Blogs Home / Blogs / हिन्दी साहित्य - आलेख / साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद
  • साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद

     18.05.2018
    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद

    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद


    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद दो भिन्न बातें हैं किंतु एक बिंदु है जहाँ दोनों आकर मिलते हैं, इस बिंदु पर इनका सम्मिलन औपचारिकता मात्र नहीं रहता अपितु एक-दूसरे के अन्योन्याश्रित होकर एक-दूसरे का पूरक हो जाता है। यदि साहित्य संस्कृति और समाज को संस्कारित करता है तो साहित्य राष्ट्रवाद के लिए खाद-पानी भी प्रदान करता है।

    ‘‘दिपै वारां देस जारां साहित जगमगै’’ जैसी उक्ति इस बात को पुष्ट करती है कि साहित्य और राष्ट्र में कितना गहरा सम्बन्ध है। आप समाज को खराब साहित्य दीजिए और एक खराब राष्ट्र का निर्माण कर लीजिए। आप समाज को अच्छा साहित्य दीजिए और अच्छे राष्ट्र का निर्माण कर लीजिए।

    इस बात को थोड़ा विस्तार देना आवश्यक है।

    किसी भी राष्ट्र के तीन शरीर होते हैं- भौगोलिक शरीर, राजनीतिक शरीर एवं सांस्कृतिक शरीर। ये तीनों ही शरीर एक दूसरे में समाए हुए होते हैं। इनमें से एक के क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट होने पर दूसरा एवं तीसरा शरीर स्वतः क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट हो जाता है।

    राष्ट्र का निर्माण कौन करता है ?

    आप कहेंगे- प्रकृति। प्रकृति राष्ट्र के केवल भौगोलिक शरीर का निर्माण करती है। नदियां, पहाड़, समुद्र और झीलों ने विश्व के बहुत से देशों की सीमाएं बनाई हैं किंतु ये सीमाएं शाश्वत नहीं हैं। कल हिन्दूकुश पर्वत भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा का निर्माण करता था किंतु आज रैडक्लिफ रेखा भारत और पाकिस्तान की सीमा का निर्माण करती है। 

    तो क्या राष्ट्र का निर्माण राजा या सेना करते हैं ?

    निश्चित रूप से करते हैं किंतु वे केवल राष्ट्र के राजनीतिक शरीर का निर्माण करते हैं। राजा या सेना के हारते ही राष्ट्र की भौगोलिक सीमाएं बदल जाती हैं तथा राजनीतिक व्यवस्थाएं भी ध्वस्त हो जाती हैं।

    तो फिर अखण्ड, अक्षय एवं शाश्वत राष्ट्र का निर्माण कौन करता है?

    निःसंदेह किसी भी राष्ट्र के अखण्ड, अक्षय एवं शाश्वत शरीर का निर्माण, उस देश की संस्कृति करती है। आइए इसे इस बात को समझने की चेष्टा करते हैं- मनुष्य के तीन शरीर होते हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। स्थूल शरीर दिखाई देता है, सूक्ष्म शरीर अनुभव होता है किंतु कारण शरीर को तो अनुभव नहीं किया जा सकता केवल उसका चिंतन किया जा सकता है। आंखों से जो कपड़ा दिखाई देता है, वह केवल बाह्य स्वरूप है, कपड़ा तो वास्तव में धागे से बनता है। धागा भी केवल एक बीच की अवस्था या व्यवस्था है, वास्तविक इकाई तो वह रुई है जिससे धागा बाना है और जिससे अंत में कपड़ा बना है।

    ठीक इसी प्रकार राष्ट्र का बाह्य स्वरूप उसकी भौगोलिक देह है जिसे हम राष्ट्र कहते हैं- कश्मीर के कन्याकमारी तक की भौगोलिक देह। इस भौगोलिक देह को एक सूत्र अथवा एक व्यवस्था के अंतर्गत नियंत्रित करने वाली, उसे बांध कर रखने वाली देह हमारी राजनीतिक व्यवस्था है किंतु राजनीतिक व्यवस्था राष्ट्र नहीं है, यह राष्ट्र की स्थूल देह को निर्मित करने का माध्यम भर है। वास्तव में देश की संस्कृति ही उसकी राजनीतिक व्यवस्था का भी निर्माण करती है।

    कहने का अर्थ ये कि राष्ट्र को निर्मित करने वाला बारीक तत्व संस्कृति है। देश की भौगोलिक सीमाएं बदल जाएं, राजनीतिक व्यवस्थाएं बदल जाएं किंतु नागरिक अपनी संस्कृति को पकड़े रहें तो वह राष्ट्र अक्षुण्ण रहता है। यदि भौगोलिक सीमाएं और राजनीतिक व्यवस्थाएं न बदलें और राष्ट्र की संस्कृति को बदल दिया जाए तो राष्ट्र मर जाता है।

    अब हम अपने मूल विषय पर आते हैं।

    संस्कृति का निर्माण कौन करता है ?

