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  • अजमेर का इतिहास - 19

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 19

    दिल्ली सल्तनत के अधीन अजमेर (3)


    सोलहवीं शताब्दी में अजमेर

    कुंवर रायमल

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    ई.1505 में मेवाड़ के महाराणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज ने बीठली दुर्ग पर अधिकार कर लिया। जब महाराणा रायमल (ई.1473-1509) के तीन पुत्रों- पृथ्वीराज, जयमल तथा संग्रामसिंह के बीच झगड़ा उठ खड़ा हुआ तो कुंवर संग्रामसिंह ने अजमेर के निकट श्रीनगर के परमार जागीरदार, राव करमचन्द के यहाँ शरण ली। ई.1509 में जब संग्रामसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठा तो उसने करमचन्द को अजमेर, परबतसर, मांडल, फूलिया तथा बनेड़ा आदि की जागीरें प्रदान की। ई.1509 में सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानकदेव कार्त्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में स्नान करने के लिये पधारे। ई.1515 में करमचंद पंवार की पत्नी रमादेवी ने अजमेर के निकट रामसर गांव की स्थापना की तथा एक पक्की बावड़ी बनवायी। ई.1523 में धार के राजा रामदेव ने रामसर झील का निर्माण करवाया।

    शमशेरुलमुल्क

    ई.1533 में नागौर के शासक दौलतखां ने मालदेव से परास्त होने के बाद अजमेर में शरण ली। उसी वर्ष गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ के विरुद्ध अभियान किया तथा शमशेरुलमुल्क को एक सेना देकर अजमेर दुर्ग का आकार छोटा करने के लिये भेजा। शमशेरुलमुल्क ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। यह अधिकार बहुत थोड़े समय तक ही बना रह सका।

    राव वीरमदेव मेड़तिया

    ई.1535 में मेड़ता के राव वीरमदेव ने शमशेरुलमुल्क से अजमेर छीन लिया। जोधपुर के राव मालदेव ने वीरमदेव से कहा कि वह अजमेर मालदेव को सौंप दे क्योंकि यदि गुजरात के सुल्तान ने अजमेर पर आक्रमण किया तो तुम उसकी रक्षा नहीं कर सकोगे। वीरमदेव ने मालदेव को अजमेर देने से मना कर दिया। इस पर मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण किया। वीरमदेव मेड़ता खाली करके अजमेर चला गया तथा मेड़ता पर मालदेव का अधिकार हो गया। मालदेव ने वरसिंह के पौत्र सहसा को रीयां की जागीर प्रदान की। एक दिन वीरमदेव गढ़ बीठली पर खड़ा होकर चारों ओर का दृश्य निहार रहा था। अचानक उसकी दृष्टि रीयां की पहाड़ी पर पड़ी।

    मेड़ता तथा रीयां को हाथ से निकला हुआ जानकर वीरमदेव के मन में प्रतिशोध की अग्नि भड़क उठी और उसने रियां पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। वीरमदेव के सामंतों ने वीरमदेव को समझाया कि वह रीयां पर आक्रमण नहीं करे किंतु वीरमदेव ने उनकी बात नहीं सुनी तथा रीयां पर आक्रमण कर दिया। इस पर मालदेव ने सेना भेजकर वीरमदेव का मार्ग रोका। वीरमदेव परास्त होकर अजमेर चला गया किंतु सम्मुख युद्ध में रीयां का ठाकुर सहसा मारा गया। इसके बाद मालदेव ने अपने सामंतों- कूंपा तथा जैता को अजमेर पर अधिकार करने के लिये भेजा। वीरमदेव उनके विरुद्ध बहादुरी से लड़ा किंतु परास्त होकर अजमेर खाली करके चला गया।

    राव मालदेव

    इस प्रकार ई.1535 में अजमेर मालदेव के अधीन आ गया। ई.1536 में मालदेव ने अपने सामंत कूंपावत महेश घड़सिंहोत को अजमेर का जागीरदार बनाया। मालदेव ने अजमेर के बीठली गढ़ में महल, प्राचीर तथा बुर्जों का निर्माण करवाया और गढ़ में जलापूर्ति के लिए पहाड़ियों पर चक्र लगवाया। उस समय अजमेर, मारवाड़ राज्य के 38 जिलों (परगनों) में से एक था जिसके अधीन 360 गांव आते थे। जब ई.1540 में हुमायूं, शेरशाह सूरी से परास्त हो गया तो हुमायूं, शेरशाह सूरी से बचने के लिये मारवाड़ की तरफ भागा। शेरशाह सूरी उसके पीछे लगा रहा। इस दौरान हुमायूं अजमेर होकर निकला। कविराजा श्यामलदास ने भी इस मत का समर्थन किया है।

