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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-10

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-10

    राजस्थान का जलवायु


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    किसी भी प्रदेश की जलवायु का उसकी संस्कृति पर विशिष्ट प्रभाव होता है। वहाँ के खान-पान से लेकर वस्त्र विन्यास, भवनों की बनावट एवं सजावट, संगीत, नृत्य, तीज-त्यौहार तक अर्थात् संस्कृति के हर अंग पर उस क्षेत्र की जलवायु की गहरी छाप होती है। अतः राजस्थान की अनूठी पर्यावरणीय संस्कृति को समझने के लिये यहाँ के विशिष्ट जलवायु को समझना आवश्यक है।

    किसी भी प्रदेश के मौसम की औसत दशाओं को जलवायु कहा जाता है। मौसमी दशाओं में किसी क्षेत्र का तापमान, वायुदाब, वर्षा, आर्द्रता आदि सम्मिलित किये जाते हैं। मौसमी दशाओं का निर्माण उस क्षेत्र की अक्षांशीय स्थिति, समुद्र तट से दूरी, समुद्र तल से ऊँचाई, धरातलीय स्वरूप, जलीय भागों की स्थिति, वायु दिशा एवं गति आदि से निर्धारित होता है। सामान्यतः समुद्र तल से लगभग 300 फुट ऊपर जाने पर तापमान में 1 सेंटीग्रेड की गिरावट आती है। राजस्थान की जलवायु मानसूनी है। इस कारण सर्दी, गर्मी तथा वर्षा की अलग-अलग ऋतुएँ होती हैं। गर्मी की ऋतु सबसे बड़ी, सर्दी की उससे छोटी और वर्षा की ऋतु सबसे छोटी होती है।


    मुख्य ऋतुएँ

    (1) ग्रीष्म ऋतु : राजस्थान में ग्रीष्म ऋतु में तेज गर्मी पड़ती है। पश्चिमी एवं मध्य राजस्थान में दिन का तापमान 40 से 48 सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है। गर्म हवायें चलती हैं जिन्हें लू कहते हैं। इस कारण वातावरण में आर्द्रता 1 प्रतिशत से भी कम रह जाती है। ग्रीष्म ऋतु मार्च से आरंभ होकर जून-जुलाई तक चलती है। मई-जून माह सर्वाधिक गर्म होते हैं। मरुस्थलीय जिलों में रातें प्रायः शीतल एवं सुहावनी होती हैं। गर्मी के कारण पश्चिमी राजस्थान के भेड़-बकरी आदि पशु पानी की तलाश में कुछ समय के लिये मालवा क्षेत्र के लिये प्रस्थान करते हैं। पश्चिमी राजस्थान में अप्रैल से जून तक तेज हवायें व आंधियां चलती हैं। इनकी अधिकतम गति 140 कि.मी. प्रति घंटा तक होती है। इनके मार्ग में वृक्षों की कमी होने से करोड़ों टन मिट्टी हवा के साथ बहकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर चली जाती है। इससे मरुस्थलीकरण में वृद्धि होती है।

    (2) वर्षा ऋतु : मध्य जून से वर्षा ऋतु आरंभ होती है जो मध्य सितम्बर तक चलती है। राज्य में वर्षा का औसत 575.1 मि.मी. है जिसका वितरण 185 मिमी से 950 मि.मी. के मध्य है। राज्य में होने वाली कुल वर्षा का 34 प्रतिशत जुलाई माह में तथा 33 प्रतिशत अगस्त माह में होता है। प्रदेश का पश्चिमी क्षेत्र एशिया के वर्षा रहित भागों के निकट स्थित है जिसके कारण वर्षा की मात्रा तथा अवधि कम होती है। बंगाल की खाड़ी से आने वाली दक्षिणी-पूर्वी मानसूनी हवाएं उत्तर पश्चिम की ओर बढ़ती हैं किंतु बीच में अरावली पर्वत माला द्वारा रोक ली जाती हैं जिससे प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में अधिक वर्षा होती है। पश्चिमी क्षेत्र में जो मानसून पहुँचता है उसे रोकने के लिये इस भाग में पर्याप्त उच्च पर्वत श्रृंखला नहीं है। इस कारण मानसूनी हवाओं से पश्चिमी क्षेत्र में प्रतिवर्ष औसतन 120 से 150 मि.मि. तक ही वर्षा होती है। जैसलमेर जिले में वर्षा का वार्षिक औसत 185 मि.मि. है। दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में वर्षा का वार्षिक औसत 600 मि.मि. से 950 मि.मि. तक है। बांसवाड़ा जिले में सर्वाधिक 950.3 मि.मि. वर्षा होती है। मई से सितम्बर तक तूफान आते हैं जिनमें तेज हवाओं के साथ तेज पानी बरसता है। ये तूफान पश्चिमी क्षेत्र की अपेक्षा दक्षिणी-पूर्वी प्रदेश में अधिक आते हैं। कभी-कभी ओलावृष्टि भी होती है। राजस्थान में प्रतिवर्ष औसतन 29 दिन वर्षा होती है। सर्वाधिक 40 दिन वर्षा झालावाड़ में, 38 दिन बांसवाड़ा में तथा सबसे कम 5 दिन जैसलमेर में होती है।

