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  • चिट्ठी/हिन्दी कहानी/ डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     23.02.2020
    चिट्ठी/हिन्दी कहानी/ डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    चिट्ठी


    आप यह समझने की भूल कदापि न करें कि आप कोई कहानी पढ़ रहे हैं। यह एक चिट्ठी है जो मैंने आपके नाम लिखी है। लोगों को दूसरों के घरों में झाँकने की आदत होती है, दूसरों के नाम आई चिट्ठी पढ़ने की आदत होती है। यह तो अच्छा है कि हम उनके घरों और चिट्ठियों तक ही सीमित रहते हैं, यदि हम किसी की जिंदगी में झाँककर देख लें तो मेरा दावा है कि लोग दूसरों के घरों और चिट्ठियों में झाँकना छोड़ दें। हालांकि मेरी उम्र दावे करने की नहीं है। सात साल की उम्र होती ही क्या है?

    आप विश्वास नहीं करेंगे कि अनुभवों के जिस दौर से मैं पिछले सात सालों में गुजरा हूँ, उनके कारण दुनिया में मेरे लिये समझने को कुछ भी शेष नहीं रह गया है। सच पूछो तो अब मैं दुनिया को समझता ही क्या हूँ ! कुछ भी नहीं ! दुनिया के नाम मेरी यह पहली और आखिरी चिट्ठी है। जब तक यह चिट्ठी आप तक पहुँचेगी, मैं इस दुनिया से बहुत दूर, किसी और दुनिया में जा चुका होऊँगा।

    मैं जब पैदा हुआ तो दूसरे बालकों की ही तरह प्यारी सी सूरत, नन्हीं मुट्ठियाँ और घुंघराले बाल लेकर दुनिया में आया। मेरी नन्हीं आँखों में उत्सुकता का समुद्र समाया हुआ था। मेरी किलकारी में संगीत था और मेरे रुदन में छिपी थीं - माता-पिता के हृदय की अनंत अभिलाषायें। कहते हैं, बालक जब पैदा होता है तो मुट्ठियाँ बांधकर आता है ताकि विधाता द्वारा दिया गया भाग्य मजबूती से पकड़े रहे। मुट्ठियाँ मेरी भी बंद थीं किंतु उनमें विधाता द्वारा दिया गया भाग्य नहीं किसी पूर्व जन्म में किये गये पापों के परिणाम से उत्पन्न दुर्भाग्य बंद था।

    मेरी शब्दावली पर आप आश्चर्य न करें। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अनुभवों ने मुझे आयु सीमा के बंधनों से मुक्त कर दिया है। हाँ तो मैं बात कर रहा था अपने जन्म की। जन्म के समय अन्य बालकों की तरह ही सामान्य दिखने के बावजूद एक असामान्यता मेरे शरीर में मौजूद थी। मेरी पीठ पर एक छोटा सा घाव था जो रीढ़ की हड्डी तक गहरा था। चूंकि आजकल के दूसरे बालकों की तरह मैं भी अस्पताल में पैदा हुआ था अतः डॉक्टर ने मेरे पैदा होते ही मेरे शरीर का निरीक्षण किया और कहा कि यदि इस घाव का ऑपरेशन चौबीस घंटे में न किया गया तो यह बालक जीवित नहीं बचेगा।

    उसने यह भी आशंका जताई कि इस ऑपरेशन के बाद बालक का 'सिर' हाथ-पैरों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ सकता है। बालक का पूरी तरह सामान्य होना शायद ही संभव हो। मेरे माता-पिता के सामने विचित्र स्थिति आ खड़ी हुई। क्या करें, क्या न करें? यदि ऑपरेशन नहीं करवाते हैं तो मैं, जो उनकी पहली संतान था, जिसके लिये उन्होंने कितने श्वेत-रतनारे स्वप्न संजोये थे, जीवित नहीं बचता और यदि ऑपरेशन करवाते हैं तो मेरी आ-ति असामान्य हो जायेगी। कौन जाने मैं कभी अपने पैरों पर खड़ा हो सकूंगा कि नहीं ! बहुत सारे सोच-विचार के बाद उन्होंने मेरा ऑपरेशन करवाना ही उचित समझा।

