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  • स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्रीय काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

     15.03.2018
    स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्रीय काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

    किसी भी राष्ट्र के तीन शरीर आवश्यक रूप से होते हैं- भौगोलिक शरीर, राजनीतिक शरीर एवं सांस्कृतिक शरीर। ये तीनों ही शरीर एक दूसरे में समाए हुए, एक दूसरे के पूरक और एक दूसरे के अन्योन्याश्रित हैं। इनमें से एक के क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट होने पर दूसरा एवं तीसरा शरीर स्वतः क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट हो जाता है। हमारे आलेख का विषय राष्ट्र के सांस्कृतिक शरीर से सम्बन्धित है जो राष्ट्र के भौगोलिक शरीर की रक्षा करके उसे प्रबल राजनीतिक देह प्रदान करन की कामना रखता है।

    यजुर्वेद की एक ऋचा में ‘राष्ट्र मे देहि’ और अथर्वेद की एक ऋचा में ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो राष्ट्र के मूल आधार अर्थात् ‘समाज’ के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। समाज ही सभ्यता का विकास करता है, समाज ही संस्कृति को रचता है और समाज ही राष्ट्र का निर्माण करता है। समाज, सभ्यता एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने की भावना ही राष्ट्रीय चेतना के रूप में प्रतिफलित होती है। समाज अपनी भूमि से जुड़ा हुआ रहता है। यही कारण है कि राष्ट्र एक गांव एवं एक राजा द्वारा शासित क्षेत्र के संकुचित अर्थ से लेकर भारत जैसे विराट देश के लिए प्रयुक्त होता है।

    अथर्ववेद का सूक्तकार ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः’ कहकर राष्ट्रवाद का सूत्रपात करता है। अथर्ववेद के पृथ्वी-सूक्त का प्रत्येक मंत्र राष्ट्र-भक्ति का पाठ पढ़ाता है। आधुनिक युग में भारत माता की कल्पना इसी पृथ्वी-सूक्त से आई है। वाल्मीकि रामायण भी ‘स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ कहकर राष्ट्रवाद की भावना को आगे बढ़ाती है। रामचरित मानस में यह भावना इन शब्दों में व्यक्त हुई है-

    सुनु कपीस अंगद लंकेसा, पावन पुरी रुचिर यह देसा।

    जद्यपि सब बैकुंठ बखाना, बेद पुरान बिदित जगु जाना।

    अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ, यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।

    जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।


    मानव समाज जब किन्हीं अन्य भूमियों पर विकसित राजनीतिक शक्तियों के अधीन हो जाता है तो वह अपनी जन्मभूमि से अपने सम्बन्ध का स्मरण करता है। इसी बिंदु पर राष्ट्रवाद की कविता जन्म लेती है। भारत के इतिहास में स्वाधीनता आंदोलन तब-तब होता हुआ दिखाई देता है, जब-जब विदेशी शक्तियां भारत में अपनी सत्ता की स्थापना करती हैं। यह घटना ई.पू.322 में सिकंदर के आक्रमण से लेकर ई.1947 में भारत के अंतिम स्वाधीनता संग्राम तक बार-बार घटी है।

    संसार की प्रत्येक भाषा के काव्य में, हर युग में राष्ट्रीय भावना का समावेश होता है। किसी भी देश के राष्ट्रीय काव्य में समग्र राष्ट्र की चेतना प्रस्फुटित होती है। राष्ट्रीय-भावना, राष्ट्र की प्रगति का मंत्र है। राष्ट्रीय भावना का सृजनात्मक पक्ष मानवता वादी होता है। वह न केवल अपने देश को स्वतंत्र देखना चाहता है अपितु समस्त मानवता को स्वाधीन एवं सुखी देखने की कामना रखता है।

    भारत के स्वाधीनता संग्राम का आशय उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी ईस्वी में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन के विरुद्ध भारतीय जनता द्वारा किए गए राजनीतिक संघर्ष से है।

    भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र हिन्दी भाषा के पहले कवि माने जाते हैं जो समाज को जागृत करने के लिए अपनी लेखनी उठाते हैं। उनका रचना काल ई.1867 से 1885 रहा। इस काल में 1857 की असफल सशस्त्र-क्रांति की व्यथा, भारतीयों के मन पर काली परछाई की तरह व्याप्त थी। इस काल में भारत अपनी दुरावस्था एवं वास्तविकता को पहचानने का प्रयास कर रहा था। इसी कारण भारतेंदु बाबू के नाटक भारत दुर्दशा का आरम्भ ही इन पंक्तियों से होता है-

    रोअहू सब मिलिकै आवहु भारत भाई। हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई ।।

    अँगरेराज सुख साज सजे सब भारी। पै धन बिदेश चलि जात इहै अति ख़्वारी ।।


    इसी नाटक में भारत विलाप करता हुआ कहता है-

    कोऊ नहिं पकरत मेरो हाथ। बीस कोटि सुत होत फिरत मैं हा हा होय अनाथ ।।

    बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ने भारतेंदुजी से प्रभावित होकर काव्य एवं नाटकों की रचना की। उन्होंने ई.1888 में कांग्रेस के महाधिवेशन के अवसर पर खेले जाने के लिए ‘भारत सौभाग्य’ नाटक लिखा। प्रेमघन को भारतेंदु मण्डल का उज्जवलतम नक्षत्र कहा जाता है।

    भारतेंदु बाबू के फुफेरे भाई राधाकृष्ण दास ने भारतेंदु से प्रेरित होकर ई.1880 में पंद्रह वर्ष की अवस्था में ही ‘दुःखिनी बाला’ नामक छोटा रूपक लिखा। इसके एक ही वर्ष बाद ‘निस्सहाय हिंदू’ नामक सामाजिक उपन्यास लिखा। इसी के अनंतर ‘स्वर्णजता’ आदि पुस्तकों का बँगला से हिंदी में अनुवाद किया। इसी काल में ‘आर्यचरितामृत’ शीर्षक से बाप्पा रावल की जीवनी तथा ‘महारानी पद्मावती’ रूपक भी लिखा। उन्होंने नागरीदास का जीवन चरित, राजस्थान केसरी वा महाराणा प्रताप सिंह नाटक, भारतेंदु जी की जीवनी, रहिमन विलास आदि राष्ट्रीय विचारधारा के साहित्य की रचना की। उन्होंने भारतेंदुजी के अधूरे हिन्दी नाटक ‘सती प्रताप’ को भी पूर्ण किया।

    भारतेंदु बाबू तथा उनके समकालीन कवियों के लगभग 20 वर्ष के रचनाकाल का यह प्रभाव हुआ कि अंग्रेज शक्ति, भारतीयों की पीड़ा और असंतोष को दबाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी ब्रिटिश मुखापेक्षी संस्था का ‘प्रसव’ करने पर विवश हुई जो भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति विश्वसनीयता का निर्माण कर सके एवं भारतीयों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए गौरांग शक्ति के समक्ष अनुनय-विनय का मंच प्रदान कर सके।

    भारतेंदु बाबू के अवसान के लगभग 27 वर्ष बाद, ई.1912-13 में मैथिली शरण गुप्त की भारत-भारती प्रकाशित हुई जिसने राष्ट्रीयता की सुप्त भावना को पुनजीर्वित करने में बड़ा योगदान दिया। इस ग्रंथ की रचना उस समय हुई जब भारत में बंग-भंग के विरोध में देशव्यापी आंदोलन हो रहे थे और भारतीयों को संतुष्ट करने के लिए देश में मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट लाया जा रहा था। गुप्तजी की भारत-भारती वस्तुतः भारत दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति थी। इस रचना में गुप्तजी ने देश के अतीत का अत्यंत गौरव और श्रद्धा के साथ गुणगान करते हुए देश की वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ प्रकट किया-

    भूलोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?

    फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ?


    संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?

    उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।


    इस रचना के माध्यम से गुप्तजी ने न केवल स्वदेश प्रेम की आवश्यकता को प्रतिपादित किया अपितु देश को दुर्दशा से उबरने हेतु समाधान खोजने का सफल प्रयोग भी किया-

    भूलो न ऋषि-सन्तान हो, अब भी तुम्हें यदि ध्यान हो।

    तो विश्व को फिर भी तुम्हारी, शक्ति का कुछ ज्ञान हो।

    बनकर अहो फिर कर्म्मयोगी, वीर बड़भागी बनो।

    परमार्थ के पीछे जगत में, स्वार्थ के त्यागी बनो।


    आगे चलकर गांधीजी ने गुप्तजी को राष्ट्रकवि बताते हुए कहा- ‘मैं मैथिलीशरण जी को इसलिये बड़ा मानता हूँ कि वे हम लोगों के कवि हैं और राष्ट्रभर की आवश्यकता को समझकर लिख रहे हैं।’ यह आश्चर्य ही था कि गांधीजी ने गुप्तजी के लिए ऐसा कहा। मेरे विचार से, स्वराज्य के लिए गांधीजी द्वारा किए गए आंदोलनों की लुंज-पुंज और अनिश्चित शब्दावली के विपरीत गुप्तजी के स्वर ओजस्वी हुंकार से युक्त थे जो गांधीजी के सांचे में फिट नहीं बैठते थे। गुप्तजी ने लिखा है-

    धरती हिलाकर नींद भगा दे

    वज्रनाद से व्योम जगा दे

    दैव, और कुछ लाग लगा दे।


    हिन्दी साहित्य के युग में इसे विस्मयकारी घटना ही माना जाना चाहिए कि भारत-भारती के युग में हिन्दी कविता में छायावाद ने जन्म लिया जिसने ई.1918 से 1936 तक ‘प्रेम’ जैसी सर्वव्यापक किंतु नितांत व्यक्तिगत अनुभूति को कविता में पिरोकर रहस्य के आवरण से ढक दिया। स्वतंत्रता आंदोलन की दृष्टि से यह काल अत्यंत महत्व का है। इस काल के आरम्भ में ई.1919 में रोलट एक्ट आता है और पूरा देश एक बार फिर से आंदोलनों की चपेट में आ जाता है। इसी काल में अंग्रेजों द्वारा असहयोग आंदोलन कुचला जाता है। चौराचौरी काण्ड होता है। खिलाफत आंदोलन होता है। साइमन कमीशन आता है। लाला लाजपतराय सड़कों पर आंदोलन करते हुए शहीद होते हैं। भगतसिंह, सुखदेव राजगुरु को फांसी होती है। गांधी-इरविन समझौता होता है। गांधी एवं अम्बेडकर के बीच पूना पैक्ट होता है। इस काल का अवसान भारत सरकार अधिनियम 1935 के साथ होता है।

    स्वतंत्रता आंदोलन की धारा इसी काल में सर्वाधिक तीव्र होती हुई दिखाई देती है। अतः प्रेम की कविता करने वाले छायावादी कवि इन घटनाओं से नितांत असंपृक्त नहीं रह सकते थे। उनके द्वारा रचे गए छायावादी काव्य में राष्ट्रीय आन्दोलनों की स्थूल अभिव्यक्ति को तो स्थान नहीं मिला किन्तु उनकी कविता में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना के बीज प्रच्छन्न रूप से उपलब्ध हैं।

    छायावाद में राष्ट्रीयता का स्वर प्रतीकात्मक रूप में तथा शक्ति और जागरण गीतों के रूप में मिलता है किंतु राष्ट्रप्रेम का प्रतीकात्मक रूप, अभावों एवं शोषण से संत्रस्त एवं संघर्षरत श्रमजीवी भारत को अधिक समय के लिए ग्राह्य नहीं था। यही कारण था कि छायावादी काव्य धारा के समानांतर और उतनी ही शक्तिशाली राष्ट्रीय चेतना की काव्यधारा भी प्रबल वेग से प्रवाहमान हो पड़ी जिसके बीज भारतेंदु बाबू ने बोए थे और मैथिलिशरण गुप्त ने जिसे सींच कर प्रस्फुटित किया था। इस धारा के कवियों ने राष्ट्रीय और सांस्कृतिक संघर्ष को स्पष्ट और उग्र स्वर में व्यक्त किया।

