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  • अजमेर का इतिहास - 18

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 18

    दिल्ली सल्तनत के अधीन अजमेर (2)


    पंद्रहवीं शती में अजमेर

    राव चूण्डा का अजमेर पर अधिकार

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    पंद्रहवीं शताब्दी में भी अजमेर, हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच युद्ध का विषय बना रहा। ई.1405 में मण्डोर पर अधिकार करने के बाद राठौड़ राजकुमार चूण्डा ने अपने राज्य का विस्तार किया और डीडवाना, खाटू, सांभर, अजमेर तथा जांगल प्रदेश भी छीन लिये। चूण्डा के वंशजों ने अजमेर के निकट छतारी गांव में अपनी जागीर स्थापित की जो भारत के स्वतंत्र होने तक चूण्डावत राठौड़ों की जागीर के रूप में विद्यमान रही। चूण्डा ने ही मण्डोर अपने अधिकार में लेकर मारवाड़ रियासत की स्थापना की थी।

    उसी ने खाटू, डीडवाना, सांभर और अजमेर पर अधिकार किया था। उसके समय से ही अजमेर, मारवाड़ राज्य का हिस्सा बनने लगा। पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ से लेकर, सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक अजमेर को मारवाड़ राज्य का ही भाग मानना चाहिये। सोलहवीं शताब्दी के मध्यकाल के लेखक एवं अकबर के दरबारी, अबुल फजल ने मारवाड़ रियासत की लम्बाई 100 कोस और चौड़ाई 60 कोस बताते हुए लिखा है कि अजमेर, जोधपुर, नागौर, सिरोही और बीकानेर, मारवाड़ के प्रमुख नगर हैं तथा अजमेर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, उमरकोट और जै नगर इसके प्रमुख दुर्ग हैं। जै नगर से तात्पर्य किस नगर से है, कहा नहीं जा सकता।

    मेवाड़ वालों का अजमेर पर अधिकार

    ऐसा प्रतीत होता है कि राठौड़ चूण्डा अजमेर पर अपना अधिकार लम्बे समय तक बनाये न रख सका। इस कारण अजमेर पर फिर से मुसलमानों का शासन हो गया। चित्तौड़ के शासक लक्षसिंह (महाराणा लाखा) ने पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ में, लगभग पूरे मेरवाड़ा क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। ई.1408 के लगभग महाराणा लाखा के साले रणमल्ल ने अजमेर के बीठली दुर्ग पर अधिकार करके उसे महाराणा लाखा को सौंप दिया। संभवतः कुछ समय पश्चात् अजमेर मालवा के मुस्लिम शासक के अधिकार में चला गया। उसने सलीमखां को अजमेर में अपना सूबेदार नियुक्त किया।

    ई.1423 में सलीम खां ने मेवाड़ के राजकुमार चूण्डा के विरुद्ध पूगल के भाटियों की सहायता की। मेवाड़ का महाराणा मोकल (ई.1419-1433) उस समय छोटा बालक था। उसकी तरफ से शासन का सारा कार्य उसका मामा रणमल्ल देखता था। इसलिये रणमल्ल ने सलीम खां को दण्डित करने के लिये चित्तौड़ से खीमसी पंचोली को 500 घुड़सवार तथा 400 पैदल सैनिक देकर भेजा। खीमसी पंचोली ने सलीम खां को मारकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। महाराणा मोकल ने अजमेर के निकट स्थित बांदनवाड़ा गांव मेवाड़ के एकलिंगजी के मंदिर को समर्पित किया। ई.1438 में महाराणा कुंभा (ई.1433-1468) के कहने पर चित्तौड़ दुर्ग में राव रणमल्ल की हत्या हो गई। उस समय अजमेर दुर्ग पर मारवाड़ के राठौड़ों का अधिकार था। कुंभा ने राठौड़ों से अजमेर भी छीन लिया।

    मालवा के सुल्तान का अजमेर पर अधिकार

    ई.1455 तक अजमेर मेवाड़ के महाराणा के अधीन रहा। जब मालवा के सुल्तान मुहम्मद खिलजी तथा मेवाड़ के बीच युद्ध आरंभ हुआ तब खिलजी ने महाराणा को उलझाये रखने के लिये अपनी एक सेना मंदसौर की तरफ रवाना की तथा स्वयं सेना लेकर अजमेर पर चढ़ बैठा। उस समय तारागढ़ का दुर्गपति गजधरसिंह था। गजधरसिंह ने चार दिन तक दुर्ग की रक्षा की तथा पांचवे दिन दुर्ग के द्वार खोलकर शत्रु सैन्य पर टूट पड़ा। इस युद्ध में गजधरसिंह मारा गया तो उसके सैनिक भाग कर फिर से गढ़ में चले गये।

    इन सैनिकों के साथ खिलजी के सैनिक भी मिलकर दुर्ग में घुस गये तथा भीतर पहुँचकर उन्होंने दुर्ग अपने अधिकार में ले लिया। खिलजी ने ख्वाजा नेमतुल्लाह को सैफखान के नाम से अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया गया। इस प्रकार ई.1456 में अजमेर, मालवा के सुल्तान मुहम्मद खिलजी के अधीन चला गया। इस घटना के कुछ माह बाद महाराणा कुंभा ने अजमेर को दुबारा से हासिल कर लिया। महाराणा कुंभा के निधन के बाद मालवा के सुल्तान मुहम्मद खिलजी ने फिर से अजमेर पर अधिकार कर लिया।

