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  • क्या जाट भारत में बाहर से आये थे ! (भाग-2)

     03.06.2020
     क्या जाट भारत में बाहर से आये थे ! (भाग-2)

    मत- 10. जाट नागवंशी हैं।


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    व्याख्या-
    जाटों में तक्षक, कालिय, कुठर तथा कुण्डु आदि गोत्र पाये जाते हैं। अतः इस मत को मानने वाले विद्वानों का कहना है कि जाट 'जितनाग' नामक जाति के वंशज हैं। पुराणों में नागों की इन शाखाओं का प्रमुखता से उल्लेख हुआ है- (1.) तक्षक, (2.) जितनाग, (3.) वसाति, (4.) कालपौनिया, (5.) कलकल। जितनागों से जाटों की उत्पत्ति हुई तथा वसाति, जाटों के वैस वंश के नाम से विख्यात हुआ। वैस वंश की चार शाखाएं कादियान, सांगवान, सौराण तथा जाखड़ आज भी प्रचलित हैं। डॉ. योगेन्द्रपाल शास्त्री के अनुसार होशियारपुर (पंजाब) के समीप श्रीमालपुर वसाति जाटों की जन्म भूमि थी। हेरोडोटस कहता है कि जित लोग एकेश्वरवादी थे। डिगायन के अनुसार ये बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। कर्नल टॉड ने अग्नि वंश से उत्पन्न क्षत्रियों के छत्तीस कुलों में जित नामक राजकुल भी वर्णन किया है। कर्नल टॉड को ईस्वी 1820 में कोटा से दक्षिण में कुछ दूरी पर स्थित कुनसूयां नामक गांव में एक प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुआ था। इस शिलालेख के अनुसार जित वंश के किसी राजा ने यदुकुल की किसी स्त्री से विवाह किया था। ज्वालाप्रसाद मिश्र ने भी एक प्राचीन शिलालेख का हवाला देते हुए लिखा है कि जित तक्षक वंशीय हैं। इस शिलालेख के अनुसार- 'विख्यात जित् पार्वती के स्तनों से निकलने वाले अमृत का पान करता है, जिसके पूर्व पुरुष वीर तुरक्ष (तक्षक) महादेव के गले में हार की भांति विराजमान रहते हैं।' कर्नल टॉड ने तक्षकों की गणना छत्तीस राजकुलों में की है। यह राजवंश महाभारत के समय भी अस्तित्व में था। कर्नल टॉड के अनुसार तक्षक शाकद्वीप से भारत में आये थे और एक समय इन्होंने अपने पराक्रम से सारे भूमण्डल को कंपा दिया था।

    निष्कर्ष- यह मत पूर्णतः सही नहीं जान पड़ता कि जाट नागों की जित अथवा तक्षक शाखा से हैं। नाग नगर व्यवस्था बनाकर रहने वाले थे। जबकि जाट ग्राम्य सभ्यता के निवासी हैं। इस मत में से इतना तथ्य स्वीकार किया जा सकता है कि जब जाट जाति पूरे उत्तर भारत में फैल गई थी, तब नागों के कुछ कबीले जाट जाति में सम्मिलित हो गये।

    मत-11. जाट आर्य हैं।

    व्याख्या-
    नेसफील्ड ने लिखा है- 'यदि सूरत शक्ल, कुछ समझे जाने वाली चीज है तो जाट सिवाय आर्यों के कुछ नहीं हो सकते।' हैवेल ने लम्बे कद, सुन्दर चेहरा, पतली-लम्बी नाक, चौड़े कन्धे, लम्बी भुजाएं, शेर की सी कमर और हिरण की सी पतली टांगों के कारण इन्हें आर्य ठहराया है। चिन्तामणि वैद्य ने लिखा है कि जाट हूणों के सम्बन्धी नहीं अपितु शत्रु थे। जाटों ने हूणों का सामना किया और उन्हें परास्त किया। वे सुन्दर, लम्बी और बड़ी नाक वाले हैं। इलियट इनकी बोली एवं शारीरिक गठन से इन्हें आर्यों का वंशज बताता है। निष्कर्ष- इस मत के विरोध में कोई प्रमाण नहीं दिया जा सकता। आज भी हिमालय पर्वत पर जो परम्पारगत आर्य कबीले निवास करते हैं और जिनका बाह्य दुनिया से सम्पर्क कम रहा है, वे देहयष्टि में जाट जाति के काफी निकट प्रतीत होते हैं। अतः इस मत को मानने में कोई आपत्ति नहीं है।

