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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-4

     01.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-4

    राजस्थान में मानव सभ्यता का उदय एवं पुरा-संस्कृतियों का विकास(2)



    कालीबंगा

    हड़प्पा कालीन सभ्यता वाले 30-35 थेड़, जिनमें कालीबंगा का थेड़ सबसे ऊँचा है, की खुदाई साठ के दशक में की गयी। खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के कारण इस स्थान को कालीबंगा कहा जाता है। कालीबंगा के टीलों की खुदाई के दौरान दो भिन्न कालों की सभ्यता प्राप्त हुई है। पहला भाग 2400 ई.पू. से 2250 ई.पू. का है तथा दूसरा भाग 2200 ई.पू. से 1700 ई.पू. का है। यहाँ से एक दुर्ग, जुते हुए खेत, सड़कें, बस्ती, गोल कुओं, नालियों मकानों व धनी लोगों के आवासों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मकानों में चूल्हों के अवशेष मिले हैं।

    कालीबंगा के लोग मिट्टी की कच्ची या पक्की ईंटों का चबूतरा बनाकर मकान बनाते थे, बरतनों में खाना खाने की मिट्टी की थालियां, कूण्डे, नीचे से पतले व ऊपर से प्यालानुमा गिलास, लाल बरतनों पर कलापूर्ण काले रंग की चित्रकारी, मिट्टी की देवी की छोटी-छोटी प्रतिमायें, बैल, बैलगाड़ी, गोलियां, शंख की चूड़ियां, चकमक पत्थर की छुरियां, शतरंज की गोटी तथा एक गोल, नरम पत्थर की मुद्रा आदि मिले। बरतनों पर मछली, बत्तख, कछुआ तथा हरिण की आकृतियां बनी हैं। मुहरों पर सैंधव लिपि उत्कीर्ण है जिसे पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि दाहिने से बायें लिखी हुई है। यहाँ से मिट्टी, तांबे एवं कांच से बनी हुई सामग्री मिली है। छेद किये हुए किवाड़ एवं मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन केवल यहीं से मिले हैं।

    रंगमहल

    सूरतगढ़-हनुमानगढ़ क्षेत्र में रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी आदि स्थलों के निकट कई थेड़ मिले हैं जिनमें से कुछ की खुदाई की गयी है। इनमें रंगमहल का टीला सबसे ऊँचा है। इस खुदाई से ज्ञात हुआ कि प्रस्तर युग से लेकर छठी शताब्दी ई.पू. तक यह क्षेत्र पूर्णतः समृद्ध था। यही कारण है कि यहाँ से प्रस्तर युगीन एवं धातु युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। रंगमहल के टीलों पर पक्की ईंटें व रोड़े, मोटी परत व लाल रंग वाले बरतनों पर काले रंग के मांडने युक्त हड़प्पा कालीन सभ्यता के बरतनों के टुकड़े बिखरे हुए हैं। यहाँ से ताम्बे के दो कुषाण कालीन सिक्के तथा गुप्त कालीन खिलौने भी मिले हैं। तांबे के 105 अन्य सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

    आहड़ सभ्यता

    सरस्वती-दृश्द्वती नदी सभ्यता से निकलकर इस प्रदेश के मानव ने आहड़, गंभीरी, लूनी, डच तथा कांटली आदि नदियों के किनारे अपनी बस्तियां बसाईं तथा सभ्यता का विकास किया। इन सभ्यताओं का काल 7 हजार से 3 हजार वर्ष पुराना ठहराया गया है। यह सभ्यता उदयपुर जिले में आहड़ नदी के आस-पास, बनास, बेड़च, चित्तौड़गढ़ जिले में गंभीरी, वागन, भीलवाड़ा जिले में खारी तथा कोठारी आदि नदियों के किनारे अजमेर तक फैली थी। इस क्षेत्र में प्रस्तर युगीन मानव निवास करता था। प्राचीन शिलालेखों में आहड़ का पुराना नाम ताम्रवती अंकित है। दसवीं व ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर अथवा आघट दुर्ग कहा जाता था। बाद के काल में इसे धूलकोट कहते थे।

    उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर 1600 फुट लम्बे और 550 फुट चौड़े धूलकोट के नीचे आहड़ का पुराना कस्बा दबा हुआ है जहाँ से ताम्र युगीन सभ्यता प्राप्त हुई है। ये लोग लाल, भूरे व काले मिट्टी के बर्तन काम में लेते थे जिन्हें उलटी तपाई शैली में पकाया जाता था। मकान पक्की ईंटों के होते थे। पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था। आहड़ सभ्यता की खुदाई में मानव सभ्यता के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रथम स्तर में मिट्टी की दीवारें और मिट्टी के बर्तन मिले हैं। दूसरा स्तर प्रथम स्तर के ऊपर स्थित है। यहाँ से बस्ती के चारों ओर दीवार भी मिली है। तीसरे स्तर से चित्रित बर्तन मिले हैं। चतुर्थ स्तर से ताम्बे की दो कुल्हाड़ियां मिली हैं। मकानों से अनाज पीसने की चक्कियां, ताम्बे के औजार, पत्थरों के आभूषण, गोमेद तथा स्फटिक की मणियां प्राप्त हुई हैं। तांबे की छः मुद्रायें व तीन मोहरें मिली हैं। एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता अंकित है जो तीर एवं तरकश से युक्त है। इस पर यूनानी भाषा में लेख अंकित है। यह मुद्रा दूसरी शताब्दी ईस्वी की है। ये लोग मृतकों को कपड़ों तथा आभूषणों के साथ गाढ़ते थे।

    बागोर सभ्यता

    भीलवाड़ा कस्बे से 25 किलोमीटर दूर कोठारी नदी के किनारे वर्ष 1967-68 में डॉ. वीरेंद्रनाथ मिश्र के नेतृत्व में की गयी खुदाई में 3000 ई.पू. से लेकर 500 ई. पू. तक के काल की बागोर सभ्यता का पता लगा। यहाँ के निवासी कृषि, पशुपालन तथा आखेट करते थे। यहाँ से तांबे के पाँच उपकरण प्राप्त हुए हैं। मकान पत्थरों से बनाये गये हैं। बर्तनों में लोटे, थाली, कटोरे, बोतल आदि मिले हैं।

    बालाथल

    बालाथल उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील में स्थित है। यहाँ से 1993 में ई.पू. 3000 से लेकर ई.पू. 2500 तक की ताम्रपाषाण युगीन संस्कृति के बारे में पता चला है। यहाँ के लोग भी कृषि, पशुपालन एवं आखेट करते थे। ये लोग मिट्टी के बर्तन बनाने में निपुण थे तथा कपड़ा बुनना जानते थे। यहाँ से तांबे के सिक्के, मुद्रायें एवं आभूषण प्राप्त हुए हैं। आभूषणों में कर्णफूल, हार और लटकन मिले हैं। यहाँ से एक दुर्गनुमा भवन तथा ग्यारह कमरों वाले विशाल भवन भी प्राप्त हुए हैं।

    गणेश्वर सभ्यता

    सीकर जिले की नीम का थाना तहसील में कांटली नदी के तट पर गणेश्वर टीला की खुदाई 1977-78 में की गयी थी। यहाँ से प्राप्त सभ्यता लगभग 2800 वर्ष पुरानी है। ताम्र युगीन सभ्यताओं में यह अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन केंद्र है। यह सभ्यता सीकर से झुंझुनूं, जयपुर तथा भरतपुर तक फैली थी। यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे मिले हैं जिनसे पता चलता है कि उस समय कांटली नदी में पर्याप्त जल था। यहाँ का मानव भोजन संग्रहण की अवस्था में था। यहाँ से ताम्र उपकरण एवं बर्तन बड़ी संख्या में मिले हैं। ऐसा इसलिये संभव हो सका क्योंकि खेतड़ी के ताम्र भण्डार यहाँ से निकट थे। मिट्टी के बर्तनों में कलश, तलसे, प्याले, हाण्डी आदि मिले हैं जिन पर चित्रांकन उपलब्ध है।

