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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-7

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-7

    पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध(1)



    पुरानी कहावत है कि मनुष्य अपने पर्यावरण की उपज है। इसी कारण पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध अटूट होना एक सहज स्वाभाविक बात है। पर्यावरण और संस्कृति एक दूसरे से असंपृक्त, विरक्त अथवा शत्रुवत् होकर नहीं रह सकतीं। इनमें मित्रता का भाव होना आवश्यक है। पर्यावरण एवं संस्कृति के अटूट सम्बन्ध को समझने के लिये, इनका निर्माण करने वाले मूल तत्त्वों को समझना आवश्यक है।


    पर्यावरण का निर्माण करने वाले मूल तत्व

    प्राकृतिक शक्तियाँ

    पृथ्वी के धरातल पर तथा धरातल के चारों ओर जो भी दृश्य एवं अदृश्य शक्ति अथवा वस्तु उपस्थित है, उस सबसे मिलकर धरती के पर्यावरण का निर्माण होता है। प्राकृतिक शक्तियाँ- आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि हमारे पर्यावरण की प्राथमिक निर्माता हैं, यहाँ तक कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी और दूसरे ग्रहों एवं उपग्रहों द्वारा धरती के प्रति लगाये जाने वाले आकर्षण एवं विकर्षण बल भी। ये प्राकृतिक शक्तियाँ एक दूसरे को गति, स्वरूप एवं संतुलन प्रदान करती हैं जिनके कारण वायु मण्डल, भू-मण्डल तथा जल मण्डल बनते हैं।

    इन्हीं प्राकृतिक शक्तियों के समन्वय से सर्दी, गर्मी, वर्षा, वायु संचरण, वायु में आर्द्रता एवं ताप का संचरण, आंधी, चक्रवात, मानसून तथा बिजली चमकने जैसी प्राकृतिक घटनाएं जन्म लेती हैं। ये प्राकृतिक शक्तियाँ ही परस्पर सहयोग एवं समन्वय स्थापित करके वनस्पति जगत एवं जीव जगत का निर्माण करती हैं।

    वनस्पति जगत

    धरती पर पाया जाने वाला वनस्पति जगत- यथा पेड़-पौधे, घासें, वल्लरियां, फंगस, कवक; नदियों, तालाबों एवं समुद्रों में मिलने वाली काई, घासें एवं विविध प्रकार की जलीय वनस्पतियां; पहाड़ों एवं मरुस्थलों में मिलने वाली वनस्पतियां, हमारे पर्यावरण की द्वितीयक निर्माता हैं जो सम्पूर्ण जीव जगत का पोषण करती हैं। उसे ऑक्सीजन, भोजन, लकड़ी, ईंधन आदि प्रदान करती हैं यहाँ तक कि जलीय चक्र का निर्माण करके जीव जगत के लिये जल की उपलब्धता सुनिश्चित करती हैं। भूमि को ऊर्वरा शक्ति प्रदान करती हैं तथा धरातल पर बहने वाले जल को अनुशासन में बांधती हैं। जीव जगत जीव जगत यथा- मत्स्य, उभयचर, कीट, सरीसृप, पक्षी, पशु एवं मनुष्य जो कि इस पर्यावरण का निर्माण करने वाले आवश्यक तत्व तो हैं ही, साथ ही ये पर्यावरण के उपभोक्ता भी हैं। जो कुछ भी प्राकृतिक शक्तियों द्वारा निर्मित किया जाता है तथा वनस्पति जगत द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, उस सबका उपभोक्ता जीव जगत ही है।

    जीव जगत

    में भी मनुष्य ऐसा प्राणी है जो जीव जगत द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले एवं उपलब्ध कराये जाने वाले संसाधनों को अंतिम उपभोक्ता की तरह प्रयुक्त करता है। यही कारण है कि मनुष्य इस प्रकृति का पुत्र होते हुए भी, प्रकृति में उपलब्ध हर वस्तु का स्वामी है।


    संस्कृति का निर्माण करने वाले मूल तत्व

    संस्कृति शब्द का निर्माण मूलतः 'कृ' धातु से हुआ है जिसका अर्थ है करना। इसके पूर्व सम् उपसर्ग तथा घात (ति) प्रत्यय लगने से लगने से संस्कार शब्द बनता है जिसका अर्थ- पूरा करना, सुधारना, सज्जित करना, मांज कर चमकाना, शृंगार, सजावट आदि हैं। इसी विशेषण की संज्ञा 'संस्कृति' है। वाजनसनेयी संहिता में 'तैयार करना' या 'पूर्णता' के अर्थ में यह शब्द आया है तथा ऐतरेय ब्राह्मण में 'बनावट' या 'संरचना' के अर्थ में इसका प्रयोग हुआ है। महाभारत में कृष्ण के एक नाम के रूप में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार संस्कृति शब्द का अर्थ साफ या परिष्कृत करना है। वर्तमान में संस्कृति शब्द अंग्रेजी के कल्चर (CULTURE) शब्द का पर्याय माना जाता है। संस्कृति शब्द का व्यापक अर्थ समस्त सीखे हुए व्यवहारों अथवा उस व्यवहार का नाम है जो सामाजिक परम्परा से प्राप्त होता है। इस अर्थ में संस्कृति को सामाजिक प्रथा का पर्याय भी कहा जाता है। संकीर्ण अर्थ में संस्कृति का आशय 'सभ्य' और 'सुसंस्कृत' होने से है। रामधारीसिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में लिखा है- 'संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं।'

    निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की जीवन शैली, उस क्षेत्र की संस्कृति का निर्माण करती है। उस क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की आदतें, विचार, स्वभाव, कार्य-कलाप, रीति रिवाज, परम्पराएं, खान-पान, वस्त्र-विन्यास, तीज-त्यौहार, खेल-कूद, नृत्य-संगीत, चाक्षुष कलाएं, जन्म-मरण के संस्कार एवं विधान आदि विभिन्न तत्व उस क्षेत्र की संस्कृति को आकार देते हैं।

    संस्कृति का मनुष्य जाति पर प्रभाव

    संस्कृति की शास्त्रीय व्याख्या के अनुसार मनुष्य आज जो कुछ भी है, वह संस्कृति की देन है। यदि मनुष्य से उसकी संस्कृति छीन ली जाये तो मनुष्य श्री-हीन हो जायेगा। विद्वानों का मानना है कि आज मनुष्य इसलिये मनुष्य है क्योंकि उसके पास संस्कृति है। भारतीय दर्शन के अनुसार संस्कृति मनुष्य की आत्मोन्नति का मापदण्ड भी है और आत्माभिव्यक्ति का साधन भी। संस्कृति चेतन धर्म है। संस्कृति को केवल बाह्य रूप या क्रिया ही नहीं मान लेना चाहिये। उसका आधार जीवन के मूल्यों में है और पदार्थों के साथ स्व को जोड़ने की सूक्ष्म कला में है। श्यामचरण दुबे ने लिखा है, संस्कृति के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन की पूर्ण पृष्ठभूमि में अपना स्थान पाता है और संस्कृति के द्वारा उसे जीवन में रचनात्मक संतोष के साधन उपलब्ध होते हैं।


    पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध

    पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। अर्थात् दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बदलने से दूसरा स्वतः बदल जाता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि सृष्टि के आरम्भ में पर्यावरण सभ्यता को जन्म देता है। दूसरे चरण में सभ्यता, संस्कृति को जन्म देती है तथा तीसरे चरण में संस्कृति पर्यावरण को संवारती या विनष्ट करती है।

    पर्यावरण का संस्कृति पर प्रभाव

    किसी क्षेत्र के पर्यावरण का उस क्षेत्र की संस्कृति पर गहरा प्रभाव होता है। उदाहरण के लिये अत्यधिक ठण्डे एवं अत्यधिक गर्म प्रदेशों के लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा प्रवेश न हो जबकि समशीतोष्ण जलवायु युक्त क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा और निर्बाध प्रवेश हो। ठण्डे प्रदेशों में निवास करने वाले लोग अपने खान-पान में मांस एवं मदिरा को अधिक मात्रा में सम्मिलित करना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के निवासी अपने खान-पान में वनस्पति, दूध-दही एवं छाछ को अधिक सम्मिलित करेंगे। ठण्डे प्रदेश के लोग ऊनी, मोटे और चुस्त कपड़े पहना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग सूती, पतले तथा ढीले कपड़े पहनेंगे। गर्म प्रदेश के लोग चर्च में जूते पहनकर जाना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग अपने जूते मंदिरों एवं मस्जिदों से बाहर उतारना पसंद करेंगे। बाह्य पर्यावरण के कारण अपनाई गई खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों का मनुष्य की कार्य क्षमता एवं उसकी बौद्धिक क्षमता पर गहरा असर होता है। जिन लोगों के भोजन में मदिरा का समावेश होगा तथा जो चुस्त कपड़े पहनेंगे, वे अधिक समय तक काम करेंगे किंतु वे स्वभाव से उग्र होंगे तथा भौतिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे। जबकि जिन लोगों के भोजन में दही एवं छाछ का समावेश होगा तथा कपड़े ढीले होंगे, उनका शरीर तुलनात्मक दृष्टि से कम समय तक काम कर सकेगा किंतु उनकी प्रवृत्ति शांत होगी तथा वे आध्यात्मिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे।

    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मानव और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की प्रतिक्रिया केवल भौतिक ही नहीं होती, अपितु बौद्धिक भी होती है।

    संस्कृति का पर्यावरण पर प्रभाव

    जिस प्रकार पर्यावरण का संस्कृति पर प्रभाव होता है, उसी प्रकार संस्कृति का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव होता है। किसी भी भू-भाग में रहने वाले मानव समुदाय की आदतें, स्वभाव, प्रवृत्तियाँ, रीति-रिवाज, परम्पराएं, धार्मिक विश्वास, तीज-त्यौहार, पर्व, अनुष्ठान आदि विभिन्न तत्व, संस्कृति के ऐसे अंग हैं जो धरती के पर्यावरण को गहराई तक प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिये राजस्थान के सामंती परिवेश में शेरों, शूकरों एवं हरिणों का शिकार एक परम्परा के रूप में प्रचलित रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि जंगल असुरक्षित हो गये और भारी मात्रा में मनुष्यों द्वारा सहज रूप से काट कर नष्ट कर दिये गये। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पनपी उपभोक्तावादी संस्कृति, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी का प्रसार तथा वनों के प्रति आदर के अभाव ने जंगलों को तेजी से गायब किया। आज जहाँ भारत में जहाँ 23.28 प्रतिशत जंगल हैं, वहीं राजस्थान में केवल 9.54 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल बचे हैं।

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