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  • पक्की छत/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     05.02.2018
    पक्की छत/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    पक्की छत/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    शारदा बेचैन है। बार-बार करवटें बदल रही है। थोड़ी-थोड़ी देर में बाहर जाकर देख आती है, कितनी रात बाकी रही है। झौंपड़े में सन्नाटा है। पास 
    में ही उसका पति मदन बेसुध होकर सोया पड़ा है। दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद, शाम को खाना कम और दारू ज्यादा। इसके बाद पूरा झौंपड़ा कच्ची शराब की गंध से भर जाता है। शारदा को कच्ची दारू की गंध तनिक भी नहीं भाती किंतु पिछले पच्चीस सालों से इस तेज गंध को झेलते रहने के कारण अब उसे इस गंध से उतनी परेशानी नहीं होती जितनी उन दिनों में होती थी, जब वह ब्याह के बाद इस झौंपड़े में आई थी।

    एक कौने में चारों बच्चे बेखबर सोये पड़े हैं, अपने बाप की ही तरह पूरा शरीर बिखेरकर। गहरी नींद में किसी को खबर नहीं कि हाथ कहां है और पैर किधर। तीसरे कोने में श्वसुर का भी वही हाल है। उसका शरीर भी दारू के कारण जर्जर हो रहा है। हाथ पैर कांपते हैं, जबान लड़खड़ाती है, टीबी का मरीज है किंतु दारू पिये बिना गुजर नहीं।

    शारदा उठकर झौंपड़े से बाहर आती है। सचमुच आज की रात उसके लिये काफी लम्बी है। चंद्रमा जरूर अपने स्थान से थोड़ा हिला है किंतु तारे तो वहीं की वहीं, अड़े हुए हैं। शारदा झौंपड़े के बाहर पत्थर पर बैठ जाती है। कौन जाने कल का दिन उसके मन की मुराद पूरी करने वाला ही हो! उसके दिल में उम्मीद बंधती है....... किंतु आज तक तो जीवन में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे देखकर यह लग सके कि उसके मन की मुराद पूरी भी हो सकती है......... किंतु ग्रामसेवक स्वयं आकर शारदा के दस्तखत लेकर गया है और कहकर गया है कि कल पंचायत समिति में आ जाना तुम्हें पक्का मकान बनाने के लिये पचास हजार रुपये मिलेंगे। मकान में पक्का शौचालय बनाने के लिये बत्तीस सौ रुपये अलग से मिलेंगे। खुद मंत्रीजी जयपुर से चलाकर आयेंगे, गरीबों को चैक देने।

    शारदा फिर आश्वस्त होती है। यदि मंत्रीजी आये तो अवश्य ही पचास हजार रुपये का चैक मिल जायेगा। कब से शारदा के मन में यह आस है कि उसके बच्चों के सिर पर उनकी अपनी पक्की छत हो। शारदा का श्वसुर भीखाराम गांव की गलियों में झाड़ू लगाते-लगाते बूढ़े हो गया किंतु परिवार को पक्की छत तो दूर, कभी झौंपड़े के लिये नया तिरपाल भी नसीब नहीं हुआ जो बरसात में झौंपड़े को टपकने से रोक सके।

    शारदा का पति मदन भी जिंदगी भर हाड़ तोड़ मेहनत के बाद कभी पक्की छत का सपना नहीं देख सका। सपना देखता भी कैसे, वह तो जो कुछ भी कमाता था, हर शाम दारू की भेंट चढ़ जाता था। आज से तीन साल पहले इंदिरा आवास योजना में जब शारदा का नाम आया था तब शारदा को कुछ आस बंधी थी कि देर सबेर ही सही किंतु उसे पक्का मकान बनाने के लिये रुपये मिल जायेंगे किंतु जिस गति से पिछले तीन सालों में सूची में नाम आगे सरक रहे थे, उससे उसकी आस बार-बार कमजोर पड़ जाती थी। जब वह गांव के लोगों के मुँह से सुनती कि इस सूची में लिखे नामों को मकान मिलने में बीस-बाईस साल लग जायेंगे तो उसका रहा-सहा धैर्य जवाब दे जाता।