    मत-12. जाट विदेशी मूल के हैं।

    व्याख्या- विभिन्न विदेशी विद्वानों तथा कतिपय भारतीय विद्वानों ने आर्यों के विदेशी जाति होने के सम्बन्ध में मुख्यतः तीन सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं- 1. यूरोपीय सिद्धांत, 2. मध्य एशिया का सिद्धांत, 3. आर्कटिक प्रदेश का सिद्धांत।

    यदि उपरोक्त तीनों सिद्धांतों में से किसी भी एक मत को सही मान लिया जाता है तो जाट भी सम्पूर्ण आर्य जाति की तरह विदेशी मूल के ठहरते हैं। निष्कर्ष- चूंकि आर्यों के भारत में बाहर से आने का सिद्धांत अधिकांश भारतीय इतिहासकारों द्वारा अमान्य घोषित कर दिया गया है, इसलिये जाटों के सम्बन्ध में भी यह धारणा अमान्य हो जाती है। क्योंकि जाट भी आर्य ही हैं। मत-9. जाट जुटलैण्ड के निवासी हैं। व्याख्या- इस सिद्धांत की स्थापना करने वालों का कहना है कि डेन्मार्क में जुटलैण्ड नामक एक जिला है। जाट मूलतः वहीं के रहने वाले हैं। इस मत के समर्थन में 'डेन्मार्क' शब्द की संस्कृत शब्द के 'धेनुमार्ग' शब्द से समानता को भी देखा जा सकता है। धेनुमार्ग का अर्थ होता है- गायों का मार्ग, जहां बहुत बड़ी संख्या में गायें विचरण करती हैं। आज भी डेन्मार्क पूरे विश्व में सर्वाधिक दुग्धोत्पादन के लिये प्रसिद्ध है।

    निष्कर्ष- जाटों का मुख्य व्यवसाय खेती तथा पशुपालन है। अतः इस मत को मानने में कोई अतिश्योक्ति दिखाई नहीं देती कि धेनुमार्ग (डेन्मार्क) में जाट रहते थे। वे गायें पालते थे और उनका मूल स्थान आज भी जुटलैण्ड कहलाता है। यहाँ एक बात यह भी देखनी होगी कि 'जाट' भारत से लेकर जर्मनी तक पाये जाते हैं।


     वास्तविकता क्या है ?

    जाटों को विदेशी विद्वानों ने शक, कुषाण, हूण, यूची अथवा विदेशी जातियों की संतान होना बताया है, वस्तुतः ये विद्वान एक सोची समझी साजिश के तहत ऐसी मान्यताएं स्थापित करते थे। उन्होंने न केवल जाटों को अपितु गुर्जरों, चौलुक्यों, चावड़ों, प्रतिहारों तथा राठौड़ों को भी विदेशी ठहराने का प्रयास किया। अंग्रेज एवं अन्य यूरोपीय जातियां जो मध्यकाल में भारत आईं और उन्नीसवीं शताब्दी में देश की वास्तविक शासक बन गईं तो उन्होंने यहाँ की जनता को यह समझाने का प्रयास किया कि न केवल हम, अपितु भारत के पुराने शासक क्षत्रिय अथवा राजपूत भी विदेशी थे। अतः हमसे घृणा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    विदेशी विद्वानों ने तो यहाँ तक सिद्ध कर दिया कि सम्पूर्ण आर्य जाति ईरान, यूनान, उत्तरी ध्रुव, भूमध्य सागर के तट अथवा किसी अन्य प्रदेश से भारत में आये। ये मान्यताएं भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक तथा धार्मिक परम्पराओं के आधार पर अमान्य ठहराई जा चुकी हैं। जाटों को विदेशी बताना भी इन विदेशी विद्वानों का यही कारण था।

    भारतीय समाज का इतिहास ऋग्वेद से मिलना प्रारम्भ होता है। ऋग्वेद में जाति व्यवस्था का नहीं अपितु वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है। जातियां तब बनी ही नहीं थीं। भारतीय समाज के इतिहास की दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक भगवान वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत है। इस पुस्तक में क्षत्रिय जातियों अथवा क्षत्रिय वंशों का विस्तार से उल्लेख हुआ है। महाभारत में मद्रकों के साथ जाटतृकों का उल्लेख भी हुआ है। महाभारत में जाटतृक (अथवा जर्तिका) जाति के रहने का जो स्थान बताया गया है, वह आधुनिक पंजाब ही है। अतः इस बात की प्रबल की सम्भावना है कि जाटों की उत्पत्ति जाटतृकों से हुई हो।

