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  • अंतिम उपदेश/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     05.02.2018
    अंतिम उपदेश/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    अंतिम उपदेश/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    महात्माजी बड़े प्रसन्न हैं। जंगल के जानवरों पर उनके प्रवचनों का अच्छा प्रभाव पड़ रहा है। जंगल का सम्पूर्ण वातारण ही जैसे बदल गया है। अब बहुत से भेड़िये नदी पर पानी पीने आते तो हरिणों तथा खरगोशों की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखते। बहुत से गीदड़, जरख, लक्कड़बग्घे और लोमड़े गले में तुलसी मालाएं डालकर रामधुन गाते हुए जंगल की पगडण्डियों पर विचरण करते हुए दिखाई देते हैं तो महात्माजी का रोम-रोम पुलकित हो उठता है। नदियों के घाट पूरी तरह सुरक्षित हो गये हैं, अब वहाँ हिंसा पूरी तरह बंद हो गई है।

    बाघ और तेंदुए तो अब जंगल में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते। महात्माजी ने भेड़ियों से पूछा कि जब वे इस जंगल में आये थे तो बहुत से बाघ-बघेरे, तेंदुए और चीते दिखाई देते थे किंतु अब उनमें से एक भी दिखाई नहीं देता तो भेड़ियों ने अत्यंत आदर से शीश झुकाकर महात्माजी से निवेदन किया कि वे पातकी और हिंसक प्राणी, महात्माजी के व्यक्तित्व से प्रभावित हो, यह जंगल छोड़कर दूसरे जंगलों में चले गये हैं। महात्माजी ने उस दिन ईश्वर को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया कि जंगल में अब खरगोश और हरिण जैसे निरीह प्राणी पूरी तरह सुरक्षित हो गये हैं।

    यहाँ तक तो सब कुछ अद्भुत और प्रभावकारी था किंतु महात्माजी ने एक विचित्र बात भी अनुभव की कि जहाँ एक ओर जंगल के हिंसक पशु इतने सात्विक हो गये हैं, वहीं निरीह प्राणियों में हिंसक पशुओं के प्रति अविश्वास का भाव तनिक भी नहीं घटा। महात्माजी इन निरीह प्राणियों को समझाने का बहुत प्रयास करते किंतु निरीह प्राणियों के चेहरों से अविश्वास के भाव जाते ही नहीं। महात्माजी का मन तब बहुत विचलित हो जाता है, जब वे देखते हैं कि लाख उपदेशों के उपरांत भी खरगोशों, भेड़ों, बकरियों और हरिणों के चेहरों पर प्रसन्नता के वे भाव नहीं आते, जिनकी अपेक्षा महात्माजी को है। फिर भी महात्माजी को विश्वास है कि जिस प्रकार हिंसक पशुओं के मन में सत्य के प्रति निष्ठा जागृत हुई है, उसी प्रकार निरीह पशुओं के मन में भी सत्य की शक्ति के प्रति भरोसा उत्पन्न हो ही जायेगा। इसलिये वे जंगल में घूम-घूम कर पशु-पक्षियों को उपदेश देते रहे।

    जंगल में दिन छोटे और ठण्डे ही होते हैं किंतु जब सर्दियां बीत गईं और गर्मियां आ गईं तो जंगल में भी दिन लम्बे और गर्म हो गये। विशेष रूप से दुपहरी बहुत लम्बी होने लगी किंतु दिन का यही हिस्सा ऐसा होता है जिसमें जंगल सर्वाधिक शांत होता है। एक दिन दुपहरी में सूरज आकाश के मध्य तप रहा था और जंगल के समस्त पशु-पक्षी अपने आश्रय स्थलों में विश्राम कर रहे थे। यह महात्माजी के स्वाध्याय का समय होता है और उनके स्वाध्याय में कोई पशु-पक्षी विघ्न उत्पन्न नहीं करता। अचानक कुटिया के द्वार पर हलचल हुई। महात्माजी ने ग्रंथ पर से आंख हटाकर द्वार की ओर देखा तो देखते ही रह गये। कुटिया के द्वार पर दो सुंदर हरिण शावक खड़े हुए थे और उत्सुक नेत्रों से महात्माजी की ओर ताक रहे थे। इतने सुंदर, इतने निरीह, इतने भोले हरिण शावक महात्माजी ने अब से पहले कभी नहीं देखे थे। महात्माजी का मन आनंद से नाच उठा। वे अपने स्थान से उठे और उन्होंने हरिण शावकों को गोद में भर लिया।

