Blogs Home / Blogs / हिन्दी कहानियाँ / घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)
  • घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)

     20.05.2018
     घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)

     घर चलो माँ!

    बबलू बेचैन है। क्या कहे माँ से! कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं होती। वह कनखियों से माँ की ओर देखता है, माँ का चेहरा पूरी तहर निर्विकार है। बबलू को इस चेहरे को पढ़ने का अभ्यास तब से है जब वह बोल भी नहीं पाता था। तब वह केवल रो कर माँ को बता देता था कि वह क्या चाहता है! थोड़ा सा रोने के बाद बबलू चुप हो जाता था और माँ का चेहरा देखकर आश्वस्त होने का प्रयास करता था कि माँ ने उसकी आवश्यकता को ठीक से समझ लिया है या नहीं। माँ हर बार ठीक से जान जाती थी कि इस बार बबलू दूध के लिये रोया है, या उसने लंगोटी गीली कर ली है, या उसे गर्मी लग रही है। उन दिनों से लेकर इन दिनों तक उसकी हर मांग माँ ही पूरी करती आई है। आज वही माँ बबलू को माँ के अपने बनाये मकान में छोड़कर भावशून्य चेहरा लिये किराये के मकान में रहने चली आई है।

    माँ का भावशून्य चेहरा देखकर बबलू भीतर ही भीतर काँप जाता है। उसे लगता है कि वह एक ऐसी इमारत के सामने खड़ा है जिसमें प्रवेश करने के सारे दरवाजे पूरी मजबूती के साथ भीतर से बंद कर लिये गये हैं। बाहर से कितनी भी आवाज दो, भीतर न तो आवाज पहुँचने वाली है और न अनायास ही दरवाजा खुलने वाला है। कौन जाने दरवाजा खोलने के लिये इमारत के भीतर कोई है भी कि नहीं!

    बबलू फिर से कनखियों से माँ की ओर देखता है। माँ मौन है। पिछले कई सालों से उसकी आँखों में हर पल दिखाई देने वाली कठिनाई, खीझ, गुस्सा और असमंजस का भाव आज नहीं है। माँ की आँखों में पल-पल दिखाई देने वाले भाव बबलू के लिये खिड़की का कार्य करते थे जिनके माध्यम से वह माँ के भीतर पहुँच जाया करता था और नाराज माँ को किसी तरह मना लिया करता था किंतु आज सारी खिड़कियाँ बंद हैं। माँ का चेहरा कपूर की तरह सफेद, बर्फ की तरह ठण्डा और सर्दियों में ठहरे हुए झील के पानी की तरह शांत है। छोटे से घर में पसरा हुआ मौन बबलू को काटता हुआ सा प्रतीत होता है। माँ कभी इतनी तंग गली के इतने छोटे मकान में नहीं रही। कैसे माँ ने इस मकान में रहने का मन बनाया होगा! उसे आश्चर्य होता है।

    माँ का मोबाइल बजने से बबलू को राहत मिलती है। वह आया तो था माँ को मनाकर पुनः घर ले चलने के लिये किंतु माँ का नितांत ठण्डा स्वर और भावशून्य चेहरा देखकर उसकी हिम्मत ही नहीं हुई। माँ को मोबाइल में व्यस्त जानकर बबलू कमरे से बाहर आ गया है। यह कहना गलत है कि वह कमरे से बाहर आ गया है।

    वास्तविकता यह है कि एक कमरे के घर में कमरे से बाहर आने का अर्थ होता है घर से भी बाहर आ जाना। सड़क पर आकर बबलू गाड़ी स्टार्ट करता है। कहाँ जाये! ऑफिस या घर! ऑफिस में मन नहीं लगेगा और घर में विनीता के सवालों की झड़ी लग जायेगी। वे सवाल जिनकी वजह बबलू नहीं है, स्वयं विनीता है, या फिर पापा हैं किंतु विनीता उन सवालों के उत्तर बबलू से लेना चाहेगी। यह कैसी विडम्बना है, प्रायः वह उन सवालों से घिर जाता है जिनके उत्तर उसे स्वयं चाहिये। कल तक वह भी माँ पर खूब चीखता चिल्लाता था। उन्हीं सवालों के जवाब वह माँ से मांगता रहा था जिन सवालों के जवाब आज उसे पूरी दुनिया को देने पड़ेंगे।

