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  • क्या जाट भारत में बाहर से आये थे ? (भाग-1)

     03.06.2020
     क्या जाट भारत में बाहर से आये थे ? (भाग-1)

    उत्तर भारत में जाट

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    आज सम्पूर्ण उत्तर भारत में जाट जाति बड़ी संख्या में निवास करती है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में जाट जाति का सघन अधिवास दृष्टिगोचर होता है। जाटों की देहयष्टि उत्तर भारत में निवास करने वाली कतिपय आर्य जातियों यथा ब्राह्मणों, राजपूतों, महेश्वरियों एवं अग्रवालों, मालियों, मीणों आदि से कुछ निश्चित भिन्नताएं लिये हुए है। देहयष्टि के आधार पर कतिपय इतिहासकारों ने जाटों को विदेशी मूल के आर्य तो कुछ इतिहासकारों ने भारतीय आर्य ठहराने की चेष्टा की है। अनके विदेशी इतिहासकारों ने गुर्जरों और अनेक क्षत्रिय कुलों की भांति जाटों को विदेशी मूल का माना है। उन्होंने गुर्जरों को खिजरों की, राजपूतों को हूणों की तथा जाटों को सीथियनों की संतान माना है। निःसंदेह जाट कृषक और पशुपालक जाति है किंतु निरी कृषक और पशुपालक जाति नहीं है। आवश्यकता होने पर जाट जाति ने हथियार उठाने में संकोच नहीं किया।

    सत्रहवीं शताब्दी में औरंगजेब के जीवनकाल का उत्तर भारत में अधिकांश समय जाट शक्ति का दमन करने में और दक्षिण भारत में मराठा शक्ति का दमन करने में लगा। जब अठारहवीं शताब्दी में मुगल बादशाह कमजोर हो गये और मराठों ने उत्तर भारत की राजपूत रियासतों को रौंदकर रख दिया तब भरतपुर के जाट हथियार उठाकर मराठों का सामना करने के लिये आगे आये। जब ई.1757 में अहमदशाह अब्दाली के भय से मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) लाल किले में बंद होकर बैठ गया और मराठे नर्बदा को पार करके दक्खिन को भाग गये तब भरतपुर के जाट मथुरा की रक्षा के लिये 10 हजार जाट सैनिकों के सिर कटवाने को तत्पर हुए।

    अंग्रेजों के शासन काल में भी और वर्तमान प्रजातान्त्रिक सरकारों के काल में भी जाट जाति के युवक प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में सेना में भरती होते हैं तथा भारतीय सेना में गोरखा, राजपूत एवं मराठा रेजीमेंट की तरह जाट रेजीमेंट भी अस्तित्व में है। राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग, पुलिस विभाग एवं राजस्व विभाग में भी जाट जाति के व्यक्ति बहुत बड़ी संख्या में नौकरी करते हैं।

    भारत में जाटों के अतिरिक्त ऐसी कोई अन्य जाति नहीं है जो कृषि, पशुपालन, व्यापार तथा युद्ध आदि अलग-अलग प्रवृत्तियों के कार्यों में समान रूप से प्रतिभा सम्पन्न हो। जाट एक ऐसी जाति है जिसमें काले रंग का व्यक्ति शायद ही कभी देखने को मिलता है। इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दिया जाये तो जाट गोरे, पतले, लम्बे और परिश्रमी देहयष्टि वाले ही हैं। इसलिये इतिहास की दृष्टि से यह जानना रोचक तथा महत्त्वपूर्ण होगा कि जाट कौन हैं, ये भारतीय मूल के हैं अथवा विदेशों से आकर भारत में बसे हैं। जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जितने मत स्थापित किये गये, उतने अधिक मत किसी अन्य जाति की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्थापित नहीं किये गये। इनमें से कुछ प्रमुख मत तथा उनकी व्याख्या इस प्रकार से हैं-

    मत-1. जाट ईसा की प्रारम्भिक सदी में सीथियनों के भारत आक्रमण के समय उनके साथ बाहर से आये थे। सम्भवतः जाट सीथियनों से ही उत्पन्न हुए थे।

    व्याख्या- यह मत हेरोडोटस के मत के आधार पर ईस्वी 1820 के आसपास कर्नल टॉड ने स्थापित किया था।

    निष्कर्ष- यह मत सही नहीं माना जा सकता क्योंकि सीथियनों के भारत पर आक्रमण से पूर्व भी जाट सिंध में रहते थे।