    मैं बच गया और सामान्य बच्चे की तरह दिखने लगा। मेरे माता-पिता प्रसन्न थे। मेरी माँ मुझे घंटों निहारती रहती। कभी-कभी मेरे पिता से कहती - 'मिजाज में बिल्कुल आप पर गया है। जरा-जरा सी बात पर गुस्सा किया करेगा।'

    'और शक्ल सूरत में तो बिल्कुल तुम पर गया है। देखो तो बड़ी-बड़ी आँखें, बिल्कुल तुम्हारे जैसे होंठ और तीखी नाक।' मेरे पिता माँ की बात आगे बढ़ाते। 'बस-बस रहने दो, इसके बहाने मेरी चापलूसी कर रहे हो।' माँ इतराकर कहती।

    'चापलूसी तो मैं तुम्हारी जिंदगी भर करूंगा।' यह कहकर मेरे पिता हँस पड़ते।

    उन्हीं दिनों मुझे मालूम हुआ कि मेरी माँ हॉकी की बड़ी अच्छी खिलाड़ी थी तथा देश-विदेश की कई स्पर्धाओं में उसने अच्छी ख्याति अर्जित की थी। अपने देश की ओर से ओलंपिक भी खेल चुकी थी। मेरे पिता भारत सरकार में किसी बड़े ओहदे पर थे। एक बार उनकी नियुक्ति नेशनल स्पोर्ट्स स्कूल पटियाला में हुई। वहीं उनकी भेंट मेरी माँ से हुई। मेरी माँ जितना अच्छा खेलती थी, वह उतनी ही सुंदर थी और उतनी ही विदुषी भी। मेरे पिता ने मेरी माँ के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। माँ को भी मेरे पिता पसंद आये और दोनों का विवाह हो गया।

    मेरे पिता माँ को छेड़ने के लिये अक्सर कहते - 'जार्ज बर्नाड शॉ दुनिया का सबसे बुद्धिमान आदमी समझा जाता था। उसने दुनिया की समस्त स्त्रियों को तीन वर्गों में बांट रखा था - सुंदर, विदुषी और बहुसंख्यक। तुम कौनसे वर्ग में आती हो?'

    'बर्नाड शॉ का नाम लेकर तुम मुझे जिस वर्ग में रखना चाहते हो, मैं उसी वर्ग में आती हूँ।' माँ हँसकर जवाब देती।

    -'क्या तुम सुंदर हो?' -'मुझे क्या पता, यह तो तुम जानो।'

    -'क्या तुम विदुषी हो?' 'मैंने कहा न, मुझे पता नहीं।'

    -'तो क्या तुम इन दोनों वर्गों में से नहीं हो?' -'शायद ऐसा ही हो।'

    -'तो तुम बहुसंख्यक हो।'

    -'मैं अच्छी तरह समझती हूँ कि तुम घुमा फिरा कर क्या कहना चाहते हो !'

    -'क्या कहना चाहता हूँ?' -'तुम कहना चाहते हो कि सुंदर स्त्रियाँ मूर्ख होती हैं और विदुषी स्त्रियाँ कुरूप होती हैं तथा यह भी कि दुनिया की अधिकांश स्त्रियाँ न तो सुंदर होती हैं और न बुद्धिमती। अर्थात् दुनिया की ज्यादातर स्त्रियाँ कुरूप और मूर्खा होती हैं किंतु शायद तुम्हें यह पता नहीं कि यह बात केवल स्त्रियों पर ही नहीं, पुरुषों पर भी लागू होती है। दुनिया का सबसे बुद्धिमान समझा जाने वाला जार्ज बर्नाड शॉ स्वयं भी दुनिया का सबसे कुरूप व्यक्ति था।

    -'तुम्हें कैसे मालूम?' -'क्यों तुमने वह किस्सा नहीं सुना क्या?'

    -'कौनसा?'

