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  • अजमेर का इतिहास - 13

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 13

    चौहान कालीन अजमेर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजयराज चौहान द्वारा बसाया गया अजमेर नगर निरंतर वृद्धि को प्राप्त करता हुआ तारागढ़ दुर्ग से बाहर के क्षेत्र में फैलता चला गया। छः सौ वर्षों में अजमेर नगर पर कई आक्रमण हुए किंतु नगर को कोई हानि नहीं पहुँच सकी। पृथ्वीराज चौहान के समय में अजमेर नगर तारागढ़ की पहाड़ी के नीचे पश्चिमी कौने में बसा हुआ था। यह नूरजहाँ के चश्मे (यह झरना अत्यंत प्राचीन काल से मौजूद था। जहाँगीर ने इसका नामकरण नूरजहाँ के नाम पर किया) और बाग (यह उद्यान सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जहाँगीर ने लगावाया था। इस उद्यान के जामुन उन्नीसवीं शताब्दी में भी अजमेर में प्रसिद्ध थे।) तक विस्तृत था। इस शहर का परकोटा और द्वार उन्नीसवीं शती में भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में विद्यमान थे। इस परकोटे का उत्तरी द्वार लक्ष्मी पोल कहलाता था जो तारागढ़ जाने वालों को रास्ते में दिखाई देता था। पृथ्वीराज के समय अजमेर में विख्यात जैन मंदिर मौजूद थे तथा तालाब बीसला (ई.1873 में मुराद अली ने इसे पाल बीचला लिखा है तथा इसे वीरान बताया है।) पर कुछ पुराने महल बने हुए थे जो जहाँगीर के समय तक मौजूद रहे।


    चौहान शासकों का धर्म

    शैव धर्म

    चौहान शासकों में शैव धर्म सर्वाधिक लोकप्रिय धर्म था। अनेक चौहान शासकों के इष्ट देवता शिव थे। हर्षनाथ की पहाड़ी का शिव मंदिर चौहानों के शैव होने का प्रमाण है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह शिव मंदिर न होकर हर्षनाथ भैरव का मंदिर है। दोनों ही स्थिति में चौहान शैव प्रमाणित होते हैं। विग्रहराज द्वारा रचित नाटक 'हरकेलि' में चौहान शासक विग्रहराज (चतुर्थ) ने शिव के मुख से गौरी के समक्ष कहलवाया है कि कवि विग्रहराज ने अपने 'हरकेलि' नाटक करने में मुझे इतना प्रसन्न कर दिया है कि मैं स्वयं इस नाटक को देखने जाउंगा। नाटक के अंत में भगवान शिव, काव्य जगत् में विग्रहराज की यशः पताका चिरकाल तक बने रहने का वरदान देते हैं तथा विग्रहराज को शाकंभरी पर राज्य करने के लिये पुनः अजमेर भेज देते हैं। इन पंक्तियों से भी चौहान शासकों की भगवान शिव के प्रति निष्ठा प्रकट होती है।

    सोमेश्वर तथा पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) के सिक्कों के पृष्ठ भाग में बैठा हुआ नंदी अंकित है जिसके पुट्ठे पर त्रिशूल अंकित है और लेख में आशावरी श्री सामन्तदेव अंकित है। इस सिक्के से भी चौहानों के शैव होने की पुष्टि होती है। नंदी तथा त्रिशूल तो शैव चिह्न हैं ही, साथ ही आशावरी से आशय चौहानों की इष्ट देवी आशापुरी से है जो कि महिषासुरमर्दिनी का अवतार है।

    वैष्णव धर्म

    चौहान साम्राज्य में वैष्णव धर्म भी अन्य धार्मिक सम्प्रदायों की तरह लोकप्रिय रहा। सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर अजमेर से प्राप्त एक लेख जिसे डी. सी. सरकार ने सम्पादित किया है, उसमें विष्णु के कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध ओर कल्कि का स्पष्ट उल्लेख है। चौहान नरेश विष्णु भक्त थे। उनके राज्य में विष्णु भक्ति का ही अधिक प्रचार था। राजपूताना म्यूजियम अजमेर में शेषशायी विष्णु (8-11 वीं शताब्दी) और त्रिपुरुष प्रतिमा आज भी सुरक्षित है।