    जिन सवालों ने आज माँ को घर से निकाल कर किराये के मकान में पहुंचा दिया है, जिन सवालों ने आज उसके और माँ के बीच में एक ऐसी मोटी दीवार चिन दी है जिसके आर-पार आवाज जाने की संभावना तक दिखाई नहीं देती, उन सवालों के जवाब कहाँ से लाये बबलू! उसे स्वयं अपनी स्थिति पर तरस आ जाता है। अगले ही क्षण उसे माँ का ध्यान आता है। निश्चय ही आज उसने माँ का जो चेहरा देखा है, वह चेहरा उसके हृदय की वास्तविक स्थिति का द्योतक नहीं है। भीतर ही भीतर वह अवश्य ही बहुत दुःखी है।

    जरा सी बात पिछले नौ सालों में बढ़कर यहाँ तक पहुँच गई थी। न तो पापा विनीता को सहन करने को तैयार हुए थे और न विनीता ने पापा की किसी बात को सुनने का प्रयास किया था। इस पूरे प्रकरण में बबलू की क्या गलती थी? और माँ? माँ की भी तो कोई गलती नहीं थी। उन्हें भी तो सजा मिल रही है। जब माँ औरत होकर इतना सहन कर सकती है तो फिर बबलू क्यों नहीं। क्यों वह अपने भीतर की पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा!

    उसे आज भी याद है कि अंतिम वर्ष में उसके पास कॉलेज की फीस भरने लायक रुपये नहीं थे, पापा सदैव की तरह अपने सुनहरे अतीत का गुणगान करते हुए किंकर्त्तव्य विमूढ़ की तरह घर में बैठे थे और बबलू रिश्तेदारों और परिचितों के यहाँ दो सौ रुपये के लिये याचक बना घूम रहा था, पूरे शहर में वह चक्करघिन्नी की तरह घूम गया था किंतु किसी उसे दो सौ रुपये नहीं दिये थे। हार थक कर बबलू घर की सीढ़ियों पर आ बैठा था। उसका दिल रोने को हो रहा था किंतु माँ को हॉस्पीटल गये काफी देर हो गई थी इसलिये मकान की सीढ़ियों पर बैठकर रोने से अधिक जरूरी माँ को ढूंढने के लिये हॉस्पीटल जाना हो गया था।

    आंसुओं को आँखों में ही रोककर वह सीढ़ियों से उतर कर घर से बाहर निकला ही था कि दरवाजे पर थकी हारी माँ दिखाई दी थी। माँ ने स्कूल फीस जमा कराने की पर्ची चुपचाप उसकी हथेली पर रख दी थी और स्वयं सीढ़ियों पर बैठकर हांफने सी लगी थीं। उन्होंने अपनी एक महीने की दवाईयाँ न खरीदकर उन रुपयों से उसकी फीस भरवा दी थी।

    उन दिनों बीमारी के कारण माँ को नौकरी पर जाना बंद किये हुए पूरा एक साल होने आया था और जो कुछ भी घर में पिछले दिनों का बचा हुआ था, वह माँ के इलाज पर शनैः शनैः चुक रहा था। यह तो ठीक था कि सरकारी नौकरी थी इसलिये वह छूटी नहीं, अन्यथा माँ के लिये आगे की नौकरी का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता।

    उपचार से माँ लगातार ठीक होती जा रही थी और यह आशा बंधती जा रही थी कि कुछ महीनों बाद वह फिर से नौकरी पर जाने लगेगी और घर फिर से पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा। माँ का सारा गहना भी उन्हीं दिनों बिका। बबलू और उससे भी चार साल छोटी बबीता ने उन दिनों क्या कुछ नहीं सहा! अच्छे कपड़ों में तो वे समझते ही नहीं थे किंतु साबुत निक्कर कमीज के लिये भी तरस गये थे वे। आखिर कुछ महीने और बीते, माँ नौकरी पर जाने लायक हो गई। जीवन धीरे-धीरे सामान्य होता चला गया था। बबलू ने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली किंतु पढ़ाई पूरी करते-करते उसके मन में गरीबी और लाचारी ने ऐसी जिद भर दी कि अब वह कोई छोटी-मोटी नौकरी तलाशने के स्थान पर व्यापार में हाथ आजमाना चाहता था। वह कोई ऐसा व्यापार चाहता था जो उसे कुछ ही समय में करोड़पति बना दे ताकि फिर कभी गरीबी और बेचारगी मुड़कर इस घर को न देखें।

    उसने अपने लिये इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनिस चुना। माँ ने सुना तो उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। इतना पैसा कहाँ से आयेगा! यह ऐसा बिजनिस था जिसे आरंभ करने के लिये कम से कम पाँच-सात लाख रुपये तो जेब में चाहिये ही। माँ ने बबलू को इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनिस करने से लाख मना किया और कहा कि वह कोई नौकरी कर ले किंतु बबलू को तो एक ही धुन सवार थी - इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनिस।

    बबलू को आज भी याद है कि उसने माँ से कुछ नहीं मांगा था किंतु जब उसे परेशान होते हुए कई दिन बीत गये थे तब एक दिन स्वयं माँ ने उसके हाथ में तीन लाख रुपये का चैक रख दिया था - 'ये ले! अपना बिजनिस शुरु कर।'

    बुरी तरह चौंका था बबलू - 'इतने रुपये कहाँ से आये?'

