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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-5

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-5

    ऐतिहासिक काल में राजस्थान की सभ्यता एवं संस्कृति(1)



    मौर्य कालीन सभ्यता

    मौर्यकाल (325 ई.पू. से 184 ई.पू.) से हमें तिथिक्रम युक्त इतिहास मिलना आरम्भ हो जाता है। इस काल के आते-आते राजस्थान में सभ्यता काफी विकास कर गई थी। मौर्यकाल में लगभग पूरा राजस्थान मौर्यों के अधीन था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गई। बैराठ (विराटनगर) से मौर्य कालीन सभ्यता के अवेशष प्राप्त हुए हैं। इसे बैराठ सभ्यता भी कहते हैं। जयपुर से 85 किलोमीटर दूर विराटनगर की भब्रू पहाड़ी से मौर्य सम्राट अशोक का एक शिलालेख मिला है।

    ई.1840 में यह शिलालेख एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कलकत्ता) को स्थानांतरित कर दिया गया। ई.1909 में बीजक की पहाड़ी में एक बौद्ध विहार (गोलमंदिर) के अवशेष प्राप्त हुए। इस विहार को सम्राट अशोक के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में निर्मित माना जाता है। इसमें पत्थरों के स्थान पर लकड़ी के स्तंभों तथा ईंटों का प्रयोग हुआ है। इस स्थान से अलंकारिक मृद्पात्र, पहिये पर त्रिरत्न तथा स्वस्तिक चिह्न प्राप्त हुए हैं। जयपुर नरेश सवाई रामसिंह के काल में यहाँ से एक स्वर्णमंजूषा प्राप्त हुई थी जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष थे। चीनी चात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में 8 बौद्ध विहार देखे थे जिनमें से एक का ही पता चल पाया है। अशोक ने जिस योजना के अनुसार शिलालेख लगवाये थे, उसके अनुसार इन 8 बौद्ध विहारों के पास 128 शिलालेख लगवाये होंगे किंतु अब तक 2 शिलालेख ही प्राप्त हुए हैं। मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात तथा कोंकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिम जनपद कहलाता था।

    विदेशी जातियों का शासन

    मौर्यों का पतन हो जाने के बाद राजस्थान छोटे-छोटे गणों में बंट गया। इस कारण भारत भूमि पर विदेशी जातियों के आक्रमण बढ़ गये। यूनानी राजा मिनेण्डर ने ई.पू. 150 में मध्यमिका नगरी पर अधिकार करके, अपने राज्य की स्थापना की। तब से भारत में विदेशी जातियों का शासन होना आरंभ हो गया। यूनानी राजाओं के सिक्के सांभर झील के पास स्थित मीठे पानी की झील नलियासर से प्राप्त हुए हैं। उनके कुछ सिक्के बैराठ तथा नगरी से भी प्राप्त हुए हैं। ई.पू. प्रथम शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान पर सीथियनों के आक्रमण आरंभ हुए। कुषाण, पह्लव तथा शकों को सम्मिलित रूप से सीथियन कहा जाता है। ईसा से लगभग 90 वर्ष पहले राजस्थान से यूनानी शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा सीथियनों ने अपने पांव जमा लिये। ये लोग ई.पू. 57 तक मथुरा पर शासन करते रहे। शक मूलतः एशिया में सिकंदरिया के रहने वाले थे। राजस्थान में नलियासर से शक शासक हुविष्क की मुद्रा प्राप्त हुई है। उसका शासनकाल ई.95 से ई.127 के बीच था। पश्चिमी भारत में शकों की दो शाखायें- क्षहरात एवं चष्टन, कुषाणों के अधीन रहकर शासन करती थीं। कनिष्क के शिलालेख के अनुसार ई.83 से ई.119 तक कुषाण राजस्थान के पूर्वी भाग पर शासन करते रहे। ई.150 के सुदर्शन झील अभिलेख से ज्ञात हुआ है कि कुषाणों का राज्य मरुप्रदेश से साबरमती के आस पास था।

    ई.130 से 150 के मध्य, शक शासक रुद्रदामन तथा यौधेयों के मध्य घनघोर संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में यौधेय पराजित हो गये। ई.150 के लगभग नागों की भारशिव शाखा ने अपनी शक्ति बढ़ानी आरंभ की तथा विदेशी शासकों को भारत से बाहर निकालने का काम आरंभ किया। इन नागों ने यौधेय, मालव, अर्जुनायन, वाकटाक, कुणिंद, मघ आदि जातियों की सहायता से पंजाब, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश को कुषाणों से मुक्त करवा लिया। नागों ने कुषाणों के विरुद्ध अपनी विजयों के उपलक्ष्य में वाराणसी में दस अश्वमेध यज्ञ किये। वह स्थान आज भी दशाश्वमेध घाट कहलाता है।

