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  • निर्णय/कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     02.06.2020
    निर्णय/कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    निर्णय/कहानी/ मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    गाँव के लोग मास्टर लीलाधर को बेकार आदमी समझते थे। मास्टर लीलाधर इसी गाँव में जन्मे थे, इसी में उनका बचपन, कैशोर्य, यौवन और प्रौढ़त्व व्यतीत हुए थे और अब इसी गाँव में उनका बुढ़ापा भी व्यतीत हो रहा था। मास्टर लीलाधर के कारण इस गाँव को कई बार राष्ट्रीय समाचार पत्रों के मुखपृष्ठों पर स्थान मिला था, इस गाँव को शहर से जोड़ने वाली कच्ची सड़क, पक्की बनी थी, गाँव में एक डिस्पेंसरी खुली थी, और भी ऐसे कई उपहार थे जो मास्टर लीलाधर के कारण इस गाँव को मिले थे किंतु गाँव को मास्टर लीलाधर की इन उपलब्धियों से कोई लेना-देना नहीं था सो मास्टर लीलाधर की इस छवि में कोई अंतर नहीं आ पाया था कि वे काम के आदमी नहीं हैं।

    लीलाधर बहुत छोटे थे जब उन्होंने होश संभालना आरंभ किया। घर से बाहर निकलने योग्य क्षमता अर्जित करने पर उन्हें गाँव की एक मात्र पाठशाला में पढ़ने बैठाया गया। कुछ साल इस पाठशाला में पढ़ने के बाद वे निकट के कस्बे में पढ़ने के लिये गये और फिर लौट-लाटकर गाँव की उसी छोटी पाठशाला में अध्यापक बन गये, जहाँ से उन्होंने होश संभालना आरंभ किया था। जब तक लीलाधर छोटी पाठशाला में मास्टर नहीं बने, गाँव ने उन पर कोई गौर नहीं किया किंतु अब गौर करना आवश्यक हो गया। इस गौर करने में ही मास्टर लीलाधर गाँव की कसौटी पर खरे नहीं उतरे और बस यहीं से उन्हें ‘बेकार आदमी’ मानने की परंपरा चल पड़ी।

    गाँव की छोटी पाठशाला का मास्टर होना बड़े गौरव की बात थी। मास्टर गाँव के लिये बहुत काम का आदमी हुआ करता था किंतु मास्टर लीलाधर ने उस परंपरा को तोड़कर अपने आप को बेकार आदमी कहलवाया था। गाँव की पाठशाला गाँव के लिये किसी यूनीवर्सिटी से कम महत्व नहीं रखती थी। गाँव की पाठशाला का लम्बा गौरवमय अतीत था। पाठशाला के साथ-साथ पाठशाला का प्रत्येक अध्यापक गाँव के लिये अत्यंत आदरणीय हुआ करता था। गाँव में इतनी समझ भले ही न थी कि अध्यापकों को राष्ट्र निर्माता कह और समझ पाता किंतु इतनी समझ अवश्य विकसित हो गई थी कि पाठशाला का अध्यापक गाँव के बालकों का भाग्य विधाता था।

    पाठशाला के अध्यापकों की कृपा से गाँव के अनगिनत बालक पाँचवी-आठवीं कक्षा उत्तीर्ण होने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करके निकट के शहर में स्थित बड़े-बड़े सरकारी कार्यालयों में चपरासी, चौकीदार और होमगार्ड तथा पुलिस में कांस्टेबल बन गये थे। यही कारण था कि गाँव की पाठशाला का प्रत्येक बालक जब प्रातःकालीन प्रार्थना के बाद राष्ट्रगान गाता था तो ‘जय हे-जय हे’ बोलते समय अपने अध्यापकोें को देखकर उनका जोश चरम पर पहुँच जाता था। यही वे क्षण होते थे जब ‘जय हे-जय हे’ की चीखें पाठशाला से निकलकर पूरे गाँव को कंपा देती थीं।

    ऐसा नहीं था कि बालक अबोध थे। या उनके ज्ञान में किसी तरह की कमी थी। बालकों को हर चीज का पर्याप्त गहराई से बोध था। वे जानते थे कि मास्टर लीलाधर बेकार आदमी हैं। इस कारण कोई भी बालक ‘जय हे-जय हे’ बोलते समय मास्टर लीलाधर की ओर नहीं देखता था।

