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  • मजनूं का कटोरा/हिन्दी कहानी/डॉ.मोहनलाल गुप्ता

     28.02.2020
    मजनूं का कटोरा/हिन्दी कहानी/डॉ.मोहनलाल गुप्ता

    मजनूं का कटोरा/हिन्दी कहानी/डॉ.मोहनलाल गुप्ता

    लैला को इस बात का कोई मलाल नहीं है कि वह काली है। वह जानती है कि लडकियां या तो गोरी होती हैं या फिर काली। बड़ी बात है उनका लड़की होना, न कि गोरी या काली होना। प्रेमियों के पीछे धूप में घूमने वाली लैलाएं अक्सर काली हो ही जाती हैं।

    लैला को इस बात का भी कोई अफसोस नहीं है कि उसका पिता एक बेरहम इंसान है। वह जानती है कि पिता या तो रहमदिल होते हैं या बेरहम। बड़ी बात है उनका पिता होना न कि रहमदिल या बेरहम होना। बच्चों की फिक्र करने वाले पिता अक्सर बेरहम हो ही जाया करते हैं। लैला को इस बात का भी कोई गम नहीं कि मजनूं, लैला से दूर चला गया है। प्रेमियों की नियति दूर चले जाना ही होती है, वे शौहर तो नहीं हैं जो अपनी बीवी को छोड़कर जाना भी चाहें तो न जा सकें! बड़ी बात है उनका प्रेमी होना, न कि पास या दूर होना।

    ये सब दुनियावी बातें हैं, जिन्हें इस दुनिया में रहने वाले लोगों को आम तौर पर जानना और समझना ही चाहिये। इसी सबब से लैला को इनमें से किसी बात का कोई मलाल नहीं लेकिन फिर भी एक दुःख है जो लैला को दिन रात खाये जाता है। लाख कोशिश करने पर भी लैला उस दुःख से उबर नहीं पाती। लैला भले ही किसी और के सामने यहाँ तक कि स्वयं के सामने भी स्वीकार नहीं करे किंतु सच्चाई यही है कि उसे मजनूं के चले जाने का ही दुःख खाये जा रहा है। इसलिये नहीं कि मजनूं, चला गया है बल्कि इसलिये कि मजनूं इस तरह चला गया है!

    अरे क्या हुआ जो सुल्तान अर्थात् लैला के बाप ने मजनूं को अपने महल के सामने बुलाकर सरे आम चार जूते लगवा दिये ! क्या हुआ जो सुल्तान ने मजनूं को गंदी गालियां दीं और ऑनर किलिंग की धमकी देते हुए, सल्तनत छोड़ कर चले जाने को कहा!

    हजारों सालों से दी जा रही कुछ निश्चित प्रकार की गालियों, ऊँट की खाल से बने हुए जूतों की मार, और युगों से चली आ रही ऑनर किलिंग की धमकी का मजनूं पर इतना असर कैसे हो गया था जो उसके सामने लैला की मुहब्बत फीकी पड़ गई और मजनूं, लैला के बाप की सल्तनत छोड़कर चला गया!

    कैसा पिलपिला सा मजनूं था वह, जो एक बार भी सुल्तान को यह नहीं कह सका कि चाहो तो खाल खिंचवा लो, सूली पर चढ़वा दो, ऑनर किलिंग करवा दो, मेरे पूरे खानदान को खत्म कर दो, किंतु मैं लैला को जीते-जी खुद से अलग नहीं कर सकूंगा। मर भी गया तो भी मेरी मुहब्बत कम नहीं होगी। मैं फिर जनम लूंगा और हर जन्म में लैला के लिये आसमान के तारे तोड़कर लाता रहूंगा, लैला पर लाख पहरे होंगे किंतु मैं लैला तक पहुंच ही जाउंगा। यदि लैला बीच समंदर किसी जजीरे पर छुपी होगी तो भी मैं लैला को सात सातों समंदर खंगाल कर ढूंढ ही लूंगा।