    -'हाँलीवुड की सबसे सुंदर अभिनेत्री ने एक बार बर्नाड शॉ को चिट्ठी लिखी कि हम दोनों विवाह कर लें। हमसे जो संतान पैदा होगी, वह तुम्हारे समान बुद्धिमान और मेरे समान सुंदर होगी। बर्नाड ने उत्तर दिया कि मुझे खेद है कि मैं तुम्हारे साथ विवाह नहीं कर सकता, यदि इसका उल्टा हो गया तो?'

    -'अर्थात् तुम मानती हो कि हॉलीवुड की सबसे सुंदर अभिनेत्री भी मूर्ख थी। इसका अर्थ यह है कि जॉर्ज का वर्गीकरण ठीक था।'

    इस प्रकार माँ स्वयं ही परास्त हो जाती और खीझकर कहती - 'बर्नाड की छोड़ो, तुम अपने वर्गीकरण की कहो।'

    -'हाँ, ये हुई न कोई बात! मेरे वर्गीकरण के अनुसार भी संसार की समस्त स्त्रियाँ तीन वर्गों में रखी जा सकती हैं - सुदर्शिनी, प्रियदर्शिनी और प्रदर्शनी।'

    -'इसका क्या मतलब?'

    -'इसका मतलब ये कि कुछ स्त्रियाँ देखने में अच्छी होती हैं, कुछ को देखना अच्छा लगता है और बाकी की स्त्रियाँ तो केवल देखने-देखने की होती हैं।'

    -'मुझे आपने कौनसे वर्ग में रख रखा है?'

    -'यदि नाराज नहीं होओ तो बताऊँ।'

    -'मैं क्यों नाराज होने लगी !'

    -'तो फिर बता दूँ?' -'हाँ-हाँ, बता दो। डरते क्यों हो !'

    -'तो सुनो ! तुम पहले दोनों वर्गों में आती हो।'

    -'चलो, हटो। फिर चापलूसी पर उतर आये !'

    माँ की खीझ समाप्त हो जाती। हमारे घर की प्रसन्नता के ये दिन मेरे भाग्य की मुट्ठी में अधिक नहीं निकले। शीघ्र ही मेरे माता-पिता को पता चल गया कि मेरा माथा, मेरे हाथ-पैरों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ रहा है। डेढ़ साल का होने पर भी मैं चलना नहीं सीख पाया। सीखता भी कैसे ! मेरे पैर तो छः महीने के बालक जितने थे और सिर तथा सीना तीन साल के बालक जितने।

    मेरे इलाज की बहुत कोशिशें की गयीं किंतु सब बेकार गयीं। ऐसा कोई डॉक्टर, वैद्य, हकीम, ओझा, पीर और सयाना नहीं था जिसकी प्रसिद्धि सुनकर मेेरे माता-पिता मुझे उसके पास न ले गये हों। माँ मुझे गोद में उठाये मंदिरों, तीर्थों और साधु बाबाओं के पास भटकती रहती किंतु कोई परिणाम नहीं निकला।

    मैं चलना तो नहीं सीख सका किंतु मुझे बैठना आ गया। दो साल का होते-होते मैं बोलने भी लगा। मेरी वजह से माँ का खेलना छूट गया। वह सारे दिन मेरे ही चारों ओर घूमती रहती। मेरे अतिरिक्त दुनिया में और किसी चीज का उसे ध्यान न रह गया। हॉकी की गेन्द की जगह अब मैंने ले ली। मैं ही अब उसकी सारी प्रतियोगिताओं का केन्द्र बन गया। उसके सारे मैडल और पदक मुझमें समाहित हो गये। मैं उसके भाग्य की ऐसी गेंद बन गया जिसे अम्पायर ने सदा-सदा के लिये 'फाउल' करार दे रखा था किंतु माँ थी कि उसी 'फाउल बॉल' से गोल कर देना चाहती थी।

