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  • सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी)

     20.05.2018
     सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी)

    सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी) 

    कमल बाबू ने लोहे का गेट खोलकर घर में प्रवेश करते हुए देखा, सेमल का पेड़ आज भी कौने में प्रहरी की तरह खड़ा हुआ है, ठीक उसी तरह जिस तरह आज से चौबीस साल पहले कमल बाबू ने आखिरी बार उसे यहाँ खड़े हुए देखा था। प्रहरी शब्द कमल बाबू को दुविधा में डाल देता है। किसका प्रहरी है यह! घर का! या उसमें रहने वालों का! संभवतः दोनों का ही नहीं। वह तो समय का प्रहरी है। बीतने वाले एक-एक पल का प्रहरी। जब भी एक प्रहर बीतता है सेमल का वृक्ष आकाश रूपी चौड़े थाल पर अपनी टहनियों से आघात करता है। हवा का एक झौंका उद्वेलित होता है और उसी के साथ पूरा वृक्ष सम्पूर्ण शक्ति से झूमने लगता है मानो किसी हठी योगी के योगासन की एक मुद्रा पूरी हो गयी हो और अब दूसरी मुद्रा में जाने का समय हो गया हो।

    घर के किसी सदस्य को पता तक नहीं चलता कि समय बीत रहा है और बाहर खड़ा हुआ सेमल का पेड़ बीतते हुए हर पल की घोषणा कर रहा है। जाने क्यों सेमल का पेड़ घर के सदस्यों की अनवरत उदासीनता से अप्रभावित रहकर मौन योगी की तरह साधना में संलग्न है! वह अकेला ही समय की उस उदास गूंज को अनुभव करता है जिसने पिछले पिचहत्तर सालों में इस घर को इतना बदल दिया है कि घर का हर हिस्सा बदला हुआ दिखाई देने लगा है।

    समय की गति है भी तो कितनी मंथर! कभी लगता ही नहीं कि समय चल रहा है किंतु इस मंथर गति की मार कितनी तेज है! जिसके चलते सभी कुछ तेजी से बदल जाता है। लगता है मानो पलक झपकी और दृश्य गायब। प्रायः हर बदलाव की कसक भी सेमल के पेड़ को बरसों तक बनी रहती है किंतु बदलाव से बेपरवाह घर के सदस्य सेमल के पेड़ की इस कसक को अनुभव तक नहीं कर पाते।

    कमल बाबू को आज भी अच्छी तरह याद है कि सर्दियां आने से ठीक पहले कैसे पूरा पेड़ अपने पत्तों को त्याग कर नागा साधु का रूप धारण कर लेता। सुबह उठने पर पूरा लॉन पीले कत्थई पत्तों से भरा हुआ मिलता। नानी जब जिंदा थीं तो उनका दिन इन्हीं पत्तों को बुहारने से आरंभ होता था। कमल बाबू जब नानी को पेड़ के नीचे पत्ते बुहारते देखते तो वे स्वयं भी नानी का हाथ बंटाने लगते।

    जब तक तेज सर्दियां शुरू होतीं तब तक सारे पत्ते झर जाते और पूरा पेड़ लाल अंगारों जैसे दिखने वाले बड़े-बड़े फूलों से भर जाता। मानो किसी हठी नागा साधु ने वस्त्र त्यागकर गांजे की चिलम के अंगारों को पूरे दम से फूंका हो। कुछ दिन और बीतते तो अमिया जैसी छोटी-छोटी फलियां शाखाओं पर दिखने लगतीं। होली के आने तक फूल पूरी तरह बुझ गयी चिलम के अंगारों की तरह अदृश्य हो जाते और अप्रेल की हलकी गर्मी में रुई की फलियां पूरे वैभव के साथ शाखाओं पर बैठकर चहकने लगतीं।

    ठीक ये ही वो दिन होते थे जब छोटी नानी सेमल के पेड़ के आस पास दिखायी देने लगती थीं। तेज गर्मियों के साथ रुई की फलियां फटने को होतीं और उनमें से नागा साधु के चिलम की ठण्डी हो चुकी राख जैसी सफेद रुई बाहर झांकने लगती। अब तो छोटी नानी की उपस्थिति सेमल के पास और अधिक बढ़ जाती। बड़ी जल्दी उठकर लम्बे बांस की सहायता से वे रुई की फलियांे को नीचे गिरातीं और टोकरी में जमा कर लेतीं। इतने भर से उन्हें संतोष न होता। पूरी दुपहरी वे सेमल के पेड़ के नीचे थोड़ी-थोड़ी देर में चक्कर लगाती रहतीं ताकि तेज हवा के चलने से नीचे टपकी रुई की फलियों को टोकरी में डाला जा सके।