    ऋग्वैदिक सभ्यता

    सरस्वती और दृश्द्वती के बीच के हिस्से को मनु ने ब्रह्मावर्त बताया है जो अति पवित्र एवं ज्ञानियों का क्षेत्र माना गया है। आगे उत्तर-पूर्व में कुरुक्षेत्र स्वर्ग के समान माना गया है। सरस्वती-दृश्द्वती के इस क्षेत्र में पाकिस्तान की सीमा से लगते, अनूपगढ़ क्षेत्र से उत्तर पूर्व की ओर चलने पर हड़प्पा कालीन सभ्यता से बाद की सभ्यता के नगर बड़ी संख्या में मिलते हैं जो भूमि के नीचे दबकर टीले के रूप में दिखायी पड़ते हैं। इन टीलों में स्लेटी मिट्टी के बर्तन काम में लाने वाली सभ्यता निवास करती थी। यह सभ्यता हड़प्पा कालीन सभ्यता से काफी बाद की थी। अनूपगढ़ तथा तरखानवाला डेरा से प्राप्त खुदाई से इस सभ्यता पर कुछ प्रकाश पड़ा है। राजस्थान में इस सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य टीलों में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं। ये सभ्यताएं लौह युगीन सभ्यता का हिस्सा हैं। सुनारी से लौह प्राप्त करने की प्राचीनतम भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं।

    ऋग्वैदिक काल में भारतीय समाज में दो वर्ण थे। पहला वर्ण गौर वर्ण के लोगों का था जो आर्य कहलाते थे। दूसरा कृष्ण वर्ण के लोगों का था जो अनार्य कहलाते थे। ऋग्वेद में ब्राह्मण और क्षत्रिय शब्दों का प्रयोग तो बार-बार हुआ है किंतु केवल एक ही सूक्त ऐसा है जिसमें चतुर्वर्णों का उल्लेख मिलता है। इस सूक्त में कहा गया है कि परम पुरुष के मुख से ब्राह्मण की, भुजाओं से क्षत्रिय की, जांघों से वैश्य की और पैरों से शूद्रों की उत्त्पत्ति हुई। इस रूपक का आशय जातियों की श्रेष्ठता का क्रम निर्धारित करना नहीं है अपितु प्रत्येक जाति के कार्य की स्थिति को स्पष्ट करना है। यह रूपक बताता है कि ब्राह्मण का कार्य देश के मुख के समान है। अर्थात् यज्ञ-हवन, नीति निर्देशन, उपदेश तथा शिक्षण का कार्य करने वाले ब्राह्मण हैं। क्षत्रिय देश की भुजाएं हैं। अर्थात् वे बाहुबल से प्रजा की रक्षा करते हैं। समाज रूपी शरीर के मुख और बाहुओं से नीचे अर्थात् पेट से लेकर जांघ तक का कार्य वैश्य करते हैं अर्थात् कृषि पशुपालन एवं व्यापार के माध्यम से वे प्रजा का पेट भरते हैं। शूद्रों का कार्य देश को गति देना है। वे निर्माण, सेवा और अन्य कार्यों के माध्यम से समाज को गति प्रदान करते हैं।

    वैदिक काल में जातीय श्रेष्ठता का विचार उत्पन्न नहीं हुआ था। सभी आर्य परस्पर बराबर थे। कोई भी आर्य अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार एक कर्म को त्याग कर दूसरा कर्म अपना सकता था। अंगिरा ऋषि लकड़ी का कार्य करते थे। उनके वंशज परवर्ती काल में जातियों का निर्माण होने पर 'सः अंगिरा' अर्थात् 'वह जो अंगिरा है' अर्थात् जांगिड़ कहलाये। वैदिक काल में देश व प्रजा की रक्षा के लिये युद्ध करने वाले क्षत्रिय कहलाते थे। व्यापार, वाणिज्य, कृषि कर्म, पशुपालन आदि आर्थिक गतिविधियों में संलग्न समुदाय वैदिक काल में वैश्य कहलाता था।

