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  • गाली/कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     27.02.2020
    गाली/कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    गाली/कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता


    शांति को गुस्सा आ गया। बहुत ज्यादा वाला गुस्सा। इससे पहले उसे इतना गुस्सा कभी नहीं आया था। सच पूछो तो उसे इससे पहले गुस्सा ही नहीं आया था। गुस्सा करने वाली औरत नहीं वह। वह तो अपने नाम के अनुरूप शांति से ही जीती आई है लेकिन यह भी भला कोई बात हुई!

    शांति ने अपने हाथ की झाड़ू जोर से जमीन पर पटकी और बोली- ‘‘अम्मा, मेरा हिसाब कर दो। मुझे काम नहीं करना।" अपनी जिह्वा में ताकत लाने के लिए शांति ने ओढ़नी का पल्लू कमर में खोंस लिया।

    शांति की इस हिमाकत पर अम्मा का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा- ‘‘तेरी धमकियों से डरती नहीं मैं! काम छोड़ना है तो चली जा, कौन रोकता है?"

    - ‘‘ठीक है, मेरा हिसाब कर दो।"

    - ‘‘हिसाब तो महीना पूरा होने पर होगा। बीच महीने में कौन पैसे देगा तुझे?"

    - ‘‘देखो अम्मा, मैं आपके हाथ जोड़ती हूँ, मुझे तंग मत करो, मेरा हिसाब कर दो।"

    - ‘‘कह दिया ना, हिसाब हिसाब के समय होगा।"

    - ‘‘नहीं, हिसाब अभी होगा।"

    - यदि हिसाब चाहिये तो आज का काम पूरा करके जा।"

    - अब तो मर जाऊँ तो भी मैं आपके यहाँ काम नहीं करूं।"

    - ‘‘ऐसा मैंने क्या कह दिया जो इतनी बिफर रही है।"

    - ‘‘अम्मा मैं काम करने के पैसे लेती हूँ, पति और बच्चों के लिए गाली खाने के नहीं।"

    - ‘‘अरे तू तो दिल से ही लगा बैठी, वह सब तो मेरे मुँह से निकल गया। ऐसे बुरा थोड़े ही मानते हैं, जा मेरे कमरे में झाडू लगा आ। फिर चाय बना लेना, अपने लिए भी और मेरे लिए भी।"

    अम्मा समझौते पर उतर आई। शांति के ठण्डे किंतु सख्त कण्ठ से अम्मा के तेवर ढीले पड़ गये थे। कहीं यह सचमुच ही काम छोड़कर चली गई तो मुश्किल हो जाएगी। आज कल काम वाली बाइयां मिलती कहां हैं? कितने बरसों से तो आ रही है। इसमें एक ही ऐब है, कभी समय पर नहीं आती। ज्यादा कहो तो एकाध दिन समय पर आएगी फिर वही पुराने ढर्रे पर।

    अम्मा ठहरी घर में अकेला जीव। उम्र अस्सी को पार कर चुकी। कमर कभी की झुक चुकी। पाखाने और गुसलखाने में भी वॉकर लेकर जाना पडता है। शांति ही आकर सब कुछ कर जाती है। झाड़ू लगाने से लेकर, नाश्ता तैयार करने, खाना बनाने, कपड़े धोने, बरतन मांजने के अलावा और भी बहुत से काम हैं जो अम्मा के वश की बात नहीं। यहाँ तक की मकान के बगीचे में खड़े पेड़ों तक की छंटाई भी शांति के ही जिम्मे है।