    गाँव की शिकायत अनुचित नहीं थी। जो काम आजादी के पहले से पाठशाला के मास्टर करते चले आये थे, उस काम को भी यदि मास्टर लीलाधर नहीं कर सकते थे तो भला वे किस काम के थे? गाँव की दृष्टि में मास्टर लीलाधर अत्यंत स्वार्थी किस्म के आदमी थे। वे कमजोर बच्चों की सहायता नहीं करते थे अर्थात् पढ़ाई में कमजोर बच्चे को वे अपनी तरफ से कृपांक देकर उन्हें उत्तीर्ण नहीं करते थे। जबकि मास्टर लीलाधर का मानना था कि कृपांक देकर बच्चों को उत्तीर्ण करना न केवल उन बच्चों के साथ अपितु उनके परिवार, समाज, यहाँ तक कि पूरे राष्ट्र के साथ धोखा करना है।

    कस्बा चाहता था कि मास्टर लोग बच्चों के माता पिता से छोटी-मोटी सेवा और सुविधा लेकर उन्हें अच्छे अंक दें ताकि बच्चों का भविष्य बिगड़े नहीं। गाँव के लोगों की दृष्टि में मास्टर लीलाधर बच्चों के दुश्मन थे। वे उन्हें समय पर पाठशाला आने को कहते थे, नहीं आने पर प्रताड़ित करते थे। बच्चों से सर्दी में भी नहा कर आने को कहते थे। वे बच्चों को प्रश्नों के जवाब याद करने को कहते थे। इस तरह एक-एक करके मास्टर लीलाधर ने कई कारण पैदा कर लिये थे जिनके कारण वे ‘बेकार आदमी’ कहलाने लगे थे। पहले यह बात कुछ ही लोगों को मालूम हुई फिर धीरे-धीरे सारे गाँव को मालूम हो गयी कि वे ‘बेकार आदमी’ हैं।

    मास्टर लीलाधर से गाँव की अपेक्षायें बहुत सीमित थीं जिन्हें अत्यंत प्रतिभावान होने पर भी मास्टर लीलाधर समझ नहीं पाये थे। जबकि गाँव के बालकों से मास्टर लालीलाधर की अपेक्षायें बहुत सारी थीं जिन्हें गाँव वालों द्वारा समझ लिया जाना संभव नहीं था। गाँव वाले चाहते थे कि पाठशाला से निकलने पर उनके बच्चे नगर के बड़े-बड़े कार्यालयों में चपरासी या चौकीदार बन जायें जबकि मास्टर लीलाधर चाहते थे कि पढ़-लिखकर विद्वान बनें।

    राष्ट्र के जिम्मेदार नागरिक बनें, राष्ट्र और समाज के विकास में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें। ऐसी ही जाने कैसी-कैसी उलटी-सीधी बातें मास्टर लीलाधर किया करते थे जो गाँव वालों की समझ में नहीं आती थीं। गाँव वाले यह भी नहीं समझ पाते थे कि जब मास्टर लीलाधर उनके बच्चों को कक्षा में उत्तीर्ण ही नहीं करेंगे तो बच्चे विद्वान कैसे बनेंगे! मास्टर लीलाधर को इस बात का भान था कि गाँव के लोग उन्हें ‘बेकार आदमी’ समझते हैं। इस कारण उन्हें कभी-कभी असंतोष तो होता था किंतु बिना हार माने हुए इस स्थिति से उन्होंने समझौता कर लिया था।

    दूसरी ओर गाँव को इस बात का न तो भान था कि मास्टर लीलाधर बहुत ही प्रतिभाशाली और विद्वान व्यक्ति हैं या कि पूरे देश का पढ़ा-लिखा समाज उन्हें बहुत आदर की दृष्टि से देखता है या कि वेे उच्चकोटि के कवि हैं, और न ही गांव इस बात को जानना चाहता था कि राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक अकादमियों में मास्टर लीलाधर बड़ी-बड़ी अकादमियों में व्याख्यान देने जाते हैं।

    जब पहली बार गाँव में दिल्ली से छपकर आने वाले समाचार पत्रों के मुखपृष्ठ पर मास्टर लीलाधर के चित्र छपे तो कस्बा हैरान रह गया। मास्टर लीलाधर को राष्ट्रीय साहित्यिक अकादमी ने देश का उस वर्ष का सर्वाेच्च साहित्यिक पुरस्कार देने की घोषणा की थी।

    गाँव के अधिकांश लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि उनके अपने गाँव में बेकार आदमी माने जाने वाले मास्टर लीलाधर राष्ट्र के लिये इतने अधिक काम के आदमी होंगे कि उनके चित्र समाचार पत्रों के मुखपृष्ठ पर छपें! जैसा कि इस तरह के गांवों में हुआ करता है, एकाध दिन तो इस बात की चर्चा रही और फिर गाँव द्वारा भुला दी गई। मास्टर लीलाधर उसी प्रकार ‘बेकार आदमी’ माने जाते रहे।

