Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 20
  • अजमेर का इतिहास - 20

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 20

    मुहम्मद जलादुद्दीन अकबर (1)


    अजमेर के इतिहास का तीसरा चरण


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1526 में बाबर आगरा तथा दिल्ली पर अधिकार करके भारत में मुगलिया सल्तनत की नींव डाल चुका था किंतु अगले 52 साल तक अजमेर पर मुगलिया सल्तनत का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। ई.1558 में पहली बार मुगलों की दृष्टि अजमेर पर पड़ी। यहीं से अजमेर के इतिहास का तीसरा चरण आरंभ होता है जो ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु तक चलता है। इस पूरी अवधि में अजमेर; आगरा तथा दिल्ली के बाद, मुगलों की तीसरी राजधानी के रूप उभरा।

    मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर

    ई.1556 में मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर, आगरा के तख्त पर बैठा। उसकी पैनी नजरों से अजमेर की केन्द्रीय स्थिति छिपी न रह सकी। उस समय अजमेर हाजीखां के अधीन था किंतु आईन ए अकबरी ने अजमेर को मालदेव के अधिकार में माना है। आईन ए अकबरी कहती है- मालदेव जो 16वीं पुश्त में है, बहुत बढ़ा-चढ़ा है। करीब था शेरखां का भी उसके मुकाबले में काम तमाम हो जाता। वैसे तो इस मुल्क में बहुत से किले हैं लेकिन उनमें अजमेर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, उमरकोट, आबूगढ़ और जालौर के किले खास हैं। मआसिरुल उमरा ने अजमेर, जोधपुर, सिरोही, नागौर और बीकानेर को मारवाड़ का हिस्सा बताया है। अजमेर को मालदेव के अधीन बताने का कारण संभवतः यह रहा कि हाजीखां, मालदेव के अधीनस्थ स्थिति में था।

    ई.1558 में अकबर की सेना ने अजमेर दुर्ग एवं नगर पर अधिकार कर लिया। हाजी खां, मुगल बादशाह अकबर के सेनापति सैयद मुहम्मद कासिम खां निशापुरी के डर से अजमेर खाली करके मारवाड़ भाग गया। कासिम खां ने बिना लड़े ही, अजमेर पर अधिकार कर लिया। एल्फिंस्टन के अनुसार कासिम खां ने अकबर के शासन के तीसरे वर्ष में तथा अकबरनामा के अनुसार अकबर के शासन के पहले वर्ष में अजमेर पर अधिकार किया।

    इस समय तक मालदेव काफी वृद्ध हो चुका था। इसलिये उसने मुगलों की ताकत को समझते हुए अजमेर के विषय पर शांति धारण कर ली। ई.1558 में अजमेर जिले में मसूदा ठिकाणे की स्थापना हुई तथा सलेमाबाद में वैष्णवों की निम्बार्क शाखा की पीठ स्थापित हुई। ई.1560 में पंवार शार्दुलसिंह ने मालपुरा से आकर श्रीनगर में एक पक्का दुर्ग बनवाया। ई.1561 में अकबर अजमेर आया और उसने मिर्जा शर्फुद्दीन को मेड़ता पर चढ़ाई करने भेजा।

    अजमेर सूबा

    अकबर ने अजमेर को मुगल साम्राज्य के 10 सूबों में सम्मिलित किया। इस सूबे की लम्बाई 336 मील तथा चौड़ाई 300 मील थी। इस सूबे की सीमायें दिल्ली, आगरा, गुजरात, दिपालपुर और मुल्तान से छूती थीं तथा अजमेर इसकी राजधानी थी। जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर तथा सिरोही के करद राज्य (कर देने वाले राज्य।) इस सूबे के अधीन रखे गये। इस सूबे में 7 सरकारें तथा 197 परगने थे। अबुल फजल ने इस सूबे का क्षेत्रफल 2,14,35,941 बीघा तथा 7 बिस्वा बताया है।

    सूबेदार, दीवान, मुख्य काजी, सदर तथा फौजदार अजमेर सूबे के उच्च अधिकारी थे जिनका मुख्यालय अजमेर में था। अजमेर सूबे का राजस्व 28,84,01,557 दम्म (लगभग 72,10,308 रुपये, 14 आने 9 पाई) था। इसमें से 28,26,366 दम्म (57,158 रुपये 6 आने 5 पाई) सूयूरगाल की आय थी। अजमेर सूबे के अधीन 86,500 घुड़सवार तथा 3,47,000 पैदल सैनिक थे। अकबर के समय अजमेर में ताम्बे के सिक्के ढालने की टकसाल थी। इन सिक्कों को दम्म कहा जाता था। अकबर के शासनकाल में अजमेर की टकसाल से सोने के सिक्के भी जारी किये गये जिन्हें मुहर कहा जाता था।

    अजमेर सूबे की सात सरकारें

    अन्य सूबों की भांति अजमेर सूबा भी सरकारों और परगनों अथवा महलों में विभक्त किया गया। प्रारंभ में अजमेर सूबे में सात सरकारें- अजमेर, चित्तौड़, रणथंभौर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर और सिरोही थीं। उस समय परगनों की संख्या 197 थी। यह स्थिति 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में फर्रूखसीयर के शासन काल तक थोड़े से परिवर्तन के साथ चलती रही। बाद में जैसलमेर को बीकानेर सरकार से निकालकर एक पृथक् सरकार का गठन किया गया। तब से अजमेर सूबे में आठ सरकारें हो गईं। उस समय अजमेर सूबे के परगनों की संख्या 123 रह गई। अजमेर सूबे में करद राज्यों का जमघट था।