    कर्ण द्वारा मद्रराज शल्य को जाटतृकों के बारे में जो ऊँची-नीची बातें कही गई हैं, वे शाश्वत सत्य नहीं मानी जा सकतीं। कर्ण अपने परिवार एवं समाज से च्युत व्यक्ति था। उसके दुष्ट स्वभाव के कारण ही दुर्योधन ने उसे अपना मित्र एवं सेनापति बनाया था। मद्रराज शल्य की बहिन माद्री कुरुवंशी महाराज पाण्डु को ब्याही गई थी। पाण्डु की महारानी किसी हीन कुलोजात राजकुल की नहीं हो सकती थी। मद्रराज शल्य निःसंदेह कर्ण से श्रेष्ठ था। कर्ण का स्वभाव श्रेष्ठ पुरुषों से द्रोह करने तथा उन्हें येन-केन-प्रकरेण नीचा दिखाने का था। अतः कर्ण की किसी बात का विश्वास नहीं किया जा सकता। उसके द्वारा यह कहा जाना कि जर्तिका स्त्रियां शराब पीकर और नशे में नंगी होकर नाचती हैं तथा जिन बर्तनों को कुत्ते चाटते हैं, उन्हीं में जर्तिका लोग भोजन करते हैं, सिवाय दुष्टता के और कुछ नहीं है। यदि ये लोग ऐसे होते तो इनकी राजकुमारी महाभारत काल के सर्वशक्तिशाली, परम प्रतापी नरेश पाण्डु को न ब्याही गई होती।

    लेखक की धारण है कि यह संभव है कि जाट जाति का मूल उद्गम
    पंजाब का क्षेत्र रहा हो किंतु जर्तिका जाति से उनके प्रत्यक्ष सम्बन्ध होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। पंजाब से ही चलकर इनका प्रसार भारत के अन्य भागों, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, ईराक, चीन, तिब्बत, मंगोलिया, स्पेन, स्कैण्डिवेनिया, नो-वो गोर्ड, मिश्र, यूनान, तुर्किस्तान, अरब, इंग्लैण्ड, ग्रीक, रोम तथा जर्मनी तक हुआ। विभिन्न देशों के जाटों ने कालान्तर में अपने देश की सभ्यता, संस्कृति और धर्म को अपना लिया। यद्यपि भारत के जाटों में नागों के अतिरिक्त अन्य कई जातियां सम्मिलित हैं तथापि वर्तमान समय में जाट अपने मूल स्वरूप से निकटता बनाये रखने में केवल भारत में ही सफल हो सके हैं। वे यहाँ आज भी वे वैदिक सभ्यता को अपनाये हुए हैं, कृषि कर्म में संलग्न हैं तथा अपने स्वातंत्र्य-प्रिय स्वभाव के कारण सबसे अलग दिखाई देते हैं। 

    जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ भ्रामक बातों का निराकरण यहीं कर देना उचित होगा। जाटों को आर्येतर जाति मानने, नागों से उत्पन्न होने अथवा शिवजी की जटाओं से उत्पन्न होना बताये जाने के कुछ कारण हैं। वस्तुतः जिस समय भारतीय समाज वैदिक सभ्यता से आगे निकलकर पौराणिक काल में पहुंचा तो ना-ना प्रकार की जातियां उत्पन्न हो गईं। इन जातियों की उत्पत्ति ऊपर से नीचे हुई थी। अर्थात् भारतीय समाज में प्रारम्भ में समस्त आर्य ब्राह्मण थे। वे ईश्वर तथा सत्य के साथ-साथ प्रकृति के रहस्यों की खोज करते थे। वे प्रकृति से प्राप्त कन्द, मूल, फल आदि पर जीवन यापन करते थे। जब उन्हें दूसरे देशों से आने वाले आक्रान्ताओं से अपनी रक्षा करने की आवश्यकता अनुभव हुई तो कुछ ब्राह्मण क्षत्रियों में परिवर्तित हो गये। ऐसा करते समय आर्यों ने देवताओं से अस्त्र-शस्त्र एवं उनके संचालन का ज्ञान प्राप्त किया। जब समाज के भरण-पोषण के लिये कृषि कर्म एवं पशुपालन की आवश्यकता हुई तो कुछ ब्राह्मण एवं क्षत्रिय; वैश्यों में परिवर्तित हो गये। सभ्यता और समाज के और आगे बढ़ने पर अनुचरों और सेवकों की आवश्यकता हुई तो कुछ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य; शूद्र कर्म करने लगे। इन शूद्रों में अन्त्यज सम्मिलित नहीं थे। इन शूद्रों में कुम्हार, सुथार, नाई, माली आदि जातियां सम्मिलित थीं न कि चाण्डाल तथा डोम जैसी अन्त्यज कही जाने वाली जातियां। अंत्यज जातियां तो बहुत आगे चलकर उत्पन्न हुईं।