    माँ धीरे-धीरे मुझे पढ़ाने लगी। मैं पढ़ाई लिखाई में बहुत तेज निकला और जल्दी ही काफी कुछ सीख गया। मुझे लगता है कि जो लोग शरीर से काफी कमजोर होते हैं, उनकी बुद्धि बहुत तेज काम करती है। मेरे पिता अब अक्सर खीझ पड़ते। मैं ही उसका कारण होता। पिताजी के खाने का समय होता और मैं कपड़े खराब कर लेता। माँ आधी लगी हुई थाली छोड़कर मुझे साफ करने में लग जाती। कई बार गुस्सा होकर पिताजी थाली फेंक देते। भूखे ही ऑफिस चले जाते। माँ उन्हें समझाती, आप सक्षम हैं, उठकर भी खाना ले सकते हैं। यह बच्चा दूसरों का मोहताज है। इसका काम पहले करना जरूरी है। पिताजी कभी-कभी तो माँ की झिड़की चुपचाप सुन लेते और कभी उल्टे बरस पड़ते।

    इसी सब के बीच मैं पाँच साल का हो गया। दुनिया का कोई भी इलाज मेरे काम नहीं आया। मेरा सिर बाकी शरीर के एक तिहाई से भी बड़ा हो गया। फिर भी माँ मुझे चिपकाये रहती। कभी भूलकर भी मुझ पर नहीं खीझती।

    मैं जब बहुत छोटा था तब पिताजी मेरे लिये एक गुड़िया खरीद कर लाये थे। मैंने माँ के मुँह से सुना था कि वह जापानी गुड़िया कहलाती थी। जब उसे लिटाते तो उसकी आंखें बंद हो जातीं और जब उसे खड़ी कर देते तो उसकी आँखें खुल जातीं। उसके रेशमी चिकने बाल उसकी पीठ पर झूलते रहते। माँ कभी उन बालों की चोटियाँ गूंथ देती तो कभी कसकर जूड़ा बांध देती। मैं उसके बाल खोल देता। वह मुझे खुले बालों में ही अच्छी लगती थी। गुड़िया को चाहे सुला दो या खड़ी कर दो, वह सदैव हँसती रहती थी।

    जब गुड़िया घर में आई थी तब माँ भी उसके जैसी ही लगती थी। लेटते ही आँखें बंद कर लेती। आँखें बन्द करके ही वह कहानी कहती। माँ को बहुत सारे गीत याद थे जिन्हें वह बहुत मीठे स्वर में गाया करती। मैं चाहता था कि गुड़िया भी माँ की तरह गाये किंतु गुड़िया मेरे लाख प्रयास करने पर भी नहीं गाती। तब माँ ही मुझे गीत सुनाकर चुप करती। पिछले सात सालों में गुड़िया जाने कहाँ गयी। माँ भी अब गुड़िया जैसी नहीं दिखती। उसका चेहरा बदलता जा रहा है। माँ अब भी लेटते ही आँखें बन्द कर लेती है किंतु अब वह पहले की तरह मुस्कुराती नहीं है। उसके बाल भी जाने कैसे हो चले हैं, गुड़िया जैसे नहीं रहे हैं।

    इधर मेरा माथा बढ़ता जा रहा है और उधर पिताजी का गुस्सा। धीरे-धीरे उन्होंने मुझसे स्थाई रूप से घृणा करना आरंभ कर दिया है। उनकी इस घृणा के कई कारण हैं, जो वे माँ को सुनाया करते हैं। मेरी असामान्य और भुतहा आ-ति के कारण वे अपने किसी मित्र-परिचित को घर नहीं ला सकते और न ही वे मुझे और मेरी माँ को लेकर किसी मित्र परिचित, सगे सम्बधी के यहाँ अथवा सिनेमा देखने जा सकते हैं।

    पिताजी का सामाजिक जीवन मेरे कारण पूरी तरह समाप्त होकर रह गया है। मेरे जन्म से पहले तथा बाद के कुछ सालों तक घर में पिताजी के मित्र-परिचितों और सगे सम्बन्धियों का मेला लगा रहता था। घर में सदैव हँसी-ठठ्ठा और उत्साह का माहौल बना रहता किंतु अब तो भूल कर भी हमारे घर में कोई नहीं आता। पिताजी की कमाई का ज्यादातर हिस्सा मेरे उपचार और किराये भाड़े में खर्च हो जाता है। बचे हुए पैसों से घर का खर्च भी मुश्किल से ही चल पाता है।