    रूठी रानी उमादे

    ई.1542 में राज्य-विहीन वीरमदेव, शेरशाह सूरी के पास सहायता मांगने गया। शेरशाह सूरी ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उसने जनवरी 1544 में 80 हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ आगरा से मालदेव के विरुद्ध अभियान आरंभ किया। उसने सबसे पहले अजमेर का रुख किया। मालदेव की रानी उमादे जो इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है, उस समय गढ़ बीठली में थी। जब मालेदव को शेरशाह के अभियान के सम्बन्ध में ज्ञात हुआ तो उसने अपने सामंत ईश्वरदास को लिखा कि वह रानी को लेकर जोधपुर चला आये। जब रानी उमादे को यह आदेश ज्ञात हुआ तो उसने ईश्वरदास से कहा कि शत्रु का आगमन जानने के बाद मेरा इस तरह दुर्ग छोड़कर चले जाना उचित नहीं है। इससे मेरे दोनों कुलों पर कलंक लगेगा। इसलिये आप रावजी को लिख दें कि वह यहाँ का सारा प्रबंध मुझ पर छोड़ दें।

    रावजी विश्वास रखें कि शत्रु का आक्रमण होने पर मैं राणा सांगा की रानी हाड़ी कर्मावती के समान अग्नि में प्रवेश न करके, शत्रु को मार भगाऊंगी और यदि इसमें सफल न हुई तो क्षत्रियाणी की तरह सम्मुख रण में प्रवृत्त होकर प्राण त्याग करूंगी। जब राव मालदेव को पत्र द्वारा इस बात की जानकारी हुई तो उसने ईश्वरदास को लिखा कि तुम हमारी तरफ से रानी से कह दो कि अजमेर में हम स्वयं शेरशाह से लड़ेंगे। इसलिये वहाँ का प्रबंध तो हमारे ही हाथ में रहना उचित होगा।

    जोधपुर दुर्ग का प्रबंध हम रानी उमा दे को सौंपते हैं। अतः रानी जोधपुर आ जाये। रानी उमा दे ने अपने पति की इस आज्ञा को मान लिया और वह अजमेर का दुर्ग राव के सेनापतियों को सौंपकर स्वयं जोधपुर के लिये रवाना हो गई। मार्ग में मालदेव की अन्य रानियों ने उमादे को जोधपुर न आने देने का षड़यन्त्र रचा। इससे रानी कोसाना में ही ठहर गई तथा मालदेव से कहलाया कि मैं यहीं रहकर जोधपुर की रक्षा करूंगी। आप मुझे यहीं सेना भिजवा दें। मालदेव ने वैसा ही किया। इसके बाद मालदेव 50 हजार सैनिकों के साथ अजमेर के लिये रवाना हुआ किंतु बाद में गिर्री को लड़ने के लिये अधिक उपयुक्त स्थान मानकर गिर्री चला गया।

    शेरशाह सूरी

    शेरशाह सूरी ने अजमेर से 48 किलोमीटर दूर, सुमेल के मैदान में अपना शिविर लगाया तथा मालदेव की तरफ मुंह करके एक महीने तक बैठा रहा। मालदेव अधिक शक्तिशाली था इस कारण शेरशाह की हिम्मत नहीं हुई कि वह मालदेव के साथ छेड़छाड़ करे। जब शक्ति से काम बनता हुआ दिखाई नहीं दिया तो शेरशाह सूरी ने मालदेव के विरुद्ध षड़यन्त्र रचा तथा झूठे पत्रों का प्रयोग करके राव मालदेव के मन में, उसके अपने सरदारों के प्रति शंका उत्पन्न कर दी जिससे मालदेव अपने सरदारों को रणक्षेत्र में छोड़कर चला गया। बिना राजा की इस सेना को जीतने में भी शेरशाह सूरी के पसीने छूट गये। बड़ी कठिनाई से वह इस जीत में युद्ध हासिल कर सका।

    युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद शेरशाह मैदान में ही नमाज पढ़ने बैठ गया तथा खुदा का धन्यवाद करते हुए बोला कि मुट्ठी भर बाजरे के लिये मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता। सुमेल युद्ध में मिली विजय से अजमेर पर शेरशाह का अधिकार हो गया। शेरशाह ने मालदेव की राजधानी जोधपुर पर भी अधिकार कर लिया और खवास खां को जोधपुर का शासक नियुक्त करके अजमेर आ गया। (तारीखे दाउदी ही एकमात्र स्रोत है जो यह कहता है कि शेरशाह अजमेर आया।)

    अजमेर के आसपास के दृश्य का आनंद लेने के लिये वह तारागढ़ भी गया। उसने मेड़ता तथा नागौर पर भी अधिकार कर लिया किंतु उसका प्रभुत्व स्थाई नहीं रह सका। जब शेरशाह के सेनापति खवासखां ने जोधपुर पर अधिकार कर लिया तो उसने कोसाने में ठहरी हुई रानी उमादे पर आक्रमण करने का विचार किया तथा अपनी सेना लेकर कोसाने की तरफ रवाना हुआ किंतु कोसाना में रानी की सेनाओं का जमघट देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुई और वह कोसाना के पास खवासपुरा गांव बसाकर जोधपुर लौट गया।

    फिर से राठौड़ों के अधिकार में

    सुमेल युद्ध के चार साल बाद ई.1545 में शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई तथा उसकी मृत्यु के साथ ही उसका साम्राज्य छिन्न भिन्न होने लगा। ई.1548 में मालदेव के सेनापति जैतावत राठौड़ पृथ्वीराज ने मुसलमानों को भगाकर फिर से अजमेर पर अधिकार कर लिया। यह देखकर मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने राठौड़ों से अजमेर लेने के लिये अजमेर पर आक्रमण किया किंतु महाराणा की सेनाओं को परास्त होकर भाग जाना पड़ा।

    हाजी खाँ

    ई.1556 में शेरशाह सूरी के पुराने गवर्नर एवं मेवात के शासक हाजी खां ने अवसर पाकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। मालदेव ने पृथ्वीराज जैतावत को अजमेर पर चढ़ाई करने भेजा। हाजी खां ने उदयपुर के राणा उदयसिंह, बून्दी के हाड़ा राव सुर्जन तथा मेड़ता के राव जयमल मेड़तिया को अपनी सहायता के लिये बुलाया। बीकानेर का राव कल्याणमल भी मालदेव के विरुद्ध आ खड़ा हुआ। इतने सारे नरेशों को अपने विरुद्ध खड़ा देखकर मालेदव की हिम्मत पस्त हो गई और उसने अपनी सेनाएं अजमेर से वापिस बुला लीं।

    जब जोधपुर की सेनायें लौट गईं तो महाराणा उदयसिंह ने अपने सामंतों- तेजसिंह तथा बालिसा सूजा को अजमेर भेजकर हाजी खां से चालीस मन सोना तथा रंगराय नामक वेश्या देने की मांग की। हाजी खां ने यह कहते हुए महाराणा की मांग ठुकरा दी कि रंगराय मेरी पत्नी है तथा सोना मेरे पास है नहीं। हाजी खां के इस उत्तर से नाराज होकर उदयसिंह ने हाजीखां पर आक्रमण कर दिया। इस पर हाजी खां ने मालदेव से सहायता मांगी। मालदेव ने 1500 घुड़सवार हाजीखां की सहायता के लिये अजमेर भेजे।

    जनवरी 1557 में अजमेर के पास हरमाड़ा नामक स्थान पर घमासान युद्ध हुआ जिसमें एक पक्ष तो अजमेर के हाजी खां और जोधपुर के मालदेव का था और दूसरा पक्ष उदयपुर, बून्दी, मेड़ता तथा बीकानेर का था। इस युद्ध में मेवाड़, मेड़ता, बीकानेर तथा बून्दी की करारी हार हुई। युद्ध में विजय मिलने पर भी अजमेर पर हाजी खां का अधिकार बना रहा तथा मालदेव को मेड़ता से संतोष करना पड़ा।

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