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  • दावत/ कहानी/ डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     02.06.2020
    दावत/ कहानी/ डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    दावत/ कहानी/ डॉ. मोहनलाल गुप्ता


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जग्गा सड़क के किनारे उदास आंखों से, बिजली के तारों पर भूखे बैठे कबूतरों की ओर देख रहा था और कबूतर बिजली के तारों पर कतार में बैठे हुए, जग्गा की ओर सूनी निगाहों से ताक रहे थे। न तो जग्गा को कुछ समझ में आ रहा था कि इन कबूतरों को कैसे समझाया जाये और न कबूतरों को समझ में आ रहा था कि जग्गा को आज आखिर हुआ क्याा है ? ऐसा कभी नहीें हुआ कि जग्गा ने सुबह-सुबह पांच सेर ज्वार कबूतरों के लिये न डाली हो। रोज की तरह सही समय पर जग्गा आया था, कबूतरों ने उसे देखते ही पंख फड़फड़ाने आरम्भ कर दिये थे। किसी भी कबूतर का ध्यान इस बात पर नहीं गया था कि आज जग्गा की चाल बहुत धीमी थी, उसके पैर जैसे उठ ही नहीं रहे थे। आज उसकी कमर पर, सदा लटकने वाली ज्वार की थैली भी नहीं थी। जग्गा ने अपनी प्रतीक्षा में बैठे कबूतरों पर एक उदास दृष्टि डाली थी और बस चुपचाप सड़क के किनारे बने फुटपाथ पर जा बैठा था।

    जग्गा नगर निगम का कर्मचारी था। वह पांच सेर ज्वार सुबह होते ही शहर की मुख्य सड़क के बीचों बीच बने डिवाइडर पर डालता था। बहुत चौड़ा डिवाइडर था यह। उस पर सारे दिन कबूतर फुदकते और मस्ती करते रहते थे। देखने वाला दृश्य होता था यह। बरसों से यह सिलसिला चल रहा था। कल अचानक उसे निगम के बाबू ने बुलाया और आदेश दिया कि आज के बाद सड़क के बीच बने डिवाइडर पर कबूतरों को दाना नहीं डाला जायेगा।

    -‘लेकिन आखिर क्यों?’ जग्गा ने हैरान होकर पूछा था।

    - ‘हुकुम है।’

    - ‘किसका हुकुम है?’

    - ‘कलक्टर साहब का हुकुम है।’

    - ‘कोई गलती हो गई हमसे?’

    - ‘हाँ बहुत बड़ी।’ बाबू ने लापरवाही से जवाब दिया।

    - ‘का गलती हुई?’

    - ‘तुम जो कबूतर को दाना डालत हो, उससे सड़क पर एक्सीडेण्ट हो जात है।’ बाबू ने हंस कर कहा।

    - ‘कौनसा एक्सीडेण्ट हुआ।’

    - ‘ई हमें का मालूम, तुम्हारा केस है, तुम जानो।’

    - ‘पर बताना तो पड़ेगा।’

    - ‘का बतायें?’

    - ‘कि हमारे कबूतरों के कारण किसका एक्सीडेण्ट हुआ। बीस बरस से अधिक हुई रहे, हमें दाना डालत, अब तक तो कोई एक्सीडेंट ना भया। आज अचानक कलक्टर साहब ई का बात निकाली है?’

    - ‘जब कलक्टर साहब कह रहे हैं तो कुछ तो हुआ होगा ना?’

    - ‘राम कसम कौनो एक्सीडेण्ट ना हुआ।’

    - ‘तुम का कलक्टर से ऊपर हो। जब कलक्टर ने कहा कि तुम्हारे द्वारा कबूतरों को दाना डालने से सड़क पर एक्सीडेण्ट होता है, तो होता है।’ बाबू ने झल्लाकर कहा।

    - ‘खाली-पीली हमार कबूतरों पर आरोप लगा रहे हैं कलक्टर साहब।’

    - ‘तो जा, कलक्टर के पास चला जा, वहाँ जा कर कह जो कहना है तुझे।’

    - ‘का कहें हम कलक्टर साहब से ?’ जग्गा ने हैरान होकर पूछा।

    - ‘अब ई भी हमी बतायें ?’

    - ‘क्यों न बतायेंगे, तुम्हारे कुछ नहीं लगते का ?’

    - ‘कौन ?

    - ‘कबूतर और कौन ?’

    - ‘हमारे का लगेंगे ?’

