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  • अंधेरे में पलते उजाले (कहानी)

     10.05.2018
    अंधेरे में पलते उजाले (कहानी)

    बबीता स्वप्न बुनती है और स्वप्न के जंजाल में उनींदी सी रहकर स्वेटर बुनती है। स्वप्न और स्वेटर से इतर बबीता और भी बहुत कुछ बुनती है। बबीता जानती है कि जब तक उसमें बुनने की क्षमता है, तब तक ही वह बुन सकती है। बुनना उसके हाथ की बात नहीं है। उसे बुनने की भूमिका मिली है। उसे जीवन भर और सामर्थ्य भर बुनते ही रहना है। ऊन के मुलायम और रंग बिरंगे गोले केवल उसकी गोद में ही नहीं रखे हैं जिनके सिरे उसकी अंगुलियों में पकड़ी हुई सलाईयों से जुड़े हुए हैं, ऊन के गोले उसकी गोद के भीतर भी रखे हैं जिनके सिरे उसके अपने शरीर से जुड़े हुए हैं।

    हाथ की सलाईयां तेज गति से फंदे रचती हैं, नरम मुलायम रंगीन ऊन के गोले गोल-गोल नाचते हैं और स्वेटर का आकार शनैः शनैः बड़ा होता जाता है। उसका शरीर भी सलाइयों की तरह हिलता है, गोद के भीतर हलचल होती है और अदृश्य दीवारों के पीछे कुछ फंदे रचे जा रहे हैं। कुछ उलटे फंदे और उसके बाद कुछ सीधे फंदे। इन उलटे और सीधे फंदों के मेल से शरीर की अदृश्य दीवारों के पीछे जो कुछ भी बुना जा रहा है, वह शनैः शनैः बड़ा होता जाता है। कौन जाने कि बेटा है या बेटी! एक अनजान भय से कंपित रहकर अंधेरी कोठरी में सुबह का उजाला पालते जाना ही बबीता की क्षमता का चरम है।

    तीन साल की मुनिया ऊन के गोलों को उठाकर बाहर भाग जाना चाहती है किंतु हर बार की तरह बबीता उसे प्यार से झिड़क देती है - ‘भइया के लिये स्वेटर बुन रही हूँ। इन्हें लेकर मत भाग।’

    ‘कहाँ है भइया?’

    ‘अभी आयेगा। तू ऊन छोड़।’

    ‘कब आयेगा?’ मुनिया को भइया से मिलने की जल्दी है।

    ‘जब आयेगा तब अपने आप देख लेना। तू खेलेगी भइया के साथ।’

    ‘हाँ मैं भइया के साथ खेलूंगी।’

    ‘तो फिर ऊन छोड़।’

    मुुनिया अनमने हाथों से ऊन का गोला माँ की गोद में फैंक देती है।

    ‘ऐसे नहीं फैंकते, भइया के लग जायेगी।’

    ‘कहाँ है भइया?’ मुनिया फिर सवाल करती है।

    ‘जा तू बाहर खेल। देख तो गली में सब्जी बेचने वाला आया है क्या?’ ‘नहीं, पहले बताओ भइया कहाँ है। मैं उसके साथ खेलूंगी। मुनिया अड़ जाती है।

    इससे पहले कि बबीता कुछ जवाब सोच पाती, बाहर गली में गुब्बारे बेचने वाले की आवाज आई और मुनिया भइया देखने की जिद छोड़कर बाहर लॉन में दौड़ गई। बबीता हाथ की सलाइयों को समेटकर पलंग के कौने पर रख देती है। वह आहिस्ता से ऊन के मुलायम रंगीन गोलों को हाथ में उठाकर तोलती है, उसे आश्चर्य होता है कितने हलके हैं। उनका कोमल स्पर्श उन्हें और भी हलका बना देता है किंतु यही हलके गोले ठण्ड का गुरूर तोड़ देते हैं।

    सर्दियों के छोटे दिनों में आकाश के अतिथि को भी घर जाने की जल्दी रहती है इसलिये पाँच बजने से पहले ही सांझ होने का आभास होने लगा है। सास मंदिर जाने की तैयारी कर रही हैं और ससुर अंधेरा होने से पहले ही सायंकालीन भ्रमण के लिये चले गये हैं। पति के दफ्तर से लौटने से पहले बबीता को रात के खाने की तैयारी करनी है। वह पलंग का सहारा लेकर खड़ी होती है। भीतर भारीपन का अहसास होता है। उसका ध्यान एक बार फिर भीतर की अदृश्य रचना पर चला जाता है। आजकल उसका ध्यान बाहर की ओर कम और अपने भीतर की ओर अधिक रहता है।