    मत-2. जाट, जाठर क्षत्रिय हैं तथा ब्राह्मणों से ही उत्पन्न हुए हैं।

    व्याख्या- यह मत ईस्वी 1869 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) के विद्वान अंगद शास्त्री द्वारा प्रतिपादित किया गया था। उन्होंने पुराणों में से यह श्लोक उद्धृत किया- क्षत्र शून्ये पुरा लोके मार्गवेन यदा लोके। विलोक्या क्षत्रियां धरणी कन्यास्तेषां सहस्रशः ।। ब्राह्मणान् जगृहुस्मिन् पुत्रोत्पादन लिप्सया। जठरे धारितं गर्भ संरक्ष्य विधिवत् पुरा।। पुत्रान् सुषुविरे कन्या जाठरान् क्षात्रवंशजान्ं। अर्थात् जब परशुराम ने भारतखण्ड को क्षत्रियों से रहित कर दिया तो क्षत्रिय कन्याओं ने भारत खण्ड को क्षत्रिय रहित जानकर ब्राह्मणों से गर्भाधान स्वीकार किया और अपने जठर में धारित गर्भ की रक्षा करके जाठर नामके क्षत्र वंशीय पुत्रों को उत्पन्न किया जो आगे चलकर जाट कहलाये।

    निष्कर्ष- यह मत अपने समर्थन में पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता है। अतः यह अधिक विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। पुराणों के अनुसार परशुराम द्वारा क्षत्रियों का संहार कर देने के बाद समाज की रक्षा करने के लिये महर्षि वसिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर यज्ञोत्सव आयोजित करके समाज के जिन चार वीरों को क्षेत्रिय धर्म अपनाने का आदेश दिया गया था वे प्रतिहार, परमार, चौलुक्य तथा चाहमान नामों से प्रसिद्ध हुए। जाट मूलतः वैश्य वर्ण है। जाटों ने मुगलों के भारत में आने के बाद छोटे-छोटे राज्य स्थापित अवश्य किये किंतु इनका कोई प्राचीन साम्राज्य या राजवंश नहीं था।

    मत-3. वेदों में जिन्हें 'ज्येष्ठ कहा गया है, वही आगे चलकर जाट कहलाये।

    व्याख्या- यह मत यजुर्वेद के इस मंत्र के आधार पर स्थिर किया गया है- 'इमम् देवाऽसपत्नं सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जान राज्यायेन्द्र स्येन्द्रियाय......।

    निष्कर्ष- पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में इसे स्वीकार नहीं किया जा सका। ज्येष्ठ से -जेठ' बनता है, जाट नहीं।

    मत- 4. महाभारत में राजसूय यज्ञ के अवसर पर भगवान कृष्ण को ज्येष्ठ की उपाधि दी गई थी। श्रीकृष्ण के वंशज यदु तथा जाट नाम से प्रसिद्ध हुए।

    व्याख्या- इस मत के समर्थन में कहा जाता है कि जाटों के गोत्र यदुवंशियों से मेल खाते हैं।

    निष्कर्ष- जिस प्रकार जाटों के गोत्र यदुवंशियों से मेल खाते हैं उसी प्रकार चन्द्रवंशियों एवं सूर्यवंशियों से भी मेल खाते हैं, अतः इस तथ्य को प्रमाण नहीं माना जा सकता।

    मत-5. जाटों की उत्पत्ति शिव की जटाओं में हुई।


    व्याख्या- इस मान्यता के अनुसार जब सृष्टि की रचना हुई तब महादेव ने अपनी जटा में से कुछ भस्म निकालकर देवी पार्वती को दी। पार्वती ने उस भस्म का पुतला बनाकर महादेव से उसमें प्राण डालने की प्रार्थना की। महादेव ने पुतले में प्राण फूंक दिये। पार्वती ने उसका नाम 'हरतीतरवाल' रखा। हरतीतरवाल के दो बेटे गोदारा और पूनिया हुए जिनमें से जाटों की दो खापें गोदारा और पूनिया बनी। पीछे से और भी कौमें जाटों में मिल गईं। इसी प्रकार की एक कथा पुराण में अन्य स्थान पर भी मिलती है। इस कथा के अनुसार जब सती के पिता दक्ष ने यज्ञ किया और उसमें शिवजी को नहीं बुलाया तो सती बिना बुलाये ही अपने पिता के घर जा पहुंची। वहां सती अपने पति भगवान शिव का यज्ञ भाग न देखकर अपने पति के अपमान के कारण योगानल से जलकर भस्म हो गई। शिवजी ने दक्ष को दण्ड देने के लिये अपनी जटा से वीरभद्र नामक गण उत्पन्न किया। इसी वीरभद्र के वंशज जाट कहलाये।

    निष्कर्ष- जाटों का शिवजी की जटाओं से जो सम्बन्ध स्थापित किया गया है, वह एक ऐतिहासिक रूपक प्रतीत होता है जिसमें ऐतिहासिक सच्चाई छिपी हुई है। इस पर हम विस्तार से चर्चा आगे चलकर करेंगे।

