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  • कविता के बिना रोबोट बन जायेगा मनुष्य !

     05.10.2019
    कविता के बिना रोबोट बन जायेगा मनुष्य !

    प्रख्यात शिक्षाविद् यशपाल ने अपनी एक पुस्तक की भूमिका में लिखा है- तकनीकी शिक्षा पर जोर देने से परिस्थितियाँं बिगड़ी हैं, यदि व्यक्ति साहित्य, संगीत और दर्शन से दूर रहेगा तो दुनिया शीघ्र ही ऐसे रोबोट्स से भर जायेगी जिनका केवल चेहरा ही मनुष्य जैसा होगा।

    अधिकांश लोगों का यह दृढ़ विश्वास है कि कविता, संगीत और पेंटिग जैसी सृजनात्मक गतिविधियों से जुड़े छात्रों के रैगिंग जैसे अपराधों से जुड़ने की संभावना कम होती है। तकनीकी शिक्षा पर जोर के साथ शिक्षा संस्थाओं में सृजनात्मक और मानवीय मूल्यों से जुड़ा ज्ञान देने की आवश्यकता है।

    मैं समझता हूँ कि यशपाल की यह घोषणा पत्थर पर खींची गई लकीर के समान है जिसे भविष्य भी खुरच कर मिटा नहीं पायेगा। हमारे बच्चे क्यों संवदेनहीन, दुःसाहसी और आत्मघाती होते जा रहे हैं, इस प्रश्न का इससे सही उत्तर और कुछ नहीं हो सकता कि हमने उन्हें इंजीनियर, डॉक्टर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, प्रशासनिक अधिकारी और व्यवसाय प्रबंधक बनाने के लिये कविता से दूर कर दिया। जैसे जीवन का बसंत यौवन है, वैसे बुद्धि का वसंत कविता है।

    एक युग वह भी था जब बड़े-बड़े राजा-महाराजा कविता पढ़ने वालों की पालकियों को कंधे पर उठाया करते थे और एक समय यह है कि साहित्य, कला, इतिहास और भूगोल जैसे सरस विषय कम नम्बर लाने वाले छात्र के उपयुक्त समझे जाते हैं। परीक्षा में रट-रटा कर दूसरों से अधिक अंक लाने वाले छात्रों को मेधावी माना जा रहा है। विज्ञान और अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को सुयोग्य तथा साहित्य और कविता पढ़ने वालों को अयोग्य अर्थात् कम बुद्धि वाला छात्र माना जा रहा है।

    इतिहास गवाह है कि तुलसी, सूर, कबीर, मैथिलीशरण गुप्त जैसे व्यक्ति कविता से जुड़ाव के कारण ही दीर्घ आयु वाले हुए, उन्हें इतना यश मिला कि देश, काल और युगों की सीमा लांघ गया। दूसरी ओर भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे कवि भी हुए जिन्होंने कविता को पाने के लिये अपने पुरखों द्वारा संचित कुबेर का कोष खाली कर दिया। यह सही है कि विज्ञान और अर्थशास्त्र के अध्ययन के बिना संसार का काम नहीं चल सकता किंतु यह भी सही है कि कविता के बिना भी संसार का काम नहीं चल सकता। वह मनुष्य किस काम का जिसके हृदय में कविता नहीं बसती हो।

    मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है- जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। कविता मन, वाणी और बुद्धि का उल्लास है।

    इसीलिये कहा जाता है- जहाँ न पहुंचे रवि, तहाँ पहुँचे कवि।

    संस्कृत का एक श्लोक आज भी छोटी कक्षाओं में पढ़ाया जाता है- काव्यशास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्। व्यसनेन मूर्खाणां, निंद्रिया कलहेन वा। अर्थात् बुद्धि व्यक्तियों का समय कविता से विनोद करने में व्यतीत होता है जबकि मूर्ख व्यक्ति या तो सोते हैं, या कलह अर्थात् झगड़ा पैदा करते हैं।

    इसीलिये यशपाल ने सत्य ही कहा है कि जो बच्चे कविता पढ़ते हैं, वे रैगिंग जैसे अपराध से दूर रहते हैं। कहते हैं कि अंग्रेजी के कवित मिल्टन ने जब अपने दोनों नेत्र खो दिये तो वे बहुत दुखी हुए। इस दुख से अंतस में कविता फूट पड़ी और उन्होंने ‘‘पैराडाइज लॉस्ट’’ अर्थात् स्वर्ग खो गया शीर्षक से कविता रची। इस कविता के रचने से उन्हें अपार आनंद की प्राप्ति हुई और उन्होंने ‘‘पैराडाइज रीगेन’’ अर्थात् स्वर्ग की पुनः प्राप्ति शीर्षक से कविता लिखी। सचमुच कविता स्वर्ग है। हमें अपने बच्चों को इस स्वर्ग से दूर नहीं करना चाहिये। उन्हें इंजीनियर, डॉक्टर या आईएएस बनाइये किंतु कविता गुनगुनाने वाला, न कि कविता से झिझकने वाला।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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