एक मैदानी दुर्ग बनाने का निर्णय लिया। साथ ही उसने ख्वाजा की दरगाह में एक मस्जिद बनाने का भी निर्णय लिया।

    जिस स्थान पर अकबर ने अपने लिये नया दुर्ग बनवाने का निर्णय लिया, उस स्थान पर पहले से एक प्राचीन दुर्ग बना हुआ था। यह दुर्ग किसने और कब बनवाया था, कोई जानकारी नहीं मिलती।

    अकबर ने इसी दुर्ग को एक नये दुर्ग में बदल दिया। यह कार्य तीन साल में पूरा हुआ। इसके भीतर अकबर ने अपने लिये एक महल बनवाया। आज भी इस दुर्ग को अकबर के महल के नाम से जाना जाता है। यह दुर्ग फतहपुर सीकरी के महल की अनुकृति है और विशाल चतुष्कोणीय आकृति में है। इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें बनी हुई हैं। नगर की तरफ मुंह किये हुए इसका द्वार बना हुआ है तथा केन्द्रीय भाग में विशाल बैठक बनी हुई है। ब्रिटिश काल में यह मैगजीन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अकबर ने अपने अमीर-उमरावों को भी आदेश दिया कि वे यहाँ अच्छे भवन बनवायें तथा उद्यान लगवायें। अमीरों ने आस पास के हिन्दू भवनों में कुछ परिवर्तन करके उन्हें नये भवनों का रूप दिया। इस प्रकार के भवनों का भीतरी भाग हिन्दू स्थापत्य शैली का है जबकि उनके बाहरी भाग को मुस्लिम स्थापत्य शैली में ढाल दिया गया है। नया बाजार में बना हुआ बादशाही भवन इसी प्रकार का है। अकबर के किले में स्थित दरबारे आम भी इसी शैली का गवाह है। जब अकबर ने अजमेर में अपने लिये दुर्ग बनवाया तो उसके चारों ओर एक नया अजमेर शहर खड़ा हो गया।

    अकबर ने दरगाह में एक मस्जिद बनवाई जो अकबरी मस्जिद कहलाती है। 3 नवम्बर 1570 को अकबर अजमेर से नागौर के लिये रवाना हो गया। ई.1571 में भारी वर्षा के उपरांत भी अकबर अजमेर आया। इस बार उसने अजमेर की शहर पनाह बनवाई। इस शहर पनाह की लम्बाई चारों ओर से केवल 4,045 गज थी। 4 जुलाई 1572 को वह पुनः आगरा से अजमेर के लिये रवाना हुआ। इस यात्रा में वह तारागढ़ में स्थित हुसैन खनग सवार की दरगाह पर भी गया। इस यात्रा के दौरान अकबर की एक बेगम गर्भवती थी। अकबर को यहाँ से गुजरात अभियान पर जाना था इसलिये बेगम उसके साथ यात्रा में नहीं चल सकती थी।

    अकबर का किला अब तक बनकर तैयार नहीं हुआ था इसिलये अकबर ने ख्वाजा की दरगाह के एक खादिम शेख दानियाल से अनुरोध किया कि वह बेगम की जचगी (प्रसव) के लिये सुरक्षित स्थान उपलब्ध करवाये। शेख दानियाल ने अपना मकान खाली करके बेगम को दे दिया। उसी मकान में 9 सितम्बर 1572 को एक शहजादे का जन्म हुआ जिसका नाम शेख दानियाल के नाम पर दानियाल रखा गया। गुजरात विजय के पश्चात् अकबर फिर से 13 मई 1573 को अजमेर आया। तब तक बेगम, शहजादे को लेकर आम्बेर जा चुकी थी। अकबर ने बेगम को आम्बेर से पुनः अजमेर बुलवाया।

    ई.1573 में अकबर ने पुनः गुजरात अभियान किया। आगरा से गुजरात जाते समय 25 अगस्त 1573 को तथा गुजरात से लौटते समय 27 सितम्बर 1573 को अकबर अजमेर आया। ई.1574 में गुजरात से बंगाल जाते समय 8 फरवरी 1574 को अकबर फिर से अजमेर आया। वह अजमेर से सात कोस पहले सवारी से उतर गया तथा वहाँ से पैदल ही ख्वाजा की दरगाह पर पहुँचा। दरगाह से सीधा वह अपने नये किले के लिये रवाना हुआ जो अब लगभग पूरा हो चुका था। यहीं पर उसकी भेंट राय रामदास से हुई। अकबर ने रामदास को अजमेर सूबे का दीवान नियुक्त किया। 11 मार्च 1574 को अपने शासन के उन्नीसवें वर्ष के आरंभ होने पर अकबर ने ख्वाजा की दरगाह पर अमीरों एवं गरीबों को एक बड़ा भोज दिया। इस भोज में जो लोग सम्मिलित हुए उन्हें अकबर ने कुल मिलाकर एक लाख रुपये के पुरस्कार बांटे। इसी वर्ष अकबर पहली बार सलीम को ख्वाजा की दरगाह में लेकर आया। 17 मार्च 1574 को वह आगरा लौट गया। बंगाल विजय के बाद दिसम्बर 1574 में अकबर फिर से अजमेर आकर ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित हुआ। वह तब तक अजमेर में ही रहा जब तक कि जोधपुर के राव चंद्रसेन को परास्त नहीं कर दिया गया।

