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     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-11

    राजस्थान में सूखा एवं अकाल


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जब वर्षा की कमी हो जाती है तो उसे सूखा कहते हैं। सूखे के कारण पशु-पक्षियों के लिये चारा-पानी तथा मनुष्यों के लिये अनाज एवं पेयजल की कमी हो जाती है जिसे अकाल कहते हैं। राजस्थान में हर वर्ष किसी न किसी क्षेत्र में सूखा एवं अकाल पड़ता है। जिस वर्ष प्रदेश के 20 प्रतिशत या उससे अधिक क्षेत्र में वर्षा कम होती है, उस वर्ष को सूखा वर्ष घोषित किया जाता है। सूखे एवं अकाल की परिस्थितियां गंभीर हो जाती हैं तो उसे गंभीर सूखा वर्ष घोषित किया जाता है। जिस क्षेत्र में प्रति पाँच वर्ष में एक बार सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है उसे सूखा संभाव्य क्षेत्र कहते हैं। जल की कमी होने पर जल अकाल, अन्न की कमी होने पर अन्न अकाल तथा तृण की कमी होने पर तृण अकाल कहते हैं। जब जल, अन्न और तृण तीनों की कमी हो जाती है तो उसे त्रिकाल कहते हैं।


    सूखा एवं अकाल के प्रमुख कारण

    प्राकृतिक विषमता : राज्य में सूखे एवं अकाल के प्रमुख कारणों में राज्य की ज्यामितीय एवं सापेक्ष स्थिति, वर्षा की अल्प मात्रा, वर्षा का अनिश्चित एवं अनियमित वितरण, जलवायु दशाओं की अतिशयता, राज्य के 60 प्रतिशत भू-भाग पर रेगिस्तान का विस्तार, अरावली पर्वत माला का दक्षिण-पश्चिम मानसून के समानान्तर होना एवं प्राकृतिक प्रकोपों यथा टिड्डी दलों द्वारा फसलों का नष्ट होना शामिल है।

    मानवीय कुप्रबंधन : प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानवीय कुप्रबंधन भी सूखे एवं अकाल को जन्म देता है। इन कारणों में वर्षा जल के एकत्रीकरण एवं प्रबंधन के प्राचीन एवं परंपरागत तरीकों को परित्याग, जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, वनोन्मूलन, मिट्टी का अपरदन, आधारभूत सुविधाओं की कमी, सिंचाई साधनों की कमी, निर्धनता एवं बेरोजगारी आदि सम्मिलित हैं।


    सूखे एवं अकाल के क्षेत्र

    पश्चिमी राजस्थान के 12 जिले सूखे व अकाल के स्थायी क्षेत्र हैं। इसमें जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, पाली, जालोर, सीकर व झुंझुनूं जिले आते हैं। इन जिलों में राज्य का 61.11 प्रतिशत क्षेत्रफल है जिनमें राज्य की 40 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इन जिलों में मरुस्थल की उपस्थिति है, वर्षा का औसत कम है। उच्च तापक्रम के कारण जलवाष्पन की गति अधिक है। राज्य में अकाल के क्षेत्रों के विषय में एक दोहा कहा जाता है-


    पग पूगल धड़ कोटड़ा, उदरज बीकानेर

    भूलो चूको जोधपुर, ठावो जैसलमेर।




    अकाल का इतिहास


    प्रदेश में सूखे एवं अकाल का लम्बा इतिहास है। ई.1783 (वि.सं. 1840) में पड़े अकाल को चालीसा का अकाल कहा जाता है। ई.1812-13 के अकाल को पंचकाल कहा गया। ई.1868-69 में त्रिकाल पड़ा। ई.1899-1900 (वि.सं. 1956) को छप्पनिया अकाल कहा जाता है। राज्य में अकाल को लेकर एक कहावत कही जाती है- तीजो कुरियो आठवों काल। अर्थात् एक वर्ष छोड़कर एक वर्ष में अर्द्ध अकाल होता है तथा प्रति आठवें वर्ष में भीषण अकाल पड़ता है। 

    प्राकृतिक आपदाओं की भविष्यवाणी के लिये संस्थाएं

    मौसम विभाग : राजस्थान में मौसम सम्बन्धी सूचनाओं को एकत्र करने एवं उसकी भविष्यवाणी करने के लिये केंद्र सरकार के अधीन मौसम विभाग के कार्यालय स्थापित किये गये हैं। इन कार्यालयों से आकाशवाणी, दूरदर्शन, दैनिक समाचार पत्र एवं मीडिया एजेंसियों को मौसम सम्बन्धी सूचनाएं उपलब्ध करवायी जाती हैं।

    टिड्डी नियंत्रण कार्यालय : केन्द्र सरकार के अधीन खोले गये टिड्डी कार्यालय पूरे राज्य में खोले गये हैं। ये कार्यालय टिड्डियों के प्रजनन एवं माइग्रेशन पर दृष्टि रखते हैं तथा उनके नियंत्रण के लये कार्यवाही करते हैं।

    रिमोट सेंसिंग सेंटर : जोधपुर में 1988 में रिमोट सेंसिंग सेंटर स्थापित किया गया। यह केंद्र उपग्रहों के माध्यम से कृषि, वानिकी, शहरी विकास आदि कार्यों से सम्बन्ध रखने वाले तत्वों- बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि, आंधियां, भूकम्प, ज्वालामुखी आदि प्राकृतिक आपदाओं के आकलन एवं निराकरण के सम्बन्ध में सूचनाएं एकत्रित करता है। देश में ऐसे पाँच केन्द्र हैं।


    राजस्थान में सूखा एवं अकाल प्रबंधन

    राजस्थान में अकाल प्रबंधन का कार्य जिला प्रशासन द्वारा संचालित किया जाता है। इसके अंतर्गत पशुओं के लिये चारा डिपो खोलना, वाटर टैंकरों के माध्यम से मानवों एवं पशुओं के लिये पेयजल उपलब्ध करवाना, पशुओं के लिये उपचार उपलब्ध करवाना एवं मानवों के लिये रोजगार उपलब्ध करवाने हेतु अकाल राहत कार्य खोलना सम्मिलित है। जब से राज्य में मनरेगा योजना आरंभ हुई है तब से अकाल एवं सूखा प्रबंधन में रोजगार गतिविधियां सम्मिलित नहीं की जाती हैं।

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