    - ‘दाने का खर्चा तो तुम ही देते रहे ना हमका, पिछले बीस बरस से।’

    - ‘तो......?’

    - ‘सोचो तनिक, यदि कल कबूतरन को दाना समय पर ना पहुंचा तो वे तुम्हारे बारे में का सोचेंगे ?’ जग्गा की आंखें गीली हो आईं।

    बाबू ने यह तो सोचा ही नहीं था कि कलक्टर के इस निर्णय से कबूतरों पर क्या बीतेगी! जब जग्गा ने उसे ध्यान दिलाया तो वह भीतर से हिल गया। कह तो यह ठीक ही रहा है। पिछले बीस साल से कबूतर मुख्य सड़क पर बने डिवाइडर पर दाना चुग रहे हैं, कल जब कबूतर आयेंगे तो वे क्या करेंगे! बहुत सोचा बाबू ने किंतु कोई जवाब नहीं सूझा। वह चुप ही रहा। जग्गा ने कुछ देर तो प्रतीक्षा की किंतु फिर थक कर बाहर आ गया। आज उसे ज्वार के पैसे नहीं मिले थे। पैसे न मिले तो न सही। वह शहर के बहुत से सेठों को जानता था जिनसे ज्वार के पैसे ले सकता था किंतु यहां तो कलक्टर का आदेश ही यह था कि कबूतरों को सड़क के डिवाइडर पर दाना डाला ही नहीं जाये। इस कलक्टर को जाने किसने भड़का दिया था कबूतरों के खिलाफ। ईश्वर जानता है कि कबूतरों के दाना चुगने से कभी कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ। शहर में रोज दस-बीस एक्सीडेण्ट होते ही हैं, वहाँ तो कबूतर नहीं होते। फिर कैसे कलक्टर साहब ने ये समझ लिया कि एक्सीडेण्टों के पीछे ये कबूतर ही हैं!

    विकट समस्या खड़ी हो गई। आस-पास कोई ऐसी जगह नहीं थी जहाँ कबूतरों के लिये दाना डाला जा सके। सबसे सुरक्षित स्थान तो यही था। इसीलिये तो यहाँ दाना डाला जाता था। अचानक जग्गा को सड़क पर चलने वाले लोग दुश्मन दिखाई देने लगे। उसका मन हुआ कि सबको पत्थर मार कर भगा दे यहाँ से। सब के सब हत्यारे हैं, एक दूसरे को एक्सीडेण्ट 
    में मारते हैं और दोष मेरे कबूतरों पर लगाते हैं। जहर जैसा धुआं उगलती टैक्सियां, तेज हॉर्न बजाती कारें, फर्राटे से निकलती मोटर साइकिलें, टन्न-टन्न घण्टियां बजाकर साइकिलों की रेस करते स्कूलों के बच्चे, इन्हें कोई देखने वाला नहीं कि ये कैसे चलते हैं, बस एक कारण ढूंढ लिया है एक्सीडेण्टों का, ये बेचारे निरीह कबूतर। 

    पूरी रात जग्गा यही सब कुछ सोचता रहा था और आज सुबह हमेशा की तरह चुपचाप, खाली हाथ यहाँ चला आया था। नियत समय पर कबूतर भी आने शुरु हो गये थे जो बिजली के तारों पर कतार बांध कर बैठ गये थे।

    काफी देर तो कबूतर उत्सुक दृष्ठि से जग्गा की ओर देखते रहे थे किंतु जब जग्गा अपनी जगह से इंच भर भी नहीं हिला तो कबूतरों में बेचैनी फैलने लगी थी और वे उछल-कूद मचाकर जग्गा का ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा करने लगे थे। जब इसका भी कोई परिणाम नहीं निकला वे बिजली के तारों पर शांत होकर बैठ गये थे।

