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  • अजमेर का इतिहास - 12

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 12

    भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (3)


    गौरी का अंतिम आक्रमण

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    गजनी पहुँचने के बाद पूरे एक साल तक मुहम्मद गौरी अपनी सेना में वृद्धि करता रहा। उसने एक से एक खूनी दरिन्दा अपनी सेना में जमा किया। जब उसकी सेना में 1,20,000 सैनिक जमा हो गये तो ई.1192 में वह पुनः पृथ्वीराज से लड़ने के लिये अजमेर की ओर चल दिया। इस बीच उसने अपनी सहायता के लिये कन्नौज के राजा जयचंद को भी अपनी ओर मिला लिया। हर बिलास शारदा के अनुसार कन्नौज के राठौड़ों (मारवाड़ के राठौड़, कन्नौज के गहड़वालों के ही वंशज माने जाते हैं, इसलिये हर बिलास शारदा ने राठौड़ शब्द काम में लिया है।) तथा गुजरात के सोलंकियों ने एक साथ षड़यन्त्र करके पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये शहाबुद्दीन को आमंत्रित किया। गौरी को कन्नौज तथा जम्मू के राजाओं द्वारा सैन्य सहायता उपलब्ध करवाई गई।

    संधि का छलावा

    जब गौरी लाहौर पहुँचा तो उसने अपना दूत अजमेर भेजा तथा पृथ्वीराज से कहलवाया कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले और गौरी की अधीनता मान ले। पृथ्वीराज ने उसे प्रत्युत्तर भिजवाया कि वह गजनी लौट जाये अन्यथा उसकी भेंट युद्ध स्थल में होगी। मुहम्मद गोरी, पृथ्वीराज को छल से जीतना चाहता था। इसलिये उसने अपना दूत दुबारा अजमेर भेजकर कहलवाया कि वह युद्ध की अपेक्षा सन्धि को अच्छा मानता है इसलिये उसके सम्बन्ध में उसने एक दूत अपने भाई के पास गजनी भेजा है। ज्योंही उसे गजनी से आदेश प्राप्त हो जायेंगे, वह स्वदेश लौट जायेगा तथा पंजाब, मुल्तान एवं सरहिंद को लेकर संतुष्ट हो जायेगा।

    इस संधि वार्ता ने पृथ्वीराज को भुलावे में डाल दिया। वह थोड़ी सी सेना लेकर तराइन की ओर बढ़ा, बाकी सेना जो सेनापति स्कंद के साथ थी, वह उसके साथ न जा सकी। उसका दूसरा सेनाध्यक्ष उदयराज भी समय पर अजमेर से रवाना न हो सका। पृथ्वीराज का मंत्री सोमेश्वर जो युद्ध के पक्ष में न था तथा पृथ्वीराज के द्वारा दण्डित किया गया था, वह अजमेर से रवाना होकर शत्रु से जाकर मिल गया। जब पृथ्वीराज की सेना तराइन के मैदान में पहुँची तो संधि वार्ता के भ्रम में आनंद में मग्न हो गई तथा रात भर उत्सव मनाती रही। इसके विपरीत गौरी ने शत्रुओं को भ्रम में डाले रखने के लिये अपने शिविर में भी रात भर आग जलाये रखी और अपने सैनिकों को शत्रुदल के चारों ओर घेरा डालने के लिये रवाना कर दिया।

    ज्योंही प्रभात हुआ, राजपूत सैनिक शौचादि के लिये बिखर गये। ठीक इसी समय तुर्कों ने अजमेर की सेना पर आक्रमण कर दिया। चारों ओर भगदड़ मच गई। पृथ्वीराज जो हाथी पर चढ़कर युद्ध में लड़ने चला था, अपने घोड़े पर बैठकर शत्रु दल से लड़ता हुआ मैदान से भाग निकला। वह सिरसा के आसपास गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया और मारा गया। गोविंदराय और अनेक सामंत वीर योद्धाओं की भांति लड़ते हुए काम आये।

    तराइन का मैदान

    मुहम्मद गौरी तथा पृथ्वीराज चौहान के बीच की दूसरी लड़ाई भी तराइन के मैदान में हुई। इतिहास में यह तराइन की दूसरी लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध है। फरिश्ता निजामुद्दीन अहमद तथा लेनपूल आदि कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद गौरी एवं पृथ्वीराज चौहान के बीच ई.1191 एवं 1192 के युद्ध नारायण नाम स्थान पर लड़े गये जिसे तारावदी भी कहा जाता है। कतिपय आधुनिक इतिहासकारों (ईश्वरी प्रसाद ने मिडाइवल इण्डिया पृ. 133 पर पाद टिप्पणी दी है- अधिकतर इतिहास में इसे नाराइन लिखा गया है जो कि गलत है। गांव का नाम तराइन है। यह थाणेश्वर एवं करनाल के बीच स्थित है। संभवतः यह त्रुटि पर्शियन लिपि के कारण हुई है।) के अनुसार ये युद्ध तारावदी नामक स्थान पर लड़े गये जिसे तराइन भी कहा जाता है। समकालीन लेखक मिन्हाज उस सिराज द्वारा लिखित तबकात-इ-नासिरी में भी तराइन नाम दिया गया है। आधुनिक लेखक युद्ध स्थल का सही नाम इसी को मानते हैं। नारायन के स्थान पर तराइन अथवा तराइन के स्थान पर नारायन पाठ का यह अंतर पर्शियन लिपि की शिकस्ता ढंग की लेखनी के कारण हुआ है जिसमें पहले अक्षर के ऊपर कुछ बिंदुओं के अंतर के कारण तराइन का नाराइन अथवा नाराइन का तराइन हो जाता है।