    छोटी नानी अर्थात् नानी की विधवा देवरानी का मानना था कि इस घर में उनका आधा हिस्सा था। छोटी नानी की दृष्टि में वैसे तो उनका हिस्सा आधे से अधिक बनता था क्योंकि वे अपनी इस जेठानी से भी पहले इस घर में आयी थीं और इस नाते जेठानी के अधिकार, जेठ की पत्नी के नहीं बल्कि उनके अपने पास होने चाहिये थे।

    सेमल का यह पेड़ गवाह है कि समय भी कितना क्रूर होता है। वह आदमी के साथ कैसी निर्ममता से व्यवहार करता है। कमल बाबू की मां के बाबा अर्थात् सुखानंद ने इस पेड़ को एक नन्हे से पौधे के रूप में यहां लाकर लगाया था। उस दिन से वह इस घर में घटने वाली हर घटना का मूक साक्षी हो गया था। सुखानंद वास्तव में सुखानंद थे। उनके चारों ओर हर समय आनंद बरसा करता था। लगता था दुःख तो जैसे सदासुखी सुखानंद के निकट नहीं फटक सकता था।

    कहते हैं कि समय को आँख बदलते समय नहीं लगता। समय ने सुखानंद के साथ भी क्रूर खेल खेला। उनके दो पुत्रों में से बड़े पुत्र की पत्नी दो बच्चों को जन्म देकर काल के गाल में समा गयी तो छोटा पुत्र भी दो बच्चों के जन्म के बाद परमात्मा को प्राप्त हुआ। सुखानंद ने समय के इस क्रूर दण्ड को बड़े धैर्य से अपने सीने पर झेला था। किसी तरह भाग दौड़ करके बड़े बेटे का तो उन्होंने दूसरा विवाह करवा दिया किंतु आर्य समाजी विचारों का होने के बावजूद अपनी छोटी बहू के लिये वे कुछ प्रबंध नहीं कर सके। उसे पूरा जीवन इसी घर में विधवा औरत के रूप में व्यतीत करना था।

    'छोटी बहू' अर्थात् दुनिया भर की कर्कशा, कुरूपा, निरक्षरा, हठी और दो बच्चों की विधवा मां का संसार में किसी चीज से कोई साम्य नहीं था। पता नहीं पूर्व जन्मों के किन संस्कारों के कारण वह इस घर की बहू बनकर आ गयी थी और भाग्य की किस विडम्बना के कारण वैधव्य ने असमय ही उसका वरण कर लिया था! सुखानंद ने अपने जीवन भर की कमाई झौंककर अपने दोनों लड़कों के लिये दो भव्य मकान बनवाये थे किंतु जब छोटे पुत्र की असमय मृत्यु हो गयी तो उन्होंने छोटी बहू को भी उसी मकान में रहने के लिये बुला लिया था जिसमें वे अपने बड़े पुत्र के साथ रहते थे। समय पाकर सुखानंद तो दुनिया से चले गये किंतु छोटी बहू अपने दोनों बच्चों के साथ जेठ के ही मकान में रहती रही। वही छोटी बहू कमल बाबू की पीढ़ी के बच्चों के लिये छोटी दादी और छोटी नानी के रूप में जानी जाती थी।

    चूंकि सेमल का पेड़ सुखानंद ने लगाया था इस नाते सेमल के पेड़ पर भी नानी की विधवा देवरानी अर्थात् छोटी नानी का आधे का अधिकार था। इसी अधिकार से छोटी नानी पूरी गर्मियों में रूई इकट्ठी करतीं और आधी रुई साधिकार अपने पास रखकर, आधी रुई बड़ी नानी को दे देतीं। सहज संतोषी नानी उस रुई से तकिये भरतीं और गर्मी में आने वाली बहन बेटियों के लिये तकिये भर कर उन्हें भेंट कर देतीं। जब नानी किसी बहन बेटी को सेमल की रुई का नरम मुलायम तकिया भेंट करतीं तो उनकी आंखों में एक विशेष प्रकार की चमक होती। उनका संतोषी मन इस घर की बहन बेटियों को साड़ियां, स्वेटर, लड्डू, मठरियां और अचार के डिब्बे देने में जितने आनंद का अनुभव करता था उससे अधिक आनंद उन्हें सेमल के तकिये देते समय होता था।

    नानी इसे छोटी नानी का बड़प्पन मानती थीं कि उनकी कर्कशा, कुरूपा और मुंहफट देवरानी ने सेमल की रुई पर आधे का ही अधिकार मान रखा था अन्यथा घर के पिछवाड़े में छोटी नानी ने जो करौंदे, अमरूद और केले के पेड़ लगाये थे, उन पर छोटी नानी का ही स्वघोषित एकछत्र अधिकार था। इस नाते करौंदों को तोड़कर उनकी सॉस बनाने का अधिकार भी केवल छोटी नानी को था। यह अलग बात थी कि वे उस सॉस को अपनी जेठानी की बेटियों को उदारता पूर्वक भेंट किया करती थीं क्योंकि गर्मियों में पीहर आने वाली उनकी अपनी कोई बेटी नहीं थी। छोटी नानी के जीवन में केवल एक यही उदारता देखी थी कमल बाबू ने।