    निःसंदेह मनुष्य करता है।

    संस्कृति का परिष्कार कौन करता है ?

    निःसंदेह साहित्य 
    करता है। 

    राष्ट्र का विचार या मंत्र कौन देता है ?

    निःसंदेह साहित्य करता है।

    यजुर्वेद की एक ऋचा में ‘राष्ट्र मे देहि’ और अथर्ववेद की एक ऋचा में ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो राष्ट्र के मूल आधार अर्थात् ‘समाज’ के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। समाज ही सभ्यता का विकास करता है, समाज ही संस्कृति को रचता है और समाज ही राष्ट्र का निर्माण करता है। समाज, सभ्यता एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने की भावना ही राष्ट्रीय चेतना के रूप में प्रतिफलित होती है।

    यह भावना आती कहां से है ?

    यह भावना आती है साहित्य से। समाज अपनी भूमि से जुड़ा हुआ रहता है। यही कारण है कि राष्ट्र, एक राजा द्वारा शासित एक गांव के संकुचित अर्थ से लेकर भारत, चीन और अमरीका जैसे विराट देशों के लिए प्रयुक्त होता है।

    अथर्ववेद का सूक्तकार ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः’ कहकर राष्ट्रवाद का सूत्रपात करता है। यहां देखिए कि अथर्ववेद का सूक्तकार राष्ट्रवाद का बीज वपन कर रहा है। अथर्ववेद के पृथ्वी-सूक्त का प्रत्येक मंत्र राष्ट्र-भक्ति का पाठ पढ़ाता है। आधुनिक युग में भारत माता की कल्पना इसी पृथ्वी-सूक्त से आई है।

    राष्ट्र को कौन जगाता है 
    ?

    यजुर्वेद कहता है- वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः । यजुर्वेद राष्ट्र संरक्षण का दायित्व ब्राह्मणों पर ही डालता है। ये ब्राह्मण कौन हैं! ये ब्राह्मण और कोई नहीं, वेदों के मंत्र देने वाले, रामायण, महाभारत और गीता जैसे लोकोपकारी साहित्य रचने वाले, समाज को मार्ग दिखाने वाले हमारे और आपके जैसे साहित्यकार ही ब्राह्मण हैं। राष्ट्र को जागृत और जीवंत बनाने का भार इन्हीं साहित्यकार रूपी ब्राह्मणों पर है। आप किसी देश के साहित्य को बदल दीजिए, थोड़े ही समय में देश बदल जाएगा।

    साहित्य का सामर्थ्य कहां तक विस्तारित है 


    साहित्य के सामर्थ्य को समझने के लिए हमें मनुष्य जाति के विकास की कहानी पर थोड़ी दृष्टि डालनी चाहिए।

    क्या आप को मालूम है, धरती पर आदमी का पहला संस्करण कब आया ?

    देवताओं ने इस धरती को लगभग 18 लाख साल पहले, मानव का पहला संस्करण प्रदान किया। इसे होमो हैबिलिस कहते थे, वह बंदर से मिलता-जुलता था किंतु यह मानव पत्थर के औजार बनाकर उनसे शिकार करता था। देवताओं को विश्वास था कि यह मनुष्य उन्नति करेगा तथा एक संस्कृति का विकास करेगा किंतु 8 लाख साल तक भी वह अपनी उस अवस्था से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा।

    इसलिए देवताओं ने आज से 10 लाख साल पहले आदमी का दूसरा संस्करण तैयार किया जिसे होमो इरैक्टस कहते थे। यह दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलता था। उसकी शेष चेष्टाएं पशुओं जैसी थीं। देवताओं को विश्वास था कि यह मनुष्य अवश्य उन्नति करेगा किंतु 5 लाख साल बीत जाने पर भी इस मनुष्य ने अपनी आदतों में कोई परिवर्तन नहीं किया।