    कभी-कभी निराश होकर वह अपने घास-फूस के झौंपड़े में गूदड़ी में मुँह छिपाकर रो पड़ती....... किंतु इन आंसुओं की इस बेरहम संसार में कोई कीमत नहीं थी........... कीमत होना तो दूर, इन आंसुओं को कोई देखने वाला तक न था........करे तो क्या करे ? जाये तो कहां जाये ? फूस की छत बरसात को रोक नहीं पाती। सर्दी की रातों में दांत किटकिटा जाते और गमियों की दुपहरी में झौंपड़े में लू बरबस घुस आती।

    अब तो खैर बच्चे काफी बड़े हो गये किंतु जब बच्चे छोटे थे, तब वह काम के लिये मदन के साथ झौंपड़े से निकलती तो उसका कलेजा किसी अनहोनी की आशंका से कांपता रहता। आये दिन वह सुनती कि झौंपड़ी में बच्चे और बकरियां जल मरे तो उसका कलेजा मुँह को आ जाता। फिर भी उसे अपने छोटे बच्चों को झौंपड़ी में बिना किसी सहारे के छोड़कर, मजदूरी करने पति के साथ जाना ही पड़ता।

    कुछ दिन पहले उसने सुना कि सरकार गांवों के गरीब लोगों को मकान बनाने के लिये रुपया देगी तो मन के किसी कोने में आशा का अंकुर एक बार फिर फूट पड़ा था। उसने इधर-उधर पूछताछ की। सरपंच साहब ने बताया कि हाँ उन्होंने भी अखबार में पढ़ा है कि सरकार राज्य के गरीब लोगों को मकान बनाने के लिये चौंतीस सौ करोड़ रुपये का कर्ज लेगी। इस कर्ज से राज्य में रह रहे गरीबों के लिये दस लाख मकान बनाये जायेंगे। कर्ज का नाम सुनकर शारदा एक बार फिर मुरझा गई। कर्ज लेंगे तो चुकायेंगे कैसे ? किंतु जब सरपंच साहब ने बताया कि यह कर्जा सरकार स्वयं चुकायेगी, गरीबों को नहीं चुकाना पड़ेगा तो शारदा की जान में जान आई। यह एक ऐसी सूचना थी जिसे सुनकर शारदा का दिल बल्लियों उछल गया।

    कुछ दिन और बीते। गांव के लोगों में यह चर्चा आम हो गई कि सरकार गरीबों को मकान बनाने के लिये पचास हजार रुपया देगी। शारदा भी इस चर्चा को सुनती और आकाश की ओर देखकर मन ही मन परमात्मा से प्रार्थना करती कि हे भगवान, यह खबर सच्ची निकले। इसमें किसी तरह की दूसरी बात पैदा नहीं हो। पहले भी कितनी ही बार उसने इस तरह की बातें सुनी थीं किंतु वे केवल बातें ही बनकर रह गई थीं। कहीं इस बार फिर किस्मत उसी तरह धोखा न दे जाये। उसके मन में डर घर कर गया था।

    आखिर वो दिन भी आया जब ग्रामसेवक उसका फार्म भरवाने और बैंक में खाता खुलवाने के लिये आया। श्वसुर भीखाराम ने हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया था।

    -‘शारदा कहां है ?’ ग्रामसेवक ने भीखाराम से पूछा था। ग्रामसेवक के मुँह से अपना नाम सुनकर शारदा के कान खड़े हो गये थे।