    पिताजी कुढ़ते, जब वे ये देखते कि पास-पड़ौसी मेरी शक्ल नहीं देखना चाहते। यह जानकर तो पिताजी को और भी गुस्सा आता कि उनके अधीनस्थ कर्मचारी उनकी पीठ पीछे हँसी उड़ाते हैं। बालकों ने मेरा नाम 'बागड़-बिल्ला' रख दिया है। उन्हीं में से किसी के मुँह से मैंने सुना है कि राजस्थान में डूंगरपुर-बांसवाड़ा का क्षेत्र बागड़ कहलाता है जहाँ मेरी तरह की भद्दी शक्ल और बेडौल आ
    कृति के बिलाव पाये जाते हैं।

    मेरे पिता मेरे बाद एक और संतान चाहते हैं जो दिखने में दूसरे बालकों की तरह सामान्य हो ताकि घर की मनहूसियत कुछ कम हो सके किंतु माँ इसके लिये बिल्कुल भी तैयार नहीं। उसका मानना है कि दूसरे बालक के आ जाने से मेरी उपेक्षा होगी तथा पूरी तरह देखभाल और उपचार नहीं हो पायेगा। माँ को पूरा विश्वास है कि एक दिन मैं पूरा ठीक हो जाऊँगा। मेरी आ
    कृति दूसरे बालकों की तरह सामान्य हो जायेगी। मैं उन्हीं की तरह भाग-दौड़ सकूंगा। कंधे पर बस्ता लटका कर स्कूल जाया करूंगा और जब बड़ा हो जाऊँगा तो उनके लिये एक सुंदर सी बहू लेकर आऊंगा जो उन्हीं की तरह जापानी गुड़िया जैसी होगी।

    पिताजी माँ की बातों पर हैरान होते, उसे पागल कहते तथा गालियाँ देने लगते। एक दिन तो उन पर जैसे भूत सवार हो गया। कहने लगे - 'इसे कोढ़ियों को दे देते हैं। वे इसे भीख माँगने वाली गाड़ी में बैठाकर भीख माँगा करेंगे। इसे देखकर लोग भीख भी ज्यादा देंगे और कोढ़ी लोग इसका ध्यान भी रखेंगे।'

    पिताजी की इस बात से घर में कोहराम मच गया। माँ ने अपना सिर दीवार पर दे मारा। बोली - 'भगवान से डरो।'

    -'इसमें बुराई क्या है? किसी के घर में हींजड़ा पैदा हो जाता है तो माँ बाप अपना बच्चा हींजड़ों को नहीं दे देते?'

    -'मेरा बच्चा हींजड़ा नहीं है।'

    -'नहीं यह तो पूरा महाराणा प्रताप है।'

    -'दुनिया के सारे बच्चे महाराणा प्रताप नहीं होते।'

    -'दुनिया के सारे बच्चे इसकी तरह अपाहिज भी नहीं होते।'

    -'यह अपाहिज है तो इसमें इसका क्या कुसूर है?'

    -'कुसूर तो सारा मेरा है।'

    -'यह तो सब अपने-अपने भाग्य की बात है। इसमें किसी का भी क्या कुसूर है?'

    मैं टुकुर-टुकुर दोनों को देखता रहा। मैंने सोचा कि यदि मैं चल सकता तो स्वयं ही चलकर कोढ़ियों के पास पहुँच जाता। हींजड़ों को तो मैं नहीं जानता कि वे कौन लोग होते हैं और कहाँ पाये जाते हैं! कोढ़ियों को मैंने अक्सर ही मंदिरों के बाहर छोटी-छोटी गाड़ियों में बैठकर भीख माँगते देखा है। मेरे चले जाने से पिताजी को इस अदम्य वेदना से मुक्ति मिलती और माँ भी कुछ दिन रो-धो कर चुप हो जाती। कुछ दिनों बाद घर में कोई दूसरा बच्चा आता जिसकी किलकारियों से घर की मनहूसियत दूर हो जाती, किंतु मैं चल कहाँ सकता हूँ? चल ही सकता तो फिर रोना किस बात का था !