    -‘आओ मेरे बच्चो! तुम्हारा इस कुटिया में स्वागत है।' महात्माजी ने उन्हें पीने के लिये जल दिया और कहा, दोपहर में इधर-उधर मत भटको। तुम्हारी माँ तुम्हारे लिये परेशान हो रही होगी।

    हरिण शावकों ने महात्माजी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उन्हें तो कुटिया में आ रही चंदन की सुगंध आकर्षित कर रही थी। वे उसी सुगंध का आनंद लेने लगे। कुटिया में रखे ग्रंथ भी उन्हें किसी अचरज से कम नहीं लग रहे थे। कुछ देर हरिण शावकों की निश्छल चेष्टाओं का आनंद लेने के बाद महात्माजी ने उन्हें अपने निकट बैठा लिया और फिर से स्वाध्याय में मन लगाने का प्रयास किया। महात्माजी का मन स्वाध्याय में नहीं लगा। उन्होंने ग्रंथ पर से दृष्टि हटा ली और हरिण शावकों की ओर देखा। हरिण शावक टकटकी लगाकर महात्माजी की ओर ही देख रहे थे। महात्माजी ने फिर से ग्रंथ उठा लिया और उच्च स्वर से उसका पाठ करने लगे। महात्माजी ने अनुभव किया कि हरिण शावक ध्यान लगाकर ग्रंथ का पाठ सुन रहे हैं। उस दिन महात्माजी को बहुत आनंद आया। उनके मन को असीम शांति मिली। उन्होंने निश्चय किया कि अब से वे स्वाध्याय करने के स्थान पर उच्च स्वर से ग्रंथ का वाचन करेंगे।

    संध्या होने को आई तो महात्माजी ने हरिण शावकों को अपनी माता के पास जाने के लिये कहा। दोनों हरिण शावकों ने महात्माजी को अभिवादन किया तथा उछलते कूदते महात्माजी की आंखों से ओझल हो गये। अगली प्रातः को जब महात्माजी ने कुटिया के बाहर आकर सूर्यदेव को प्रणाम किया तो उनके आश्चर्य का पार न रहा, दोनों हरिण शावक कुटिया के बाहर ही खेल रहे थे। महात्माजी को देखकर वे उनके निकट आकर उनकी टांगों से लिपट गये। महात्माजी का मन एक अनोखे आनंद से भर गया। ये कैसा आनंद है, महात्माजी ने विचार किया। इन निरीह प्राणियों की मित्रता ने महात्माजी के अंतः स्थल को किसी दिव्य अनुभूति से भिगो दिया था।

    महात्माजी ने आज भी दुपहरी मेें स्वाध्याय करने के स्थान पर ग्रंथों का उच्च स्वर से पाठ किया और दोनों हरिण शावक पूरे समय उनके निकट बैठकर उस पाठ को सुनते रहे। तीसरे दिन भी यही हुआ और चौथे दिन भी। फिर तो यह महात्माजी की दिनचर्या का नियमित भाग बन गया। तीनों प्राणी, अपनी इस अद्भुत पाठशाला में निमग्न रहते। कुछ दिन इसी प्रकार बीत गये। इधर ये तीनों प्राणी, शास्त्रों में निमग्न थे और उधर जंगल में कुछ अनपेक्षित और कुटिल चालें चली जाने लगीं। महात्माजी को पता ही नहीं चला कि जंगल में क्या कुछ चल रहा है।

    एक दिन महात्माजी प्रातःकाल में कुटिया से बाहर निकले तो हरिण शावक वहाँ नहीं थे। जब से हरिण शावकों ने कुटिया में आना प्रारम्भ किया था, तब से यह पहली बार था कि वे महात्माजी के बाहर आने से पहले कुटिया के द्वार पर उपस्थित नहीं थे। महात्माजी, हरिण शावकों को देखने के लिये व्यग्र हो उठे। एक प्रहर बीत गया किंतु हरिण शावक नहीं आये। महात्माजी ने शास्त्र खोले किंतु उनका मन ग्रंथ पढ़ने में नहीं लगा। हार कर, महात्माजी ने हरिण शावकों को ढूंढने के लिये जंगल में जाने का निश्चय किया। अभी वे लकुटी उठाकर कुटिया से बाहर आये ही थे कि उन्हें कुटिया की ओर आने वाली पगडण्डी पर धूल उड़ती हुई दिखाई दी। महात्माजी को लगा कि हरिण शावक ही दौड़ते हुए उनकी ओर आ रहे हैं।