    मत-6. जाट बाल्हीक कबीले की जर्तिका शाखा से उत्पन्न हुए हैं।

    व्याख्या- इस मत का प्रतिपादक जेम्स कैम्पबैल नामक विद्वान था। ग्रियर्सन ने भी इसी मत को स्वीकार किया है। वराह मिहिर की पुस्तक में जटासुराः तथा जटाधराः नामक जाति के लोगों को कावेरी के उत्तर-पूर्व और दक्षिण में निवास करना बताया गया है। जेम्स कैम्पबैल कहता है कि जर्तिका विदेशी थे तथा जिस समय कुषाणों ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय जर्तिका भी भारत में आये। यही जर्तिका आगे चलकर जाट कहलाये।

    ग्रियर्सन का कहना है कि महाभारत में मद्र देश के प्रसंग में मद्रक तथा जर्तिका कबीलों का वर्णन आया है। ये दोनों कबीले, बाल्हीक अथवा वाहीक कहे गये हैं। महाभारत में कहा गया है कि गंगा-यमुना, कुरुक्षेत्र और हिमालय से बाहर तथा रावी, चेनाव, झेलम, सतलुज, व्यास और सिंधु नदी के बीच में बाह्लीक देश है। वहां आपगा नदी के तट पर शाकल नामक नगर है, उसमें जर्तिका बाह्लीक जाति के नीच मनुष्य रहते हैं।

    ग्रियर्सन कहता है कि हिमालय में वर्णित यह प्रदेश आज का पंजाब है। भारत और पाकिस्तान दोनों का संयुक्त पंजाब। पंजाब में आज भी बहुत बड़ी संख्या में जाट निवास करते हैं। अतः स्पष्ट है कि जर्तिका जाति ही आगे चलकर जाटों में बदल गई। इस मत को के. आर. कानूनगो, ठाकुर देशराज तथा डॉ. रणजीत सिंह आदि ने गलत ठहराया है। उनके अनुसार महाभारत में जिस जर्तिका जाति का वर्णन आया है, वे आज के कश्मीरी हैं, न कि जाट। अपने समर्थन में ये विद्वान महाभारत के कर्ण पर्व में कर्ण द्वारा शल्य को कहे गये इस वक्तव्य का उल्लेख करते हैं-

    'वे (जर्तिका) धान और गुड़ की शराब बनाकर पीते हैं और लहसुन के साथ गोमांस खाते हैं। इनमें पिता, पुत्र, माता, श्वसुर और सास, चाचा, बहिन, मित्र, अतिथि, दास तथा दासियों के साथ मिलकर शराब पीने और गोमांस खाने की परम्परा है। इनकी स्त्रियां शराब में धुत्त होकर नंगी नाचती हैं। वे गोरे रंग तथा ऊँचे कद की हैं। इस प्रदेश की ़िस्त्रयां बाहर दिखाई देने वाली मालाएं और चन्दन आदि सुगन्धि लगाकर, शराब पीकर, मस्त होकर, नंगी होकर, घर-द्वार और नगर के बाहर हँसती-गाती और नाचती हैं। वे ऊनी कम्बल लपेटती हैं, उन स्त्रियों का स्वर गधे और ऊँट के समान होता है। उनमें प्रत्येक प्रकार के शिष्टाचार की कमी है। वे खड़ी होकर पेशाब करती हैं।'

    मद्रराज शल्य को नीच ठहराता हुआ कर्ण कहता है- 'किसी समय बाह्लीक देश का एक व्यक्ति कुरुजांगल (आज का नागौर-बीकानेर क्षेत्र) में आया। एक दिन वह उदास मन से स्त्रियों के बारे में सोचने लगा कि ऊन के कम्बल की साड़ी पहनने वाली मेरी मोटी, गोरी स्त्री मेरा स्मरण करती होगी। इसलिये मैं शतद्रु तथा इरावती को पार करके अपने देश जाऊंगा तथा बड़ी-बड़ी चूड़ियों को पहनने वाली उन सुन्दर स्त्रियों को देखूंगा। सुखद मार्गों वाले पीलू-कैर और शमी (खेजड़ी) वाले वन में, मैं कब जाऊंगा? ....... जो सूअर, मुर्गा, गाय, गधा, ऊँट और भेड़ का मांस नहीं खाते उनका जन्म निरर्थक है........।'

    कर्ण आगे कहता है - 'हे शल्य! जहां पीलू और दाख का विशाल वन है उसी देश में सतलुज, रावी, व्यास, झेलम, चिनाव और सिंधु नदियां बहती हैं, उन देशों का नाम आरट्ट है। वहां के मनुष्य अधर्मी होते हैं। वे मिट्टी और काठ के बर्तनों में खाते हैं, उन्हीं बर्तनों को कुत्ते चाटते हैं, उन्हीं में ये लोग घृणा रहित होकर भोजन करते हैं। वे बकरी, गधी और ऊँटनी का दूध पीते हैं। उनकी सृष्टि प्रजापति से नहीं हुई। वे तो वाही और हीक नामक पिशाच दम्पत्ति की संतान हैं।'