    हर्षनाथ (सांभर) से विष्णु की बैठी हुई और बाघरा (अजमेर) से विष्णु की कमलासन प्रतिमायें प्राप्त हो चुकी हैं। चौहान शासकों में से कुछ राजाओं ने भगवान विष्णु को अपना आराध्य देव बनाया था। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य से ज्ञात होता है कि चामुण्डराज (1040-65 ई.) ने नरवर में वैष्णव मंदिर का निर्माण करवाया। चौहान शासक अर्णोराज भी भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा रखता था। सोमेश्वर ने तो अपने राजकीय आवास में ही विष्णु का मंदिर स्थापित कर दिया था। पृथ्वीराज द्वितीय के सम्बन्ध में (1165-1169 ई.) अभिलेखिकीय प्रमाण से ज्ञात होता है कि उसने भगवान मुरारी की कृपा प्राप्त करने के लिये प्रार्थना की थी। मुरारी को विष्णु का स्वरूप माना जाता है। इसी प्रकार नाडौल के चौहान राजा रतनपाल भी विष्णु के भक्त थे। इसी वंश के शासक कीर्तिपाल ने विष्णु की उपासना श्रीधर के रूप में की थी। चौहान शासकों के राज्य में विष्णु की उपासना अपराजितेश के रूप में भी की जाती थी। अजयदेव के चांदी मिश्रित धातु तथा ताम्बे के सिक्कों पर देवी लक्ष्मी की मूर्त्ति उत्कीर्ण है जो उसके वैष्णव होने का प्रमाण है।


    चौहान कालीन शासन व्यवस्था चौहानों की शासन व्यवस्था

    में प्राचीन आर्य शासन पद्धति के अनुसार राजा ही सम्पूर्ण शक्तियों का केन्द्र बिंदु था। वह अपने अधिकारों का स्वयं उपभोग करता था। कोष पर उसके अधिकार सीमित थे। ज्येष्ठ पुत्र नैसर्गिक रूप से उसका उत्तराधिकारी होता था। राज्य के समस्त कर्मचारी राजा के प्रति उत्तरदायी होते थे। राजा स्वेच्छा से गद्दी नहीं छोड़ सकता था। धर्म ग्रंथों द्वारा परम्परागत रूप से राजा का कार्य निर्दिष्ट था। प्रशासन की सुविधा के लिये राज्यकार्य कई विभागों में विभक्त था। राजा की अपनी सम्पत्ति राजकीय भोग अथवा स्वभोग कहलाती थी। सम्पूर्ण राज्य, वर्तमान जिलों की भांति पुरों में विभक्त था। पुरपाल स्वयं सेनानायक होते थे। पुरपाल को सलाह देने के लिये एक समिति होती थी जिसमें बारिक अर्थात् बारी-बारी से चुने जाने वाले सदस्य होते थे। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी।

    इसका प्रशासन पंचकुल द्वारा चलाया जाता था। ग्राम सचिव को करण्कि कहते थे जो पंचकुल के कार्यों का लेखा जोखा रखता था। पंचकुल के कार्यालय को श्रीकरण कहते थे।


    अजमेर के चौहान साम्राज्य के प्रमुख शासनाधिकारी

    अजमेर का चौहान साम्राज्य, शासनाधिकारियों की एक सृदढ़ व्यवस्था पर खड़ा था। कम से कम चालीस प्रकार के अधिकारी एवं कर्मचारी राजकीय सेवाओं में थे। इनके पदनाम इस प्रकार से हैं-

    1. मुख्य अमात्य(मुख्यमंत्री), 2. विग्रहिकामात्य (विदेश मंत्री), 3. अक्षपटलिक (मुख्य सचिव), 4. दण्डनायक (प्रांत अधिकारी), 5. महाध्यक्ष पटलिक (वित्त एवं राजस्व मंत्री), 6. कोषाध्यक्ष, 7. श्रीकरण(केन्द्रीय सचिव), 8.सेनाधिपति (सेनापति), 9. भण्डागारिक (खाद्यमंत्री), 10. महामात्य (महासचिव), 11. महाव्यूहपति (प्रधान सेनापति), 12. पत्याध्यक्ष (पदाति सेना का अध्यक्ष), 13. महाअश्वपति (घुड़सेना का अध्यक्ष), 14. गोल्मिक (थानेदार), 15. दुःसाध्य (गुप्तचर प्रमुख), 16.चौराद्वरणिक(कारागृह अध्यक्ष), 17. महादण्डनायक (सेनापति), 18. भट्ट, भट्टपुत्र, सरपतिक, बनजारा, दारिका (ये सब छोटे कर्मचारी थे), 19. कोटपाल (दुर्ग अधिकारी), 20. पुरपाल (जिला शासक), 21. राजचिंतक (जिलाधीश), 22. प्रांत पालक (गवर्नर), 23. महासाहनी (अश्वशाला का अध्यक्ष), 24. करणिक (लिपिक), 25. भिषक (राजवैद्य), 26. प्रतिहार (द्वारपाल), 27. नैमित्तिक (राजज्योतिषी), 28. विषयपति, 29. दण्डपाषिक, 30. शौल्किक (कर अधिकारी), 31. तारिक (वनपाल), 32. आटविक (पशु शालाओं एवं गौशालाओं की देखरेख करने वाला बड़ा कर्मचारी), 33.चाट (छोटा कर्मचारी), 34. महाबलाधिकृत (सर्वोच्च पुलिस अधिकारी), 35. परिग्रहिक (कनिष्ठ अधिकारी), 36. महास्थान (मुख्यालय),37. राजस्थानीय (राजकीय अधिकारी), 38. तलार, 39. तलाररक्ष, 40. महंत, महंत पट्टलिक, गोष्ठी पंचकुल, चौकड़िया (विभिन्न प्रकार के ग्राम मुखियाओं को भिन्न-भिन्न नामों से बुलाते थे)।