    उन दिनों घर कितनी चहल पहल से भरा हुआ रहता था। सारी बहन-बेटियां बच्चों को लेकर अपने पीहर आ जाती थीं। कमल बाबू भी उन्हीं दिनों अपनी मां के साथ ननिहाल आया करते थे। टिक्का मौसी अर्थात बड़ी मौसी, झब्बा मौसी अर्थात् मंझली मौसी और संतरा मौसी अर्थात् छोटी मौसी, उन सबके बच्चे, फिर मामाओं के बच्चे, पूरे घर में धमाल रहती। नानी दोपहरी में जलेबी और समोसे मंगवातीं तो पूरा घर बच्चों के झगड़े से गूंज उठता। शोर घर से बाहर निकल कर सेमल के पेड़ तक जा पहुंचता। नानी बड़ी तसल्ली से उनके झगड़े सुलझातीं। वे हर बच्चे की शिकायत को धैर्य पूर्वक सुनतीं और उसे तब तक मिठाई देती रहतीं जब तक कि वह बच्चा संतुष्ट नहीं हो जाता किंतु छोटी नानी इन झगड़ों में अम्पायर की भूमिका निभातीं। कभी इस बच्चे को लाल कार्ड दिखाकर मैदान से बाहर किया तो कभी उस बच्चे पर पैनल्टी ठोकी। बच्चे भी जलेबी देने वाली नानी के स्थान पर अम्पायर की भूमिका निभाने वाली छोटी नानी का रौब अधिक मानते।

    टिक्का मौसी, झब्बा मौसी और संतरा मौसी भी जलेबी और समोसों के लिये होने वाले इन झगड़ों में बराबर की भागीदारी निभातीं। सबसे छोटे दोनों मामा अर्थात् किन्नू मामा और गब्बू मामा भी इन झगड़ों में पूरा कौशल दिखाते किंतु कमल बाबू की माँ जिन्हें दूसरी मौसियों के बच्चे गुल्ला मौसी कहते थे, घर की सबसे बड़ी सदस्य होने के कारण इस झगड़े से दूर खड़ी रहकर तमाशा देखतीं। संभवतः कमल को भी जलेबियों के लिये झगड़ने की बजाय शांत खड़े रहकर तमाशा देखने की प्रेरणा उन्हीं से मिली थी।

    क्यों रे कमल, तू कभी जलेबी के लिये झगड़ा नहीं करता। तू दूसरे बच्चों से अलग है क्या! छोटी नानी, दूसरे बच्चों से अलग खड़े कमल को उलाहना देतीं। देख तो यह निरमल लड़-झगड़ कर अपनी नानी से कितनी सारी जलेबी ले गया! जवाब में कमल बाबू मुस्कुराते भर। छोटी नानी को इस बात पर बड़ी नाराजगी थी कि छोटे से कमल ने कभी उनसे दूसरे बच्चों की शिकायत नहीं की और न ही अपने लिये अधिक मिठाई की मांग रखी।

    कमल बाबू का ध्यान अपने लिये अधिक मिठाई झपटने में नहीं बल्कि अपनी ही उम्र के दूसरे बच्चों द्वारा अधिक मिठाई पाने के लिये अपनाई गयी तरकीबों को देखने में अधिक रहता था। उन्हें आश्चर्य होता कि सबसे छोटा नीटू कैसे दूसरे बच्चों की बजाय हर बार नानी को चकमा देकर दो बार जलेबी पाने में सफल हो जाता था और कैसे फिर छोटी नानी उसकी चोरी पकड़ कर उससे जलेबियां छीनने के लिये उसके पीछे दौड़ती थी ताकि दूसरे बच्चों की शिकायत दूर की जा सके।

    गर्मियां आतीं और चली जातीं। उनके साथ ही खत्म हो जातीं गर्मियों की छुट्टियां। सारी बहन-बेटियां भी एक-एक करके घर से विदा लेतीं। हर बहन-बेटी के सामान में लड्डू, मठरी और अचार के साथ-साथ सेमल का एक तकिया अवश्य बढ़ जाता था।