    - 'तुझे ज्यादा पूछताछ करने की जरूरत नहीं।' माँ ने हर बार की तरह उसे निरुत्तर कर दिया था।

    कई महीने बाद बबलू को पता चल पाया कि जिस मकान को बनाने में माँ ने अपनी आधी जिंदगी की कमाई झौंक दी थी, उसी को गिरवी रखकर माँ ने बैंक से यह पैसा लिया था। उसके बाद से तो जैसे एक नया सिलसिला चल पड़ा। इस बिजनिस की अपनी परेशानियाँ थीं जिन्हें सुलझा पाना बबलू के अकेले के बूते की बात ही नहीं थी लेकिन जब भी बबलू ने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की तो उसे माँ अपने ठीक पीछे खड़ी हुई मिली।

    कई बार उसका कन्साइनमैण्ट फेल हो जाता था। कई बार उसका माल कस्टम में रोक लिया जाता था। कई बार फॉरेन वाली पार्टी वायदा करके मुकर जाती थी। जब भी ऐसा होता था बबलू को तत्काल दो तीन लाख रुपयों की जरूरत होती थी और हर बार बबलू की जेब खाली होती थी। पता नहीं कैसे बबलू इतना बड़ा बिजनिस संभाल पाता था, उसे पैसों का हिसाब रखने को तो कोई होश ही नहीं था। वह तो केवल इतना जानता था कि जितना पैसा हो सब बिजनिस में लगा दो। पैसा कम पड़े तो माँ को बताओ। यह सही था कि बबलू को इस बिजनिस में अच्छा लाभ हो रहा था किंतु वह पूरी आय को बिजनिस में झौंकता जा रहा था जिससे बिजनिस का आकार और मुनाफा दोनों बढ़ रहे थे किंतु बबलू का हाथ सदैव तंग ही रहता था।

    बबलू को मुँह से बोलकर कुछ भी मांगना नहीं पड़ता था। माँ सब जानती थी, सब सहती थी और सब करती थी। रसोई का खर्च, बबलू के पापा का इलाज, अपनी दवाईयाँ, बबीता के विवाह का खर्च, बबलू के विदेश आने-जाने के टिकट, सारा प्रबंध माँ ही करती रही थी और बबलू बेतहाशा पैसा कमाता रहा था। इस बीच में बबीता अपने ससुराल चली गई थी किंतु घर में विनीता आ गई थी। बबलू को लगा था कि बहू के आ जाने के बाद माँ को कुछ आराम मिलेगा किंतु हुआ ठीक उलटा। पापा के और विनीता के गण पहले दिन से ही नहीं मिले। विनीता के आने से पहले पापा कभी इतने रूखे नहीं थे। यह ठीक है कि पापा ने जीवन भर कभी ढंग से कमाया नहीं किंतु वे स्वभाव के अच्छे ही थे। जाने ऐसी क्या बात थी कि विनीता को देखते ही उनके स्वभाव ने पलटी मार ली थी।

    सरल स्वभाव की विनीता, जाने क्यों पापा की इच्छानुसार काम नहीं कर पाती थी। पापा की एक न एक शिकायत बनी ही रहती - रोटियाँ कच्ची हैं। सब्जी बेस्वाद है। चाय को ढंग से उबाला नहीं। पापड़ ढंग से नहीं सेके। बरतन मांजने में इतनी आवाज करती है। धूप में पड़े-पड़े कपड़ों का रंग खराब हो रहा है। इसे कपड़े भीतर लाने का होश नहीं है। विनीता सिर झुका कर पापा के सब आरोपों और उलाहनों को चुपचाप सब सुनती। पापा के मन को अच्छा लगे, ऐसा कुछ करने का भरसक प्रयास करती किंतु पापा अपने अतीत की गौरव गाथाओं का गायन करते-करते विनीता के हर काम में दोष निकालते ही गये थी। जाने पापा विनीता से क्या चाहते थे?

