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     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 16

    अजमेर का गर्व भंजन


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारत भूमि को ईक्ष्वाकु वंश से लेकर मौर्यों, गुप्तों तथा प्रतिहारों जैसे प्रतापी राजवंशों की अनुपम सेवायें प्राप्त हुईं। सिकन्दर के आक्रमण के समय यद्यपि कोई प्रतापी राजंवश भारत भूमि पर उपस्थित नहीं था तथापि आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने इस विषम और विकट परिस्थिति में हिन्दू जाति की गौरव पताका को गिरने नहीं दिया। चौहानों ने भी कई शताब्दियों तक हिन्दू जाति की स्वतन्त्रता को बनाये रखा किन्तु दैववश ई.1192 में पृथ्वीराज चौहान परास्त हो गया। इससे हिन्दू जाति की स्वतन्त्रता नष्ट हो गई तथा भारत में मुस्लिम राज्य स्थापित हो गया।

    तराइन की दूसरी लड़ाई के बाद अजमेर, दिल्ली, हांसी, सिरसा, समाना तथा कोहराम के क्षेत्र मुहम्मद गौरी के अधीन हो गये। तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज की हार से हिन्दू धर्म की बहुत हानि हुई। इस युद्ध में हजारों हिन्दू योद्धा मारे गये। चौहानों की शक्ति नष्ट हो गईं। देश की अपार सम्पति म्लेच्छों के हाथ लगी। नौकरियों पूरे देश में भय और आतंक का वातावरण बना दिया। हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये गये। स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। मन्दिर एवम् पाठशालायें ध्वस्त कर अग्नि को समर्पित कर दी गईं। जैन साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गये। पूरे देश में हाहाकार मच गया और इतिहास ने भारत भूमि पर गुलामी का पहला अध्याय लिखा। इससे पूर्व भारत-भूमि के लोग 'गुलामी' शब्द से परिचित नहीं थे।

    ई.1192 में शहाबुद्दीन गौरी के समकालीन लेखक हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ताजुल मासिर में अजमेर नगर का वर्णन करते हुए इसकी मिट्टी, हवा, पानी, जंगल तथा पहाड़ों की तुलना स्वर्ग से की है। शहाबुद्दीन गौरी ने इस स्वर्ग को तोड़ दिया। शहबुद्दीन की सेनाओं ने अजमेर नगर में विध्वंसकारी ताण्डव किया। नगर में स्थित अनेक मन्दिर नष्ट कर दिये। बहुत से देव मंदिरों के खम्भों एवं मूर्तियों को तोड़ डाला। वीसलदेव द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला एवं सरस्वती मंदिर को तोड़ कर उसके एक हिस्से को मस्जिद में बदल दिया। यह भवन उस समय धरती पर स्थित सुंदरतम भवनों में से एक था किंतु इस विंध्वस के बाद यह विस्मृति के गर्त में चला गया तथा छः सौ साल तक किसी ने इसकी सुधि नहीं ली। उन दिनों अजमेर में इन्द्रसेन जैनी का मंदिर हुआ करता था। गौरी की सेनाओं ने उसे नष्ट कर दिया। शहाबुद्दीन गौरी ने अजमेर के प्रमुख व्यक्तियों को पकड़कर उनकी हत्या कर दी।

    गोविंदराज

    पृथ्वीराज को मारने के बाद शहाबुद्दीन गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के अवयस्क पुत्र गोविन्दराज से विपुल कर राशि लेकर गोविंदराज को अजमेर की गद्दी पर बैठाया। गोविंदराज को अजमेर का राज्य सौंपने के बाद शहाबुद्दीन गौरी कुछ समय तक अजमेर में रहकर दिल्ली को लौट गया।

    मुहम्मद गौरी के सिक्के

    डॉ. दशरथ शर्मा तथा एडवर्ड थॉमस ने एक सिक्के का उल्लेख किया है जिसके एक तरफ पृथ्वीराज चौहान का नाम है तथा दूसरी तरफ मुहम्मद बिन साम (शहाबुद्दीन गौरी) का नाम है। यह संभवतः उस समय की मुद्रा है जब शहाबुद्दीन अजमेर में ही था तथा वह पृथ्वीराज के पुत्र गोविंदराज को अजमेर का राज्य दे चुका था। इस मुद्रा की लिपि हिन्दी भाषा में है। शहाबुद्दीन गौरी ने अजमेर से और भी कई सिक्के चलाये। उसके चलाये सोने के सिक्कों पर एक ओर लक्ष्मी की मूति और दूसरी ओर नागरी लिपि में 'श्रीमहमदविनिसाम' लिखा हुआ मिलता है। उसके ताम्बे के सिक्कों पर एक ओर नंदी तथा त्रिशूल के साथ स्रीमहमद साम और दूसरी तरफ चौहानों के सिक्कों के समान स्रीहमीर लेख है।

    गौरीशंकर ओझा ने स्रीहमीर को श्री अमीर पढ़ने की गलती की है। यह सिक्का मूलतः शहाबुद्दीन गौरी ने चलाया था जिसके एक तरफ स्रीमहमद साम अर्थात् श्री मुहम्मद बिन साम अंकित है। इसके दूसरी तरफ जो अंकन था, उसके बारे में अब कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि उस अंकन के ऊपर रणथम्भौर के हम्मीर ने अपना नाम स्रीहमीर अर्थात् श्री हम्मीर उत्कीर्ण करवाया।