    लोग कहते हैं कि आखिरी महीने में बालक माँ के पेट में उलटा लटक कर रहता है। इस दौरान वह माँ के शरीर से जुड़ी नाल के रास्ते भोजन प्राप्त करता है। उलटे लटकने की कल्पना मात्र से ही सिहर उठती है बबीता। वह जगह तो एक दम अंधेरी बंद कोठरी जैसी होगी जिसमें हाथ-पाँव तक हिलाने को जगह नहीं। क्या इतनी तंग अंधेरी बंद कोठरी में आँखें बंद करके उलटे लटके रहने में गर्भस्थ शिशु को कोई कष्ट नहीं होता होगा?

    बबीता को याद है, उसकी नानी कहा करती थीं - ‘हर प्राणी अपनी माँ के पेट में नौ महीने की सबसे कठिन सजा भोगता है। इस सजा से घबरा कर वह भगवान के सामने बारबार गिड़गिड़ाता है कि इस बार मुझे इस कष्ट से छुटकारा दिला दो, अब कभी पाप नहीं करूंगा। तब भगवान प्राणी को उसके अपराधों की जानकारी देता है और कहता है कि यह तेरे पिछले पापों की सजा है। जब तक तू पाप करता रहेगा, तब तक तू जन्म मरण के चक्कर में पड़ा रहेगा और बारम्बार यहाँ आता रहेगा। यह सजा तो तुझे भोगनी ही है।’

    बबीता चक्कर में पड़ जाती है। तो क्या मेरेे अपने भीतर इन दिनों एक न्यायालय चल रहा है जिसमें किसी अज्ञात, अदेखे, अजन्मे प्राणी के पूर्व जन्मों के पाप पुण्य के मुकदमे की सुनवाई हो रही है? क्या जो मासूम अदृश्य रचना मेरे रक्त और मज्जा से शनैः शनैः साकार हो रही है, वह अपने पूर्व जन्मों के कर्मों की सजा भोगने के लिये मेरे भीतर बनी एक अंधी कोठरी में उलटी लटकी हुई है और भगवान उससे उसके पूर्व जन्मों का लेखा-जोखा पूछ रहा है?

    बबीता का पूरा शरीर सिहर उठता है। भगवान पाप-पुण्य का लेखा-जोखा किससे पूछ रहा है? उलटे लटके हुए निर्माणाधीन शिशु के शरीर से या फिर उसके भीतर उलटी लटकी हुई निर्माणाधीन आत्मा से? क्या जिस तरह शिशु के शरीर का शनैः शनैः निर्माण होता है, उसी तरह आत्मा का भी शनैः शनैः अवतरण होता है? या फिर शरीर तो तिल-तिल कर बनता है और आत्मा एक साथ उसमें प्रवेश करती है? बबीता अपने आप से कई सवाल करती है किंतु कोई उत्तर नहीं सूझता।

    बबीता एक बार फिर अपने आप से पूछती है, पूर्व जन्मों के पापों की सजा किसे मिल रही है? तिल-तिल कर बन रहे उलटे लटके हुए शरीर को? या फिर उसके भीतर धीरे-धीरे अवतरित होती हुई आत्मा को? तो क्या जिस तरह मेरे शरीर में एक और शरीर प्रवेश कर गया है, उसी तरह मेरी आत्मा के भीतर भी एक और आत्मा प्रवेश कर गई है? वह खुद ही उलझ जाती है, उसे समझ नहीं आता, आत्मा के भीतर आत्मा कैसे प्रवेश कर सकती है? उसका ध्यान फिर से सजा वाली बात पर चला जाता है। माँ के पेट मंे सजा किसे मिलती है? शरीर को या आत्मा को?