    उधर सेमल का पेड़ प्रहर पर प्रहर बदलने की सूचना देता रहा और इधर नानी के बालों की सफेदी और चेहरे की झुर्रियां बढ़ती रहीं। धीरे-धीरे मौसियों के बाल भी पकने लगे थे। कुछ मौसियां तो हर साल आने की बजाय दो साल में आने लगी थीं। उनके साथ आने वाले बच्चों की संख्या भी घटने लगी थी। कुछ बच्चे बड़ी कक्षाओं में आने के कारण और कुछ अपने काम धंधों में लग जाने के कारण ननिहाल कम ही आ पाते थे। बाद के बरसों में स्वयं कमल बाबू भी तो कितना कम आ पाते थे। हां इतना अंतर अवश्य आ गया था कि घर में मामाओं के बच्चों की संख्या बढ़ गयी थी।

    कमल बाबू उन दिनों नौकरी के सिलसिले में शिमला में थे जब उन्हें तार मिला कि नाना नहीं रहे। तार पढ़ते ही कमल बाबू की आंखों के सामने नाना के स्थान पर सेमल का पेड़ तैर गया था। वे बार-बार मन को स्थिर करते कि नाना नहीं रहे किंतु जाने क्यों हर बार उन्हें यही लगता कि सेमल का पेड़ नहीं रहा। कमल बाबू एक दिन के लिये ननिहाल आये थे। सेमल का पेड़ उसी तरह मौन योगी की तरह खड़ा था। पूरी तरह रुई से लदा हुआ। छोटी नानी की टोकरी तब भी पेड़ के नीचे रखी थी।

    नानी के बाल और सफेद हो गये थे। मानो सेमल की रुई ने उन्हें अपना रंग दे दिया हो। घर में सारी मौसियां दिखायी दी थीं कमल बाबू को किंतु उनके बच्चों में से कोई नहीं था। कोई अपने पोते के साथ आयी थी तो कोई बूढ़े हो चले मौसा के साथ। कुल एक दिन रुके थे कमल बाबू। वापसी के समय उन्होंने क्षण भर के लिये ठहर कर सेमल के पेड़ को देखा था। अब उसकी ऊँचाई और अधिक हो चली थी। लगता था जैसे आकाश में कहीं गहरे तक जा धंसा है।

    सात आठ साल तक कमल बाबू का ननिहाल आना नहीं हुआ। एक दिन अचानक उन्हें फोन से सूचना मिली कि नानी नहीं रहीं। कमल बाबू को लगा कि धड़ाम की आवाज हुई और सेमल का पेड़ नीचे गिर पड़ा। उन्होंने चौंक कर अपने आस पास देखा। कहीं कुछ नहीं गिरा था। किसी चीज के गिरने की आवाज नहीं हुई थी। कमल बाबू का जाना नहीं हो सका। नानी को उन्होंने मन ही मन वहीं श्रद्धांजलि दी और फिर से नौकरी में रम गये। कमल बाबू की मां अपने बड़े पोते को लेकर अपने पीहर गयीं। उसके बाद कमल बाबू का ननिहाल जाना हुआ ही नहीं। बरसों बीत गये। जाने सेमल का पेड़ रहा भी होगा कि नहीं, कमल बाबू प्रायः सोचते।

    आज पूरे चौबीस साल बाद जब इस शहर में किसी काम से आना हुआ तो कमल बाबू की इच्छा हुई कि ननिहाल का चक्कर लगाया जाये। नाना तो नहीं रहे। नानी भी नहीं रहीं। मौसियों का आना तो नाना-नानी के समय ही कम हो गया था। फिर भी कोई न कोई मामा, कोई न कोई मामी अवश्य मिल जायेंगे।

    संध्या के झुरमुटे में गेट खोलते ही उनकी दृष्टि सेमल के पेड़ पर गयी। वह आज भी हठी योगी की तरह उसी तरह प्रहरी के रूप में विद्यमान था। नीचे लॉन में पत्तों की रेलमपेल मची हुई थी। निश्चित ही था कि नानी का स्थान घर की किसी औरत ने नहीं लिया था जिसके दिन की शुरूआत इन पत्तों को बुहारने से हो। अंधेरे में कमल बाबू यह तो नहीं देख पाये कि लाल अंगारों वाले फूल शाखाओं पर आ बैठे हैं कि नहीं किंतु उन्होंने अनुमान लगा लिया था कि वे अवश्य ही वहां उपस्थित हैं। उन्हें लगा कि घर के भीतर जाने से कोई लाभ नहीं, जिस काम के लिये आये थे वह तो हो गया है।

    लौट जाने के लिये उन्होंने गेट बंद करना चाहा, ठीक उसी समय किसी ने अंदर से आवाज लगायी- ''कौन है।''

    कमल बाबू की जीभ मानो तालु से चिपक गयी। क्या जवाब दें वे! क्या सवाल करने वाला जान जायेगा कि गेट पर कौन है!

    - ''कौन है गेट पर!'' फिर से आवाज आयी।

    - ''मैं कोई नहीं।'' कमल बाबू के मुंह से बरबस निकला और वे सेमल के पेड़ की तरफ पीठ करके आगे बढ़ गये।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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