    सुल्तान पानी पी-पीकर मजनूं को गालियां देता रहा किंतु मजनूं के मुंह से एक हर्फ नहीं निकला। अरे! गली मुहल्ले के दो टके की औकात वाले लोग भी पाव भर दारू चढ़ाकर सुल्तान के सिपाहियों को दो-चार धक्के दे ही जाते हैं। मुंह से भले ही न बोल पाएं किंतु उनकी त्यौरियां सुल्तान को उसकी औकात दिखा ही जाती हैं। रात के अंधेरे में कितने ही लोग सुल्तान के महल पर पत्थर फैंक ही जाते हैं किंतु मजनूं ने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया।

    महल की सीढ़ियों से उतरती हुई लैला, विचारों की तरंगों में हिचकोले खाती हुई कब नीचे तक पहुंच गई। पता ही नहीं चला।

    -'शहजादी, ये फल और मिठाइयां इन दरवेशों में आप अपने हाथों से बांट दीजिये। मल्लिका का यही हुक्म है।' बांदी की आवाज से लैला, खयालों की दुनिया से बाहर आई। आज लैला का जन्मदिन था और आज के दिन वह हर साल, महल के बाहर आकर दरवेशों में फल और मिठाइयां बांटती थी।

    जब से मजनूं, लैला के बाप की सल्तनत छोड़कर गया था, लैला गंदे और बेतरतीब कपड़े पहनने लगी थी। आज अपने जन्मदिन पर भी उसने वैसे ही कपड़े पहन रखे थे। लैला की माँ अर्थात् सुल्ताना ने कहा भी कि आज तो ढंग के कपड़े पहन लेती किंतु लैला ने सुल्ताना की बात पर ध्यान नहीं दिया और अपने नथुनों से गर्म हवा निकालती हुई, माँ की तरफ एक उपेक्षा भरी दृष्टि फैंक कर चली आई थी।

    सुल्ताना सब समझती थी। अपनी बेटी के दिल का हाल भी जानती थी किंतु वह क्या कर सकती थी! सुल्ताना होते हुए भी आखिर वह एक औरत थी और अपने शौहर की मर्जी के खिलाफ कैसे जा सकती थी! सुल्तान ने महल में तैनात हर गुलाम और बांदी को सख्त आदेश दिये थे कि लैला की हरकतों पर नजर रखी जाये। उसे महल से बाहर न जाने दिया जाये। यदि लैला से मिलने कोई आता है तो उसे पकड़कर सुल्तान के सामने पेश किया जाये। सुल्तान ने लैला के फेसबुक एकाउंट, व्हाटसैप, इंस्टाग्राम, चैटिंग ब्राउजर, ट्विटर एकाउंट, ई-मेल एकाउंट आदि पर नजर रखने के लिये सल्तनत की साइबर क्राइम ब्रांच की एक पूरी टुकड़ी लगा दी थी। सुल्तान को आशंका थी कि लैला और मजनूं फेसबुक या व्हाट्सएप पर सम्पर्क करने की कोशिश जरूर करेंगे।

    सुल्तान की उम्मीद से उलट, ऐसा कुछ नहीं हुआ था। जिस दिन से सुल्तान ने मजनूं को महल के सामने ऊँट के चमड़े से बने जूतों से पिटवाया था, उसी दिन से लैला ने अपना स्मार्ट फोन, आई पैड और लैपटॉप उठाकर एक ओर पटक दिये थे। न तो मजनूं की ओर से कोई मेल या मैसेज आया था, न लैला ने फेसबुक या व्हा्टस एप पर कुछ पोस्ट किया था।

    सुल्तान के परिवार में खुशी वाले दिन, फल और मिठाइयां मिलने की आशा में दूर-दूर से फकीर और दरवेश महल की सीढ़ियों के पास, बड़े सवेरे ही आकर बैठ जाते थे और झूठे, फरेबी और मक्कार सुल्तान की तारीफ में ऐसे-ऐसे कसीदे पढ़ते थे कि उन्हें सुनकर महल के नौकरों को भी शर्म आ जाती थी किंतु सुल्तान तथा उसके परिवार के लोग उन कशीदों को सुनकर खुश होते।