    माँ अब अधिक परेशान हो गयी। नित्य ही मुझे लेकर मंदिर की चौखट पर माथा रगड़ने जाती। घंटों रोती रहती, भगवान से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करती, पागलों की तरह झोली फैला लेती।

    एक दिन पिताजी एक छोटी सी पुड़िया लाये, बोले - 'इसे यह खिला देते हैं। जीवन भर नरक भोगने से तो अच्छा है कि छोटा सा पाप कर लिया जाये।'

    माँ सिंहनी की तरह बिफर पड़ी। बोली - 'खबरदार जो तुमने ऐसी नीच हरकत की तो ! इसे जहर देने से तो अच्छा है, मुझे ही कुछ खिला दो। फिर तुम्हारी जो इच्छा हो सो करना।'

    उस दिन झगड़ा बढ़ गया। पिताजी ने कहा - 'चाहे जो हो, आज तो इसे मारकर ही दम लूंगा।'

    पिताजी का यह रूप देख कर माँ मुझे उठाकर घर से बाहर भाग आयी। पिताजी ने पीछे से डण्डा फैंककर मारा जो माँ के सिर में लगा। सिर फट गया और खून की धार बहने लगी। माँ सिर पकड़कर वहीं बैठ गयी।

    पिताजी का गुस्सा गायब हो गया। माँ के सिर से खून बहता देखकर पिताजी दौड़े आये और माँ का सिर पकड़ कर बालकों की तरह फूट-फूट कर रोने लगे।

    मौहल्ले में अच्छा-खासा तमाशा खड़ा हो गया। माँ, पिताजी को और मुझे लेकर घर में चली आयी। मुझे माँ की गोद से उतार कर पिताजी ने माँ का घाव धोया और सूती कपड़ा जलाकर घाव में भरा। बहुत दिनों बाद मैंने माँ और पिताजी को घर में साथ-साथ बैठे देखा। पिताजी जहर की जो पुड़िया लाये थे, वह मेरे पास ही पड़ी थी। उसे मैंने अपने कपड़ों में छिपा लिया।

    शाम होने को है। माँ खाना बनाने में व्यस्त है। आज बहुत दिनों बाद पिताजी पूजा कर रहे हैं। इधर पिछले कई सालों से उन्होंने पूजा करना छोड़ रखा है, भगवान पर से तो उनका विश्वास जैसे पूरी तरह उठ गया है। मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया है कि जो काम पिताजी नहीं कर पाये, उसे मैं स्वयं कर लेता हूँ। पुड़िया खाने से पहले मैंने यह पहली और आखिरी चिट्ठी आपके नाम लिखी है ताकि आप मेरी माँ और पिताजी को किसी बात के लिये दोषी नहीं ठहरायें।

    चिट्ठी पूरी करके जैसे ही मैंने पुड़िया खोली और चाहा कि फाँक लूँ, अचानक मेरे हाथों से पुड़िया किसी ने छीन ली। मैंने सहम कर सिर ऊपर उठाया। देखा पिताजी थे। वे कब पूजा घर से आकर मेरे पास खड़े हो गये, चिट्ठी लिखने की धुन में मुझे पता ही नहीं लगा। मैंने सोचा कि अब मेरी खैर नही है किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। मेरे अनुमान के विपरीत पिताजी ने मुझे प्यार से गोद में उठाया और सीने से लगाते हुए बोले - 'हम जिंदगी से इस तरह हार नहीं मानेंगे। मेरी इतनी छोटी गलती की इतनी बड़ी सजा मुझे मत दो बेटा कि मैं जिंदगी भर जी न सकूँ।'

    पिताजी की आवाज सुनकर माँ रसोईघर से बाहर निकल आई। उसे डर था कि पिताजी मुझे कुछ चोट न पहुँचायें। कमरे में पहुँच कर माँ के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उस दिन हम तीनों ने साथ बैठकर खाना खाया। मेरी लिखी चिट्ठी अब कोई अर्थ नहीं रखती। अतः यह चिट्ठी आपके हाथों में पहुँच गयी हो तो तो उसे न पढ़ें। दूसरों की चिट्ठियाँ पढ़ना कोई अच्छी बात नहीं है, क्योंकि यही वह मोड़ है जब चिट्ठी, चिट्ठी न रह कर कहानी बनने लगती है।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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