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     03.06.2020
    भगवान सूर्य की पत्नी के नाम से विख्यात क्षेत्र तालिबानियों ने हड़प लिया

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    भगवान सूर्य की पत्नी के नाम से विख्यात क्षेत्र तालिबानियों ने हड़प लिया पाकिस्तान के धुर पश्चिम में स्वात क्षेत्र स्थित है। यह हरी-भरी पहाडि़यों वाला अत्यंत सुंदर क्षेत्र है। इसीलिये इसे स्वात कहा जाता है। स्वात शब्द;स्वाति; का अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है- सूर्य की पत्नी। यह क्षेत्र सचमुच इतना सुंदर है कि इसे भगवान सूर्य की पत्नी कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं। किसी समय यहाँ सैंकड़ों नदियों और झरनों के किनारों पर वैदिक ऋचाऐं गूंजा करती थीं। सैंकड़ों ऋषि मुनि यहां बैठकर सृष्टि की रचना और मनुष्य जीवन के उद्देश्यों के बारे में चिंतन और सृष्टिकर्त्ता का स्तवन किया करते थे। इसी स्वात घाटी के पश्चिम में स्थित है बामियान जिसे कभी नूरिस्तान भी कहा जाता था। अब स्वात पकिस्तान में है तथा बामियान अफगानिस्तान में। जब सैंकड़ों बौद्ध भिक्षु, भगवान बुद्ध के संदेश लेकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गये तो उनमें से कुछ भिक्षु स्वात घाटी तथा उससे लगे हुए बामियान को संसार की सबसे सुंदर तपस्थली मानकर यहीं रुक गये। उन्होंने यहां की पहाडि़यों में भगवान बुद्ध की हजारों मूर्त्तियों का उत्कीर्णन किया। बुद्ध की इन मूर्त्तियों ने इस क्षेत्र में नये स्वर्ग की रचना की। जब कोई भूला बिसरा यात्री इस क्षेत्र में अचानक पहुँच जाता से इस स्वर्ग को देखकर हैरान रह जाता। जब सूर्य रश्मियां हरियाली से ढकी हुई पहाडि़यों और उनमें उत्कीर्णित भगवान बुद्ध की हजारों मूर्त्तियों पर अठखेलियां करतीं तो लगता कि रश्मिरथी सूर्य की पत्नी स्वाति ने स्वयं प्रकट होकर भगवान सूर्य की रश्मियों से अपना शृंगार किया है। इस क्षेत्र में भगवान बुद्ध की मूर्त्तियों का इतने बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ कि यहां से मूर्त्तिशिल्प की गांधार शैली विकसित हुई। जब सिकन्दर विश्व विजय का स्वप्न लेकर भारत आते समय इस क्षेत्र से निकला तो वह इस सुंदर स्थान को देखकर हैरान रह गया। कुछ समय बाद जब सिकंदर ने घायल होकर विश्व विजय का स्वप्न त्याग दिया और वह वापस यूनान जाने के लिये लौटा तो उसने बामियान क्षेत्र पर अपना अधिकार बनाये रखने के लिये अपनी सेना का एक हिस्सा यहीं छोड़ दिया। सिकन्दर के आदेश से हजारों यूनानी सैनिक अपने परिवारों सहित यहीं बस गये। नीली आँखों और लाल बालों के सैंकड़ों सुंदर यूनानियों के आ बसने से यह क्षेत्र और भी सुंदर हो गया। उनके देह सौंदर्य के कारण ही अफगानिस्तान के लोग इस क्षेत्र को नूरिस्तान कहने लगे। जब अफगानिस्तान पर अरब आक्रांताओं का आक्रमण हुआ तो नूरिस्तान के लोगों ने अरब आक्रांताओं के धर्म को मानने से मना कर दिया। अरब आक्रांता नूरिस्तान के बहादुर यूनानी लोगों को परास्त नहीं कर सके, न ही अन्य किसी तरह से उन्हें अपना धर्म