    लैला ने महल की सीढ़ियां उतर कर देखा, आज भी दरवेशों और फकीरों का अच्छा-खासा जमघट लगा हुआ था। लैला ने अनमने ढंग से थाली में रखी मिठाइयां और फल उनके कटोरों में डालने शुरु किये। दरवेशों और फकीरों ने शहजादी को लम्बी उम्र पाने की दुआएं दीं। बूढ़े, खूसट और जल्लाद सुल्तान का इकबाल बुलंद रहने के नारे बुलंद किये किंतु लैला उन दुआओं और नारों से बिल्कुल असंपृक्त, आगे बढ़ती रही तथा फल और मिठाइयां बांटती रही।

    अचानक लैला का हाथ रुका। उसके सामने जो हाथ फैला हुआ था उसे पहचानने में लैला को क्षण भर भी नहीं लगा। यद्यपि लैला की आंखें धरती पर लगी हुई थीं किंतु इस हाथ को पहचानने के लिये लैला को आंखों की आवश्यकता नहीं थी। लैला ने क्षण भर के लिये कुछ सोचा और अपने हाथ में पकड़ा हुआ केलों का गुच्छा फिर से बांदी की टोकरी में रख दिया।

    लैला को अपने सामने खड़ी देखकर, दरवेश का हाथ जोर से कांपा और कटोरा हिलने लगा। लैला का हृदय, कटोरे की आवाज से भी अधिक जोर से धड़कने लगा। बांदियों ने चौंककर शहजादी की ओर देखा किंतु शहजादी अब भी जमीन की तरफ देखे जा रही थी, उसने रंचमात्र भी अपनी पुतलियां घुमाने की जरूरत नहीं समझी थी।

    कुछ क्षण यूं ही बीते और उसके बाद जो हुआ उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। लैला ने बिना सिर उठाये, दरवेश के हाथ से कटोरा छीना और धरती पर पटककर अपने पैरों से तोड़ डाला तथा अगले दरवेश की तरफ बढ़ गई। बांदियां शहजादी के इस कारनामे से सहम गईं किंतु वे कुछ न समझ सकीं कि आखिर उस दरवेश से क्या गुस्ताखी हुई जो शहजादी ने उसका कटोरा तोड़ डाला किंतु उनकी हिम्मत नहीं हुई जो शहजादी से कुछ पूछ सकें। जब सारे फल और मिठाइयां बंट गये तो लैला ने ऊंची आवाज में दरवेशों और फकीरों से कहा कि कल फिर आना। इसके बाद वह चुपचाप महल की सीढ़ियां चढ़ गई। उसका चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था।

    अगले दिन शहजादी ने उदास चेहरे और निराशा भरी आवाज में अपनी मां से कहा कि मैंने फकीरों और दरवेशों से कहा था कि कल फिर आना। क्या मैं अपने दिल की तसल्ली के लिये उन्हें फल और मिठाइयां दे आऊं! मल्लिका ने शहजादी का उदास चेहरा देखा और बांदियों को संकेत किया कि वे शहजादी के साथ फल तथा मिठाइयां लेकर जाएं। लैला आज भी कल की तरह आंखें नीची रखकर महल की सीढ़ियों से उतरी और दरवेशों को फल तथा मिठाइयां बांटने लगी। कुछ देर बाद फिर वही हाथ लैला के सामने था और उसमें पकड़ा हुआ कटोरा भी नया था। हाथ आज भी कांप रहा था और कटोरा आज भी हिल रहा था।