    राष्ट्रवादी कवियों ने छायावाद के रेशमी आवरण को भेदकर अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रवादी कवि मैथिलिशरण गुप्त और पश्चवर्ती राष्ट्रवादी कवि रामधारीसिंह दिनकर के साथ अपना स्वर मिलाए रखा। इन कवियों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, जन-जागरण तथा अभियान गीतों से राष्ट्र की आत्मा को नवीन चेतना प्रदान की। स्वयं मैथिलिशरण गुप्त इस पूरे काल में सक्रिय रहे।

    अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है- ‘मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी या सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय नवजागरण के उत्प्रेरक ऐसे कवियों के नाम हैं, जिन्होंने अपने संकल्प और चिन्तन, त्याग और बलिदान के सहारे राष्ट्रीयता की अलख जगाकर, अपने पूरे युग को आन्दोलित किया था, गाँधीजी के पीछे देश की तरूणाई को खड़ा कर दिया था। सोहनलालजी उस शृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी थे।’

    ई.1918 से 1936 के छायावादी युग में राष्ट्रवादी कविता का जोर पकड़ जाना, भारतीय साहित्याकाश की एक स्वाभाविक घटना थी। असहयोग आंदोलन, साइमन कमीशन, लाला लाजपत राय का बलिदान, भगतसिंह, सुखदेव एवं राजगुरु का आत्मोत्सर्ग, सविनय अवज्ञा आंदोलन, लंदन में आयोजित तीन गोलमेज सम्मेलन एवं भारत सरकार अधिनियम 1935 जैसी बड़ी घटनाओं में भारतीय तत्व तभी समाविष्ट हो सकता था जब भारत के कवि, जनसामान्य को उनकी निर्धन झौंपड़ियों से खींचकर सड़कों पर ले आएं और जिनकी सामूहिक शक्ति से अंग्रेज शक्ति का दुर्भेद्य-दुर्ग भरभरा कर गिर जाए। सौभाग्य से भारत के राष्ट्रवादी कवि इस कार्य में सफल रहे।

    राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के इस कठिन काल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय काव्यधारा के बड़े कवि के रूप में सामने आते हैं। उनकी हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता, युगचरण, समर्पण आदि काव्यकृतियां राष्ट्रीय भावछाया से आप्लावित हैं। चतुर्वेदीजी ने भारत को पूर्ण स्वतन्त्र कर जनतन्त्रात्मक पद्धति की स्थापना का आह्वान किया। उनकी कविता ‘कैदी और कोकिला’ में जेल की हथकड़ी, आभूषण बनकर भारत की जनता को संघर्ष करने की प्रेरणा देती है-

    ‘क्या? देख न सकती जंजीरो का गहना

    हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना’ ‘


    पुष्प की अभिलाषा’ में वे पुष्प के माध्यम से देश को आत्मोत्सर्ग का मार्ग सुझाते हुए कहते हैं-

    मुझे तोड़ लेना वनमाली!

    उस पथ पर देना तुम फेंक,

    मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,

    जिस पर जावें वीर अनेक।


    रामनरेश त्रिपाठी ने ई.1920 में हिन्दी के प्रथम राष्ट्रीय खण्डकाव्य ‘पथिक’ की रचना की। ‘वह देश कौन सा है!’ कविता में वे मैथिलीशरण गुप्त की बात को आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं-

    सब से प्रथम जगत में, जो सभ्य था यशस्वी।

    जगदीश का दुलारा, वह देश कौन-सा है?

    पृथ्वी-निवासियों को, जिसने प्रथम जगाया।

    शिक्षित किया सुधारा, वह देश कौन-सा है?

    जिसमें हुए अलौकिक, तत्वज्ञ ब्रह्मज्ञानी।

    गौतम, कपिल, पतंजलि, वह देश कौन-सा है?

    छोड़ा स्वराज तृणवत आदेश से पिता के।

    वह राम थे जहाँ पर, वह देश कौन-सा है?


    रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित कौमुदी, मानसी, स्वप्न आदि काव्य संग्रहों में देश के उद्धार के लिए आत्मोत्सर्ग की भावना उत्पन्न करने वाली कविताएं हैं। रामनरेश त्रिपाठी ने रामचरित मानस में राष्ट्र जागरण के प्रबल तत्वों के दर्शन किए। वे इस ग्रंथ को घर-घर पहुंचाना चाहते थे। कवि के प्रखर राष्ट्रप्रेम और रामचरित मानस में अगाध श्रद्धा को देखते हुए बेढब बनारसी ने उनके बारे में कहा था-

    तुम तोप और मैं लाठी

    तुम रामचरित मानस निर्मल, मैं रामनरेश त्रिपाठी।


    राष्ट्रीय काव्यधारा को पुष्ट करने वाली कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान भी इसी कालखण्ड में सामने आती हैं। उनकी ‘त्रिधारा’, ‘मुकुल’ की ‘राखी’ ‘झासी की रानी’ ‘वीरों का कैसा हो बसंत’ आदि कविताओं में राष्ट्रीयता के तीक्ष्ण भावों की भावना मुखरित हुई। उन्होंने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने जलियाँवाला बाग के नरसंहार के लगभग 11 वर्ष बाद ‘जलियाँवाला बाग में बसंत’ नामक कविता लिखकर माखनलाल चतुर्वेदी के संदेश को आगे बढ़ाया-

    यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,

    काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

    कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,

    कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

    .... तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,

    शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।

    यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,

    यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

    कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,

    वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।


    सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता ‘झाँसी की रानी’ के माध्यम से देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया-

    महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,

    यह स्वतंत्रता की चिन्गारी अंतरतम से आई थी।

    झांसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,

    मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी

    ........ जाओ रानी याद करेंगें ये कृतज्ञ भारतवासी।

    तेरा ये बलिदान जगाएगा स्वतंत्रता अविनाशी।


    भारत सरकार अधिनियम 1935 के बाद देश का स्वतंत्रता आंदोलन एक नए दौर में प्रवेश कर जाता है। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ इसी दौर में सामने आते हैं। उनकी कविताओं में भक्ति-भावना, राष्ट्र-प्रेम तथा विद्रोह का स्वर प्रमुखता से आया है। ई.1936 में उनका पहला काव्य संग्रह ‘कुंकुम’ प्रकाशित हुआ। इसमें राष्ट्रीयता के प्रखर स्वर सुनाई देते हैं-

    यहाँ बनी हथकड़ियाँ राखी, साखी है संसार

    यहाँ कई बहनों के भैया, बैठे हैं मनमार।’


    बालकृष्ण शर्मा स्वयं 10 बार जेल गए। उन्होंने विप्लव गान की रचना करके राष्ट्रीयता के स्वरों को नवीन ऊंचाइयां प्रदान कीं। उन्होंने राष्ट्र का सीधे और स्पष्ट स्वरों में आह्वान किया-

    कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये

    एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर को जाये नाश !

    नाश! हाँ महानाश!!! की प्रलयंकारी आंख खुल जाये।


    ई.1939 से 1945 तक द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ। इंगलैण्ड चाहता था कि भारतीय सैनिक इस युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से लड़ें किंतु भारतीय जनमानस, इस युद्ध में सम्मिलित होने के प्रतिफल के रूप में अपने देश के लिए आजादी चाहते थे। भारत छोड़ो आंदोलन, क्रिप्स मिशन और कैबिनेट मिशन इस काल की प्रमुख राजनीतिक घटनाएं हैं। अतः इस काल की राष्ट्रीय कविता इस घटनाक्रम को अपनी आंखों से देख रही थी।