    रेणसी द्वारा शहाबुद्दीन को चुनौती

    जब शहाबुद्दीन गोरी, गोविंदराज को अजमेर की गद्दी पर बैठाकर पुनः दिल्ली लौटा तो एक बड़े चौहान मुखिया ने हांसी के निकट उसका मार्ग रोका। ताजुल मासिर के लेखक ने इस चौहान मुखिया का नाम नहीं लिखा है और न ही उसके सम्बन्ध में कुछ भी विवरण दिया है। ताजुल मासिर के अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा इस चौहान मुखिया का वध किया गया। कुछ इतिहासकारों ने इस चौहान मुखिया को पृथ्वीराज का बड़ा पुत्र रेणसी बताया है। इस युद्ध में रेणसी मारा गया।

    हरिराज

    जब शहाबुद्दीन गौरी कुतबुद्दीन ऐबक को भारत में विजित क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त करके गजनी चला गया तब पृथ्वीराज चौहान के छोटे भाई हरिराज चौहान (फरिश्ता ने इसका नाम हेमराज तथा हसन निजामी ने हिराज लिखा है।) ने गोविन्दराज को अजमेर से मार भगाया तथा स्वयं अजमेर का राजा बन गया क्योंकि गोविंदराज ने मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। इस घटनाक्रम के समय कुतुबद्दीन ऐबक, बनारस, कन्नौज तथा कोयल (अब उत्तरप्रदेश का अलीगढ़।) में उलझा हुआ था। इस कारण गोविंदराज अजमेर से रणथंभौर चला गया। (हम्मीर चौहान इसी के वंश में हुआ। बूंदी तथा कोटा के चौहान राज्य भी इसी गोविंदराज के वंशजों ने स्थापित किये।) हरिराज ने रणथंभौर को घेर लिया। इस पर गोविंदराज ने कुतुबुद्दीन ऐबक से पुनः सहायता मांगी। जब कुतुबुद्दीन की सेना गोविंदराज की सहायता के लिये आई तो हरिराज रणथम्भौर का घेरा उठाकर अजमेर चला आया।

    ई.1194 में हरिराज ने अपने सेनापति चतरराज को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये भेजा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने चतरराज को परास्त कर दिया। चतरराज फिर से अजमेर लौट आया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने चतरराज का पीछा किया तथा वह भी सेना लेकर अजमेर आ गया और उसने तारागढ़ घेर लिया। हरिराज ने आगे बढ़कर कुतुबुद्दीन पर आक्रमण किया किंतु परास्त हो गया। हम्मीर महाकाव्य के अनुसार अपनी पराजय निश्चित जानकर हरिराज और उसका सेनापति जैत्रसिंह, अपने स्त्री समूह सहित, जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर गये। इस प्रकार ई.1195 में अजमेर पर फिर से मुसलमानों का अधिकार हो गया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने हरिराज की मृत्यु के बाद अजमेर, गोविंदराज को न सौंपकर प्रत्यक्ष मुस्लिम शासन के अधीन ले लिया। चौहान साम्राज्य के पतन के बाद भी चौहान शासकों द्वारा स्थापित टकसाल, अजमेर में काम करती रही।


    अजमेर के इतिहास का द्वितीय चरण

    ई.1196 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का सुल्तान बना। इसके साथ ही अजमेर के इतिहास का प्रथम चरण समाप्त हो जाता है तथा द्वितीय चरण आरंभ होता है जो ई.1558 तक चलता है। ई.1196 से ई.1558 तक की अवधि में अजमेर- मालवा, गुजरात तथा दिल्ली के सुल्तानों एवं मेवाड़ तथा मारवाड़ के शासकों के बीच सिर फुटव्वल का कारण बना रहा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने सयैद हुसैन खनग सवार मीरन साहिब को अजमेर का दरोगा नियुक्त किया।

    इस प्रकार बारहवीं शताब्दी के अंत में अजमेर के चौहान सदैव के लिये नेपथ्य में चले गये। शाकंभरी राज्य लुप्त हो गया तथा स्वर्ग लोक से प्रतिस्पर्धा करने वाली उनकी राजधानी अजमेर का गर्व भंग हो गया। जिन चौहानों के भय से तोमरों, गहड़वालों तथा चौलुक्यों को नींद नहीं आती थी, जिन चौहानों ने अरब, सिंध, गजनी एवं गोर के आक्रांताओं को छः सौ वर्ष तक भारत भूमि से दूर रखा था, जिन चौहानों के राज्य में दिल्ली और हांसी छोटी सी जागीरों की हैसियत रखते थे, उन चौहानों ने अब अजमेर से दूर रहकर अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित करने के प्रयास आरंभ कर दिये। उनकी शक्ति रणथंभौर, बूंदी, नाडोल, जालोर, सिरोही तथा आबू के राज्यों में बँट गई।

    यद्यपि राणा सांगा (महाराणा संग्रामसिंह), हेमू (विक्रमादित्य हेमचन्द्र), राणा प्रताप (महाराणा प्रतापसिंह), महाराज छत्रपति शिवाजी, वीर दुर्गादास राठौड़ तथा महाराणा राजसिंह जैसे प्रतापी राजाओं एवं सेनानायकों ने देश की खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त करने के लिये अनेक प्रयास किये किन्तु लगता है जैसे दैव हिन्दू जाति से तथा भारत भूमि से रूठा हुआ है। इस कार्य को गति ई.1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद ही प्राप्त हुई। ई.1192 में तराइन के मैदान में अजमेर ने जो स्वतन्त्रता खोई वह ई.1947 में देश की राजनैतिक स्वतन्त्रता के बाद ही पुनः प्राप्त की जा सकी किंतु वह भी भारत के खण्ड-खण्ड होने के बाद।

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