    लैला का दिल आज भी कल की तरह जोरों से धड़का। बांदियों ने चौंक कर देखा, लैला ने दरवेश के हाथों से कटोरा छीना और धरती पर पटक कर पैरों से तोड़ दिया तथा अगले दरवेश की तरफ बढ़ गई। दरवेशों को फल और मिठाइयां बांटने के बाद आज लैला ने दरवेशों को, कल फिर आने का निमंत्रण नहीं दिया और वह महल की सीढ़ियां चढ़ गई।

    बांदियों के साथ-साथ सारे दरवेश और फकीर हैरान थे कि आखिर यह नौजवान फकीर ऐसी कौनसी गुस्ताखी करता है जो शहजादी उस पर इतनी बिगड़ जाती है। उनकी हैरानी यह देखकर और अधिक बढ़ गई थी कि कल की ही तरह वह दरवेश आज भी मुस्कुरा रहा था जिसका महंगा और नया कटोरा शहजादी ने आज फिर तोड़ डाला था।

    कुछ बूढ़े दरवेशों ने हिम्मत जुटाकर उस नौजवान से पूछा कि भाई तुम कौन हो और दो दिनों से ये क्या हो रहा है किंतु नौजवान दरवेश उनकी बातों का कुछ भी जवाब दिये बिना आगे बढ़ गया। बांदियां भी इस रहस्य का कोई तोड़ न ढूंढ सकीं। अगले दिन लैला ने फिर अपनी मां से अनुमति मांगी कि वह दरवेशों को फल और मिठाइयां बांटने जा रही है।

    मल्लिका की आखों में हैरानी तो थी किंतु उसने बांदियों को आदेश दिया कि शहजादी के साथ फल और मिठाइयां लेकर जायें। लैला आज भी आंखें ऊंची किये बिना एक-एक करके सीढ़ियां उतर गई।

    बांदियों ने देखा कि आज वहाँ केवल एक दरवेश बैठा था, वही दरवेश जिसका कटोरा शहजादी दो बार फोड़ चुकी थी। लैला, दरवेश के पास जाकर रुक गई। आज उसकी आंखें धरती की तरफ नहीं थीं। अंगारों की तरह जलती हुई उसकी आंखें, दरवेश के तन-मन को जलाए डाल रही थीं। दरवेश अपने स्थान पर बुत की तरह खड़ा रहा। लैला भी एक शब्द नहीं बोली।

    -'शहजादी! आज तो केवल एक ही दरवेश आया है।' एक बांदी ने हिम्मत करके लैला का ध्यान भंग करने की चेष्टा की।

    -'और वह भी बिना कटोरे के!' एक बांदी ने माहौल को हल्का बनाने के लिये मजाक के लहजे में कहा। लैला ने बांदियों की बात का कोई जवाब नहीं दिया और वह बुत की तरह, दरवेश के सामने खड़ी रही। दरवेश भी अवाक् होकर लैला के मुंह की तरफ देखे जा रहा था।

    धीरे-धीरे लैला की आंखों ने दहकना बंद कर दिया और उनसे निर्मल जल की धारा बह निकली। दासियों ने आश्चर्य के साथ देखा कि लैला की आंखों से बहने वाले आंसू धरती पर गिरकर मोतियों में बदल रहे थे। दजला और फरात का पानी भी धरती में मिलकर अनाज के दाने ही उपजाता था किंतु लैला की आंखों का पानी मोती उगल रहा था।

    एक दासी हिम्मत करके नीचे झुकी और उसने एक मोती हाथ में लेकर देखा, बिल्कुल सच्चा मोती। उस दासी की देखा-देखी अन्य बांदियां भी मोती इकट्ठे करने लगीं किंतु लैला इस बात से बेखबर, बस आंसू ही बहाती रही।

    काफी देर तक आंसू बहाने के बाद लैला ने थरथराती हुई जबान से पूछा- 'क्यों आया है ?'

    -'तुझे कटोरा फोड़कर तसल्ली मिलेगी। ले नया कटोरा लाया हूँ। तोड़ डाल इसे भी। दरवेश ने अपने कम्बल में से नया कटोरा निकालकर आगे बढ़ाया।

    -'मैंने पूछा, क्यों आया है ?'