    यदि सजा शरीर को मिलती है तो वह अन्याय है क्योंकि जिस शरीर ने पाप किये थे वह तो पहले ही कहीं मर चुका है। यह तो मेरे रक्त और मेरी मज्जा से बनने वाला शरीर है जो अभी तक पूरा बना ही नहीं है। फिर इसे सजा किस बात की? तो क्या सजा आत्मा को मिलती है? उस आत्मा को जो अजर है, अमर है, अखण्ड है, शाश्वत है? जो आत्मा अग्नि से नहीं जलती, पानी से नहीं भीगती, शस्त्र से नहीं कटती उस आत्मा को सजा कैसे दी जा सकती है? आत्मा तो कुछ भोगती ही नहीं, भोगता तो शरीर है।

    मुनिया गली में देखकर आ गई है। उसके चेहरे पर निराशा का भाव है। गुब्बारे वाला जा चुका है।

    ‘मम्मी गुब्बारे वाला चला गया।’

    बबीता का ध्यान कहीं और है। वह मुनिया की बात का जवाब नहीं देती।

    ‘मम्मी भइया आ गया?’

    ‘इसे भइया की बड़ी जल्दी पड़ी है।’ सास 
    हँस कर मुनिया के सिर पर हाथ फेरती हैं। वे मंदिर जाने के लिये तैयार हो चुकी हैं।

    ‘देख ध्यान से दरवाजा लगा लेना, मैं जा रही हूँ और तू कुछ खा पी लेना। ऐसे में भूखे नहीं रहते। बालक को कष्ट होता है।’ सास जाते-जाते निर्देश देती हैं।

    सास की बात से बबीता का ध्यान नाल से जुड़े गर्भस्थ शिशु की ओर चला जाता है। क्या गर्भस्थ शिशु की स्थिति चिकित्सालय में अचेत पड़े रोगी के समान है? वह स्वयं से सवाल पूछती है किंतु उत्तर में वह स्वयं ही अपने आप से सहमत नहीं हो पाती। वहाँ तो रोगी पलंग पर सीधा सोया रहता है और ग्लूकोज की बोतल उलटी लटकाई जाती है। जिससे रोगी ग्लूकाज प्राप्त करता रहता है। जबकि इस अंधी कोठरी में स्थिति उलटी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ ग्लूकोज की बोतल तो सीधी रहती है किंतु रोगी उलटा लटक कर ग्लूकोज प्राप्त करता है।

    बबीता को ध्यान है कि जब वह स्कूल में पढ़ती थी तब उनके घर में एक सन्यासी आया करते थे। वे बबीता के पिता के पुराने मित्र हुआ करते थे जो गृहस्थी का जंजाल छोड़कर वैरागी हो गये थे। उन्होंने बबीता के पिता से एक दिन कहा था - ‘जब तक प्राणी माता के गर्भ में रहता है तब तक वह ईश्वर से साम्य रखता है तथा निरंतर सोअ्हम-सोअ्हम अर्थात् मैं ही परमात्मा हूँ, मैं ही परमात्मा हूँ, कहता रहता है ताकि भीतर होने वाले सारे कष्टों को भूल जाये किंतु जब वही प्राणी माँ के गर्भ से बाहर आता है तो उसी क्षण सोअह्म-सोअ्हम भूलकर कोअ्हम-कोअ्हम अर्थात् मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ कहने लगता है और फिर से नये कष्ट पाने की भूमिका रचने लगता है।' 

    तो क्या इस समय मेरे भीतर पल-पल बड़ी हो रही रचना स्वयं के परमात्मा होने का दावा कर रही है? बबीता फिर अपने आप से सवाल पूछती है। यदि वह इस समय परमात्मा होने का दावा कर रही है तो फिर संसार में आते ही वह स्वयं को भूल क्यों जाती है? कोअ्हम्-कोअ्हम् क्यों कहने लगती है? वह रोने क्यों लगती है? बबीता को नहीं लगता कि वह अदृश्य मासूम रचना जिस भी अवस्था में उसके गर्भ में है, वह कुछ भी सोच सकने की स्थिति में है। वह तो एक निश्चेष्ट और निष्क्रिय स्थिति है। कोई भी प्राणी अचेत अवस्था में कैसे सोच सकता है? जब वह सोच ही नहीं सकता तो उसे कष्ट कैसे हो सकता है?