    महात्माजी कुटिया के द्वार पर ही ठहर गये। उनका अनुमान सही था, दोनों हरिण शावक दौड़ते हुए उनकी ओर ही चले आ रहे थे। कुछ ही क्षणों में दोनों हरिण शावक महात्माजी के निकट पहुंच गये। महात्माजी ने उन दोनों को निकट आया देखकर संतोष की सांस ली किंतु यह देखकर उनके आश्चर्य का पार न रहा कि दोनों हरिण शावक आज महात्माजी के पैरों से न लिपटकर सीधे कुटिया के भीतर चले गये थे और एक कौने में छिपने का प्रयास करने लगे।

    महात्माजी ने देखा कि हरिण शावकों की त्वचा पर भेड़ियों के पंजों के चिह्न अंकित थे और दोनों की त्वचा से रक्त बह रहा था। महात्माजी को विश्वास नहीं हुआ, जो भेड़िये गले में तुलसी की माला डालकर जंगल की पगडण्डियों पर रामधुन गाते फिरते थे, उनमें हिंसा की प्रवृत्ति फिर से लौट आई थी।

    -‘किसने की तुम्हारी ये दशा ?’ महात्माजी ने हरिण शावकों से पूछा। नित्य की ही भांति हरिण शावकों ने प्रत्युत्तर नहीं दिया। उनकी कातर आंखों से आंसू बह रहे थे और वे भय के कारण थर-थर कांप रहे थे। शावकों की यह दशा देखकर महात्माजी के मन में करुणा का सागर उमड़ पड़ा। उन्होंने हरिण शावकों को गोद में उठा लिया।

    -‘चलो मेरे साथ चलो, मैं उन भेड़ियों की भर्त्सना करता हूँ। तुम्हारे साथ वे इस तरह का व्यवहार कैसे कर सकते हैं ?’ महात्माजी अभी अपनी बात कह ही रहे थे कि उन्हें पगडण्डी के उस ओर से रामधुन सुनाई दी। अवश्य ही वहाँ कुछ भेड़िये हैं, महात्माजी ने अनुमान लगाया और वे तेज कदमों से चलते हुए उसी दिशा में चल दिये।

    वास्तव में ही वहाँ कुछ भेड़िये थे जो एक पेड़ के नीचे बैठकर रामधुन गा रहे थे। महात्माजी को आया देखकर भेड़िये उठ खड़े हुए और उन्होंने महात्माजी के चरणों में प्रणाम किया। महात्माजी ने भेड़ियों को बताया कि आज हरिण शावकों के साथ क्या हुआ है! भेड़ियों ने शावकों के साथ हुए बुरे व्यवहार पर आश्चर्य जताते हुए, महात्माजी के समक्ष खेद व्यक्त किया और महात्माजी को आश्वस्त किया कि वे उन भेड़ियों को, इस बुरे काम के लिये लताड़ पिलायेंगे ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो।

    भेड़ियों की क्षमा याचना से महात्माजी के चित्त की उद्विग्नता शांत हो गई। वे फिर से अपनी कुटिया में लौट आये। हरिण शावक अब भी कौने में दुबके हुए थे। महात्माजी ने शावकों की त्वचा पर औषधि का लेपन किया तथा शांत चित्त होकर ग्रंथ पढ़ने बैठ गये। शावक भी अपने घावों की पीड़ा भुलाकर महात्माजी के पास आकर बैठ गये। नित्य की ही भांति आज भी शास्त्रों के सेवन में तीनों प्राणियों को बहुत आनंद आया।

    संध्या होने को आई तो महात्माजी ने शावकों को अपने घर जाने के लिये कहा किंतु हरिण शावकों ने जाने से मना कर दिया। इस पर महात्माजी ने उन्हें कुटिया में ही रोक लिया। इसके बाद, हरिण शावक महात्माजी की कुटिया में ही रहने लगे। भेड़ियों के भय से वे भूलकर भी कुटिया के बाहर नहीं निकलते। महात्माजी ने शावकों को समझाया कि तुम जंगल के प्राणी हो, तुम्हें जंगल में विचरण करने के लिये अवश्य जाना चाहिये तथा भेड़ियों के साथ भी कुछ समय व्यतीत करना चाहिये ताकि वे तुम्हारे प्रति मित्रता का भाव रख सकें। भेड़िये अब तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि उनकी प्रतााड़ना कर दी गई है।