    जैसे-जैसे समाज बढ़ता गया, उसे अनुशासनबद्ध रखने के प्रयास भी बढ़ते गये। ब्राह्मणों ने समाज को धार्मिक अनुशासन में तथा क्षत्रियों ने प्रशासनिक एवं सामरिक अनुशासन में आबद्ध किया। इस सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मणों का देवताओं से सीधा सम्पर्क था। चूंकि देवता पहाड़ों में रहते थे इसलिये ब्राह्मण धरती के देवता कहे जाने लगे। जब देव जाति नष्ट हो गई और आक्रांताओं से समाज की रक्षा के लिये क्षत्रियों को ही जूझना पड़ा तो वे राजा बन गये और ब्राह्मण या तो उनके पुरोहित एवं मंत्री बनकर रह गये या मानव समाज से दूर जंगलों एवं पर्वतों में ऋषि-मुनि बनकर तपस्या करने लगे। कुछ वैश्यों ने जो कि कृषि कर्म एवं पशुपालन में संलग्न थे, ब्राह्मणों और क्षत्रियों दोनों की बनाई व्यवस्थाओं को मानने से इन्कार कर दिया और वे स्वतंत्र आचरण करने लगे। यही कारण है कि ब्राह्मणों ने इन्हें अजातीय (बिना जात का) कहकर अपनी खीझ उतारनी चाही। यही कृषि कर्मा लोग आगे चलकर जाट कहलाये।

    आगे चलकर आर्यों की नाग उपजाति भी इन्हीं जाटों में विलीन हो गई। समय-समय पर अन्य क्षत्रिय जातियां भी युद्ध कर्म त्यागकर कृषि एवं पशुपालन में संलग्न हो गईं तथा वे भी जाटों में सम्मिलित हो गये। यही कारण है कि जाटों में नागों के तक्षक, कालिय, कुठर तथा कुण्डु गोत्र पाये जाते हैं तो क्षत्रियों के गहलोत, दाहिमा, पंवार, यादव, तंवर तथा मॉर गोत्र भी मिलते हैं।

    जाटों की स्त्रियां सिर पर बोर धारण करती हैं जो कि जाटों की नागों से निकटता का परिचायक है। जाटों और नागों की निकटता के सम्बन्ध में दो प्रमाण और दिये जा सकते हैं। एक तो यह कि जहां-जहां नाग रहते थे, उस पूरे क्षेत्र में अब जाट बहुलता से पाये जाते हैं। नागौर नगर नागों द्वारा बसाया गया था इस कारण नागौर, नागपुर, नागद्रह, अहिच्छत्रपुर (बरेली) तथा अन्य नामों से जाना जाता था। इस क्षेत्र में जाट बहुलता से रहते हैं। कहा जाता है कि जन्मेजय के नागयज्ञ के बाद बचे हुए नाग इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से चलकर राजस्थान से लेकर नागपुर (महाराष्ट्र) तथा उसके नीचे तक फैल गये। यही कारण है कि दिल्ली से लेकर हिसार, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, नागौर, जोधपुर, बाड़मेर तथा जैसलमेर आदि जिलों में बड़ी संख्या में जाट रहते है। वस्तुतः इस पूरे क्षेत्र में नागों की बस्तियां थीं जिनके साथ-साथ जाट रहते थे।

    नाग नगरों में तथा जाट गांवों एवं ढाणियों में रहते थे। नागों से जाटों की निकटता का दूसरा प्रमाण यह है कि जाटों को भगवान शंकर की जटाओं से उत्पन्न होना बताया गया है। नाग भगवान शंकर के गले में रहते हैं तो जाट नागों से श्रेष्ठ होने के कारण शंकर के सिर की जटाओं से निकले हैं। यही ऐतिहासिक रूपक इस मिथक के पीछे दिखाई देता है।