    -' तुझे देखने।'

    -'क्या तुझे हक है, मुझे देखने का।'

    -'मैं तेरा मजनूं हूँ और तू मेरी लैला है। मुझे नहीं तो और किस को हक है?'

    दरवेश ने शरीर पर लपेटा हुआ कम्बल और हाथ में पकड़ा हुआ कटोरा धरती पर फैंक दिये।

    -'न तू मेरा मजनूं है, और न मैं तेरी लैला हूँ।'

    -'यह क्या कहती है ? ध्यान से देख, मैं ही तेरा कैस हूँ।'

    -'मेरा कैस तो अपने प्यार के लिये आसमान के तारे तोड़कर लाने वाला था।'

    -'वो तो मेरे मोबाइल पर आया हुआ एक लव मैसेज था। ऐसा तो सभी भेजते हैं।'

    -'मेरा कैस तो मेरे लिये दुनिया भर के बादशाहों के ताज और तख्त धूल में मिला देने का दम भरता था।' -'वो तो फेसबुक की एक पोस्ट थी। मैंने कहीं से कॉपी की थी।'

    -'मेरा कैस तो प्यार में सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाता था।'

    -'ओह! वो तो व्हाट्सएप पर भेजा जाने वाला एक कोटेशन भर था। मैंने तो केवल आगे फॉरवर्ड किया था।' मजनूं ने हंसकर कहा।

    -'वाह रे व्हाट्सएपिये मजनूं! मैंने तेरे लिये अपने बाप से बगावत की और तू केवल मैसेज फॉरवर्ड कर रहा था।' लैला ने दांत पीसकर कहा।

    -'आ भाग चलें।' मजनूं ने प्रस्ताव रखा।

    -'कहाँ ?'

    -'तेरे बाप की सल्तनत से दूर।'

    -'क्यों ?'

    -'यहाँ रहे तो तेरा बाप मुझे ऊँट की खाल के जूतों से पिटवायेगा।'

    -'सचमुच मेरे बाप ने बहुत जुल्म किया।'

    -'तू मानती है ना ?' मजनूं ने उत्साहित होकर पूछा।

    -'बिल्कुल मानती हूँ। तेरा जुर्म यह नहीं था कि ऊँट की खाल के जूतों से पिटवाया जाता।'

    -'तू मानती है ना!' मजनूं का हौंसला बढ़ रहा था।

    -'हाँ मानती हूँ। तेरा जुर्म तो ऐसा था कि तुझे ऊँट के पैरों के नीचे कुचलवाया जाता।'

    -'यह क्या कहती है लैला ?' मजनूं की आवाज में मायूसी घुल आई थी।

    -'तुझको ही क्या, उन सारे व्हाट्सएपिये मजनुओं को यही सजा मिलनी चाहिये जिन्होंने प्यार को व्हाट्सएप का कोटेशन, फेसबुक की पोस्ट और मोबाइल फोन का मैसेज भर मान लिया है। आज मुझे शर्म आ रही है कि तुझ जैसे मजनुओं के मैसेज पढ़कर दीवानी हुई लैलाएं अपने माँ-बाप और परिवारों से बगावत करती हैं।'

    बात पूरी करते-करते लैला का स्वर फिर से रोने जैसा हो आया था किंतु इस बार वह रोई नहीं। वह पीछे मुड़ी और महल की सीढ़ियां चढ़ने लगी किंतु हड़बड़ी में किसी से टकरा गई। लैला ने गर्दन उठाकर देखा तो चौंक पड़ी। उसके पीछे सुल्तान खड़ा था और अपनी आंखें रेशमी रूमाल से पौंछ रहा था। लैला अपने बाप की गर्दन से लिपटकर रो पड़ी। मजनूं को समझ में नहीं आ रहा था कि वह रुके या चला जाये। कटोरों के टूटे हुए टुकड़े, लैला के दिल के टुकड़ों जैसे दिखाई दे रहे थे।


    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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