    देशी जनपदों के सिर उठाने से, ई.176 के लगभग कुषाणों की कमर टूटने लगी तथापि वे ई.295 तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे। ई.226 में मालवों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। कर्कोट नगर से प्राप्त मुद्राओं पर 'मालवानाम् जयः' अंकित है। इसके बाद चौथी शताब्दी तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल है। ये सब जातियाँ अथवा जनपद वस्तुतः महाभारत कालीन जातियों के उत्तरकालीन अवशेष थे। मालव जयपुर के आसपास के क्षेत्र में थे जो बाद में अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गये। समुद्रगुप्त के काल तक मालव अपनी गणतंत्रात्मक सत्ता बनाये रहे। मालवों ने अर्जुनायनों के साथ मिलकर कुषाणों को परास्त किया। अर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले थे। राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र के यौधेय (अब जोहिये) भी गणतंत्रात्मक अथवा अर्द्ध राजतंत्रात्मक व्यवस्था बनाकर रहते थे। यौधयों ने राजस्थान से कुषाण सत्ता को उखाड़ फैंका। इस युग में आभीर तथा मौखरी गणराज्य भी अपना अस्तित्त्व रखते थे।

    गुप्त कालीन सभ्यता

    भारतीय इतिहास में 320 ईस्वी से 495 ईस्वी तक का काल गुप्तकाल कहलाता है। समुद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत के गणराज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने बिना लड़े ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की। पश्चिमी राजस्थान के नाग शासक भी गुप्तों के अधीन सामंत हो गये। समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय ने इन गणराज्यों को नष्ट कर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। उसके आक्रमणों से शक क्षत्रपों का अस्तित्त्व हमेशा के लिये नष्ट हो गया। गुप्त कालीन भवनों एवं मंदिरों के अवशेष जोधपुर जिले में मण्डोर, नागौर जिले में दधिमति माता मंदिर तथा जालोर जिले के भीनमाल सहित अनेक स्थानों पर मिलते हैं।

    गुप्त काल में हूणों के आक्रमण आरंभ हुए। कई शताब्दियों तक गुप्त शासकों ने हूणों से देश की रक्षा की किंतु अंत में हूणों के कारण गुप्त साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। हूण राजा तोरमाण ने ई. 503 में गुप्तों से राजस्थान छीन लिया। छठी शताब्दी के आसपास हूणों ने समस्त गणतंत्रात्मक तथा अर्द्ध राजतंत्रात्मक राज्यों को छिन्न भिन्न करके, उस काल तक विकसित हुए सभ्यता के समस्त प्रमुख केंद्र नष्ट कर दिये। इनमें वैराट, रंगमहल, बड़ोपल और पीर सुल्तान की थड़ी आदि स्थान प्रमुख हैं। (ये नाम बाद के हैं, तब इन स्थानों के नाम कुछ और रहे होंगे।) मालवा के राजा यशोवर्मन (अथवा यशोधर्मन) ने 532 ई. में हूणों को परास्त कर राजस्थान में शांति स्थापित की किंतु उसके मरते ही राजस्थान में पुनः अशांति हो गयी।

    हर्षवर्धन एवं उसके बाद का काल

    सातवीं शताब्दी में पुष्यभूति वंश का राजा हर्षवर्धन प्रतापी सम्राट हुआ। हर्ष के बारे में हमें दो ग्रंथों- बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित तथा ह्वेनसांग द्वारा रचित सी-यू-की से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। सी-यू-की का कथन है कि शीलादित्य (हर्षवर्धन) ने पूर्व से लेकर पश्चिम तक के समस्त राजाओं को जीत लिया तथा वह दक्षिण की ओर आगे बढ़ा। राजतरंगिणी का कथन है कि कश्मीर कुछ समय तक हर्ष के अधीन रहा। चालुक्य अभिलेख उसे 'सकलोत्तरापथनाथ' कहते हैं। इनसे अनुमान होता है कि उसका राज्य नेपाल से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक फैल गया। थानेश्वर, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, सिंध तथा उत्तरप्रदेश भी उसके अधीन थे। हर्ष के काल में राजस्थान चार भागों में विभक्त था- 1. गुर्जर, 2. बघारी, 3. बैराठ तथा 4. मथुरा। बयालीस वर्ष तक शासन करने के बाद 648 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु हुई। उसके बाद राजस्थान में पुनः अव्यवस्था फैल गयी।

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