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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-6

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-6

    ऐतिहासिक काल में राजस्थान की सभ्यता एवं संस्कृति(2)



    राजपूत काल

    हर्षवर्द्धन की मृत्यु के पश्चात् राजस्थान के राजनीतिक मंच पर राजपूतों का उदय हुआ। माना जाता है कि देश में अव्यवस्था फैल जाने के बाद आबू में एक यज्ञ का आयोजन किया गया तथा इसके बाद प्रतिहार, चौलुक्य, चाहमान तथा परमार नामक चार वीरों को राष्ट्र की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई। इन वीरों के नाम पर राजपूतों के चार कुल चले। भारतीय इतिहासकारों के अनुसार चौहान, प्रतिहार, परमार, गुहिल आदि राजपूत वंश ब्राह्मणों में से निकले थे। यूरोपीय इतिहासकारों की मान्यता है कि प्राचीन भारतीय क्षत्रियों में विदेशी क्षत्रियों के रक्त के मिश्रण से राजपूतों की उत्पत्ति हुई। समय के साथ राजपूत कुलों की संख्या का विस्तार होता चला गया। गुहिल, कच्छवाहा, राठौड़, भाटी, चावड़ा आदि राजपूत कुल भी राजपूताना के विभिन्न भागों पर शासन करने लगे। कान्हड़ दे प्रबंध में राजपूतों के छत्तीस कुलों का उल्लेख किया गया है। इन राजपूत कुलों में जहाँ परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध थे वहीं अपने-अपने राज्यों का विस्तार करने के लिये खूनी संघर्ष की एक अनवरत श्रृंखला विद्यमान थी। सैंकड़ों वर्ष तक चले इन खूनी संघर्षों के कारण राजपूतों की शक्ति लगातार क्षीण होती चली गई तथा उनमें बाह्य आक्रांताओं का सामना करने की क्षमता नहीं रही।

    ऋग्वैदिक काल के समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र नामक चार वर्ण विद्यमान थे। उत्तर ऋग्वैदिक काल में अंत्यज वर्ग भी अस्तित्व में आ चुका था किंतु राजपूत काल में समाज में अंत्यजों से भी नीची जातियों का एक वर्ग उत्पन्न हो गया जिन्हें म्लेच्छ कहा जाता था। इन लोगों का पेशा मनुष्यों की हत्या करना, चोरी एवं डकैती करना आदि था। इनमें कबर, भील, मीणा, मेड़ आदि जातियाँ थीं। बाद के काल में मुसलमानों एवं ईसाइयों के लिये म्लेच्छ शब्द का प्रयोग होने लगा जिसका अर्थ था वे लोग जो हिन्दू धर्म से इतर अर्थात् विधर्मी हैं। इन जातियों के अतिरिक्त कुछ जातियाँ ऐसी थीं जिन्हें किसी भी वर्ण में नहीं गिना जाता था। इनमें कायस्थ, जाट एवं गूजर प्रमुख थे। मध्य काल में जातियों की संख्या तेजी से बढ़ी। जातियों में गोत्र निकले, गोत्र में खांपें बनीं और इन्हीं खांपों ने आगे चलकर नई जातियों का निर्माण किया।

    वैदिक काल में यद्यपि पुत्री की अपेक्षा पुत्र जन्म को श्रेष्ठ माना जाता था तथापि समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत सम्मानजनक थी। वे सभा-समितियों, सामाजिक समारोहों, धार्मिक उत्सवों, वैवाहिक कार्यक्रमों, यज्ञ आदि महत्त्वपूर्ण कार्यों में पुरुषों के समान ही भाग लेती थीं। इस युग में जातियों का निर्माण नहीं हुआ था तथा अलग अलग कर्म करने वाले परिवारों की संतानों के मध्य विवाह होते थे। एक प्रकार से ये विवाह अंतरजातीय विवाह की श्रेणी में आते थे। इस काल में बाल विवाह प्रचलित थे किंतु विधवा विवाह को अच्छा नहीं माना जाता था।