    इस काल में रामधारीसिंह ‘दिनकर’ एवं सोहनलाल द्विवेदी जैसे दो बड़े राष्ट्रीय विचारधारा के कवि हिन्दी काव्य जगत में प्रकट होते हैं। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के काव्य ने भारतीय जन-मानस को नवीन चेतना से सराबोर किया। उन्होंने ई.1928 में ‘बारदोली विजय संदेश’ नामक रचना के साथ हिन्दी काव्य जगत में प्रवेश किया। वे सरकारी सेवा में थे। इसलिए जब ई.1935 में ‘रेणुका’ और 1938 में ‘हुंकार’ का प्रकाशन हुआ तो अंग्रेज सरकार उनके प्रति सतर्क हो गई। चार वर्ष में 22 बार उनका तबादला किया गया।

    रामधारी सिंह ‘दिनकर’ राष्ट्रधारा के कवियों में सर्वाधिक सबल व्यक्तित्व लेकर उभरे। वे छायावादोत्तर युग के सबसे बड़े राष्ट्रवादी कवि के रूप में जाने गए। उनके तीखे स्वरों को छायावाद आत्मसात नहीं कर सका। हुँकार, रेणुका, विपथगा में कवि ने साम्राज्यवादी ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध क्रान्ति के स्वरों का आह्वाहन किया। उनकी कविताओं में पराधीनता के विरुद्ध प्रबल विद्रोह अपनी भीषणता और भंयकरता के साथ गर्जना करता हुआ दिखाई देता है। कुरूक्षेत्र पूर्णरूपेण राष्ट्रीय महाकाव्य है जिसमें हुंकार भरते हुए वे कहते हैं-

    ‘उठो- उठो कुरीतियों की राह तुम रोक दो

    बढ़ो-बढ़ो कि आग में गुलामियों को झोंक दो।‘


    वे भारत के युवाओं को राष्ट्रीय स्वातंत्र्य के लिए प्रथम आहुति के रूप में स्वयं को समर्पित करने का संदेश देते हुए कहते हैं-

    जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त, सीमापति! तूने की पुकार

    पददलित उसे करना पीछे, पहले ले मेरा सीस उतार।


    सोहनलाल द्विवेदी ने भारत की आजादी के गीतों का मुक्तकण्ठ से गायन किया। भैरवी, चेतना, सेवाग्राम आदि काव्य-संग्रहों में उन्होंने महान् राष्ट्रनायकों का गुणगान किया। ई.1941 में उनकी प्रथम रचना भैरवी प्रकाशित हुई जो देश प्रेम से परिपूर्ण थी-

    वन्दना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला दो ।

    वंदिनी माँ को न भूलो, राग में जब मत झूलो ।

    अर्चना के रत्न कणों में, एक कण मेरा मिला लो।।


    राणा प्रताप के प्रति, आजादी के फूलों पर जय-जय, तैयार रहो, बढ़े चलो बढ़े चलो, विप्लव गीत, पूजा गीत, मातृपूजा, युग की पुकार, देश के जागरण गान, वासवदत्ता, कुणाल, तथा युगधारा आदि रचनाओं में स्वातन्त्र्य साधना के उच्च स्वर सुनाई देते हैं-

    कब तक क्रूर प्रहार सहोगे ?

    कब तक अत्याचार सहोगे ?

    कब तक हाहाकार सहोगे ?

    उठो राष्ट्र के हे अभिमानी

    सावधान मेरे सेनानी।’


    ‘प्रभात-फेरी’ में वे भारत के जन-मन का संकल्प व्यक्त करते हुए कहते हैं-

    ‘संतान शूरवीरों की हैं, हम दास नहीं कहलायेंगे ।

    या तो स्वतंत्र हो जायेंगे, या तो हम मर मिट जायेंगे ।

    हम अगर शहीद कहायेंगे, हम बलिवेदी पर जायेंगे,

    जननी की जय-जय गायेंगे।।


    सरदार पटेल की वंदना करते हुए वे कहते हैं-

    ‘लौह पुरूष सरदार! करूँ वन्दन तेरा किन शब्दों में ।

    राष्ट्र-पुरुष तुमसे मिलते हैं किसी राष्ट्र के अब्दों में ।।

    तेरा गर्जन एक, कि निर्बल में नवीन बल आता है ।

    तेरा वर्जन एक, कि बैरी बढ़ पीछे मुड़ जाता है।


    श्यामनारायण पाण्डेय राष्ट्रीय चेतना के लिए महाराणा प्रताप, महारानी पद्मिनी और रामभक्त हनुमान का वीर चरित देश के समक्ष अद्भुत ओजस्वी स्वरों में ढालकर लाए। उनके लिखे ‘हल्दीघाटी’, ‘जौहर’ एवं जय हनुमान आदि काव्यों में हिन्दू राष्ट्रीयता का जयघोष हुआ है।