    सम्राट की हत्या

    तराइन की पहली लड़ाई का अमर विजेता दिल्ली का राजा तोमर गोविन्दराज तथा चितौड़ का राजा समरसिंह भी तराइन की दूसरी लड़ाई में मारे गये। तुर्कों ने भागती हुई हिन्दू सेना का पीछा किया तथा उन्हें बिखेर दिया। पृथ्वीराज के अंत के सम्बन्ध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं।

    पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज का अंत गजनी में दिखाया गया है। इस विवरण के अनुसार पृथ्वीराज पकड़ लिया गया और गजनी ले जाया गया जहॉं उसकी आंखें फोड़ दी गईं। पृथ्वीराज का बाल सखा और दरबारी कवि चन्द बरदाई भी उसके साथ था। उसने पृथ्वीराज की मृत्यु निश्चित जानकर शत्रु के विनाश का कार्यक्रम बनाया। कवि चन्द बरदाई ने गौरी से निवेदन किया कि आंखें फूट जाने पर भी राजा पृथ्वीराज शब्द भेदी निशाना साध कर लक्ष्य वेध सकता है। इस मनोरंजक दृश्य को देखने के लिये गौरी ने एक विशाल आयोजन किया। एक ऊँचे मंच पर बैठकर उसने अंधे राजा पृथ्वीराज को लक्ष्य वेधने का संकेत दिया। जैसे ही गौरी के अनुचर ने लक्ष्य पर शब्द उत्पन्न किया, कवि चन्द बरदाई ने यह दोहा पढ़ा-


    चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण

    ता उपर सुल्तान है मत चूके चौहान।

    गौरी की स्थिति का आकलन करके पृथ्वीराज ने तीर छोड़ा जो गौरी के कण्ठ में जाकर लगा और उसी क्षण उसके प्राण पंखेरू उड़ गये। शत्रु का विनाश हुआ जानकर और उसके सैनिकों के हाथों में पड़कर अपमानजनक मृत्यु से बचने के लिए कवि चन्द बरदाई ने राजा पृथ्वीराज के पेट में अपनी कटार भौंक दी और अगले ही क्षण उसने वह कटार अपने पेट में भौंक ली। इस प्रकार दोनों अनन्य मित्र वीर लोक को गमन कर गये। उस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 26 वर्ष थी। इतिहासकारों ने चंद बरदाई के इस विवरण को सत्य नहीं माना है क्योंकि इस ग्रंथ के अतिरिक्त इस विवरण की और किसी समकालीन स्रोत से पुष्टि नहीं होती।

    हम्मीर महाकाव्य में पृथ्वीराज को कैद करना और अंत में उसको मरवा देने का उल्लेख है। विरुद्धविधिविध्वंस में पृथ्वीराज का युद्ध स्थल में काम आना लिखा है। पृथ्वीराज प्रबन्ध का लेखक लिखता है कि विजयी शत्रु पृथ्वीराज को अजमेर ले आये और वहाँ उसे एक महल में बंदी के रूप में रखा गया। इसी महल के सामने मुहम्मद गौरी अपना दरबार लगाता था जिसको देखकर पृथ्वीराज को बड़ा दुःख होता था। एक दिन उसने मंत्री प्रतापसिंह से धनुष-बाण लाने को कहा ताकि वह अपने शत्रु का अंत कर दे। मंत्री प्रतापसिंह ने उसे धनुष-बाण लाकर दे दिये तथा उसकी सूचना गौरी को दे दी। पृथ्वीराज की परीक्षा लेने के लिये गौरी की मूर्ति एक स्थान पर रख दी गई जिसको पृथ्वीराज ने अपने बाण से तोड़ दिया। अंत में गौरी ने पृथ्वीराज को गड्ढे में फिंकवा दिया जहाँ पत्थरों की चोटों से उसका अंत कर दिया गया।

    दो समसामयिक लेखक यूफी तथा हसन निजामी पृथ्वीराज को कैद किया जाना तो लिखते हैं किंतु निजामी यह भी लिखता है कि जब बंदी पृथ्वीराज जो इस्लाम का शत्रु था, सुल्तान के विरुद्ध षड़यन्त्र करता हुआ पाया गया तो उसकी हत्या कर दी गई। मिनहाज उस सिराज उसके भागने पर पकड़ा जाना और फिर मरवाया जाना लिखता है। फरिश्ता भी इसी कथन का अनुमोदन करता है। अबुल फजल लिखता है कि पृथ्वीराज को सुलतान गजनी ले गया जहाँ पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई।

    उपरोक्त सारे विवरणों में से केवल यूफी और निजामी समसामयिक हैं, शेष लेखक बाद में हुए हैं किंतु यूफी और निजामी पृथ्वीराज के अंत के बारे में अधिक जानकारी नहीं देते। निजामी लिखता है कि पृथ्वीराज को कैद किया गया तथा किसी षड़यन्त्र में भाग लेने का दोषी पाये जाने पर मरवा दिया गया। यह विवरण पृथ्वीराज प्रबन्ध के विवरण से मेल खाता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पृथ्वीराज को युद्ध क्षेत्र से पकड़कर अजमेर लाया गया तथा कुछ दिनों तक बंदी बनाकर रखने के बाद अजमेर में ही उसकी हत्या की गई।

    भारत के इतिहास का प्राचीन काल समाप्त

    ई.1192 में चौहान पृथ्वीराज (तृतीय) की मृत्यु के साथ ही भारत का इतिहास मध्यकाल में प्रवेश कर जाता है। इस समय भारत में दिल्ली, अजमेर तथा लाहौर प्रमुख राजनीतिक केन्द्र थे और ये तीनों ही मुहम्मद गौरी और उसके गवर्नरों के अधीन जा चुके थे।

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