Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 10
  • अजमेर का इतिहास - 10

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 10

    भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    सोमेश्वर की मृत्यु होने पर उसका 11 वर्षीय पुत्र पृथ्वीराज (तृतीय) ई.1179 में अजमेर की गद्दी पर बैठा। भारत के इतिहास में वह पृथ्वीराज चौहान तथा राय पिथौरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गद्दी पर बैठते समय अल्प वयस्क होने के कारण उसकी माता कर्पूर देवी अजमेर का शासन चलाने लगी। कर्पूर देवी, चेदि देश की राजकुमारी थी तथा कुशल राजनीतिज्ञ थी। उसने बड़ी योग्यता से अपने अल्पवयस्क पुत्र के राज्य को संभाला। उसने दाहिमा राजपूत कदम्बवास को अपना प्रधानमंत्री बनाया जिसे केम्ब वास तथा कैमास भी कहते हैं। कदम्ब वास ने अपने स्वामि के षट्गुणों की रक्षा की तथा राज्य की रक्षा के लिये चारों ओर सेनाएं भेजीं। वह विद्यानुरागी था जिसे पद्मप्रभ तथा जिनपति सूरि के शास्त्रार्थ की अध्यक्षता का गौरव प्राप्त था। उसने बड़ी राजभक्ति से शासन किया। नागों के दमन में कदम्बवास की सेवाएं श्लाघनीय थीं। चंदेल तथा मोहिलों ने भी इस काल में शाकम्भरी के राज्य की बड़ी सेवा की। कर्पूरदेवी का चाचा भुवनायक मल्ल (इसके भुवनमल्ल अथवा भुवनीकमल नाम भी मिलते हैं।) पृथ्वीराज की देखभाल के लिये गुजरात से अजमेर आ गया तथा उसके कल्याण हेतु कार्य करने लगा। जिस प्रकार गरुड़ ने राम और लक्ष्मण को मेघनाद के नागपाश से मुक्त किया था, उसी प्रकार भुवनमल्ल ने पृथ्वीराज को शत्रुओं से मुक्त रखा।

    कर्पूरदेवी के संरक्षण से मुक्ति

    कर्पूरदेवी का संरक्षण काल कम समय का था किंतु इस काल में अजमेर और भी सम्पन्न और समृद्ध नगर बन गया। पृथ्वीराज ने कई भाषाओं और शास्त्रों का अध्ययन किया तथा अपनी माता के निर्देशन में अपनी प्रतिभा को अधिक सम्पन्न बनाया। इसी अवधि में उसने राज्य कार्य में दक्षता अर्जित की तथा अपनी भावी योजनाओं को निर्धारित किया जो उसकी निरंतर विजय योजनाओं से प्रमाणित होता है। पृथ्वीराज कालीन प्रारंभिक विषयों एवं शासन सुव्यवस्थाओं का श्रेय कर्पूरदेवी को दिया जा सकता है जिसने अपने विवेक से अच्छे अधिकारियों को अपना सहयोगी चुना और कार्यों को इस प्रकार संचालित किया जिससे बालक पृथ्वीराज के भावी कार्यक्रम को बल मिले। पृथ्वीराज विजय के अनुसार कदम्बवास का जीवन पृथ्वीराज व माता कर्पूरदेवी के प्रति समर्पित था। कदम्बवास की ठोड़ी कुछ आगे निकली हुई थी। वह राज्य की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखता था। कहीं से गड़बड़ी की सूचना पाते ही तुरंत सेना भेजकर स्थिति को नियंत्रण में करता था।

    कदम्बवास की मृत्यु

    संभवतः संरक्षण का समय एक वर्ष से अधिक न रह सका तथा ई.1178 में पृथ्वीराज ने स्वयं सभी कार्यों को अपने हाथ में ले लिया। इस स्थिति का कारण उसकी महत्त्वाकांक्षा एवं कार्य संचालन की क्षमता उत्पन्न होना हो सकता है। संभवतः कदम्बवास की शक्ति को अपने पूर्ण अधिकार से काम करने में बाधक समझ कर उसने कुछ अन्य विश्वस्त अधिकारियों की नियुक्ति की जिनमें प्रतापसिंह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भाग्यवश कदम्बवास की मृत्यु ने कदम्बवास को पृथ्वीराज के मार्ग से हटाया। रासो के लेखक ने कदम्बवास की हत्या स्वयं पृथ्वीराज द्वारा होना लिखा है तथा पृथ्वीराज प्रबन्ध में उसकी मृत्यु का कारण प्रतापसिंह को बताया है। डॉ. दशरथ शर्मा पृथ्वीराज या प्रतापसिंह को कदम्बवास की मृत्यु का कारण नहीं मानते क्योंकि हत्या सम्बन्धी विवरण बाद के ग्रंथों पर आधारित है। मृत्यु सम्बन्धी कथाओं में सत्यता का कितना अंश है, यह कहना कठिन है किंतु पृथ्वीराज की शक्ति संगठन की योजनाएं इस ओर संकेत करती हैं कि पृथ्वीराज ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति में कदम्बवास को बाधक अवश्य माना हो तथा उससे मुक्ति का मार्ग ढूंढ निकाला हो। इस कार्य में प्रतापसिंह का सहयोग मिलना भी असम्भव नहीं दिखता। इस कल्पना की पुष्टि कदम्बवास के ई.1180 के पश्चात् कहीं भी महत्त्वपूर्ण घटनाओं के साथ उल्लेख के अभाव से होती है।