    कविवर ‘शंकर’ ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य लिखे। उन्होंने बलिदान गान में ‘प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा’ के द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्रान्ति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी। निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी’, ‘भारती जय विजय करे’, ‘जागो फिर एक बार’, ‘शिवाजी का पत्र’, प्रसाद की ‘अरूण यह मधुमय देश हमारा’ चन्द्रगुप्त नाटक में आया गीत ‘हिमाद्रि तुंगशृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ आदि रचनाओं में राष्ट्रीयता की प्रखर अभिव्यक्ति हुई।

    स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित राष्ट्रीय विचार धारा के हिन्दी कवियों की सुदीर्घ शृंखला में राधाचरण गोस्वामी, श्रीधर पाठक, माधव प्रसाद शुक्ल, नाथूराम शर्मा शंकर, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), सियाराम शरण गुप्त, जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द, अज्ञेय इत्यादि कवियों के योगदान अविस्मरणीय हैं जिन्होंने भारतीयों की सरल हृदय-भित्ती पर राष्ट्रीयता के ओजपूर्ण स्वरों का अंकन किया। कवि अज्ञेय भी पढ़ाई बीच में छोड़कर कई बार जेल गये।

    जोधपुर के एक अल्पज्ञात कवि देवदत्त व्यास ‘करुण’ का उल्लेख करना चाहूंगा। वे अखण्ड भारत के हैरदाबाद सिंध में मात्र 27 वर्ष की आयु में 8 फरवरी 1947 को मृत्यु को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु के लगभग 60 वर्ष बाद उनके दो काव्य संग्रह ‘बीते दिन मत यादा दिलाओ’ तथा ‘अंतस की पीड़ा कौन सुने’ प्रकाश में आए। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता के उद्दाम स्वर सुनाई पड़ते हैं। ‘शहीद के चरणों पर’ कविता में वे लिखते हैं-

    खौल उठे जुल्मों को ढाने, प्यारे तन में खून हमारे।

    अपनी भारत माँ के बंधन, खोल सकें, साहस से सारे।


    ‘विप्लव गान’ में वे लिखते हैं-

    जागें प्रताप से नृप महान

    हों वीर दुर्ग से कीर्तिमान

    स्वाधीन स्नेह हो स्वाभिमान

    निज देशहित पर न्यौछावर

    निर्भयता का वर दो शंकर।


    इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दी कवियों ने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के समय देश में मची उथल-पुथल को अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया। वे स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए एक ओर तो राष्ट्रीय भावों को काव्य के विषय के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना को उसके चरम पर पहुंचा रहे थे। स्पष्ट है कि वे न केवल तत्कालीन घटनाओं के प्रति सजग थे अपितु भारत के गौरवमयी इतिहास के साथ भी कदम मिलाकर चल रहे थे।

    स्वातंत्र्य-लक्ष्य की प्राप्ति के पश्चात् भी राष्ट्रवादी कविता का धारा कुण्ठित नहीं हो गई। वह उसके बाद भी राष्ट्रीय जागरण की अलख जगाती रही। राष्ट्रकवि पं. सोहनलाल द्विवेदी ने भारतीय युवाओं को स्वातंत्र्य-ध्वज सुरक्षित रखने का आह्वान करते हुए लिखा-

    शुभारंभ जो किया देश में, नव चेतनता आई है ।

    मुरदा प्राणों में फिर से, छायी नवीन तरुणाई है ।

    स्वतंत्रता की ध्वजा न झुके, यही ध्रुव ध्यान करो ।

    बढ़ो, देश के युवक-युवतियों, आज पुण्य प्रस्थान करो ।।


    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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