    राव जोधा

    ई.1468 में उदयसिंह मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा। इसे मेवाड़ के इतिहास में अनादर से, ऊदा कहा जाता है। इसने अपने पिता कुंभा के पागल हो जाने के करण उसकी हत्या की थी। इसने ई.1468 से 1473 तक चित्तौड़ पर शासन किया। उसने मेवाड़ के आन्तरिक मामलों में जोधा के निरन्तर हस्तक्षेप को बन्द करने के लिए अजमेर और सांभर मारवाड़ को दे दिये। ई.1489 में मारवाड़ के राव जोधा की मृत्यु के समय तक मारवाड़ के राठौड़ों का मण्डोर, सोजत, गोड़वाड़ा के कुछ भाग, सिवाना, साम्भर तथा अजमेर पर अधिकार हो चुका था।

    मल्लू खाँ

    पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में अजमेर, माण्डू के अधीन था और मल्लू खां अजमेर का गवर्नर था। इसका वास्तविक नाम मलिक यूसुफ था किंतु मारवाड़ में इसे मल्लूखां कहा जाता था।इस मल्लू खां ने अजमेर में तारागढ़ के नीचे दो तालाब बनवाये। ये तालाब छोटा मलूसर तथा बड़ा मलूसर कहलाते थे। बड़े मलूसर से लेकर तारागढ़ तक धरती के नीचे सुरंग बनी हुई थी जो बाद में बंद हो गई। छोटा मलूसर कुएं की तरह था। इसी मल्लूखां ने ई.1464 में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की कब्र पर मकबरा बनावाया। बाद के वर्षों में मुहर्रम के दिनों में शहर के ताजिए इसी छोटे मलूसर में दफनाये जाने लगे। बाद में छोटा मलूसर और उसके आसपास का क्षेत्र अमीर अली की दरगाह के अधीन हो गया।

    मारवाड़ के शासक राव सातल देव (ई.1489-1492) का भाई वरसिंह मेड़ता का स्वामी था। ई.1490 में अजमेर के हाकम मल्लूखां ने राव सातलदेव के भाई वरसिंह को अजमेर बुलाकर धोखे से पकड़ लिया। इस पर सातलदेव ने अजमेर पर चढ़ाई की और वरसिंह को छुड़वा लिया। ई.1491 में वरसिंह ने सांभर पर आक्रमण करके उसे लूट लिया। इस पर मल्लूखां ने माण्डू के अधिकारियों- सिरिया खां तथा मीर घड़ूला की सहायता से मेड़ता पर आक्रमण किया। वरसिंह तथा उसका भाई दूदा भाग कर अपने भाई सातल देव के पास जोधपुर चले गये। मल्लूखां ने उनका पीछा किया। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीया थी तथा गांव की बहुत सी कन्यायें गांव से बाहर के तालाब पर गौरी पूजन के लिये आई हुई थीं। मल्लू खां 140 कन्याओं को पकड़ कर ले गया।

    मल्लूखां ने अजमेर जाते समय मार्ग में कोसाणा गांव में डेरा किया। जब राव सातलदेव को इस घटना की जानकारी हुई तो उसने वरसिंह, दूदा, सूजा वरजांग (भीमोज) आदि को साथ लेकर कोसाणा पहुँचकर रात्रि में मल्लूखां के डेरे पर आक्रमण कर दिया। दूदा ने सिरियाखां का हाथी छीन लिया और सातलदेव ने बड़ी वीरता से लड़कर मीर घडूला को मारा तथा तीजणियों को मुक्त करवा लिया। इस लड़ाई में वरजांग ने कई मुसलमान सैनिकों तथा कुछ उड़दा बेगणियों (पर्दाधारी मुस्लिम महिला सैनिक।) को कैद कर लिया। इनमें घड़ूला खां की पुत्री भी शामिल थी।

    सातल देव ने मुसलमान सैनिकों के सिर मुंडवाकर उन्हें छोड़ दिया तथा मुस्लिम औरतों को ससम्मान लौटा दिया। इस लड़ाई में सातलदेव भी बुरी तरह घायल हो गया। घड़ूला खां लौटकर अजमेर नहीं जा सका। वह युद्ध क्षेत्र में ही मारा गया और सातलदेव अपने डेरे में लौट कर रात को मर गया। सातलदेव के खींची सरदार ने घड़ूलाखां का सिर काटकर उन 140 कन्याओं को सौंपे दिया। कन्यायें घुड़ला खां का सिर लेकर पूरे गांव में घूमीं। यह लड़ाई (श्रावणादि) वि.सं. 1548 (चैत्रादि 1549) चैत्र सुदि 3 (1 मार्च 1492) को हुई। कोसाणे के तालाब के निकट सातलदेव का अंतिम संस्कार किया गया। कासोणा में उसकी स्मारक छतरी बनाई गई जो अब तक विद्यमान है। तब से इस घटना की याद में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला तृतीया को घुड़ला घुमाया जाता है। कन्यायें सिर पर खाली मटकी में छेद करके उसमें दीपक रखती हैं और उसे घुड़ले के सिर के प्रतीक के रूप में गांव-गांव घुमाती हैं। मटकी के छेद घुड़ले के सिर के घाव माने जाते हैं।

    ई.1499-1500 में माण्डू के सुलतान नासिर उद्दीन कादर शाह ने आजम हुमायूं के पुत्र महमूद खां को अजमेर का नायब बनाया।

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