    कस्बा दूसरी बार फिर चौंका जब उसने अखबारों में पढ़ा कि मास्टर लीलाधर इस बार के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर लालकिले में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन में कविता पढ़ेंगे। कइयों की प्रतिक्रिया इस पर भी मास्टर लीलाधर के लिये सम्मानजनक नहीं थी। अगले दिन अखबारों में समाचार छपे कि लालकिले में हुए कविता पाठ में मास्टर लीलाधर का काव्यपाठ सर्वाधिक सराहनीय रहा तो कहीं जाकर गाँव में सुगबुगाहट आरंभ हुई कि मास्टर लीलाधर गाँव का नाम दिल्ली तक फैला रहे हैं किंतु यह सुगबुगाहट भी केवल सुगबुगाहट ही रही, मास्टर लीलाधर के प्रभामण्डल में कोई अधिक वृद्धि देने वाली सिद्ध नहीं हुई और वे पूर्ववत् ‘बेकार आदमी’ माने जाते रहे।

    एक दिन लोगों ने देखा कि लालबत्ती की एक कार मास्टर लीलाधर के घर के सामने खड़ी है। और दो गनमैन कार के बाहर पहरा दे रहे हैं। पूछताछ करने पर गाँव के लोगों को मालूम हुआ कि जिले के कलक्टर मास्टर लीलाधर से मिलने आये हैं। लोगों में उत्सुकता तो हुई किंतु उन्हें तत्काल यह पता नहीं चल सका कि जिले के कलक्टर आखिर क्यांेकर मास्टर लीलाधर से मिलने आये हैं!

    कई दिनों बाद गाँव के लोगों को ज्ञात हुआ कि नये कलक्टर साहित्य के बड़े शौकीन हैं और मास्टर लीलाधर की कविताओं के प्रशंसक भी। अतः वे मास्टर लीलाधर से साहित्य चर्चा करने और उनकी लिखी कवितायें उनके ही मुख से सुनने का गौरव प्राप्त करने आये थे। इस बार लोगों को लगा कि मास्टर लीलाधर उतने ‘बेकार आदमी’ नहीं हैं जितने कि समझे जाते हैं।

    उनमें ‘कुछ’ अवश्य है जिसके लिये उन पर गर्व किया जा सकता है किंतु लोगों को कुछ ही दिन बाद अपनी पुरानी धारणा पर लौटने पर विवश होना पड़ा कि मास्टर ‘बेकार आदमी’ हैं। हुआ यूँ कि गाँव के कुछ लोगों ने अलग-अलग सम्पर्क करके मास्टरजी से अनुरोध किया कि चूंकि कलक्टर साहब मास्टरजी के मिलने वाले हैं इसलिये मास्टरजी कलक्टर साहब से सिफारिश करके उनके बेटे या भाई की छोटी-मोटी नौकरी लगवा दें किंतु मास्टर बोले- ‘मैं किसी की सिफारिश करने कहीं नहीं जाऊँगा। अपने बेटे से कहिये कि नौकरी पाने के लिये योग्यता अर्जित करे।’

    मास्टर लीलाधर के इसी उत्तर ने लोगों को मास्टरजी के बारे में अपनी पुरानी धारणा पर लौटने पर विवश किया। एक दिन किसी सार्वजनिक उत्सव में मास्टर लीलाधर को लोगों ने घेर लिया। उनका निश्चय मास्टर लीलाधर को अपमानित करके बदला लेने का था। वे मास्टर लीलाधर की हर बात में ना-नुकर करने की आदत से अपने आप को आहत अनुभव करते थे। गाँव के लोगों द्वारा उन पर तरह-तरह के आरोप लगाये गये। किसी ने कहा कि वे अत्यंत असहिष्णु, कृपण और असहयोगी व्यक्ति हैं तो किसी ने कहा कि गाँव के प्रति उनके जो दायित्व बनते हैं वे भी उन्होंने कभी नहीं निभाये।

    मास्टर लीलाधर ने उनसे बारम्बार पूछा कि वे कौनसे दायित्व हैं जिनका निर्वहन मुझे करना चाहिये था किंतु लोग भीड़ के सामने खुलकर नहीं बोल सके कि मास्टर लीलाधर ने उनके बेटे को कृपांक नहीं दिये और लगातार अनुत्तीर्ण करके उसका भविष्य बिगाड़ दिया।

    न वे ये बोल सके कि मास्टर लीलाधर ने कलक्टर से सिफारिश करके उसके बेटे की नौकरी नहीं लगवाई। अतः लोगों ने व्यक्तिगत पीड़ा को सार्वजनिक महत्व की पीड़ा बनाकर प्रस्तुत किया कि मास्टरजी गाँव के बच्चों और नौजवानों का भला नहीं चाहते। मास्टर लीलाधर कुछ देर तक तो चुपचाप सुनते रहे ताकि ये अप्रिय क्षण शांति से व्यतीत हो जायें किंतु लोग सहजता से इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे।

    उन्होंने बार-बार मास्टर लीलाधर पर यही एक आरोप लगाया और उनसे जवाब माँगा। हार-थक कर मास्टर लीलाधर को बोलना ही पड़ा। उन्होंने कहा कि न तो मैं किसी भी अयोग्य बच्चे को परीक्षा में उत्तीर्ण करके बच्चे का भविष्य बिगाड़ सकता हूँ और न ही किसी की भी सिफारिश कलक्टर से करके राष्ट्र के साथ खिलवाड़ कर सकता हूँ। यदि गाँव को उनसे इन दो कार्यों के अतिरिक्त किसी और सार्वजनिक कार्य की अपेक्षा है तो उन्हें बताई जाये?