    पृथ्वीराज के शासन में न्याय व्यवस्था

    पृथ्वीराज के शासन में न्याय व्यवस्था आर्यों की प्राचीन पद्धति पर आधारित थी। ग्राम स्तर पर समस्त निर्णय एक ग्राम सभा करती थी। जो कोई व्यक्ति इस ग्राम सभा के निर्णय से संतुष्ट नहीं होता था, वह अपना प्रकरण लेकर क्षेत्रीय अधिकारी के समक्ष उपस्थित होता था। यदि वहाँ भी संतोषजनक निर्णय नहीं हो पाता था तो परिवादी अपना परिवाद लेकर सम्राट के समक्ष उपस्थित होता था। पृथ्वीराज के राज्य द्वार पर एक घण्टा लटका हुआ रहता था। परिवादी उसे बजाता था। राजा उस परिवादी को बुलाकर उसका परिवाद सुनता था तथा अपना निर्णय सुनाता था। जहाँगीर ने पृथ्वीराज चौहान की इसी घण्टा पद्धति का अनुकरण किया था। अपराधियों के लिये दण्ड की कड़ी व्यवस्था थी। उनके लिये कारावास बने हुए थे।


    चौहान कालीन अर्थव्यवस्था

    चौहान साम्राज्य के अंतर्गत ऊर्वर भूमि तथा जल, प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। इस कारण प्रजा सम्पन्न, सुखी एवं संतुष्ट थी। उन पर करों का भार अधिक नहीं था। भूमिकर वसूलने में कठोरता नहीं की जाती थी। भूमि कर अनाज एवं धन, दोनों रूपों में लिया जाता था। राजकोष की आय का दूसरा सबसे बड़ा साधन वाणिज्य एवं व्यापार से मिलने वाला कर था। सांभर झील से उत्पन्न होने वाले नमक से भी राज्य को अच्छी आय होती थी। पशु मेलों का आयोजन होता था जिनसे कर मिलता था। अश्वपालकों से भी कर लिया जाता था। वनों एवं पर्वतों से भी आय होती थी। जनता को वनों से कुछ लकड़ी बिना कर चुकाये ही काटने की अनुमति थी। राजकोष का अधिकतर भाग सेना तथा सैन्य अभियानों पर व्यय होता था। राजा की ओर से दान किया जाता था। राज्य के बड़े अधिकारियों को सेवा के बदले में जागीर मिलती थी तथा छोटे कर्मचारियों को वेतन मिलता था। मंदिरों एवं धार्मिक व्यक्तियों के जीवन निर्वाह हेतु भूमि एवं गांव दिये जाते थे। उस काल में अजमेर में गुप्तों की सोने और चांदी की मुद्राएं अधिक प्रचलन में थीं। (गौरीशंकर ओझा को अजमेर से गुप्तकाल के 20 सिक्के सोने के तथा 5 सिक्के चांदी के प्राप्त हुए थे।)

    चौहान कालीन मुद्राएँ

    विक्रम संवत की सातवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक राजस्थान के प्राचीन हिन्दू राजवंशों में से कवले तीन ही वंशों के सोने, चांदी या ताम्बे के सिक्के प्राप्त हुए हैं। ये सिक्के मेवाड़ के गुहिल, कन्नौज के प्रतिहार और अजमेर के चौहानों के हैं। इनमें सोने का सिक्का केवल गुहिलवंशी बप्प (बापा रावल) का मिला है। चौहानों के सिक्कों में एक ओर नंदी तथा दूसरी तरफ हाथ में भाला लिये हुए सवार होता था और कभी एक ओर लक्ष्मी और दूसरी ओर केवल लेख रहता था।