कबूल करवा सके। हार-थक कर अरब लोगों ने इस क्षेत्र का नाम बदलकर काफिरिस्तान कर दिया। जब चंगेजखाँ बामियान घाटी में पहुँचा तो वह यहाँ के नैसर्गिक सौंदर्य, शिल्प सौंदर्य और मानव सौंदर्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। काफिरिस्तान के सुंदर इंसानों को मारने में चंगेजखाँ को बड़ा आनंद आया। नीली आँखों और लाल बालों वाले इंसानों की भयाक्रांत चीखों ने उसके तन-मन में आनंद भर दिया। चंगेज खां ने उन्हें तड़पा-तड़पा कर मारा। बहादुर होने पर भी यूनानी लोग चंगेजखाँ के सैनिकों का सामना नहीं कर सके। हजारों स्त्री-पुरुष और बच्चे प्राण बचाने के लिये पहाड़ों में भाग गये। चंगेजखाँ ने उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर मौत के घाट उतारा। नूरिस्तान से निबट कर चंगेजखाँ ने बामियान घाटी में ही बसे सुर्ख शहर को जा घेरा। सुर्ख शहर की प्राकृतिक बनावट तथा दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी थी कि उस पर कोई भी सेना बाहर से आक्रमण करके अधिकार नहीं कर सकती थी, चाहे शत्रु सेना सौ वर्षों तक ही शहर को घेर कर क्यों न बैठी रहे। सुर्ख के राजा को नित्य नये विवाह करने का शौक था इसलिये वह चंगेजखाँ जैसे दुर्दांत शत्रु की परवाह किये बिना अपना विवाह करने के लिये चला गया तथा शहर को राजकुमारी के भरोसे छोड़ गया। सुर्ख की राजकुमारी अद्वितीय संुदरी थी तथा विवाह के योग्य भी। उसने चंगेजखाँ को गुप्त संदेश भिजवाया कि यदि चंगेजखाँ उसे अपनी रानी बना ले तो वह शहर पर उसका अधिकार करवा देगी। चंगेजखाँ ने राजकुमारी की शर्त स्वीकार कर ली। राजकुमारी ने चंगेजखाँ के आदमियों को वह पहाड़ी बता दी जहाँ से सुर्ख शहर को पानी मिलता था। चंगेजखाँ ने पानी का प्रवाह रोक दिया। पानी न मिलने के कारण सुर्ख शहर में हाहाकार मच गया और सुर्ख की सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा। सुर्ख पर अधिकार करते ही चंगेजखाँ ने राजकुमारी के महल को छोड़कर शेष शहर में कत्ले आम करने का आदेश दिया। चंगेजखाँ की वहशी सेना ने कई दिन तक शहर में कहर बरपाया किंतु राजकुमारी का महल लूट, हत्या और बलात्कार से बचा रहा। एक दिन शाम के समय चंगेजखाँ ने राजकुमारी को संदेश भिजवाया- ‘कल सवेरे फौज कूच करेगी। आप बाहर आ जाइये।’ राजकुमारी सफर के लिये तैयार होकर बाहर आ गयी। फौज पंक्तिबद्ध होकर प्रस्थान के लिये तैयार खड़ी थी। चंगेजखाँ राजकुमारी के स्वागत में उठ कर खड़ा हुआ। राजकुमारी दोनों बाहें फैलाकर आगे बढ़ी किंतु उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा जब उसने चंगेजखाँ के आदेश को सुना। वह अपने सैनिकों से कह रहा था- ‘प्रत्येक सिपाही इस दुष्ट राजकुमारी के सिर पर एक पत्थर मारे। जो अपने बाप की नहीं हुई वह मेरी क्या होगी?’ चंगेजखाँ के आदेश का पालन हुआ। राजकुमारी चीख मार कर नीचे गिर पड़ी। थोड़ी देर बाद उसकी लोथ ही वहाँ रह गयी। राजकुमारी के महल की ईंट से ईंट बजा दी गयी। चंगेजखाँ की सेना लूट-खसोट और कत्ले-आम के नये अध्याय लिखने के लिये आगे चल पड़ी। पीछे छोड़ गयी सुर्ख शहर के खण्डहर, जो आज भी चंगेजखाँ के क्रूर कारनामों और राजकुमारी के पितृद्रोह की कहानी सुनाने के लिये मौजूद हैं। जब चंगेजखाँ अपनी सेना के साथ बामियान की घाटी में एक पहाड़ी क्षेत्र से होकर निकला तो उसने बहुत दूर से एक पहाड़ी से सट कर खड़े दो विशाल बुतों को देखा। निकट पहुँचने पर उसने पाया कि इन विशाल बुतों के पास छोटे-छोटे हजारों बुत बिखरे पड़े हैं। उसने पहाडि़यों में बनी हुई हजारों गुफाओं को भी देखा जो पत्थरों को काटकर बनाई गयी थीं। इन गुफाओं की दीवारों पर भी हजारों बुत खड़े थे जिनमें बहुत से टूटे हुए थे। इस अद्भुत दृश्य को देखकर उसकी आँखें हैरानी से फैल गयीं। दरअसल चंगेजखाँ उन पहाडि़यों में पहुँच गया था जहाँ उसके पहुँचने से लगभग सवा हजार साल पहले बौद्ध भिक्षुओं ने सैंकड़ों पहाडि़यों को काटकर विशाल बौद्ध मठों का निर्माण किया था तथा एक पहाड़ी के बाहरी हिस्से को काटकर भगवान बुद्ध की दो विशाल मूर्तियाँ बनाईं थीं। इन मूर्तियों के ऊपर विशाल मेहराबों का निर्माण किया गया था। मेहराबों में भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र से सम्बन्धित कई रंगीन चित्र भी बनाये थे। भिक्षुओं ने आसपास की पहाडि़यों को काटकर हजारों गुफाओं का निर्माण भी किया था तथा उनमें सुंदर मूर्तियों का उत्कीर्णन किया था। जब अंग्रेजों ने अफगानिस्तान पर अधिकार किया तो उन्होंने बामियान और स्वात क्षेत्र में बिखरी हुई मूर्त्तियों को फिर से सहेजने का काम किया। इस क्षेत्र में बिखरी सैंकड़ों मूर्त्तियों को एकत्रित करके एक म्यूजियम में रखवाया गया। आज ये मूर्त्तियां पाकिस्तान के स्वात क्षेत्र में बने एक राजकीय संग्रहालय में रखी हैं जिसे ‘‘स्वात म्यूजियम’’ के नाम से जाना जाता है। इन मूर्त्तियों को देखने के लिये दुनिया भर के हजारों पर्यटक प्रतिवर्ष स्वात पहुंचते हैं। इनमें ं यूरोपीय देशों के साथ ही चीन, जापान, कोरिया आदि उन एशियाई देशों के पर्यटक भी बड़ी संख्या में होते हैं जिनमें बौद्ध धर्म की व्यापक स्तर पर मान्यता है। वर्ष 1998 में अफगानिस्तान में जब तालिबान अपने चरम उफान पर था तब उन्होंने इन मूर्त्तियों पर तोपों से गोले बरसाये। भगवान बुद्ध की सैंकड़ों मूर्त्तियां एक बार फिर तोड़ डाली गईं। जब अमरीका ने तालिबान को अफगानिस्तान से खदेड़ दिया तब तालिबान ने भागकर पाकिस्तान में शरण ली। अब स्वात घाटी का वह हिस्सा जो पाकिस्तान में है, तालिबान के चंगुल में है। तालिबान ने धमकी दी है कि वह पाकिस्तान सरकार के राजकीय संग्रहालय;स्वात म्यूजियम को तोड़ कर नष्ट कर देगा। यह तो समय बतायेगा कि तालिबान स्वात म्यूजियम को निगल जायेगा या उससे पहले पाकिस्तान उन पर कोई कार्यवाही करने में सफल होगा किंतु यह निश्चित है कि यदि तालिबान स्वात म्यूजियम को निगलने में कामयाब हुआ तो उसका अगला निशाना यहां से केवल 40 किलोमीटर दूर स्थित तक्षशिला होगा। वही तक्षशिला जो किसी समय ज्ञान-विज्ञान और दर्शन का केन्द्र था और अब पूरी तरह खण्डहर के रूप में मौजूद है। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता,

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