    ऐसा नहीं है कि अम्मा के आगे-पीछे कोई नहीं है। दो बेटे हैं। बहुएं हैं। अब तो पोते-पोती भी जवान हो चले हैं किंतु न तो अम्मा उनमें से किसी के साथ रहना चाहती और न उनमें से कोई अम्मा के पास। अम्मा मिजाज की तो तेज है ही, जीभ की भी तेज है। जरा सा पारा चढ़ा नहीं कि अम्मा लगी बकने। जो मन में आता है बकती चली जाती है। इसीलिए तो परिवार का कोई सदस्य उसके पास रहना नहीं चाहता। अम्मा के पति जीवित थे तब तक तो जैसे तैसे सबने निबाहा किंतु उनके जाने के बाद तो अम्मा से कोई कुछ कहने वाला भी नहीं रहा। अम्मा की जीभ और 
    खुल गई। बहू-बेटों से अम्मा की गालियां सहन नहीं हुईं। पहले छोटे बहू- बेटे गये और उसके बाद बड़े भी। 

    रह गई अम्मा अकेली। उसने भी किसी की परवाह नहीं की। पति ने अपनी सारी सम्पत्ति अम्मा के नाम कर रखी थी। अम्मा के जीते जी उस सम्पत्ति को कोई हाथ लगा नहीं सकता था। पति काफी पैसा छोड़ गये थे, अच्छा खासा मकान भी। इस सबके अलावा पति की पेंशन भी काफी अच्छी आती थी। शायद इसी सब के बल बूते पर अम्मा ने किसी की परवाह नहीं की थी।

    जब अम्मा के बहू-बेटे उसे अकेली छोड़ गये थे तब यही शांति उसके घर में काम करने लगी थी। अक्सर अम्मा शांति पर बिगड़ जाती। कभी लेट आने पर तो कभी चाय में चीनी ज्यादा हो जाने पर। कभी रोटी के मोटी हो जाने पर तो कभी रोटी के जल जाने पर। अम्मा का गुस्सा दो चार कठोर बातें कहकर शांत नहीं होता अपितु वह तब तक शांत नहीं होती थी जब तक कि उसे तसल्ली नहीं हो जाती कि उसके शब्दों ने सामने वाले को पूरी तरह छलनी कर दिया है।

    शांति हंस कर अम्मा की गालियां सुनती। बहुत हुआ तो कह देती कि आप मेरी माँ के जैसी हैं, आपकी तो गालियां भी मेरे लिए असीस (आशीश) है। और बात आई-गई हो जाती लेकिन आज! आज की बात वैसी नहीं है। शांति सब कुछ सुन सकती है किंतु अपने पति और बच्चों का अमंगल होने की कामना वाले शब्द नहीं। पति और बच्चों के लिए ही तो वह पिछले बीस बरसों से यहाँ शहर में अकेली पड़ी हुई है। दिन-रात हाड़ तोड़ कर मेहनत करती है। पैसे कमाती है और हर महीने अपने ससुराल में पहुँचा आती है।

    कुल तेरह बरस की थी वह जब उसका विवाह हुआ था, पंद्रह साल के उस लड़के से जो उसका धणी कहलाने का अधिकारी था। ससुर अपाहिज थे और सास बूढ़ी। पंद्रह बरस का धणी उन्हीं की सेवा में लगा रहता। कुछ दिन तो शांति ससुराल में रही लेकिन उसकी समझ में आ गया कि इस तरह से गुजारा नहीं होगा। पति को अपने माता-पिता की सेवा से फुर्सत नहीं, कमाई कहाँ से हो! घर कैसे चले!

    शांति फिर से अपने पिता के घर आ गई। पिता सरकार में चपरासी थे। शांति ने चार-पांच घरों में झाड़ू-पौंछे और बरतनों की सफाई का काम पकड़ लिया। रोटी-कपड़े का जिम्मा पिता पर रहा। वह महीने भर हाड़ तोड़ मेहनत करती और महीने के अंत में सारे पैसे अपनी ससुराल में दे आती। कुनबे-बिरादरी में कोई शादी बियाह होता तो शांति चार-पांच दिन के लिए अपने ससुराल में रुकती, नहीं तो रात से अधिक कभी नहीं रही वह अपने ससुराल में। जापे भी पीहर में ही हुए शांति के।