    गाँव के लोगों को अपनी बात कहने का अवसर मिल गया। वे बोले - ‘मास्टर! हम यह बात अपने मुँह से नहीं कहना चाहते थे किंतु तुमने स्वयं इस बात को उठाया है तो कहना पड़ता है कि तुम जानबूझ कर बच्चों को अनुत्तीर्ण करते हो। तुम्हारे मास्टर बनने के बाद ही इस स्कूल के बच्चे परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण हुए हैं, पहले तो सबके सब उत्तीर्ण होते थे, तुम्हारे आने के बाद ऐसी क्या बात हो गयी?’

    मास्टरजी ने आँख उठाकर देखा, यह सवाल करने वाला तो किशन था! वही किशन जो कभी उनका विद्यार्थी रहा था और अब चुनाव लड़कर गाँव का सरपंच हो गया था। पूरी जिन्दगी मास्टरजी गांधीजी के ग्रामराज के सिद्धांत के कायल रहे थे और पूरी जिन्दगी वे नेहरूजी की पंचायतीराज व्यवस्था के पक्षधर रहे थे किंतु आज वही ग्रामराज और पंचायतीराज पूरी मजबूती से मास्टरजी को बुद्धि का पाठ पढ़ाने आ खड़े हुए थे।

    मास्टरजी को ध्यान आया, यह किशन पूरे तीन साल तक अनुत्तीर्ण हो जाने के बाद खुद ही पढ़ाई छोड़ गया था और आज इतने बरसों बाद वह गाँव के सरपंच के रूप में उनके सामने खड़ा उनसे बदतमीजी कर रहा था।

    मास्टरजी ने सफाई देनी चाही किंतु वह सुनी नहीं गयी। उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह गई। अंत में सरपंच ने मास्टर को यह कहकर छोड़ दिया कि वे सुधर जायें अन्यथा गाँव से बाहर कर दिये जायेंगे। मास्टर लीलाधर का चेहरा अपमान से लाल हो गया। यह उनका अपना गाँव था और उनसे बात करने वाले उनके अपने शिष्य थे।

    मास्टरजी की समझ 
    में नहीं आ रहा था कि वे किसे सुधारें? स्वयं को अथवा इन लोगों को? यदि स्वयं को सुधारें तो कैसे सुधारें! पूरे बीस साल से वे गाँव वालों को और उनके बच्चों को अपनी बात समझाने का प्रयास कर रहे थे किंतु उनकी एक भी बात नहीं समझी गई। यहाँ तक कि इस बीच एक पूरी पीढ़ी बदल गयी थी। जो बच्चे कभी उनके विद्यार्थी रहे थे उनके भी बच्चे अब स्कूल में पढ़ने को आने लगे थे। पीढ़ी बदल गई थी किंतु गाँव नहीं बदला। हाँ इतना अंतर अवश्य आ गया था कि पहले लोग मास्टरजी के मुँह पर कुछ नहीं कहते थे किंतु अब वे मास्टरजी को पूरी तत्परता से सुधारने पर उतारू हो गये थे।

    पूरे बीस साल से मास्टरजी इस भरोसे के सहारे अपने इन विचारों पर टिके हुए थे कि एक न एक दिन लोगों में परिपक्वता आयेगी और मास्टरजी अपनी बात गाँव के लोगों को समझाने में सफल हो पायेंगे किंतु पीढ़ियों के अंतराल में भी दोनों पक्ष वहीं के वहीं खड़े थे। मास्टरजी ने एक निराशा भरी दृष्टि गांव वालों पर डाली और चुपचाप अपने घर का रास्ता पकड़ा।

    वे समझ चुके थे कि आजादी के साठ सालों में परिपक्व हो चले ग्रामराज और पंचायतीराज के आदेश की अवहेलना करना उनके बूते की बात नहीं। वे मन ही मन इस निर्णय पर पहुंच रहे थे कि इससे पहले कि लोग उन्हें गाँव से बाहर कर दें, वे स्वयं गाँव से बाहर हो जायेंगे।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता, 63, सरदार क्लब योजना, वायुसेना क्षेत्र, जोधपुर, पिन 342011

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