    इसलिए देवताओं ने आज से 5 लाख साल पहले आदमी का तीसरा संस्करण तैयार किया जिसे होमो सेपियन कहते थे। इसका मस्तिष्क, धरती पर निवास करने वाले समस्त प्राणियों से बहुत तेज बनाया गया। यह शब्दों का निर्माण करके उन्हें बोल भी सकता था। अर्थात् भाषा का निर्माण कर सकता था। देवताओं को इस मानव से बहुत आशाएं थीं कि शायद तेज दिमाग वाला और बोलकर अपनी बात कह सकने वाला यह मानव, अपनी सभ्यता और संस्कृति का विकास करेगा किंतु चार लाख साल बीतने पर भी यह मनुष्य अपनी अवस्था से आगे नहीं बढ़ सका।

    देवताओं ने आज से सवा लाख साल पहले मनुष्य का चौथा संस्करण तैयार किया जिसे होमो सैपियन-सैपियन कहते थे। जब इस आदमी ने भी सभ्यता और संस्कृति का विकास नहीं किया तो आज से लगभग 40 हजार वर्ष पहले आदमी का अब तक का अंतिम प्रारूप आया। इसे क्रो-मैगनन मैन कहा जाता है। जो कि आप और हम हैं।

    इस संस्करण के मनुष्य अधिक अच्छे हथियार बना सकते थे। वे कपड़ों को सिलकर पहनते थे। उनके आश्रय स्थल अच्छे थे और उनके चूल्हे भोजन पकाने में अधिक उपयोगी थे। मनुष्य का यह संस्करण बहुत उन्नत था। देवताओं को इस संस्करण से बहुत आशाएं थीं किंतु देवताओं को इस मनुष्य ने भी पहले के सभी मनुष्यों की तरह निराश किया और यह मनुष्य भी धरती के दूसरे पशुओं की तरह जीवन जीता रहा।

    देवताओं ने विचार किया कि क्या किया जाना चाहिए! उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने आज से लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले मनुष्य को तीन पुस्तकें प्रदान कीं जिन्हें ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद कहा जाता था। देवताओं ने ये पुस्तकें मनुष्यों को बोलकर सुनाईं तथा मनुष्य से कहा कि वह इन पुस्तकों को याद कर ले। मनुष्य ने वैसा ही किया। इस बार वह चमत्कार हो गया जिसकी प्रतीक्षा देवतागण पिछले 18 लाख साल से कर रहे थे।

    मनुष्य ने अपने मस्तिष्क, विचार और भाषा के साथ-साथ मन और इच्छा का विस्तार करना आरम्भ किया। उसने देवताओं को अथर्ववेद बनाकर सुनाया जिसमें मनुष्य ने देवताओं से प्रार्थना की कि आप हमें अच्छे घोड़े, अच्छे हल, अच्छी गाएं, अच्छे बीज, अच्छे मंत्र, अच्छी औषधियां दीजिए। हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए।

    कहने का अर्थ यह कि देवगण 18 लाख सालों तक मनुष्य के संस्करण परिष्कृत करते रहे किंतु वे बुद्धि से परिपूर्ण मनुष्य का निर्माण नहीं कर पाए किंतु जैसे ही उन्होंने मनुष्य को वेदों का ज्ञान दिया अर्थात् साहित्य प्रदान किया तो चमत्कार को घटित होने में समय नहीं लगा। आज आप धरती पर जो भौतिक उन्नति, वैज्ञानिक उन्नति और आध्यात्मिक उन्नति देख रहे हैं, यह मनुष्य ने पिछले लगभग साढ़े तीन हजार वर्षों में अर्जित की है।

    अब साहित्य के सामर्थ्य पर दो उदाहरण आज के उन्नत युग से देखते हैं।

    एक जर्मन लेखक हुआ है कार्लमार्क्स। हम सबने उसका नाम सुना है। ई.1867 में उसकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई- ‘दास कैपिटल’। यह पुस्तक यह कहती थी कि दुनिया में तो तरह के लोग हैं। पहले वे जो ताकतवर हैं और दुनिया का शोषण करते हैं, दूसरे वे जो कमजोर हैं और शोषित होते हैं। यदि शोषित लोग संगठित हो जाएं तो वे शोषण से मुक्ति पा सकते हैं। इस पुस्तक ने विश्व भर के राष्ट्रों में बेचैनी उत्पन्न की। बहुत से देशों में मजदूरों, किसानों और वंचतों ने संगठित होकर शासन व्यवस्था के विरुद्ध क्रांतियां कीं तथा लगभग आधी दुनिया से सत्ता के तख्ते पलट गए। 1917 में रूस तथा 1947 में चीन भी कम्युनिस्टों के हत्थे चढ़ गए।