    इसी तरह पिछले बीस बरस बीते थे। इस बीच शांति के अपने भी तीन बच्चे हो गए। कुछ समय बाद शांति ने अपने पिता पर अपनी निर्भरता कम कर दी। शांति का स्वभाव अच्छा था और आदतें भीं। इसीसे शांति को कभी काम की कमी नहीं रही लेकिन दिन में तो चौबीस घण्टे ही होते हैं। सभी चाहते कि सुबह का झाड़ू-पौंछा नौ बजे से पहले हो जाए। एक घर में कम से कम एक घण्टा लगता था। सात 
    घरों में सात घण्टे। वह सुबह उठकर पहले तो अपना और अपने बच्चों का खाना बनाती और उसके बाद बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करके उनके निकलने से पहले ही खुद निकल पड़ती।

    सुबह सात बजे अपना काम शुरू करती तो भी आखिरी घर का काम निबटाते-निबटाते दो बज जाते। शांति किसी तरह दौड़कर घर आती। बच्चे स्कूल से लौटे या नहीं। उन्होंने खाना खाया या नहीं। आपस में लड़ तो नहीं रहे! उन्हें खिलाकर खुद भी दो निवाले खाती और फिर से दौड़ पड़ती शाम की पारी के लिये। सुबह के समय झाड़ू पौंछे का काम अधिक होता है और शाम के समय बरतनों का। इसीलिए शाम को भी उसे हर घर में एक घण्टा फिर लग जाता। आखिरी घर में काम निबटाते-निबटाते उसे रात के दस बज जाते।

    हर घर से उलाहना मिलता, किसी-किसी घर से चाय भी। अधिकतर गृहणियों की शिकायत होती कि तू लेट बहुत आती है। जिन दिनों में जो गृहणी ज्यादा शिकायत करती शांति अगले दो-तीन दिन सबसे पहले उसी घर में जाने लगती। कोई कहता- ‘‘शांति यह कोई समय है तेरे आने का.......! बाईजी आपने बरतनों में साबुन लगा छोड़ दिया.......। ये देखो तो यहाँ से झाड़ू कैसी लगाई है........ । बाईजी पौंछे का पानी बदल लिया करो ........। बाईजी गंदे पानी से पौंछा मत लगाया करो........। शांति, शांति से सबकी बात सुनती और मुस्कुराकर क्षमा मांगती हुई सी फिर से काम में लग जाती।

    उसने न केवल पति और सास-ससुर की गृहस्थी चलाई अपितु अपनी नंदों के बच्चों के विवाह में भात भी भरे। किस के लिए करती आई है वह सब-कुछ पिछले बीस बरसों से! अपने पति और बच्चों के लिए ही तो। और आज उन्हीं पति और बच्चों की अमंगल कामना कर रही है अम्मा। उनके मरने की बात कर रही है। वही अम्मा जिसकी सेवा वह पिछले बीस सालों से करती आ रही है। वही अम्मा जब इसके यहाँ चोरी हुई थी तो केवल शांति अकेली थी जो अम्मा के लिए पुलिस और कचहरी तक में फिर आई थी, अकेली। मुहल्ले का और कोई आदमी तो थूकने तक के लिए नहीं आया था। अब तो वह हरगिज यहाँ काम नहीं करेगी।

    - ‘‘खड़ी-खड़ी क्या सोच रही है जा, झाड़ू लगाकर आ मेरे कमरे में। नहीं तो हिसाब नहीं करूंगी तेरा।" अम्मा का पारा फिर से चढ़ने लगा था।

    - ‘‘भाड़ में गई आपकी झाडू़ और भाड़ में गया हिसाब। मेरे पति और बच्चे बने रहें, झाड़ू और हिसाब तो चलते रहेंगे।" शांति ने अपनी चप्पलें पहनीं और घर से बाहर चली आई। उसकी आंखों का गुस्सा आंसुओं में बदलने लगा था। इस घर से बीस बरसों पुराना नाता जो टूट रहा था।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता 63, सरदार क्लब योजना, वायुसेना क्षेत्र, जोधपुर


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