    सूरज आकाश में ऊपर चढ़ आया था। गर्मी तेज हो गई थी और कबूतरों का समय दाना चुगने के बाद पास के डीजल शेड में जाकर छुप जाने का हो गया था किंतु अब तक तो दाना ही नहीं पड़ा था। जग्गा सड़क के किनारे उदास आंखों से जाने टकटकी लगाकर क्या देख रहा था! कबूतरों में बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही थी, इस तेज धूप को सहने के आदी नहीं थे वे। कितनी देर तक भूखे-प्यासे वे बिजली के तारों पर बैठे रहेंगे! आखिर छोटे कबूतरों की माताओं ने निर्णय लिया, उन्होंने अपने बच्चों को उड़ने का संकेत किया और डीजल शेड में जाकर बैठ गईं। नर कबूतर अब भी बिजली के तारों पर बैठे थे। जग्गा की खोपड़ी में तेज धूप खूंटी की तरह ठुक रही थी, भूख और प्यास के मारे उसका भी बुरा हाल था किंतु जग्गा वहाँ से हिलने को तैयार नहीं था। किस के भरोसे छोड़कर जाये वह कबूतरों को! आखिर जब धूप सहन शक्ति के बाहर हो गई तो नर कबूतरों ने भी एक दूसरे को संकेत किया और डीजल शेड में जाकर बैठ गये।

    जग्गा का कलेजा मुँह को आ गया। भूखे जा रहे हैं उसके बच्चे। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। बहुत देर तक वह सिसकता रहा। सड़क पर वाहनों की आवाजाही उसी तरह जारी थी किसी को न तो जग्गा से लेना-देना था और कबूतरों से। आखिर जग्गा भी उठा और अपनी कोठरी में जाकर चारपाई पर निढाल होकर पड़ गया। जाने कब तक रोता रहा और जाने कब आंख लग गई। जब आंख खुली तो बाहर गहरी रात थी। झींगुरों की आवाज के अतिरिक्त और कोई आवाज नहीं थी।

    अचानक उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने कोठरी में रखी बोरी में से पांच सेर ज्वार निकाली और सड़क पर जाकर डिवाइडर पर बिखेर दी, ठीक वहीं जहाँ वह रोज बिखेरता था। जग्गा को ऐसा करते हुए, देखने वाला कोई नहीं था। जग्गा खुश था, चलो आज भले ही कबूतर भूखे रहे किंतु कल सुबह जब वे आयेंगे तो उन्हें पेट भर ज्वार मिल जायेगी। कलक्टर साहब जग्गा का क्या कर लेंगे! कौन गवाह है कलक्टर साहब के पास कि यह ज्वार जग्गा ने डाली है। वह दिन में सड़क के पास दिखेगा ही नहीं और हर रात को यहाँ आकर ज्वार डाल जायेगा, जग्गा ने निर्णय लिया। उसकी प्रसन्नता का पार न था। दिन भर की सारी उदासी गायब हो गई।

    कोठरी में जाकर उसने भर पेट पानी पिया और फिर से सो गया। इस समय रोटी बनाने के लिये चूल्हा जलाना उसके वश की बात नहीं थी। अगले दिन बहुत देर तक सोता रहा था, वह। जब आंख खुली तो आकाश में सूरज बहुत ऊपर चढ़ आया था। जग्गा का मन हुआ कि वह जाकर देख आये कि कबूतर दाना चुग गये हैं कि नहीं किंतु उसकी हिम्मत नहीं हुई।

    किसी ने जाकर कलक्टर साहब को कह दिया कि सड़क पर कबूतर दाना चुग रहे हैं और जग्गा वहीं खड़ा है तो जरूर कलक्टर साहब जग्गा को पकड़कर जेल में बंद करवा देंगे। यद्यपि जग्गा ने कभी कलक्टर साहब को देखा नहीं था किंतु इतना तो वह जानता ही था कि कलक्टर तो कलक्टर ही ठहरे। उनके मगरूर भेजे में जो बात जम जाये उसकी पालना न हो तो काल-कोठरी दिये बिना थोड़े ही रहेंगे।

    पूरे दिन जग्गा अपनी कोठरी 
    में बंद रहा। उसने चूल्हा जलाकर खाना बनाया और पेट भर कर खाया। आज उसे चिंता नहीं थी, उसके कबूतरों ने भी जी भर कर दाना चुग लिया होगा। खाना खाकर जग्गा चारपाई पर लेट गया। जी भर कर सोया। आंख खुली तो झटके से उठकर देखा, अरे वह कब तक सोता रहा! कहीं दिन तो नहीं निकल आया! उसने झौंपड़ी से बाहर निकलकर देखा, चंद्रमा आकाश के ठीक बीचों-बीच था और चारों ओर चांदनी पसरी हुई थी।