    निष्कर्ष- कानूनगो तथा उनके मत के अन्य विद्वानों का कहना है कि बाह्लीक देश कोई ठण्डा प्रदेश था तभी तो वहां की स्त्रियां ऊनी कम्बल की साड़ियां पहनती थीं। अतः बाह्लीक देश का जर्तिका कबीला कश्मीरियों का पूर्वज था, न कि जाटों का। जर्तिका जाति गौमांस खाती थी किंतु जाट तो गाय के पुजारी हैं, उसे माता मानते हैं। जर्तिका जाति को बाही तथा हीक पिशाच दम्पत्ति से उत्पन्न बताया गया है। इसका अर्थ है कि वे आर्यों से अलग थे जबकि जाट तो आर्य हैं। इस प्रकार ये विद्वान जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्तिका मत का खण्डन करते हैं।

    मत-7. जाटों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण द्वारा बनाये गये 'ज्ञाति' संघ से हुई है।

    व्याख्या- इस मत के प्रतिपादक ठाकुर देशराज हैं। उनका मानना है कि यदुवंश की अन्धक तथा वृष्णि शाखाओं ने एक राजनैतिक संघ स्थापित किया। इस संघ के भीतर कंस को परास्त करने के उपरान्त श्रीकृष्ण ने यादवों के अनेक प्रजातन्त्रीय समूहों को एकत्रित करके जरासन्ध की दृष्टि से दूर एक ऐसी शासन प्रणाली की नींव डाली जो प्रजातन्त्रीय थी तथा उसमें कोई भी जाति सम्मिलित हो सकती थी। यह संघ 'ज्ञाति' कहलाता था। इसमें सम्मिलित होने वाले व्यक्ति को अपने पूर्व वंश से पुकारे जाने के स्थान पर 'ज्ञाति' कहा जाता था। इस प्रकार विभिन्न जातियों का समूह 'ज्ञाति' कहलाया और आगे चलकर जाट बन गया।

    निष्कर्ष- यह मत स्वीकार नहीं किया जा सकता। जाट जाति एक स्वतंत्र तथा सबसे भिन्न जाति है। यह विभिन्न प्रकार की जातियों का समूह नहीं है, इस बात की पुष्टि जाटों की शारीरिक रचना को देखने मात्र से हो जाती है।

    मत-8. जाट अजातीय हैं।

    व्याख्या- यह मान्यता लोक प्रचलित है। इसके अनुसार जब महाभारत के युद्ध में क्षत्रिय पुरुष नष्ट हो गये तब श्रीकृष्ण ने क्षत्रिय नारियां विभिन्न वर्णों के पुरुषों को सौंप दी। इन क्षत्रिय स्त्रियों से उत्पन्न संतान की कोई एक जाति नहीं थी। अतः वे अजातीय कहलाये और आगे चलकर 'जाट' बन गये।

    निष्कर्ष- यह मत भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। वस्तुतः ठाकुर देशराज ने श्रीकृष्ण द्वारा जिस 'ज्ञाति' संघ की स्थापना की कल्पना की है, वह कल्पना इसी मत का परिष्कृत रूप मात्र है।

    मत- 9. जाट दसरेक जाति के वंशज हैं।

    व्याख्या-
    राजशेखर रचित काव्यमीमांसा के पंचादेशों में दसरेक जनपद के एक दूत का वर्णन है। उसका मुख बकरे का सा, आंखें बंदर की सी भूरी तथा कन्धा भूरे बालों से युक्त बताया गया है। उसने गुह्य स्थानों को ढंकने के लिये उसने फटे-पुराने चिथड़े काम में लिये थे और वह मूली खाता आ रहा था जिससे ऐसा प्रतीत होता था कि यह पिशाच है। उसकी भाषा भी प्राचीन राजस्थानी अपभ्रंश जैसी है। इस दूत के 'दसरेक जनपद' को आज का पश्चिमी राजस्थान तथा इस दूत को प्राचीन आभीर माना जाता है। आचार्य परमेश्वर सोलंकी ने इन आभीरों को जाटों का पूर्वज अनुमानित किया है।

    निष्कर्ष- राजशेखर की काव्यमीमांसा में वर्णित दसरेक जनपद का व्यक्ति जाट है, यह किसी भी प्रकार से सिद्ध नहीं होता। आभीरों की संतानें जाट हुईं, इस सम्बन्ध में भी कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता। अतः यह मत पूर्णतः गल्पमात्र है।

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