    अपरगांग्य तथा नागार्जुन का दमन

    उच्च पदों पर विश्वस्त अधिकारियों को नियुक्त करने के बाद पृथ्वीराज ने अपनी विजय नीति को आरंभ करने का बीड़ा उठाया। पृथ्वीराज के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद उसके चाचा अपरगांग्य(इस समय तक सोमेश्वर को कोई भाई जीवित नहीं था। अतः अपरगांग्य तथा नागार्जुन, सोमेश्वर के चचेरे भाईयों के पुत्र होंगे।) ने विद्रोह का झण्डा उठाया। पृथ्वीराज ने उसे परास्त किया तथा उसकी हत्या करवाई। इस पर पृथ्वीराज के दूसरे चाचा तथा अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने विद्रोह को प्रज्ज्वलित किया तथा गुड़गांव पर अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज ने गुड़गांव पर भी आक्रमण किया। नागार्जुन गुड़गांव से भाग निकला किंतु उसके स्त्री, बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य पृथ्वीराज के हाथ लग गये। पृथ्वीराज ने उन्हें बंदी बना लिया। पृथ्वीराज बहुत से विद्रोहियों को पकड़कर अजमेर ले आया तथा उन्हें मौत के घाट उतार कर उनके मुण्ड नगर की प्राचीरों और द्वारों पर लगाये गये जिससे भविष्य में अन्य शत्रु सिर उठाने की हिम्मत न कर सकें। नागार्जुन का क्या हुआ, कुछ विवरण ज्ञात नहीं होता।

    भण्डानकों का दमन

    राज्य के उत्तरी भाग में मथुरा, भरतपुर तथा अलवर के निकट भण्डानक जाति रहती थी। विग्रहराज (चतुर्थ) ने इन्हें अपने अधीन किया था किंतु उसे विशेष सफलता नहीं मिली। ई.1182 के लगभग पृथ्वीराज चौहान दिगिवजय के लिये निकला। उसने भण्डानकों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियां घेर लीं। बहुत से भण्डानक मारे गये और बहुत से उत्तर की ओर भाग गये। इस आक्रमण का वर्णन समसामयिक लेखक जिनपति सूरि ने किया है। इस आक्रमण के बाद भण्डानकों की शक्ति सदा के लिये क्षीण हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीराज के राज्य की दो धुरियां- अजमेर तथा दिल्ली एक राजनीतिक सूत्र में बंध गईं।

    चंदेलों का दमन

    अब पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमायें उत्तर में मुस्लिम सत्ता से, दक्षिण-पश्चिम में गुजरात से, पूर्व में चंदेलों के राज्य से जा मिलीं। चंदेलों के राज्य में बुन्देलखण्ड, जेजाकमुक्ति तथा महोबा स्थित थे। कहा जाता है कि एक बार चंदेलों के राजा परमारदी देव ने पृथ्वीराज के कुछ घायल सैनिकों को मरवा दिया। उनकी हत्या का बदला लेने के लिये पृथ्वीराज चौहान ने चंदेलों पर आक्रमण किया। उसने जब चंदेल राज्य को लूटना आरंभ किया तो परमारदी भयभीत हो गया। परमारदी ने अपने सेनापतियों आल्हा तथा ऊदल को पृथ्वीराज के विरुद्ध रणक्षेत्र में उतारा। तुमुल युद्ध के पश्चात् परमारदी के सेनापति परास्त हुए। आल्हा तथा ऊदल ने इस युद्ध में अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया। उनके गुणगान सैंकड़ों साल से लोक गीतों में किये जाते हैं। आल्हा की गणना सप्त चिरंजीवियों में की जाती है। महोबा राज्य का बहुत सा भूभाग पृथ्वीराज चौहान के हाथ लगा। उसने अपने सामंत पंजुनराय को महोबा का अधिकारी नियुक्त किया।