    सूबे की सात सरकारों में से केवल अजमेर और नागौर सरकारें ही परोक्ष रूप से शाही प्रशासन के अधीन थीं। करद राज्यों का शासन वहाँ के वंशानुगत राजाओं द्वारा संचालित होता था। मुगल दस्तावेजों में इन राजाओं को सामान्यतः जमींदार शब्द से ही सम्बोधित किया जाता था, परन्तु व्यावहारिकता में इन्हें कई विशेष अधिकार प्राप्त थे। ये करद राज्य एक निश्चित राशि, कर के रूप में शाही खजाने में जमा करवाते थे और निर्धारित संख्या में सैनिक एवं घुड़सवार शाही सेवा में प्रस्तुत करते थे। इन राज्यों में मालगुजारी की वसूली राजा अपने कर्मचारियों से करवाता था। करद राज्यों की प्रजा को अपने धर्म को मानने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। करद राज्यों की सीमा में किसी विदेशी को पशु-पक्षी मारने का अधिकार नहीं था। सम्राट इन करद राज्यों के क्षेत्र में सुयूरगाल के रूप में भूमि आवंटित नहीं करता था। यहाँ के शासक यदा-कदा अपने क्षेत्र में राहदारी तथा चुंगी की वसूली करते थे।

    अजमेर के सूबेदार

    अजमेर के सूबेदार का सामान्य रूप से सम्पूर्ण सूबे पर नियन्त्रण रहता था परन्तु वह करद राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था। बैराठ आदि कुछ महत्त्वपूर्ण स्थानों पर शाही फौजदार नियुक्त थे। रणथंभौर किले पर शाही फौज का जमाव रहता था। इन्हीं की सहायता से अजमेर का सूबेदार, सूबे में शांति बनाये रखने का कार्य करता था। अजमेर सूबे में सर्वत्र शाही सिक्कों का प्रचलन था।

    मुगल काल में अजमेर के सूबेदारों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था। अकबर के समय उसे नाजिम तथा जहाँगीर के समय में फौजदार कहा जाता था। शाहजहाँ के समय में महाबत खां को अजमेर का साहिब-ए-सूबा नियुक्त किया गया। शेष समस्त सूबेदारों को फौजदार कहा गया। औरंगजेब के समय में इस पद को सूबेदार कहा जाता था। सूबेदार की ही तरह सूबे में दीवान का पद होता था जो राजस्व के मामले में स्वतंत्र अधिकारी था तथा प्रत्यक्ष रूप से केन्द्रीय दीवान के नीचे काम करता था। दीवान किसी भी मामले में सूबेदार के नियंत्रण में नहीं होता था। दीवान के नीचे करोड़ीस तथा तहसीलदार होते थे। इनके नीचे कानूनगो, चौधरी तथा अमीन होते थे।

    अकबरनामा के अनुसार सूबे में बख्शी, मीर अदल, सद्र, कोतवाल, मीर बहर, एव वक़ई नवीस आदि के पद होते थे। बख्शी के पास सूबे की सेनाओं की स्थापना का काम था। वही सेना को वेतन देता था। मीर अदल सूबे का न्यायिक अधिकारी था। उसकी सहायता के लिये काजी नियुक्त होता था। सद्र, सूबे में माफी की भूमि का प्रबंधन करता था तथा विद्यार्थियों एवं विद्वानों को वजीफा देता था। कोतवाल, सूबे की राजधानी में कानून एवं शांति व्यवस्था बनाने के लिये उत्तरदायी होता था। नगरीय सेवाओं की देखभाल भी वही करता था।

    मीर बहर, सूबे में बंदरगाह, चुंगी, नाव, यातायात कर आदि लेता था। अजमेर में मीर बहर का काम सार्वजनिक निर्माण के कार्य करना था। वह चित्तौड़ तथा रणथम्भौर के दुर्गों की मरम्मत और रखरखाव का काम भी देखता था। राजस्व विभाग के कामों के लिये अमीन महत्त्वपूर्ण अधिकारी था। वह भूमि के सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त का काम करता था। वह राजस्व विवादों का निर्णय भी करता था। कुछ मामलों में प्रांतीय दीवान, बादशाह के आदेश से, सूबे के चीफ अमीन की तरह काम करता था

    अकबर द्वारा अजमेर में नियुक्त किये गये नाजिमों (सूबेदारों) की सूची बनाना अत्यंत कठिन कार्य है क्योंकि किसी भी समकालीन लेखक ने नाजिमों (सूबेदारों) के बारे में नियमित रूप से नहीं लिखा है। हरबिलास शारदा तथा गोपीनाथ शर्मा ने अजमेर के नाजिमों (सूबेदारों) की सूची बनाने के प्रयास किये हैं किंतु ये सूचियां अशुद्ध एवं अधूरी हैं। डॉ. जगतनारायण ने भी अबुल फजल के हवाले से इनकी सूची दी है। यह भी आधी-अधूरी है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि अकबर ने ई.1558-1560 में मोहम्मद कासिम खां निशापुरी (ईरानी) को, ई.1561-1563 में शर्फुद्दीन हुसैन मिर्जा (तूरानी) को, ई.1563 में काजी माड को अजमेर का नाजिम बनाया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×