Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 11
  • अजमेर का इतिहास - 11

     03.06.2020
     अजमेर का इतिहास - 11

    भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (2)


    चौहान-गहड़वाल संघर्ष

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जैसे दक्षिण में चौलुक्य चौहानों के शत्रु थे, वैसे ही उत्तर पूर्व में गहड़वाल चौहानों के शत्रु थे। जब पृथ्वीराज ने नागों, भण्डानकों तथा चंदेलों को परास्त कर दिया तो कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद्र में चौहानराज के प्रति ईर्ष्या जागृत हुई। कुछ भाटों के अनुसार दिल्ली के राजा अनंगपाल के कोई लड़का न था अतः अनंगपाल तोमर ने दिल्ली का राज्य भी अपने दौहित्र पृथ्वीराज चौहान को दे दिया। अनंगपाल की दूसरी पुत्री का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल से हुआ था जिसका पुत्र जयचन्द हुआ। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) तथा जयचन्द मौसेरे भाई थे।

    (पृथ्वीराज की माता कर्पूरदेवी चेदिदेश की राजकुमारी थी न कि दिल्ली की। भाटों और ख्यातों ने पृथ्वीराज को अनंगपाल का दौहित्र कहा गया है। हो सकता है कि चेदिदेश के कलचुरी राजा अचलराज तथा दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल के बीच कोई वैवाहिक सम्बन्ध हो जिसके आधार पर पृथ्वीराज दिल्ली के अनंगपाल का दौहित्र लगता हो।) जब अनंगपाल ने पृथ्वीराज को दिल्ली का राज्य देने की घोषणा की तो जयचन्द पृथ्वीराज का शत्रु हो गया और उसे नीचा दिखाने के अवसर खोजने लगा। पृथ्वीराज चौहान स्वयं तो सुन्दर नहीं था किन्तु उसमें सौन्दर्य बोध अच्छा था। उसने पांच सुन्दर स्त्रियों से विवाह किये जो एक से बढ़ कर एक रमणीय थीं।

    पृथ्वीराज रासो के लेखक कवि चन्द बरदाई ने चौहान तथा गहड़वाल संघर्ष का कारण जयचंद की पुत्री संयोगिता को बताया है। कथा का सारांश इस प्रकार से है- पृथ्वीराज की वीरता के किस्से सुनकर जयचन्द की पुत्री संयोगिता ने मन ही मन उसे पति स्वीकार कर लिया। जब राजा जयचन्द ने संयोगिता के विवाह के लिये स्वयंवर का आयोजन किया तो पृथ्वीराज को आमन्त्रित नहीं किया गया, वरन् उसकी लोहे की मूर्ति बनाकर स्वंयवर शाला के बाहर द्वारपाल की जगह खड़ी कर दी गई। संयोगिता को जब इस स्वयंवर के आयोजन की सूचना मिली तो उसने पृथ्वीराज को संदेश भिजवाया कि वह पृथ्वीराज से ही विवाह करना चाहती है। पृथ्वीराज अपने विश्वस्त अनुचरों के साथ वेष बदलकर कन्नौज पंहुचा।

    संयोगिता ने प्रीत का प्रण निबाहा और अपने पिता के क्रोध की चिन्ता किये बिना, स्वयंवर की माला पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में डाल दी। जब पृथ्वीराज को संयोगिता के अनुराग की गहराई का ज्ञान हुआ तो वह स्वयंवर शाला से ही संयोगिता को उठा लाया। कन्नौज की विशाल सेना उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकी। पृथ्वीराज के कई विश्वस्त और पराक्रमी सरदार कन्नौज की सेना से लड़ते रहे ताकि राजा पृथ्वीराज, कन्नौज की सेना की पकड़ से बाहर हो जाये। सरदार अपने स्वामी की रक्षा के लिए तिल-तिलकर कट मरे। राजा अपनी प्रेयसी को लेकर सुरक्षित राजधानी को पहुँच गया। (पातसाहि का ब्यौरा नामक ग्रंथ में पृथ्वीराज संयोगिता प्रकरण का अंश इस प्रकार से दिया गया है- तब राजा पृथ्वीराज संजोगता परणी। जहि राजा कैसा कुल सौला 16 सूरी का 100 हुआ। त्याके भरोसे परणी ल्याओ। लड़ाई सावता कही। पणी राजा जैचंद पूंगलो पूज्यो नहीं। संजोगता सरूप हुई। तहि के बसी राजा हुवो। सौ म्हैला ही मा रही। महीला पंदरा बारा ने नीसरियो नहीं।)