    जग्गा ने संतोष की सांस ली और बोरी में से ज्वार निकालकर सड़क के डिवाइडर की तरफ चल दिया। जैसे-जैसे जग्गा डिवाइडर की तरफ बढ़ रहा था, उसकी चाल में और तेजी आ रही थी। सड़क कल की ही तरह सुनसान थी। कोई देखने वाला नहीं था। उसने तेजी से थैली में हाथ डालकर ज्वार निकाली और उसे डिवाइडर पर उछालने ही वाला था कि चांदनी के मंद प्रकाश में उसे डिवाइडर पर पड़ी हुई ज्वार दिखाई दी। उसने अपने हाथ की ज्वार थैली में ही वापस डाल दी और झुककर देखा।

    डिवाइडर पर ज्वार पहले से ही पड़ी थी। कौन डाल गया होगा, उसके आने से पहले यहाँ ज्वार ! उसने स्वयं से प्रश्न किया। अचानक उसे ध्यान आया, यह तो वही ज्वार है जिसे वह कल रात डाल गया था। तो क्या कबूतरों ने ज्वार नहीं चुगी थी! अवश्य ही दिन भर के भूखे कबूतर, पेट भरने के लिये कहीं और चले गये होंगे और यह ज्वार यूहीं पड़ी रह गई होगी, जग्गा ने सोचा। जग्गा के कलेजे में हूक सी उठी और उसकी रुलाई फूट पड़ी, नहीं-नहीं, कबूतर उसके साथ ऐसा नहीं कर सकते।

    बीस बरसों की दोस्ती वे एक दिन की ज्वार के पीछे नहीं तोड़ सकते। कबूतर उसे छोड़कर नहीं जा सकते। जग्गा की हैरानी का पार नहीं था, क्या करे और क्या न करे ! ज्वार पहले से ही वहाँ पड़ी हुई थी इसलिये और ज्वार डालने का कोई अर्थ नहीं था। जग्गा ने ज्वार की थैली अपने कंधे पर लटकाई और भारी कदमों से अपनी कोठरी की तरफ लौट गया। कोठरी का दरवाजा भी उसने खुला छोड़ दिया और चारपाई पर कटे पेड़ की तरह गिर गया। सोने का प्रयास किया किंतु नींद आंखों से कोसों दूर जा चुकी थी। बार-बार करवटें पलटता रहा, जब बहुत देर हो गई तो उसने बाहर आकर देखा, चंद्रमा अब भी ज्यों का त्यों आकाश के बीच में था। रात अब भी काफी बाकी थी।

    फिर से भीतर जाकर चारपाई पर गिर गया। कई बार वह कोठरी से बाहर यह देखने के लिये आया कि दिन निकला या नहीं, आखिर जब सातवीं या आठवीं बार उसने बाहर आकर देखा तो तड़का हो चुका था और पौ फटने वाली थी। दिन तो थोड़ी देर में निकल जायेगा, उसने स्वयं से कहा और थैली कंधे पर डालकर फिर से सड़क के डिवाइडर की तरफ चल दिया। उसके मस्तिष्क में बहुत सी बातें तेजी से घूम रही थीं।

    अपने कबूतरों को वह पहचान ही लेगा, भले ही वे शहर के किसी भी हिस्से में क्यों न चले गये हों। वहीं जाकर अब वह उन्हें दाना डाला करेगा। कबूतर भले ही जग्गा को छोड़ दें किंतु जग्गा उन्हें नहीं छोड़ेगा। दिन निकलने में अब अधिक समय नहीं था। जग्गा डिवाइडर पार करके सड़क के दूसरी तरफ आ गया। सड़क किसी विधवा स्त्री की मांग की तरह पूरी तरह से सूनी थी। क्यों न वह सूर्यदेव के निकलने तक सड़क पर ही रुका रहे, क्या मालूम कबूतर ज्वार की तलाश में आज डिवाइडर पर ही आ जायें! भला इस निर्दयी शहर में किसने उसके कबूतरों को दाना डाला होगा, उसने स्वयं से प्रश्न किया।

    जग्गा वहीं बैठ गया। आखिर सूर्य देव निकल आये, सड़क पर चहल-पहल आरम्भ हो गई। कबूतरों का दूर-दूर तक पता नहीं था। जग्गा को लगा कि कहीं कबूतर जग्गा के बैठने की जगह खाली देखकर दूर से न लौट जायें, इसलिये वह उस स्थान पर आकर बैठ गया जहाँ वह कबूतरों को ज्वार डालने के बाद रोज बैठता था।