    हरिण शावकों ने महात्माजी को बताना चाहा कि भेड़ियों की वास्तविक वृत्ति क्या है किंतु महात्माजी ने उनकी बात अनसुनी कर दी और उन्हें स्नेह से झिड़कते हुए कहा कि वे भेड़ियों के प्रति दुराग्रह न रखें, यदि हमारी दृष्टि बुराई पर ही रहेगी तो हमारे जीवन से बुरी चीजें कभी दूर नहीं जा सकेंगी। सदैव अच्छाई पर अपनी दृष्टि केन्द्रित करो। यही जीवन का चरम उत्कर्ष है। हरिण शावकों ने सिर झुका कर महात्माजी की बात सुन ली किंतु महात्माजी के आदेश के उपरांत भी कुटिया से बाहर निकलने से स्पष्ट मना कर दिया और महात्माजी के लाख प्रयास करने पर भी वे कुटिया से बाहर नहीं निकले।

    कुछ दिन और बीते। महात्माजी ने अनुभव किया कि अब पगडण्डियों के निकट रामधुन की आवाजें तेज हो गई हैं तथा गले में तुलसी माला पहने हुए भेड़ियों के झुण्ड जब-तब कुटिया के निकट से निकलते हुए दिखाई दे जाते हैं। जंगल से आती हुई रामधुनों को सुनकर तथा पगडण्डियों पर विचरण करते हुए रामनामी भेड़ियों को देखकर महात्माजी को असीम आनंद का अनुभव होता कि भेड़ियों में रामनाम के प्रति अनुराग बढ़ रहा है किंतु हरिण शावक भेड़ियों को देखते ही सहम कर कुटिया के कोने में छिप जाते।

    कुछ दिन और बीते। कुटिया के बाहर भेड़िये रामधुन गाते रहे और कुटिया के भीतर महात्माजी शावकों को धर्मग्रंथ सुनाते रहे। महात्माजी कुटिया से बाहर निकलते तो हरिण शावक उछलकर उनकी गोद में चढ़ने की चेष्टा करते। महात्माजी हँसकर उन्हें गोद में उठा लेते। जैसे ही भेड़िये महात्माजी को देखते तो वे श्रद्धा और विनय के वशीभूत होकर महात्माजी के चरणों की धूल लेते। महात्माजी उनकी इस सात्विक वृत्ति की प्रशंसा करते और उन्हें जी भरकर आशीर्वाद देते। इस प्रकार महात्माजी, भेड़ियों की ओर से पूरी तरह निश्चिंत थे किंतु शावकों का भय दिन पर दिन बढ़ता ही जाता था।

    एक दिन महात्माजी ने शावकों से कहा कि वे भेड़ियों में हर क्षण बुराई न देखें। उनमें भी बहुत अच्छाईयां हैं। कुछ भेड़िये बुरे हो सकते हैं किंतु समस्त भेड़िये बुरे नहीं हैं। हरिण शाावक सिर झुकाकर महात्माजी का प्रवचन सुनते किंतु कुछ प्रत्युत्तर नहीं देते। कुछ दिन और बीत गये। एक दिन महात्माजी कुटिया से बाहर निकले तो एक भेड़िये ने कहा कि महात्माजी आपके उपदेशों से हम तो अहिंसक और सात्विक हो गये हैं किंतु आप हमारी सदाशयता पर विश्वास ही नहीं करते। जब देखो इन शावकों को छाती से चिपकाये रहते हैं !