    उत्तर ऋग्वैदिक सभ्यता

    उत्तर ऋग्वैदिक युग के सम्पूर्ण संस्कृत वांगमय से लेकर राजपूत काल के शिलालेखों तक में आर्यों के चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तथा चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास का उल्लेख मिलता है। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, इन वर्णों में कई भेद और विभेद भी दृष्टि गोचर होने लगे। स्कंदपुराण में पंचगौड़, पंचद्रविड़, पुष्करणा और श्रीमाली ब्राह्मणों का बोध होता है जो ब्राह्मणों में श्रेष्ठ माने जाते थे। राजस्थान के कई ब्राह्मण अपने आप को पूर्वी भारत के ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानते थे। क्योंकि पूर्वी ब्राह्मणों में से कुछ मांसाहारी होते थे।

    श्रेष्ठ ब्राह्मण, निम्न समझे जाने वाले ब्राह्मणों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं करते थे। इस काल में गोत्र एवं प्रवर भी अलग-अलग होने लग गये थे। कुछ ब्राह्मण पुरोहिताई के काम में, कुछ राजकीय सेवा में, कुछ अध्यापन में तथा कुछ ब्राह्मण व्यापार कर्म में भी लगे हुए थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य समुदाय से इतर जातियों को शूद्र कहा जाता था। इनमें कुम्हार, दर्जी, तेली, तम्बोली, नाई, लुहार, सुनार, ठठेरा आदि जातियाँ गिनी जाती थीं। शूद्र वर्ग को भी समाज में पर्याप्त आदर मिलता था। इनमें से अधिकतर जातियाँ खेती का काम भी करती थीं इस कारण इनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति ठीक थी। उपरोक्त चार वर्णों के अतिरिक्त डोम, चमार, चाण्डाल, नट, गांछे, मातंग, मच्छीमार, व्याध, धोबी, चिड़ीमार, जुलाहे आदि जातियाँ अधम और अधमाधम कही जाती थीं। इन्हें अंत्यज अर्थात् अस्पर्श्य माना जाता था। समाज के इस वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी।

    महाभारत कालीन सभ्यता

    महाभारत काल से पूर्व मानव बस्तियां सरस्वती तथा दृशद्वती क्षेत्र से हटकर पूर्व तथा दक्षिण की ओर खिसक आयीं थीं। उस काल में कुरु जांगलाः तथा मद्र जांगलाः के नाम से पुकारे जाने वाले क्षेत्र आज बीकानेर तथा जोधपुर के नाम से जाने जाते हैं। इस भाग के आस पास का क्षेत्र सपादलक्ष कहलाता था। कुरु, मत्स्य तथा शूरसेन उस काल में बड़े राज्य थे। अलवर राज्य का उत्तरी भाग कुरुदेश के, दक्षिणी और पश्चिमी भाग मत्स्य देश के और पूर्वी भाग शूरसेन के अंतर्गत था। भरतपुर तथा धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अंतर्गत थे। शूरसेन देश की राजधानी मथुरा, मत्स्य की विराट तथा कुरु की इन्द्रप्रस्थ थी। महाभारत काल में शाल्व जाति की बस्तियों का उल्लेख मिलता है जो भीनमाल, सांचोर तथा सिरोही के आसपास बसी हुई थीं।

    जनपद कालीन सभ्यता

    ईसा से 1,000 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा के 300 वर्ष पूर्व तक का समय जनपद काल कहलाता है। यहाँ से इतिहास की आधारभूत सामग्री, सिक्के, आभूषण अभिलेख आदि मिलने लगते हैं। सिकंदर के आक्रमण के समय और उसके बाद गुप्तों तक राजस्थान में अनेक छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें भरतपुर के आस-पास राजन्य जनपद तथा मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद और अलवर के निकट शाल्व जनपद प्रमुख हैं।

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