    जाट आज भी ब्राह्मणों की बहुत सारी व्यवस्थाओं को नहीं मानते। उनमें विधवा विवाह अथवा नाते की प्रथा प्रचलित है। स्त्रियां सामान्यतः पर्दा नहीं करतीं। वंशानुगत अधिकार में जाटों का विश्वास नहीं है। ये वर्गवाद में भी विश्वास नहीं करते। उत्पादन एवं श्रम को महत्व देते हैं।

    कानूनगो ने जाटों के बारे में लिखा है कि जाट व्यक्तिवादी हैं और व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं। जाट वही करता है जो उसकी दृष्टि में ठीक जंचे और कहीं-कहीं वह उसे जानबूझ कर भी करता है जो उसे गलत लगे। डॉ. रणजीत सिंह ने लिखा है कि चारित्रिक दृष्टि से जाट प्राचीन आंग्ल-सैक्सन और रोमनवासियों के समान प्रतीत होता है। स्वभाव की दृष्टि से वह जर्मनों से मेल खाता है। इवेटशन कहता है कि जाट बातों द्वारा कठिनता से सहमत होता है। ये सब टिप्पणियां इस बात की द्योतक हैं कि जाटों ने भारतीय आर्य होते हुए भी ब्राह्मणों की व्यवस्था को पूरी तरह नहीं स्वीकारा। क्षत्रियों से भी इनका पूरा विरोध रहा। जहां कहीं भी जाटों ने अपना शासन स्थापित करना चाहा, क्षत्रियों ने उनका बड़ा भारी विरोध किया किंतु भरतपुर, गोहद, धौलपुर, पंजाब तथा अन्य कुछ स्थानों पर जाटों ने अपने राज्य कायम किये। जाटों का विरोध केवल ब्राह्मण अथवा क्षत्रियों से ही नहीं रहा अपितु अंग्रेजों के शासनकाल में तेजी से पनपी महाजनी व्यवस्था को भी जाटों ने पूरी तरह से ललकारा।

    यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति पर जितना प्रभाव ब्राह्मणों द्वारा बनाई धर्म-व्यवस्था, क्षत्रियों द्वारा बनाई गई शासन व्यवस्था और वैश्यों द्वारा करवाये गये लोकोपकारक कार्यों का है, उतना ही व्यापक और गहरा प्रभाव जाटों के व्यक्ति-स्वातंत्र्य चेतना का भी है। आजाद भारत में जाटों ने उत्तर भारत की खेती को संवारा है तो भारतीय सेना को लाखों वीर सैनिक भी उपलब्ध कराये हैं।

    भारतीय अर्थव्यवस्था पर जाटों का गहरा प्रभाव है। शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भी जाट जाति के विद्वान व्यक्तियों ने मील के पत्थर स्थापित किये हैं। यह धर्म-प्राण जाति, गौ-सेवा के प्रति जितनी समर्पित है, उतनी समर्पित कोई अन्य जाति नहीं है। 


    निष्कर्ष


    मानव सभ्यता के उषा काल में महाराज मनु के समय में और उनके बहुत बाद के काल में भी आर्य बस्तियां भारत से लेकर मध्य एशिया तथा यूरोप महाद्वीप तक फैली हुई थीं। उस काल में अलग-अलग देश अस्तित्व में आने आरम्भ नहीं हुए थे। इसलिये उस समय धरती के जिस क्षेत्र में आर्य जाति विस्तृत थी उस पूरे भू-क्षेत्र को भारत कहा जाना चाहिये। उस काल में कौनसा आर्य कबीला कहां रहता था और घूमते-घूमते कहां जाकर निवास करने लगा, इस सम्बन्ध में कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया जा सकता।

    हो सकता है कि आर्यों का कोई कबीला जुटलैण्ड में रहता हो जो जाट समुदाय का प्रवर्तक हो और जो या तो पंजाब से वहां गया हो अथवा वहां से पंजाब आया हो और बाद में उस कबीले के सदस्य कालांतर जुटलैण्ड से अथवा पंजाब से एशिया एवं यूरोप महाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर बस गये हों। निष्कर्षतः इतना ही कहा जा सकता है कि जाट जाति आखण्ड भारत के संयुक्त पंजाब क्षेत्र की रहने वाली प्राचीन एवं विशुद्ध आर्य जाति है और पूर्णतः भारतीय है। 

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