    ई.1182 के मदनपुर लेख के अनुसार पृथ्वीराज ने जेजाकमुक्ति के प्रवेश को नष्ट किया। सारंगधर पद्धति और प्रबंध चिंतामणि के अनुसार परमारदी ने मुख में तृण लेकर पृथ्वीराज से क्षमा याचना की। चंदेलों के राज्य की दूसरी तरफ की सीमा पर कन्नौज के गहरवारों का शासन था। माऊ शिलालेख के अनुसार महोबा और कन्नौज में मैत्री सम्बन्ध था। चंदेलों और गहड़वालों का संगठन, पृथ्वीराज के लिये सैनिक व्यय का कारण बन गया।

    चौहान-चौलुक्य संघर्ष

    पृथ्वीराज (तृतीय) के समय में चौहान-चौलुक्य संघर्ष एक बार पुनः उठ खड़ा हुआ। पृथ्वीराज ने आबू के सांखला परमार नरेश की पुत्री इच्छिना से विवाह कर लिया। इससे गुजरात का चौलुक्य राजा भीमदेव (द्वितीय) पृथ्वीराज से नाराज हो गया क्योंकि भीमदेव भी इच्छिना से विवाह करना चाहता था। डॉ. ओझा इस कथन को सत्य नहीं मानते क्योंकि ओझा के अनुसार उस समय आबू में धारावर्ष परमार का शासन था न कि सांखला परमार का।

    पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज के चाचा कान्हड़देव (यह भी सोमेश्वर के चचेरे भाइयों में से एक होना चाहिये।) ने भीमदेव के चाचा सारंगदेव के सात पुत्रों की हत्या कर दी। इससे नाराज होकर भीमदेव ने अजमेर पर आक्रमण कर दिया और सोमेश्वर चौहान की हत्या करके नागौर पर अपना अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिये भीमदेव को युद्ध में परास्त कर मार डाला और नागौर पर पुनः अधिकार कर लिया। इन कथानकों में कोई ऐतिहासिक महत्त्व नहीं है क्योंकि सोमेश्वर की मृत्यु किसी युद्ध में नहीं हुई थी तथा भीमदेव (द्वितीय) ई.1241 के लगभग तक जीवित था।

    चौहान-चालुक्य संघर्ष के फिर से उठ खड़े होने का कारण जो भी हो किंतु वास्तविकता यह भी थी कि चौहानों तथा चौलुक्यों के राज्यों की सीमायें मारवाड़ में आकर मिलती थीं। इधर पृथ्वीराज (तृतीय) और उधर भीमदेव (द्वितीय), दोनों ही महत्त्वाकांक्षी शासक थे। इसलिये दोनों में युद्ध अवश्यम्भावी था। खतरगच्छ पट्टावली में ई.1187 में पृथ्वीराज द्वारा गुजरात अभियान करने का वर्णन मिलता है। बीरबल अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है। कुछ साक्ष्य इस युद्ध की तिथि ई.1184 बताते हैं। इस युद्ध में चौलुक्यों की पराजय हो गई। इस पर चौलुक्यों के महामंत्री जगदेव प्रतिहार के प्रयासों से चौहानों एवं चौलुक्यों में संधि हो गई। संधि की शर्तों के अनुसार चौलुक्यों ने पृथ्वीराज चौहान को काफी धन दिया।

    खतरगच्छ पट्टावली के अनुसार अजमेर राज्य के कुछ धनी व्यक्ति जब इस युद्ध के बाद गुजरात गये तो गुजरात के दण्डनायक ने उनसे भारी राशि वसूलने का प्रयास किया। जब चौलुक्यों के महामंत्री जगदेव प्रतिहार को यह बात ज्ञात हुई तो उसने दण्डनायक को लताड़ा क्योंकि जगदेव के प्रयासों से चौलुक्यों एवं चौहानों के बीच संधि हुई थी और वह नहीं चाहता था कि यह संधि टूटे। इसलिये जगदेव ने दण्डनायक को धमकाया कि यदि तूने चौहान साम्राज्य के नागरिकों को तंग किया तो मैं तुझे गधे के पेट में सिलवा दूंगा। वि.सं.1244 के वेरवल से मिले जगदेव प्रतिहार के लेख में इससे पूर्व भी अनेक बार पृथ्वीराज से परास्त होना सिद्ध होता है। इस अभियान में ई.1187 में पृथ्वीराज चौहान ने आबू के परमार शासक धारावर्ष को भी हराया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×