    -‘झौंपड़े में ही है, क्यों ? भीखाराम ने उलटकर सवाल किया था।

    -‘कागज घर की औरत के नाम बनेंगे। ग्रामसेवक ने कहा।

    -‘औरत के नाम क्यों ?’ शारदा के श्वसुर भीखाराम ने गुस्से से पूछा था।

    -‘औरत के नाम इसलिये ताकि मरद उस मकान को बेचकर दारू न पी जायें।’ ग्राम सेवक ने हँसकर जवाब दिया था।

    -‘दारू! मैं दारू कहां पीता हूँ!’ भीखाराम ने आदत के अुनसार जवाब दिया था। श्वसुर का जवाब सुनकर शारदा को हँसी आ गई थी।

    -‘हाँ, मुझे पता है, तू दारू नहीं पीता। इस गांव में कोई दारू नहीं पीता।’ ग्रामसेवक ने भी हँसकर जवाब दिया था जिसे सुनकर भीखाराम भी झैंप गया था।

    -‘लेकिन घर का मालिक तो मरद ही होता है, क्या सरकार अब औरतों को घर का मालिक बनायेगी ?

    -‘ यदि मरद यू हीं दारू पीते रहे तो एक दिन सारे घरों की मालिक औरतें हो जायेंगी। चल शारदा, अंगूठा लगा।’ ग्रामसेवक ने मुँह बिगाड़कर जवाब दिया।

    शारदा को मानो अब भी अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं आया था। जाने क्यों उसकी आंखों से रुलाई फूट पड़ी। इस संसार में जब आदमी फूटी हुई किस्मत लेकर आता है तो उसे चारों ओर से धक्के ही खाने पड़ते हैं। इसलिये उसे किसी अच्छी बात पर जल्दी से विश्वास भी नहीं होता। शारदा का अब तक का अनुभव तो ऐसा ही रहा था। अब तो फार्म भी भरा जा चुका था। खाता भी खुल गया था। फिर भी शारदा के मन में आशंका बनी रही।

    वह रोज ही पंचायत के दफ्तर जा पहुंचती- ‘कब आयेंगे, हमारे मकान बनाने के पैसे।’

    -‘सबर कर। जल्दी आयेंगे।’ ग्राम सेवक हँसकर जवाब देता।

    -‘आ तो जायेंगे ?’ शारदा का अगला सवाल होता।

    -‘हाँ जरूर आ जायेंगे। सरकार ने हडको से साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये उधार लिये हैं। तीन सालों के भीतर-भीतर दस लाख मकान बनेंगे।’

    -‘तीन सालों में !’ शारदा अधीर हो उठती।

    -‘हाँ, तीन सालों में।’ इतना कह कर ग्राम सेवक अपने काम में लग जाता।

    शारदा फिर डर जाती। कौन जाने तीन साल में सरकार का सारा रुपया खतम हो जाये और मेरा नम्बर ही नहीं आये। वह मन ही मन चिंता करती। आखिर शारदा की किस्मत जागी। सारी प्रार्थनायें काम आ गईं और आज शाम को उसके श्वसुर खुशखबरी लेकर आये- ‘बीडीओ साहब की खबर आई है। मकान के कागज और चैक लेने पंचायत समिति चलना है।’

    शारदा को एकाएक विश्वास नहीं हुआ। उसे तीन साल क्या, तीन महीने भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थी। एक दिन की मजदूरी तो मारी जायेगी किंतु यदि वास्तव में मकान बनाने के लिये मंत्रीजी ने पचास हजार रुपये का चैक दे दिया तो उसके मन की साध पूरी हो जायेगी। यही सोच-सोच कर आज शारदा को नींद नहीं आ रही।

    काफी देर तक वह यूं ही पत्थर पर बैठी रही। चंद्रमा अपने स्थान से थोड़ा और हिल गया। झौंपड़े में सन्नाटा था। गांव की सुनसान गलियों में कुत्तों के भौंकने की आवाज जरूर उस सन्नाटे को भेद जाती थी। जाने कब उसी पत्थर पर बैठे-बैठे उसे झपकी आ गई। उसने देखा कि वह अपने पति और श्वसुर के साथ पंचायत समिति में खड़ी है। मंत्रीजी उसे पचास हजार रुपये का चैक थमा रहे हैं। अचानक श्वसुर ने शारदा के हाथ से वह चैक छीन लिया है। शारदा हक्की-बक्की खड़ी है। श्वसुर कह रहे हैं, ला मुझे दे! तू क्या करेगी इस चैक का ?