    अजयदेव (द्वितीय) से पहले किसी भी चौहान शासक की मुद्रा प्राप्त नहीं होती। चौहानों का सबसे पहला सिक्का अजयदेव का मिला है जो बारहवीं शताब्दी का है। ये चांदी मिश्रित धातु तथा ताम्बे के बने हैं। ये दो प्रकार के हैं। पहले पर सीधी तरफ लक्ष्मी की मूर्त्ति है जो सुघड़ नहीं है। पृष्ठ भाग में श्री अजय देव लिखा है। राजा सोमेश्वर के ई.1171 के धौड़ लेख से ज्ञात होता है कि अजयदेव के चांदी के सिक्के सोमेश्वर के समय में भी प्रचलन में थे। अजयदेव के दूसरे सिक्के पर सीधी तरफ एक भद्दी आकृति है तथा दूसरी तरफ रानी श्री सोमल देवी अंकित है।

    अजयदेव के बाद सोमेश्वर के सिक्के मिलते हैं जो मिश्रित धातु के हैं। इनका भार 53 ग्राम है। इनमें सीधी तरफ दायें हाथ में भाला लिये हुए घुड़सवार की आकृति है तथा ऊपर श्री सोमेश्वर देव लिखा हुआ है। पृष्ठ भाग में बैठा हुआ नंदी अंकित है जिसके पुट्ठे पर त्रिशूल अंकित है और लेख में आशावरी श्री सामन्तदेव अंकित है। आशावरी से आशय चौहानों की इष्ट देवी आशापुरी से है। पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) ने भी अपने सिक्के जारी किये। ये सिक्के सोमेश्वर के सिक्कों की अपेक्षा काफी सुंदर हैं। इनके सीधी तरफ भाला लिये हुए घुड़सवार है तथा लेख में श्री पृथ्वीराज देव अंकित है। इस सिक्के का पृष्ठ भाग सोमेश्वर के सिक्के के समान ही है। पृथ्वीराज के सिक्के का भार, सोमेश्वर के सिक्के से कम है। पृथ्वीराज के एक सिक्के को मुहम्मद शहाबुद्दीन गौरी ने दुबारा जारी किया। इसके सीधे भाग पर एक अश्वारोही है तथा श्री पृथ्वीराज देव अंकित है। पृष्ठ भाग में नंदी के ऊपर की ओर श्री मोहम्मद बिन साम अंकित है।

    चौहान काल में कौड़ियां सहित विभिन्न प्रकार की मुद्रायें प्रचलन में थीं। पांच कौड़ियों के बराबर एक पावीसा होता था। 4 पावीसा के बराबर एक बीसा होता था। 5 बीसा के बराबर 1 लोहटेक होता था। 4 लोहटेक के बराबर चांदी का एक रूपक होता था। 5 रूपक के बराबर 12 द्रम्म होते थे तथा 5 रूपक के बराबर ही सोने का एक निष्क होता था। चौहान कालीन एक भी सोने का सिक्का अब तक नहीं मिला है। चौहानों में विग्रहराज चतुर्थ सर्वाधिक पराक्रमी राजा हुआ किंतु उसके काल का किसी भी प्रकार का कोई सिक्का अब तक नहीं मिला है।

    भूमि का नाप-तौल

    पृथ्वीराज चौहान के काल में भूमि नापने की सबसे छोटी इकाई अंगुल थी। 24 अंगुल का एक हाथ, 4 हाथ का एक दण्ड, 2000 दण्ड का एक कोस तथा चार कोस का एक योजना होता था।


    बहुविवाह, सती और जौहर प्रथा

    बहु विवाह प्रथा

    चौहान शासकों में बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। सिंहराज के बारे में कहा जाता है कि उसकी कैद में भी उतनी ही रानियां थीं जितनी उसके महल में थीं। ई.1132 के बस्सी अभिलेख में चाहमान अजयपाल की तीन रानियों का उल्लेख है। साहित्यिक स्रोतों के अनुसार अर्णोराज चाहमान की 2 रानियों- मारोट की सुधवा एवं गुर्जरेश चौलुक्य जयसिंह की पुत्री कंचन देवी का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार पृथ्वीराज तृतीय की भी अनेक रानियां थीं।

    सती प्रथा

    चौहान राजवंश में सती प्रथा प्रचलित थी। चाहमान अजयपाल की मृत्यु पर सोमलदेवी सहित तीन रानियों के सती होने का उल्लेख मिलता है।

    जौहर प्रथा

    उस काल में जौहर प्रथा भी प्रचलित थी। ई. 724 अथवा ई.726 में में सिंध आक्रमण के समय दुर्लभराज (प्रथम) की रानियों ने जौहर का आयोजन किया। पृथ्वीराज तृतीय के भाई हरिराज ने, कुतुबुद्दीन ऐबक की सेनाओं के भय से, अपने सेनापति एवं स्त्री सहित जीवित ही अग्नि में प्रवेश किया था।

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