    महात्माजी ने हँसकर कहा कि बच्चे हैं, इसलिये डर गये हैं। कुछ दिनों में स्वतः ही समझ जायेंगे। मैं आप लोगों की सात्विक वृत्ति को देखकर प्रसन्न हूँ। कुछ दिन और बीत गये। भेड़ियों की सात्विकता और बढ़ गई किंतु शावकों की प्रवृत्ति में अंतर नहीं आया। महात्माजी यह देखकर हैरान थे कि भेड़ियों पर तो उपदेशों का प्रभाव होता है किंतु हरिण शावकों की वृत्ति में किंचित् अंतर नहीं आता।

    कुछ दिन और बीत गये। एक रात जंगल में तेज बरसात हुई। ठण्डी हवाओं में मिट्टी की सौंधी सुगंध घुल गई। वर्षा के जल में धुलकर वृक्षों के पत्ते और भी हरे तथा चमकदार हो गये। कुटिया के निकट लगे तुलसी के पौधों से तेज सुगंध निकलकर कुटिया के भीतर तथा आसपास के वातातरण में फैल गई। महात्माजी ने प्रकृति की इस उदारता के लिये ईश्वर का धन्यवाद दिया तथा पूजा के लिये पुष्प लेने कुटिया से बाहर निकले। दोनों हरिण शावक एक कौने में सोये पड़े थे।

    जैसे ही महात्माजी ने कुटिया से बाहर पैर धरा, भेड़ियों का एक झुण्ड उन पर टूट पड़ा। महात्माजी असावधान थे इसलिये धरती पर गिर गये। महात्माजी यह देखकर हैरान थे कि ये वही भेड़िये थे जो पगडण्डी के दूसरी तरफ बैठकर कई महीनों से रामधुन गा रहे थे। महात्माजी के मुंह से चीख निकल गई। ऐसा कैसे हुआ!

    एक भेड़िये ने महात्माजी की एक टांग में अपने तीखे दांत गढ़ा दिये। महात्माजी पीड़ा से चीख उठे। दूसरे भेड़िये ने उछलकर महात्माजी की गर्दन पकड़ ली। महात्माजी का दम घुटने लगा किंतु उन्होंने हिम्मत करके कुटिया का द्वार बंद करने की चेष्टा की। एक भेड़िये ने महात्माजी के हाथ में अपना जबड़ा धंसा दिया। फिर भी महात्माजी ने कुटिया का द्वार बाहर से बंद कर दिया।

    -‘ढोंगी साधु! कब तक तू इन हरिण शावकों के प्राण बचायेगा।’ एक भेड़िये ने महात्माजी की टांग चबाते हुए कहा।

    -‘मरते-मरते भी कुटिया के द्वार बंद करके हमें परेशान कर रहा है।’ दूसरे भेड़िये ने महात्माजी की बांह को जड़ से ही उखाड़ते हुए कहा।

    -‘कुटिया का द्वार आज नहीं तो कल हम खोल ही लेंगे किंतु इस पाखण्डी को तो रास्ते से हटाओ।’ एक भेड़िये ने कुटिया का चक्कर लगाकर शावकों तक पहुंचने का दूसरा मार्ग खोजने की चेष्टा की।

    महात्माजी के गले की नली कट चुकी थी और अब वे अंतिम सांसें ले रहे थे, उनकी आंखें बंद होने लगी थीं। किसी तरह महात्माजी ने आंखें खोलकर अपने चारों ओर देखा। कुछ भेड़िये महात्माजी के हाथों और टांगों को चबा रहे थे और कुछ भेड़ियों ने उनका पेट फाड़ डाला था। उन्हें समझ में आ गया था कि अब वे इस जंगल में कुछ ही क्षणों के अतिथि हैं।

    जब आंखें फिर से मुंदने लगीं तो महात्माजी के कानों में शावकों की कांपती हुई आवाजें सुनाई दीं, वे कुटिया के भीतर से महात्माजी को सावधान कर रहे थे- ‘आप इनसे बचकर भाग जाओ महात्माजी वरना ये भेड़िये आपको भी मार डालेंगे।’ महात्माजी की आंखों से आंसू बह निकले। वे समझ गये कि कुटिया के भीतर बंद शावकों को ज्ञात नहीं है कि भेड़ियों ने महात्माजी की क्या गत कर दी है।

    आज महात्माजी की समझ में वह बात आ गयी थी जो बात हरिण-शावक महात्माजी से कहने का प्रयास कर रहे थे किंतु अब इस बात को समझ लेने से कोई लाभ नहीं होने वाला था। महात्माजी ने अंतिम सांस लेने से पहले एक बार और आंखें खोलकर कुटिया के द्वार की ओर देखा, अब भेड़ियों ने कुटिया का द्वार पीटना आरम्भ कर दिया था। महात्माजी के पास इतना समय भी नहीं था कि वे हरिण शावकों को अंतिम उपदेश दे सकते।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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