    ई.1574 में अकबर ने आगरा से अजमेर के रास्ते में प्रत्येक पड़ाव पर पक्के विश्राम गृहों का निर्माण करवाया ताकि वह प्रति वर्ष बिना किसी बाधा के अजमेर आ-जा सके। प्रत्येक एक कोस की दूरी पर एक मीनार खड़ी की गई जिस पर उन हजारों हरिणों के सींग लगवाये गये जो अकबर तथा उसके सैनिकों ने मारे थे। इन मीनारों के पास कुएं भी खुदवाये गये। बाद में इन मीनारों के पास उद्यान लगाने एवं यात्रियों के लिये सराय बनाने के भी निर्देश दिये गये। अकबर ने ई.1573-1574 में जुलाल बू केसै को को अजमेर का नाजिम नियुक्त किया।

    ई.1575 में अकबर ने अपने खानखाना मुनीम खां द्वारा फिर से गुजरात विजय करने पर आगरा से अजमेर तक की यात्रा की। इस बार भी वह हर बार की तरह सात कोस पहले ही घोड़े से उतरकर पैदल चलकर दरगाह तक आया। उसने हर बार की तरह रात्रि में विद्वानों और दार्शनिकों को विचार विमर्श के लिये अपने निवास पर बुलाया। नृत्य एवं संगीत के कार्यक्रम भी हर रात्रि में हुए। उसके दरबार में आये हुए लोगों पर दीनारों एवं दिरहमों की बरसात की गई। 9 मार्च 1576 को अकबर फिर अजमेर आया। यहीं से उसने आमेर के कुंअर मानसिंह को महाराणा प्रताप के विरुद्ध अभियान पर भेजा जिसमें मानसिंह की जान बड़ी कठिनाई से बच सकी। इस सम्बन्ध में कहावत इस प्रकार से है- बाही राण प्रतापसी बखतर में बरछी। जाणै झींगर जाल में मुंह काडे मच्छी। अर्थात् महाराणा ने मानसिंह के बख्तर में अपनी बरछी ऐसे घुसा दी जैसे मछली पकड़ने के जाल में से मछली ने मुंह बाहर निकाल लिया हो।

    15 सितम्बर 1576 को अकबर पुनः आगरा से अजमेर के लिये रवाना हुआ तथा 26 सितम्बर को अजमेर पहुँचा। ई.1577 में अकबर ने ख्वाजा की दरगाह के साथ-साथ सयैद हुसैन खनग सवार की दरगाह की भी यात्रा की तथा तारागढ़ की दुर्दशा देखकर, उसकी मरम्मत करने के निर्देश दिये। अकबर ने ई.1577-80 की अवधि के लिये दुस्तम खां को अजमेर का नाजिम बनाया।

    ई.1578 में अकबर फिर अजमेर आया। इस बार उसने अनुभव किया कि उसे ख्वाजा की जियारत करने के लिये किसी स्थान विशेष पर आने की आवश्यकता नहीं है। इस यात्रा में वह चार दिन में सौ कोस चला। लौटते समय वह 2 दिनों में 120 कोस चला। संभवतः इसी यात्रा के लिये अधिकांश इतिहासकारों ने लिखा है- अजमेर से आगरा जो 240 मील दूर है, अकबर केवल 24 घण्टे में घोड़े से गया था।

    ई.1579 में अकबर ने राजा माधोसिंह को अजमेर का दीवान बनाया। 14 अक्टूबर 1579 को अकबर पुनः ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित हुआ। यह अकबर की अंतिम अजमेर यात्रा थी। इस यात्रा का विवरण लिखते समय अब्दुल कदिर बदायुनीं ने लिखा है कि जब अकबर ख्वाजा की दरगाह में पहुंचा तो कुछ समझदार लोग उसे देखकर मुस्कुराये और बोले कितने आश्चर्य की बात है कि बादशाह अजमेर के ख्वाजा में इतना विश्वास रखता है और उसने हमारे पैगम्बर के प्रत्येक आधार को ठुकरा दिया है, जबकि हमारे पैगम्बर पर विश्वास करने वाले उच्च कोटि के सैंकड़ों हजार संत हुए हैं।

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