    यहां के लोगों ने अपने पुराने शासकों को मार डाला और कम्यूनिस्ट सरकारें बना लीं। लोगों ने क्रांतियां तो कर दीं किंतु उनका परिणाम यह हुआ कि नए विचारों वाले शासक, पुराने शासकों से भी अधिक शोषण करने वाले सिद्ध हुए। मानवता इस भयानक शोषण से सिसक उठी।

    ई.1903 के आसपास भारत के बिहार प्रांत में एक अंग्रेज अधिकारी काम करता था। उसका एक पुत्र था- जॉर्ज ऑरवेल जो अंग्रेजी भाषा में उपन्यास लिखा करता था। उसने एनिमल फार्म नामक एक उपन्यास लिखा। यह उपन्यास 1945 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में 1917 की रूसी क्रांति पर एक करारा व्यंग्य किया गया।

    इस उपन्यास में रूपक खड़ा किया गया कि नेपोलियन और स्नोबॉल नामक दो सूअर, मेजर नामक एक महान सूअर के विचारों से प्रेरित होकर अपने फार्म के मालिक मिस्टर जोंस के विरुद्ध क्रांति करके उसे फार्म से खदेड़कर भगा देते हैं। इस उपन्यास के क्रांतिकारी सूअर वास्तव में रूसी क्रांति के नाक स्टालिन और ट्रोटस्की के प्रतीक थे। उपन्यासकार लिखता है किस प्रकार नेपोलियन और स्नोबॉल नामक चालाक और धूर्त सूअरों ने खेत की सत्ता हथिया ली और फार्म पर रहने वाले पशु-पक्षियों का जमकर शोषण किया। यह शोषण उनके पुराने मालिक अर्थात् आदमी द्वारा किए जाने वाले शोषण से अधिक भयानक था। वे गायों का दूध पी जाते हैं, मुर्गियों और बत्तखों के अण्डे खा जाते हैं। खेत में काम नहीं करते तथा घोड़ों को पहले की अपेक्षा अधिक घण्टों तक काम करने के लिए मजबूर करते हैं।

    जब यह उपन्यास इंग्लैण्ड से बाहर निकलकर दुनिया के अन्य देशों की जनता के हाथों में पहुंचा तो जनता ने पाया कि कम्युनिस्ट शासकों ने हमारा भी वैसा ही हाल किया है जैसा कि नेपोलियन और स्नोबॉल नामक सूअर, एनीमल फार्म के जानवरों का कर रहे थे।

    इस पुस्तक को पढ़कर दुनिया के बहुत से कम्यूनिस्ट देशों के नागरिकों के सिर से कम्यूनिज्म का भूत उतर गया। इन देशों में फिर से क्रांतियां हुईं और कम्यूनिस्ट सरकारों को उखाड़ फैंका गया। यहां तक कि स्वयं रूस ही बिखर गया। पूरी दुनिया से कम्यूनिज्म की शवयात्रा निकल गई। केवल चीन और इक्का-दुक्का कोई छोटा सा देश बचा है जहां कम्यूनिस्ट सरकारें हैं और वे आज भी अपने नागरिकों को गुलाम जैसी स्थति में रखती हैं।

    हमने राष्ट्र पर बात की, संस्कृति पर बात की, साहित्य की बात की अब थोड़ा विचार राष्ट्रवाद पर करते हैं।

    भारतीय ऋषि प्रार्थना करता है- विश्वानि देव सवितरदुरितानि परा सुवः, यद्भद्रम तन्नासुवः। अर्थात् वह विश्व भर के देवताओं से प्रार्थना कर रहा है कि मेरे भीतर जो भी बुराई है उसे दूर कीजिए और जो कुछ भी अच्छा है, वह मेरे पास लाइए।

    तो क्या यह ऐसी बात हुई कि हम प्रार्थना तो करेंगे विश्व भर में कहीं भी निवास करने वाले देवताओं की और गीत गाएंगे अपने राष्ट्र के। इस वैदिक मंत्र के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र निश्चित रूप से एक संकुचित विचार है।

    एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र से अलग है, प्रत्येक राष्ट्र के नागरिकों कोे अपने राष्ट्र पर गर्व है। गर्व की यह भावना मनुष्य की सोच को विस्तार नहीं देती, संकुचित करती है। यहां तक कि एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करके वहां की जनता को आक्रांत करे। राष्ट्रवाद के नाम पर यूरोप में सैंकड़ों वर्षों तक यही हुआ।

    आचार्य चतुरसेन ने राष्ट्रवाद के बारे में लिखा है कि राष्ट्रवाद का दैत्य यूरोप में पैदा हुआ। तो क्या राष्ट्रवाद की भावना एक नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक बात है
    ? 