    भाटों की कल्पना अथवा वास्तविकता

    प्रेम, बलिदान और शौर्य की इस प्रेम गाथा को पृथ्वीराज रासो में बहुत ही सुन्दर विधि से अंकित किया है। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन ने अपने उपन्यास पूर्णाहुति में भी इस प्रेमगाथा को बड़े सुन्दर तरीके से लिखा है। रोमिला थापर, आर. एस. त्रिपाठी, गौरीशंकर ओझा आदि इतिहासकारों ने इस घटना के सत्य होने में संदेह किया है क्योंकि संयोगिता का वर्णन रम्भामंजरी में तथा जयचंद्र के शिलालेखों में नहीं मिलता। इन इतिहासकारों के अनुसार संयोगिता की कथा 16वीं सदी के किसी भाट की कल्पना मात्र है। दूसरी ओर सी.वी. वैद्य, गोपीनाथ शर्मा तथा डा.दशरथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने इस घटना को सही माना है।

    रहस्यमय शासक

    पृथ्वीराज चौहान का जीवन शौर्य और वीरता की अनुपम कहानी है। वह वीर, विद्यानुरागी, विद्वानों का आश्रयदाता तथा प्रेम में प्राणों की बाजी लगा देने वाला था। उसकी उज्जवल कीर्ति भारतीय इतिहास के गगन में धु्रव नक्षत्र की भांति दैदीप्यमान है। आज आठ सौ साल बाद भी वह कोटि-कोटि हिन्दुओं के हदय का सम्राट है। उसे अन्तिम हिन्दू सम्राट कहा जाता है। उसके बाद इतना पराक्रमी हिन्दू राजा इस धरती पर नहीं हुआ। उसके दरबार में विद्वानों का एक बहुत बड़ा समूह रहता था। उसे छः भाषायें आती थीं तथा वह प्रतिदिन व्यायाम करता था। वह उदारमना तथा विराट व्यक्तित्व का स्वामी था।

    चितौड़ का स्वामी समरसी (समरसिंह) उसका सच्चा मित्र, हितैषी और शुभचिंतक था। पृथ्वीराज का राज्य सतलज नदी से बेतवा तक तथा हिमालय के नीचे के भागों से लेकर आबू तक विस्तृत था। जब तक संसार में शौर्य जीवित रहेगा तब तक पृथ्वीराज चौहान का नाम भी जीवित रहेगा। उसकी सभा में धार्मिक एवं साहित्यक चर्चाएं होती थीं। उसके काल में कार्तिक शुक्ला 10 वि.सं. 1239 (ई.1182) में अजमेर में खतरगच्छ के जैन आचार्य जिनपति सूरि तथा उपकेशगच्छ के आचार्य पद्मप्रभ के बीच शास्त्रार्थ हुआ। ई.1190 में जयानक ने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'पृथ्वीराज विजय' की रचना की। डा. दशरथ शर्मा के अनुसार, अपने गुणों के आधार पर पृथ्वीराज चौहान योग्य व रहस्यमय शासक था।

    पृथ्वीराज की रानियां

    पृथ्वीराज की रानियों की कोई विश्वसनीय संख्या नहीं दी जा सकती। कहीं-कहीं उसके पांच विवाहों का उल्लेख मिलता है किंतु पृथ्वीराज विजय एवं चौहान कुल कल्पदु्रम पृथ्वीराज की 16 रानियों का उल्लेख करते हैं- (1.) आबू के राव आल्हण पंवार की पुत्री इच्छिनी पंवार, (2.) मण्डोर के राव नाहड़ प्रतिहार की पुत्री जतनकंवर, (3.) देलवाड़ा के रामसिंह सोलंकी की पुत्री प्रतापकंवर, (4.) नागौर के दाहिमा राजपूतों की पुत्री सूरज कंवर, (5.) गौड़ राजकुमारी ज्ञान कंवर, (6.) बड़गूजरों की राजकुमारी नंद कंवर, (7.) यादव राजकुमारी पद्मावती। (8.) गहलोत राजकुमारी कंवर दे, (9.) आमेर नरेश पंजन की राजकुमारी जस कंवर कछवाही, (10.) मण्डोर के चंद्रसेन की पुत्री चंद्रकंवर पड़िहार, (11.) राठौड़ तेजसिंह की पुत्री शशिव्रता, (12.) देवास की सोलंकी राजकुमारी चांदकंवर, (13.) बैस राजा उदयसिंह की पुत्री रतनकंवर, (14.) सोलंकियों की राजकुमारी सूरजकंवर, (15.) प्रतापसिंह मकवाणी तथा (16.) कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता।