    ऋग्वैदिक काल में एक पत्नी प्रथा प्रचलित थी किंतु प्रभावशाली लोगों की बहुपत्नियां भी होती थीं। राजपूत काल में बहुपत्नी प्रथा अपने चरम पर थी। ऋग्वैदिक काल में पति की मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी को शव के साथ कुछ क्षणों के लिये लेटना हेाता था उसके बाद पुरोहित मंत्र पढ़कर स्त्री को आज्ञा देता था कि नारी उठो और जीवलोक में पुनः लौट आओ किंतु बाद में यह प्रथा सती प्रथा में बदल गयी। राजपूत काल में विधवा स्त्री के लिये सती होना ही श्रेयस्कर समझा जाता था। ऋग्वैदिक काल में नियोग प्रथा भी प्रचलित थी जिसमें विधवा स्त्री पुत्र की प्राप्ति के लिये अपने देवर अथवा पति के कुटुम्ब के अन्य सदस्य के साथ पत्नी रूप में रह सकती थी। राजपूत काल में इस तरह की प्रथा समाप्त हो चुकी थी। उच्च कुलों में विधवा विवाह पूरी तरह प्रतिबंधित था किंतु निम्न समझी जानी वाली जातियों में नाता प्रथा का प्रचलन था जिसमें कोई विधवा अपने पति के भाई के साथ पत्नी के रूप में रह सकती थी। ऋग्वैदिक काल में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें एक स्त्री एक साथ कई पुरुषों की पत्नी हो सकती थी इसे सहपतिक विवाह प्रणाली कहते थे। महाभारत काल में द्रौपदी का उदाहरण इसी तरह का है। राजपूत काल में यह प्रथा पूरी तरह समाप्त हो गयी थी। एक स्त्री का विवाह एक पुरुष के साथ ही हो सकता था।

    राजपूत काल में स्त्री का वह सामाजिक सम्मान नहीं रह गया था जो वैदिक काल में था। अब स्त्री पूर्णतः पुरुष की अनुगामिनी हो कर रह गयी थी। उसे विधवा विवाह, नियोग अथवा सहपतिक विवाह के अधिकार नहीं रह गये थे। पर्दा प्रथा प्रारंभ हो गयी थी। एक से अधिक पत्नियों का होना गौरव की बात समझी जाती थी। इस समय तक भी स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। सगोत्र विवाह का प्रचलन नहीं था और अनुलोम विवाह ठीक नहीं समझे जाते थे किंतु उनका प्रचलन भी समाज में था। इस काल में उच्च कुल की स्त्रियों के लिये सती होना आवश्यक सा हो गया था। विधवाओं को परिवार की सम्पत्ति पर पूरा अधिकार नहीं था। वे केवल अपने आभूषण और स्त्रीधन की ही अधिकारिणी समझी जाती थीं।

    राजपूत काल में वैश्य वर्ण काफी सम्पन्न एवं प्रभावशाली हो गया। अनेक राजा एवं राजपुत्र श्रेष्ठि कन्याओं से विवाह करते थे। इस कारण वैश्य समुदाय का राज्यकार्यों में भी हस्तक्षेप रहता था। राजकीय कोठारों, भण्डारों एवं कोषागारों को संभालने का कार्य भी वैश्य समुदाय ही करता था। राजपूत काल में अग्रवाल, माहेश्वरी, जैसवाल, खण्डेलवाल और ओसवाल प्रभावशाली वैश्य थे। इन सभी वैश्य समुदायों का उद्भव क्षत्रियों से ही माना जाता है।

    इस काल में राजस्थान के सामाजिक जीवन में नर बलि प्रथा, समाधि प्रथा, सती प्रथा, कन्या वध, बहु विवाह प्रथा, त्याग प्रथा, दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा, चेला प्रथा, दास प्रथा, मानव व्यापार प्रथा आदि कुप्रथाएं व्याप्त हो गईं। इन कुप्रथाओं के चलते, आम आदमी का जीवन दूभर हो गया।

    मुस्लिम शासन

    राजस्थान के राजपूत कुलों ने मुहम्मद गौरी के आगमन तक राजस्थान के विभिन्न भागों में स्वतंत्र रहकर राज्य किया। मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि कुतुबुद्दीन एबक ने 1206 ई. में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की। इसके बाद राजस्थान का बहुत सा भू-भाग दिल्ली सल्तन के अधीन चला गया। फिर भी राजस्थान के राजपूत राज्य कभी पूरी तरह स्वतंत्र रहकर तथा कभी अर्द्ध-स्वतंत्र रहकर अपना अस्तित्त्व बनाये रहे। इस काल में मुस्लिम संस्कृति के प्रभाव से राजस्थानी की संस्कृति में अनेक उल्लेखनीय परिवर्तन आये। लोगों में धार्मिक कट्टरता बढ़ी, सामाजिक भेदभाव अपने चरम पर पहुंच गया। लोगों ने जातिवाद को कसकर पकड़ लिया। लाखों लोग निर्धन एवं परिवारहीन हो जाने के कारण साधु, सन्यासी एवं जोगी हो गये। नये-नये सम्प्रदाय अस्त्वि में आने लगे तथा अनेक मत-मतांतर खड़े हो गये। धर्म भीरू जनता इन मत-मतांतरों के मकड़-जाल में फंस गई।

