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  • अजमेर का इतिहास - 17

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 17

    दिल्ली सल्तनत के अधीन अजमेर (1)


    तेहरवीं शताब्दी में अजमेर

    सैयद मीरन का वध

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    12 अप्रेल 1202 की रात में, तारागढ़ के आसपास रहने वाले राठौड़ों एवं चौहानों के एक दल ने अजमेर दुर्ग पर आक्रमण किया। उनकी योजना थी कि दुर्ग में स्थित मुस्लिम दरोगा सैयद हुसैन मीरन को मारकर फिर से राजपूतों का शासन स्थापित किया जाये। दोनों पक्षों के बीच रात के अंधेरे में भयानक युद्ध हुआ। इस युद्ध में दुर्ग के भीतर स्थित समस्त मुस्लिम सैनिकों को मार डाला गया। राजपूतों ने दरोगा सैयद हुसैन खनग सवार मीरन को भी मार डाला। इस प्रकार अजमेर दुर्ग एक बार फिर से हिन्दुओं के अधिकार में आ गया।

    गजनी का प्रतिशोध

    दुर्ग से भागे हुए मुस्लिम सिपाही जब दिल्ली पहुँचे तो कुतबुद्दीन ऐबक के होश उड़ गये। उसके पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वह दुर्ग पर आक्रमण करके उसे फिर से अपने अधिकार में ले ले। उसने इस आक्रमण का प्रतिशोध लेने के लिये गजनी से सेना मंगवाई। गजनी से आई विशाल सेना ने राजपूतों से दुर्ग फिर से छीन लिया। गजनी की सेना का यह प्रतिशोध बहुत भयानक था।

    अजमेर में निर्धनता का बीजारोपण

    गजनी से आई सेना ने तारागढ़ में उपस्थित राजपूत सैनिकों तथा दुर्ग के निकट रहने वाले राजपूत परिवारों को पकड़कर उनकी सुन्नत की और उन्हें मुसलमान बनाया। मुस्लिम धर्म में परिवर्तित होने के बाद ये राजपूत परिवार तारागढ़ के निकट ही रहने लगे। बाद में इन्हें देशवाली मुसलमान कहा जाने लगा। इन्हें बहुत नीची दृष्टि से देखा जाता था। गजनी के मुसलमानों द्वारा देशवाली मुसलमानों को बराबर का स्तर नहीं दिया गया। इसलिये देशवाली मुसलमान उपेक्षित जीवन जीने लगे। उनकी आर्थिक दशा दिन पर दिन गिरने लगी। इस प्रकार पहली बार अजमेर में निर्धनता का बीजारोपण किया गया।

    इल्तुतमिश

    ई.1210 में ऐबक मर गया और इल्तुतमिश (अल्तमश) दिल्ली का बादशाह हुआ। उसके शासनकाल में, ई.1213 में अजमेर के सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर के भग्नावशेषों को मस्जिद में बदला गया। उस समय इसके एक हिस्से में मस्जिद बनाई गई। बाद में अल्तमश (ई.1211-1236) ने इस मस्जिद को वर्तमान स्वरूप दिया तथा इसमें सात मेहराब बनवाये। इस मस्जिद को बाद में ढाई दिन का झौंपड़ा कहा जाने लगा ई.1226 में अजमेर के पूर्व चौहान शासकों ने पुनः अजमेर पर अधिकार कर लिया जो अब रणथंभौर में केन्द्रित थे, किन्तु इल्तुतमिश ने शीघ्र ही अजमेर उनसे छीन लिया और लाहौर के गवर्नर नासिरूद्दीन एतमुर बहाई को अजमेर का शासक नियुक्त किया।

    अजमेर पर अधिकार करने के बाद इल्तुतमिश अन्हिलवाड़ा के लिये रवाना हुआ किंतु मार्ग में राजपूतों तथा मेरों ने मिलकर उस पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में इल्तुतमिश परास्त हो गया तथा घायल होकर वापस अजमेर लौटा। राजपूतों ने उसका पीछा किया। इल्तुतमिश ने स्वयं को गढ़ बीठली में बंद कर लिया तथा गजनी से सैन्य सहायता के लिये अपने दूत भेज दिये। राजपूत दीर्घ समय तक गढ़ के चारों ओर घेरा डालकर बैठे रहे और जब गजनी से सैनिक सहायता आ गई तो राजपूतों ने घेरा उठा कर चले गये।

    ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का निधन

    ख्वाजा मोइनुद्दीन के निधन की कोई निश्चित तिथि नहीं मिलती। कुछ स्रोतों के अनुसार उनका निधन ई.1227 में हुआ तथा कुछ अन्य स्रोत उनके निधन की तिथि ई.1235-36 के आसपास मानते हैं। कुछ विद्वान उनके निधन की तिथि 16 मार्च 1236 अजमेर में हुआ बताते हैं। उन्होंने अपने पीछे तीन पुत्र, एक पुत्री तथा दो पत्नियाँ छोड़ीं। यह भी कहा जाता है कि जिस वर्ष ख्वाजा मोइनुद्दीन का निधन हुआ, उसी वर्ष इल्तुतमिश 1227 ईस्वी में अजमेर आया। इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन महमूद ने नागौर तथा अजमेर के इक्तेदार इजुद्दीन बलबन के विद्रोह को कुचलने के लिये नागौर जाते समय अजमेर की यात्रा की। खानी ने यह दावा इस आधार पर किया है कि उन दिनों के मुस्लिम शासक जिस शहर में जाते थे, वहाँ स्थित प्रमुख धार्मिक व्यक्तियों की मजारों की यात्रा करते थे।

    नागौर प्रांत के अधीन

    ई.1242 में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन मसूद ने अजमेर, नागौर व मण्डोर का शासन मल्लिक इजुद्दीन को प्रदान किया। ई.1266 में बलबन ने अपने आप को दिल्ली का शासक घोषित कर दिया। उस समय तक अजमेर अपनी राजनीतिक महत्ता खोकर एक सामान्य प्रदेश रह गया था जहाँ मुसलमानों ने अपनी सैनिक छावनी स्थापित कर रखी थी। उस समय भटिण्डा, अजमेर तथा मण्डोर 'नागौर प्रान्त' के अधीन आते थे।

    हम्मीरदेव

    ई.1282 में चौहान हम्मीरदेव रणथंभौर का शासक हुआ। जब ई.1287 में दिल्ली का तब तक का सबसे शक्तिशाली सुल्तान बलबन मर गया, तब हम्मीर देव ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार इस पूरी शताब्दी में अजमेर हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच युद्ध का विषय बना रहा और युद्धों की विभीषिका के कारण अजमेर के नागरिक कष्ट भोगते रहे। वे अजमेर नगर के चारों ओर बने परकोटे के भीतर रहते थे। अजमेर से अल्तमश के समय की कुछ मुद्रायें मिली हैं जिनमें से एक मुद्रा के एक तरफ श्री हमीर अंकित है तथा दूसरी ओर श्री रमसीरलदेव अंकित है।

    एक अन्य मुद्रा पर एक ओर श्री हमीर तथा दूसरी ओर सुरिताण श्री सम्सदिण अंकित है। सुरिताण श्री सम्सदीन का आशय सुल्तान शम्सुद्दीन (अल्तमश) से है। इससे अनुमान होता है कि हम्मीर ने अल्तमश की मुद्राओं को जब्त करके पुनः अपने नाम से जारी किया। जब मुहम्मद गौरी ने अजमेर पर अधिकार किया था तो उसने पृथ्वीराज चौहान की मुद्राओं को जब्त करके उनके एक तरफ अपना नाम अंकित करवाकर उन्हें दुबारा से जारी किया था। हम्मीर के द्वारा अल्तमश की मुद्राओं को जब्त करके उन पर अपना नाम अंकित करवाना एक तरह से पृथ्वीराज चौहान की पराजय का बदला लेने जैसा था।

    चौदहवीं शताब्दी में अजमेर

    ई.1301 में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चौहान हम्मीरदेव को मार कर रणथंभौर तथा अजमेर पुनः मुस्लिम सत्ता के अधीन कर लिये। उसने ई.1303 में चित्तौड़ अभियान किया तथा राजस्थान में काफी समय व्यतीत किया। जैन स्रोतों के अनुसार अलाउद्दीन खलजी ने ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार की यात्रा की। हर बिलास शारदा ने लिखा है कि ई.1364 से ई.1382 के बीच में मेवाड़ के महाराणा क्षेत्रसिंह ने अजमेर पर अधिकार कर लिया किंतु यह बात सत्य प्रतीत नहीं होती क्योंकि क्षेत्रसिंह ने माण्डलगढ़ को तोड़ा था न कि अजमेर पर विजय प्राप्त की थी। वस्तुतः पृथ्वीराज चौहान के समय माण्डलगढ़ से लेकर मेवाड़ का समस्त पूर्वी भाग चौहानों के अधीन था। क्षेत्रसिंह ने अजमेर राज्य के इसी हिस्से पर अधिकार किया था न कि अजमेर पर। ई.1396 में गुजरात के तुगलक गवर्नर जफर खां ने अजमेर पर अभियान किया तथा ख्वाजा मोइनुद्दीन की दरगाह की यात्रा की।

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