    ये समस्त नाम विश्वसनीय नहीं कहे जा सकते किंतु इनमें से कुछ नाम सही होने चाहिये।

    पृथ्वीराज के पुत्र

    पृथ्वीराज के पुत्रों की वास्तविक संख्या ज्ञात नहीं है। कुछ इतिहासकार केवल गोविंदराज को ही पृथ्वीराज का एकमात्र पुत्र मानते हैं। यह अपने पिता के समय में ही सेना का संचालन करता था। हम्मीर महाकाव्य ने भी इसी नाम का उल्लेख किया है। मुस्लिम इतिहासकारों ने गोविंदराज अथवा किसी भी पुत्र का कोई उल्लेख नहीं किया है। पृथ्वीराज रासो एवं अन्य हिन्दू ग्रंथों के अनुसार पृथ्वीराज का सबसे बड़ा पुत्र रेणसी था। दूसरा पुत्र गोविंदराज था। इसके अतिरिक्त बलभद्र भरत, अक्षय कुमार, जोध एवं लाखन भी पृथ्वीराज चौहान के पुत्र बताये जाते हैं जो अजमेर पर पुनः अधिकार करने के प्रयासों में मारे गये। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज की गुहिलोत रानी कंवरदे के गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न हुए थे जिनमें से एक रेणसी तथा दूसरा पुत्र सामंतसिंह था।

    शहाबुद्दीन गौरी के आक्रमण

    ई.1173 में मुहम्मद शहाबुद्दीन गौरी को गजनी का गवर्नर नियुक्त किया गया। गद्दी पर बैठने के बाद उसने भारत की तफर बढ़ना आरंभ किया। ई.1178 में चौहान सेनाओं से प्रथम बार उसकी मुठभेड़ हुई। ई.1181 में उसने सियालकोट का दुर्ग हिन्दुओं से छीन लिया। ई.1186 में उसने खसरू मलिक को परास्त करके लाहौर भी छीन लिया। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयां हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे। हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा सात बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है। पृथ्वीराज प्रबन्ध आठ बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है। प्रबन्ध कोष का लेखक बीस बार गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है। सुर्जन चरित्र में 21 बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में 23 बार गौरी का हारना अंकित है।

    तराइन की विजय

    ई.1189 में मुहम्मद गौरी ने भटिण्डा का दुर्ग हिन्दुओं से छीन लिया। उस समय यह दुर्ग चौहानों के अधीन था। पृथ्वीराज उस समय तो चुप बैठा रहा किन्तु ई.1191 में जब मुहम्मद गोरी, तबरहिंद (सरहिंद) जीतने के बाद आगे बढ़ा तो पृथ्वीराज ने करनाल जिले के तराइन के मैदान में उसका रास्ता रोका। यह लड़ाई इतिहास में तराइन की प्रथम लड़ाई के नाम से जानी जाती है। युद्ध के मैदान में गौरी का सामना दिल्ली के राजा गोविंदराय से हुआ। गौरी ने गोविंदराय पर भाला फैंक कर मारा जिससे गोविंदराय के दो दांत बाहर निकल गये। गोविंदराय ने भी प्रत्युत्तर में अपना भाला गौरी पर देकर मारा। इस वार से गौरी बुरी तरह घायल हो गया और उसके प्राणों पर संकट आ खड़ा हुआ। यह देखकर गौरी के आदमी उसे मैदान से ले भागे। बची हुई फौज में भगदड़ मच गई। मुहम्मद गौरी लाहौर पहुँचा तथा अपने घावों का उपचार करके गजनी लौट गया। पृथ्वीराज ने आगे बढ़कर तबरहिंद का दुर्ग गौरी के सेनापति काजी जियाउद्दीन से छीन लिया। काजी को बंदी बनाकर अजमेर लाया गया जहाँ उससे विपुल धन लेकर उसे गजनी लौट जाने की अनुमति दे दी गई।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×