    शारदा से कुछ जवाब न बन पड़ा। बीडीओ साहब ने श्वसुर के हाथों से चैक लेकर फिर से शारदा को दे दिया है। बीडीओ साहब भीखाराम पर बिगड़ रहे हैं। यह चैक तेरे काम का नहीं है। इसका पैसा केवल शारदा को मिल सकता है। श्वसुर के चेहरे पर बेबसी के भाव हैं। शारदा ने चैक मोड़कर ब्लाउज में रख लिया है।

    देख शारदा, इस चैक को बैंक में जमा करवा देना। थोड़ा-थोड़ा करके रुपया निकालना और अपना मकान बनाना। इन दोनों को मत देना, न अपने पति को, न अपने श्वसुर को। ये तो इस रुपये को दारू में उड़ा देंगे। शारदा चुप है।

    -‘नहीं मालिक। हम दारू नहीं पियेंगे। इन पैसों से हमारे बच्चों के सिर पर पक्की छत ही बनेगी। मदन और भीखाराम हाथ जोड़कर बीडीओ साहब से कह रहे हैं।

    -‘और हमारा क्या ?’ शारदा के हाथ से किसी ने चैक फिर से छीन लिया है। चैक तो उसने ब्लाउज में रखा था, फिर से हाथ में कैसे आ गया ? शारदा सोचती है, और चैक छीनने वाले की तरफ देखती है।

    -‘अरे ग्राम सेवकजी! ये क्या कर रहे हैं, लाइये चैक मुझे दीजिये। ये मेरा चैक है, इससे मेरे बच्चों का घर बनेगा।’ शारदा बिफर पड़ती है।

    -‘ध्यान से देख बावळी! मैं ग्राम सेवक नहीं हूँ।’ चैक छीनने वाला हँसता है।

    -‘अरे हाँ, आप तो सरपंचजी हैं। माफ करो मालिक। ये चैक मुझे दे दो।’ शारदा हाथ जोड़ती है।

    -‘बावळी हो गई है। मैं तुझे सरपंच दिखाई देता हूँ ?’ चैक छीनने वाला चैक हवा में लहराता है। बीडीओ साहब उसके हाथ से चैक लेकर फिर से शारदा को देते हैं।

    -‘जा घर चली जा। यहाँ कोई छीन लेगा।’ बीडीओ साहब स्नेह से शारदा के सिर पर हाथ रखते हैं। शारदा खुशी से रो पड़ती है। चैक फिर से उसके हाथ में आ गया है।

    अचानक दृश्य बदल गया है। शारदा अपने झौंपड़े के सामाने खड़ी है। नहीं-नहीं झौंपड़ा नहीं, मकान के सामने खड़ी है। यह तो शारदा का ही मकान है जिस पर पक्की छत दूर से ही चमक रही है।

    -‘ऐ........यहां कहां बैठकर सो रही है ?’ किसी ने झिंझोड़कर उठाया।

    शारदा ने
    आंखें खोलीं तो देखा कि दिन निकल आया है। उसका पति मदन उसे झिंझोड़कर उठा रहा है। वहां न कोई सरपंच है, न बीडीओ साहब हैं। वह तो अपने झौंपड़े के बाहर बैठी है। पूरी रात वह इस पत्थर पर बैठी सोती रही है।

    -‘अरे! इतना दिन निकल आया ? पंचायत समिति भी तो जाना है।’ शारदा ने हड़बड़ाकर कहा और पत्थर से उठ खड़ी हुई।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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