    अगले ही क्षण बबीता का ध्यान उचट कर दूसरी ओर चला जाता है। क्या कोई भी विचार शून्य रचना वृद्धि कर सकती है? यदि गर्भस्थ शिशु विचार शून्य होता है तो वह गर्भ से बाहर आते ही रोने क्यों लगता है? वह केवल कष्ट से भरा हुआ विचार ही हो सकता है जो नवजात शिशु को रोने के लिये प्रेरित करता है। विचार शून्य रचना रो नहीं सकती। इसका अर्थ यह हुआ कि गर्भस्थ शिशु कष्ट पूर्ण विचारों से परिपूर्ण है। उसे भूख लगती है, तभी तो वह माँ के गर्भ में रहकर नाल से आहार खींच लेता है और गर्भ से बाहर आकर दूध पीने लगता है। विचार शून्य रचना को भूख की अनुभूति नहीं होती।

    यदि गर्भस्थ रचना विचारों और अनुभूतियों से परिपूर्ण है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसे अंधेरी बंद कोठरी में कष्टों की अनुभूति होती ही होगी। लम्बे समय तक आँखें बंद करके चौबीसों घण्टे तरल आवरण में उसे घुटन का अहसास होता ही होगा। यदि प्राणी के बारबार जन्म लेने की बात सही है तो उसे यह बात भी अच्छी तरह स्मरण रहती होगी कि वह खुले आकाश में साँस लेने वाला प्राणी है। वह माता के गर्भ में बनी पानी की थैली में कैसे बंद रह पाता होगा? उसका दम तो घुटता ही होगा।

    नहीं-नहीं। एक बार फिर वह स्वयं से असहमत हो जाती है। क्या किसी भी आदमी को माँ के गर्भ में रहने के काल की कोई भी स्मृति होती है? इसका अर्थ यह है कि माँ के गर्भ के भीतर शिशु अपने आस-आस पास हो रही घटनाओं से अनजान होता है। उस समय की कोई स्मृति किसी भी आदमी को नहीं होती।

    लोग पूर्व जन्म के समय की स्मृतियों और घटनाओं की बात करते तो देखे गये हैं किंतु माता के गर्भ में निवास करने के समय की किसी घटना या स्मृति का उल्लेख करते हुए नहीं देखे गये हैं। इसलिये पानी के आवरण में रहने के दौरान शिशु को दम घुटने की अनुभूति बिल्कुल नहीं होती होगी।

    मछलियाँ भी तो पानी में रहती हैं। क्या उनका दम पानी में घुट जाता है? वे तो पूरा जीवन ही पानी में निकाल देती हैं। बबीता इस विचार पर भी स्थिर नहीं रह पाती। वह स्वयं से ही प्रश्न करती है और स्वयं से ही उनके उत्तर भी चाहती है। वह जानती है कि मछलियों का दम पानी के भीतर नहीं घुटता, वे तो बनी ही पानी के भीतर रहने के लिये हैं। यदि उन्हें पानी से बाहर निकाला जायेगा तो उन्हें कष्ट होगा। किंतु गर्भस्थ शिशु तो पानी के भीतर रहने के लिये नहीं बना है, उसे अवश्य नौ मास तक पानी की थैली के भीतर रहने में कष्ट होता होगा।

    एक बार फिर बबीता  के विचारों को झटका लगता है। वह अपने आप से नया प्रश्न करती है, मछलियों का ही उदाहरण क्यों? सृष्टि में मेंढक, सर्प और मगरमच्छ भी तो हैं जो पानी के भीतर और बाहर, दोनों ही स्थितियों में आनंद पूर्वक रह सकते हैं। आदमी भी उन्हीं की तरह का प्राणी हो सकता है जो नौ माह तक पानी की थैली में और उसके बाद हवा में बड़े मजे से रह सकता है। अचानक उसके विचारों का क्रम टूटता है। मुनिया उसे झिंझोड़ रही है।

    ‘मम्मी पापा आ गये।’ ‘

    अरे तेरे पापा आ भी गये। मैंने तो अभी खाना बनाना शुरु ही नहीं किया।’ विचारों को एक तरफ झटककर बबीता शीघ्रता से रसोई में घुस जाती है। सूर्य देवता अपनी प्रकाश शलाकाओं को समेट कर अपने घर चले गये हैं और बाहर काफी अंधेरा हो गया है। बिल्कुल बंद अंधेरी कोठरी जैसा जिसमें पूरी दुनिया सोअ्हम-सोअ्हम के स्थान पर कोअ्हम-कोअ्हम कह रही है।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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