    16वीं शताब्दी में बाबर ने दिल्ली सल्तनत का ध्वंस करके मुगल सल्तनत की स्थापना की। मेवाड़ को छोड़कर राजस्थान के समस्त राजपूत राज्य मुगलों के अधीन हो गये। इस काल में अकबर द्वारा अपनाई गई साम्प्रदायिक सौहार्द की नीति ने राजपूत राज्यों में कला एवं संस्कृति के विकास को गति दी। इस काल में शिल्पकला, चित्रकला, एवं संगीत कला का अच्छा विकास हुआ। 18वीं शताब्दी में मुगलों का शासन पराभव को पहुँच गया तथा मराठों ने लगभग पूरे उत्तरी भारत को रौंद डाला। इन आक्रमणों से न केवल राज्य की आर्थिक स्थिति को गहरा नुक्सान पहुंचाया अपितु सांस्कृतिक स्तर पर राजस्थान को उससे भी अधिक नुक्सान हुआ।

    ब्रिटिश शासन

    उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम में, मराठों के अत्याचारों से बचने के लिये देशी राज्यों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से अधीनस्थ समझौते करके अपने अस्तित्त्व को बचाया। 1857 ई. में हुई सैनिक क्रांति की विफलता के बाद राजस्थान के समस्त देशी राज्य ब्रिटिश क्राउन के अधीन चले गये। इस दौरान राजस्थान की संस्कृति पर पाश्चात्य विचारों का तेजी से प्रभाव पड़ा। लोग शिक्षित होने लगे और अपनी उन्नति के बारे में सोचने लगे। इस कारण प्रजा का चिंतन सामूहिक हित के लिये न होकर व्यक्तिवादी होने लगा। अंग्रेज अधिकारियों ने सामाजिक जीवन में व्याप्त नर बलि प्रथा, समाधि प्रथा, सती प्रथा, कन्या वध, बहु विवाह प्रथा, त्याग प्रथा, दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा, चेला प्रथा, मानव व्यापार प्रथा आदि को रोकने के लिये कानून बनाये। इन कानूनों का राजस्थान के सांस्कृतिक परिवेश पर गहरा प्रभाव हुआ। 1947 ई. में स्वतंत्रता मिलने तक राजस्थान की राजनीतिक स्थिति इसी प्रकार बनी रही। आजादी के बाद देशी रजवाड़े, राजस्थान में विलीन हो गये और वर्तमान राजस्थान अपने स्वरूप में आया।

    वर्तमान राजस्थान

    आज जिस प्रदेश को हम राजस्थान कहते हैं उसमें देश का 10.41 प्रतिशत भू-भाग आता है जिसमें देश की 5.56 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। विगत एक सौ वर्षों में राजस्थान की जनसंख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। 1901 ई. में राजस्थान की जनंसख्या 1,02,94,090 थी जो 100 वर्ष की अवधि में अर्थात् 2001 की जनगणना में 5,64,73,122 हो गई। वर्ष 2011 की जनगणना में राजस्थान की जनसंख्या 6,85,48,437 पाई गई। राजस्थान में एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले 20 नगर हैं जिनमें जयपुर, जोधपुर, कोटा, बीकानेर, अजमेर, उदयपुर, भीलवाड़ा, अलवर, गंगानगर, भरतपुर, पाली, सीकर, टोंक, हनुमानगढ़, ब्यावर, किशनगढ़, गंगापुर सिटी, सवाईमाधोपुर, चूरू तथा झुंझुनूं सम्मिलित हैं।

    विशाल मरुस्थल एवं विशाल अरावली पर्वतमाला के प्रसार के कारण राजस्थान विरल जनसंख्या वाला प्रदेश है। भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है किंतु राजस्थान का जनसंख्या घनत्व केवल 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है। जयपुर जिला 595 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. घनत्व के साथ राज्य का सर्वाधिक घनत्व वाला जिला है जबकि जैसलमेर जिले का जनसंख्या घनत्व सबसे कम, 17 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है। 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में 1000 पुरुषों के पीछे स्त्रियों की संख्या केवल 928 है। प्रदेश की जनसंख्या में साक्षरों की संख्या प्रतिशत है। पुरुष साक्षरता 79.2 प्रतिशत तथा स्त्री साक्षरता 52.1 प्रतिशत है। राज्य में औसत आयु 64 वर्ष है। राज्य की जन्म दर 31.4 तथा मृत्यु दर 8.5 है।

    आज के राजस्थान की संस्कृति, विगत डेढ़ लाख वर्षों में सभ्यता के विभिन्न सोपानों में विकसित ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार, रहन-सहन, रीति-रिवाज एवं धर्म-दर्शन का अद्भुत समुच्चय है। इसमें बहुत कुछ अपना है तो बहुत कुछ बाहर से आगत भी है। भले ही राजस्थान की संस्कृति में बाहरी तत्व कितनी ही प्रबलता से मौजूद क्यों न हों किंतु यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस संस्कृति पर पर्यावरणीय चेतना का बहुत गहरा प्रभाव है।

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