    जब घर में नई पीढ़ी के बच्चे आ गये तो बबलू को लगा कि पापा अब बच्चों के साथ समय निकाल लिया करेंगे किंतु उनका पूरा ध्यान विनीता की ओर ही लगा रहा। कैसी फूहड़ है? कितना पैसा खर्च करती है? बच्चों के इतने महंगे कपड़े खरीद कर क्यों लाई? कपड़ों पर ढंग से इस्तरी तक नहीं कर सकती। कपड़ों में नील लगाने तक की तमीज नहीं। पूरी बनियान पर धब्बे लगा देती है। झाडू. बुहारने तक का शउर नहीं। बरतनों की आवाज करती है।

    माँ ने पापा को समझाने का लाख प्रयास किया कि वे विनीता से प्यार से बोलें किंतु पापा को माँ की कोई बात समझ में नहीं आई थी। बबलू ने स्वयं को पापा और विनीता के प्रकरण से कभी जोड़ा ही नहीं। माँ जाने और उसका काम जाने। माँ के रहते बबलू को घर के मामलों में बोलने की जरूरत ही नहीं थी लेकिन वह लगातार अनुभव करता रहा था कि पापा और विनीता के मामले में माँ बिल्कुल असफल सिद्ध होती जा रही थी।

    जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता जाता था, पापा की शिकायतों की सूची बढ़ती जाती थी। नित नई शिकायतों की मार से विनीता का धैर्य चुकता चला गया था। पहले तो वह पापा के सामने जाने से बचने लगी। बाद में वह उन्हें जानबूझ कर अनसुना करने लगी। पापा फिर भी नहीं माने तो वह जानबूझ कर चाय खराब बनाने लगी। जानबूझ कर कच्ची रोटियाँ पापा की थाली में परोसने लगी और पापा की बनियान पर जान बूझ कर नील के धब्बे लगाने लगी। पापा में कोई सुधार नहीं हुआ। वे विनीता में आते जा रहे परिवर्तन को भी लक्ष्य नहीं कर पाये।

    धीरे-धीरे विनीता पापा के सामने बोलने भी लगी थी। उन्हें तमक कर जवाब भी देने लगी थी लेकिन ऐसा वह तभी करती थी जब उसे यह पूरा विश्वास हो कि माँ या बबलू में से कोई देख नहीं रहा है। बहू के तीखे जवाबों को सुनकर पापा और भी बौखला जाते। उनका गुस्सा आसमान पर जा चढ़ता। वे जोर-जोर से चीखने चिल्लाने लगते और घर में बवण्डर जैसा ही आ जाता।

    कई बार बबलू ने और कई बार माँ ने भी विनीता को पापा से मुँहजोरी करते हुए सुन लिया था। अब स्थिति उस बिंदु तक जा पहुँची थी कि दोनों में किसी को नहीं समझाया जा सकता था। न तो बबलू को और न माँ को ऐसा आभास हो पाया था कि विनीत आजकल पापा को गुस्सा करने के लिये क्यों उकसाती है। बहुत दिनों बाद उन्हें मालूम हुआ था कि विनीता पापा को गुस्सा करने के लिये उकसा कर अपने मोबाइल को ऑन करके पापा की सारी चीखें और गुस्से में बकी गई गालियां वह अपने पीहर वालों से लेकर ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों को सुनाती थी। इस प्रकार पापा गुस्से में आग बबूला होकर जो कुछ भी अनाप-शनाप बकते थे, उसे सब रिश्तेदारों ने अपने-अपने घर में बैठकर ही सुन लिया था और पापा सब रिश्तेदारों की दृष्टि में गिर गये थे।

    आखिर वह दिन भी आ ही गया था जिसके भय से बबलू और माँ दोनों ही भीतर ही भीतर आशंकित थे। पापा और विनीता, दोनों ने घोषणा कर दी थी कि इस घर में वे दोनों साथ नहीं रह सकते। दोनों में से किसी एक को घर छोड़कर जाना ही पड़ेगा। माँ एक ओर पापा से बंधी हुई थी तो दूसरी ओर बबलू से। बबलू भी एक ओर माँ से बंधा हुआ था तो दूसरी ओर विनीता से किंतु पापा और विनीता एक घर में रहने को तैयार नहीं थे। अतः स्वाभाविक ही था कि या तो माँ पापा को लेकर घर से चली जाती या फिर बबलू विनीता और बच्चों को लेकर घर छोड़ देता।

    आखिर इस बार भी बबलू को कुछ नहीं करना पड़ा था। माँ चुपचाप पापा को लेकर इस किराये के मकान में चली आई थीं और बबलू लाख चाह कर भी उनसे यह नहीं कह पाया था - घर चलो माँ।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

  •  घर चलो माँ!"/>  घर चलो माँ!">  घर चलो माँ!">
    Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×