    जग्गा के आश्चर्य का पार न रहा, जब उसने देखा कि डीजल शेड की तरफ से कबूतरों का एक झुण्ड उड़ता हुआ सड़क की ओर ही आ रहा था। जग्गा उठकर खड़ा हो गया ताकि कबूतर उसे दूर से ही देख लें। कबूतर निकट आते जा रहे थे, अचानक उसने देखा कि उस झुण्ड के पीछे कबूतरों का एक और झुण्ड उड़ा चला आ रहा था।

    जग्गा उन्हें हाथ हिलाकर बुलाने लगा, खुशी के मारे पागलों की तरह चिल्लाने लगा, आओ, आओ। मेरे बच्चो इधर आ जाओ, देखो मैं यहाँ हूँ तुम्हारे लिये। कबूतरों का पहला झुण्ड आकर बिजली के तारों पर बैठ गया। उनके आश्चर्य का पार न था, जग्गा अपनी जगह पर मौजूद था, उसके कंधे पर ज्वार की थैली थी और डिवाइडर पर ज्वार बिखरी पड़ी थी। कबूतरों ने देखा, जग्गा खुशी से नाच रहा था।

    एक बूढ़ा कबूतर बिजली के तार से नीचे उतरा और जग्गा के कंधे पर आकर बैठ गया। उसकी देखा-देखी और भी बहुत से कबूतर नीचे उतरकर जग्गा के कंधों और सिर बैठ गये। जग्गा ने अपनी बाहें फैला दी, बाहें भी कबूतरों से भर गईं। सारे कबूतर आकर जग्गा के चारों ओर इकट्ठे हो गये। जग्गा ने अपनी थैली से ज्वार निकाली और कबूतरों की तरफ बढ़ाई।

    कबूतरों ने उसकी ज्वार भरी हथेली की ओर देखा और उसके शरीर से हटकर नीचे बैठ गये।

    - ‘खाओ, खाओ ना। खाते क्यों नहीं!’ जग्गा ने उनसे कहा किंतु कबूतर वहीं घूमते रहे, उन्होंने ज्वार नहीं खाई। जग्गा परेशान हो गया। उसने ज्वार से भरी थैली वहीं जाकर खाली कर दी जहाँ पहले से ही कल वाली ज्वार पड़ी थी। कबूतरों ने ज्वार की तरफ गर्दन घुमाकर भी नहीं देखा। जग्गा ने एक कबूतर को हाथ में उठा लिया और ज्वार भरी मुट्ठी उसकी चौंच से लगा दी किंतु कबूतर ने गर्दन दूसरी ओर घुमा ली।

    जग्गा परेशान होकर धरती पर बैठ गया। सड़क पर यातायात बढ़ता जा रहा था। डिवाइडर पर दस किलो ज्वार पड़ी थी, कबूतर और जग्गा दोनों ही वहाँ मौजूद थे, ऐसे में यदि कलक्टर साहब की गाड़ी वहाँ से निकली तो गजब हो जाने का भय भी था। जग्गा चाह रहा था कि कबूतर ज्वार चुगना शुरु करें तो वह यहाँ से चला जाये किंतु कबूतर तो टस से मस होने का नाम नहीं ले रहे थे।

    अचानक जग्गा के दिमाग में कुछ सूझा, वह कबूतरों को वहीं छोड़कर अपनी कोठरी की तरफ दौड़ गया। कोठरी में रात की बची हुई ज्वार की रोटी और लहसुन की चटनी पड़ी थी। जग्गा ने ज्वार की रोटी पर चटनी रखी और फिर से सड़क की ओर दौड़ पड़ा।

    कबूतर बिजली के तारों पर जा बैठे थे। जग्गा सड़क के किनारे पर ठीक उसी जगह बैठ गया जहाँ वह नित्य बैठा करता था। जग्गा ने रोटी का टुकड़ा तोड़ा और अपने मुंह में डाल लिया। दूसरा टुकड़ा, फिर तीसरा और फिर चौथा। जग्गा ने देखा, उसकी तरकीब काम कर गई है। बहुत से कबूतर एक साथ बिजली के तारों से उतरे और ज्वार पर आकर बैठ गये। उधर कबूतर ज्वार चुग रहे थे और इधर जग्गा रोटी खा रहा था। न जग्गा को कलक्टर साहब की परवाह थी और न कबूतरों को, बिछड़े हुए दोस्त मिलकर दावत का आनंद उठा रहे थे।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    63, सरदार क्लब योजना वायुसेना क्षेत्र, जोधपुर

    941407606

    mlguptapro@gmail.com

    Youtube Channel - Glimps of Indian History By Dr. Mohanlal Gupta

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