    प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध इस बात के गवाह हैं कि उपनिवेशवादी शक्तियों ने जनता में राष्ट्रवाद की भावनाएं भड़का कर धरती पर निवास करने वाले करोड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया। प्रथम विश्वयुद्ध में लगभग 2 करोड़ लोग मरे और 2 करोड़ से अधिक लोग घायल हुए। द्वितीय विश्व युद्ध में 5 से 8 करोड़ लोग मरे। 50 लाख मनुष्य तो युद्धबंदियों के रूप में मृत्यु को प्राप्त हुए। घायलों की संख्या अलग है।

    यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि राष्ट्रवाद की भावना, मानव जाति के लिए इतनी भयानक चीज है तो फिर राष्ट्रवाद क्यों ?

    वस्तुतः इस प्रश्न का जवाब कहीं से आ सकता है तो केवल साहित्य की दुनिया से। संस्कृत के एक कवि ने लंका को जीतने वाले राजा रामचंद्र के मुख से यह कहलवाया है- ‘स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ इस श्लोक के माध्यम से साहित्यकार राष्ट्रवाद की भावना को मर्यादा में बांधता है। जैसे ही मनुष्य में इस भावना का उदय होता है, राष्ट्रवाद की भयावहता समाप्त हो जाती है और राष्ट्रवाद की अच्छाई के दर्शन होने लगते हैं।

    जब हम वन्दे मातरम् कहते हैं तो उसका आशय भारत माता से तो होता ही है, वस्तुतः समस्त धरित्री से भी होता है। धरती हम सब की मां है, उसे देशों में हमने बांटा है, परमात्मा ने तो उसे एक इकाई के रूप में बनाया है। धरती के विभिन्न देशों में इसलिए बंटी क्योंकि विभिन्न स्थानों के मनुष्यों द्वारा सर्वे भवंतु सुखिनः जैसे साहित्य को त्यागकर, विकृत साहित्यों का निर्माण किया, जिससे पहले तो लोगों के मन अलग हुए और बाद में देश। बहुत प्राचीन काल में जब धरती पर केवल वैदिक धर्म ही व्याप्त था, दूसरी संस्कृतियां अस्तित्व में नहीं आई थीं, तब पूरी धरती एक देश ही थी।

    साहित्य का काम संस्कृतियों के इस वैमनस्य को दूर करने का है। यही साहित्य का वास्तविक सामर्थ्य है। जब कबीरदास यह कहते हैं कि- साईं इतना दीजियो जामै कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाय। तो वे वस्तुतः संतोषी, सुखी और शांत राष्ट्र का निर्माण कर रहे होते हैं। यह साहित्य का ही सामृथ्य है कि वह मनुष्य को केवल इस बात के लिए तैयार करे कि वह परमात्मा से अपने परिवार और अतिथि का पेट भर जाने योग्य अन्न मांगने में ही संतोष का अनुभव करता है।

    मानव जब किन्हीं अन्य भूमियों पर विकसित राजनीतिक शक्तियों के अधीन हो जाता है तो वह अपनी जन्मभूमि से अपने सम्बन्ध का स्मरण करता है। इसी बिंदु पर राष्ट्रवाद का साहित्य जन्म लेता है। संसार की प्रत्येक भाषा के काव्य में, हर युग में राष्ट्रीय भावना का समावेश होता है। किसी भी देश के राष्ट्रीय काव्य में समग्र राष्ट्र की चेतना प्रस्फुटित होती है।

    अच्छे साहित्य से रची गई राष्ट्रीय-भावना ही राष्ट्र की प्रगति का मंत्र है। राष्ट्रीय भावना का सृजनात्मक पक्ष मानवता वादी होता है। वह न केवल अपने देश को स्वतंत्र देखना चाहता है अपितु समस्त मानवता को स्वाधीन एवं सुखी देखने की कामना रखता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×