    अधिकतम वर्षा वाले जिले : राज्य में सर्वाधिक वर्षा वाले जिले बांसवाड़ा (950.3 मि.मी.), बारां (873.8 मि.मी.), सवाईमाधोपुर (873.4 मि.मी.), झालावाड़ (844.3 मि.मी.), चित्तौड़गढ़ (841.5 मि.मी.) हैं।

    न्यूनतम वर्षा वाले जिले : राज्य में न्यूनतम वर्षा वाले जिले जैसलमेर (185.5 मि.मी.), गंगानगर (226.4 मि.मी.), बीकानेर (243.0 मि.मी.), बाड़मेर (265.7 मि.मी.), हनुमानगढ़ (273.5 मि.मी.) हैं।

    (3) शीत ऋतु : अक्टूबर से फरवरी तक सर्दियों का मौसम होता है। पश्चिमी राजस्थान में दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की अपेक्षा अधिक सर्दी पड़ती है। रात्रि में तापमान दो से तीन डिग्री सेंटीग्रेड हो जाता है। दिसम्बर व जनवरी कठोर सर्दी के महीने होते हैं। राज्य के उत्तरी भाग में जनवरी माह का औसत तापमान 12 सेंटीग्रेड तथा दक्षिणी भाग में 16 सेंटीग्रेड रहता है। जनवरी माह में पश्चिमी विक्षोभों से राजस्थान मंं थोड़ी-बहुत वर्षा होती है, जिसे मावठ (मावट) कहते हैं।


    राजस्थान के जलवायु प्रदेश

    (1) शुष्क जलवायु प्रदेश : यह क्षेत्र थार रेगिस्तान का हिस्सा है। इसमें जैसलमेर जिला, बीकानेर जिले का पश्चिमी भाग, गंगानगर जिले का दक्षिणी भाग, बाड़मेर जिले का उत्तरी भाग, जोधपुर जिले की फलौदी तहसील का पश्चिमी भाग सम्मिलित है। यहाँ वर्षा का वार्षिक औसत 100 मि.मी. से 200 मि.मी. के बीच रहता है। ग्रीष्म में औसत तापमान 32 से 36 सेंटीग्रेड रहता है।

    (2) अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश : इस क्षेत्र में वर्षा अनिश्चित, असमान तथा तूफानी होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 200 मि.मी. से 400 मि.मी. रहता है। ग्रीष्म ऋतु में तापमान 32 से 36 सेंटीग्रेड रहता है। इस क्षेत्र में श्रीगंगानगर, बीकानेर, बाड़मेर व जोधपुर का अधिकांश भाग, चूरू, सीकर, झुंझुनूं, पाली तथा नागौर जिले व जालोर का पश्चिमी भाग आता है।

    (3) उपआर्द्र जलवायु प्रदेश : अलवर, जयपुर तथा अजमेर जिले, जालोर, सीकर, झुंझुनूं व पाली जिले के पूर्वी भाग तथा सिरोही, टोंक एवं भीलवाड़ा के उत्तरी पश्चिमी भाग इस क्षेत्र में स्थित हैं। इस क्षेत्र में वर्षा का वार्षिक औसत 400 से 600 मि.मी. तक रहता है। ग्रीष्म ऋतु में औसत तापमान 28 से 34 सेंटीग्रेड रहता है।

    (4) आर्द्र जलवायु प्रदेश : इस क्षेत्र में अच्छी वर्षा होती है, वर्षा का वार्षिक औसत 600 से 800 मि.मी. तक होता है। गर्मी में औसत तापमान 32 से 34 सेंटीग्रेड तथा सर्दी में 14 से 17 सेंटीग्रेड रहता है। इस क्षेत्र में कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, धौलपुर, भरतपुर जिले, चित्तौड़गढ़ जिले का उत्तरी भाग एवं टोंक जिले का दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र आता है।

    (5) अति आर्द्र जलवायु प्रदेश : इस क्षेत्र में वर्षा का वार्षिक औसत 80 से 95 सेमी. तक है। ग्रीष्म ऋतु में भीषण गर्मी तथा शीतऋतु में कड़ाके की ठण्ड होती है। इस क्षेत्र में झालावाड़ एवं बांसवाड़ा जिले, उदयपुर जिले का दक्षिण-पश्चिमी भाग, कोटा जिले का दक्षिण पूर्वी भाग तथा आबू पर्वत के समीपवर्ती क्षेत्र आते हैं।

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