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  • द्वितीय विश्वयुद्ध में राजपूताने के कई राजा मोर्चे पर गये

     11.10.2017
    द्वितीय विश्वयुद्ध में राजपूताने के कई राजा मोर्चे पर गये

    3 सितम्बर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। ब्रिटिश सरकार को राजाओं से आदमी, धन तथा सामग्री के रूप में सहायता की आशा थी। राजपूताने के राजाओं ने इस आशा को व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की भरपूर सहायता की। जोधपुर महाराजा इससे पूर्व ही 26 अगस्त 1939 को वायसराय को तार भेजकर अनुरोध कर चुके थे कि भयानक अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में मैं यह अनुभव करता हूँ कि महामहिम वायसराय से अनुरोध करना मेरा कर्तव्य है कि कृपा करके संकट के समय महामना सम्राट के आदमियों तथा उनके सिंहासन के प्रति मेरी अविचल स्वामिभक्ति के बारे में सूचित किया जाये। मेरी प्रार्थना है कि युद्ध आरंभ होने पर मेरे राज्य के समस्त नागरिक एवं सैन्य संसाधन साम्राज्यिक सरकार के निष्पादन पर रखे जायें।

    जोधपुर नरेश भारत भर के राजाओं में सबसे पहले थे जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत सेवाएं तथा अपने राज्य के समस्त संसाधन साम्राज्यिक सरकार को सौंप दिये। वायसराय ने जोधपुर महाराजा को धन्यवाद का तार भिजवाया। जोधपुर का सरदार रिसाला प्रथम भारतीय राज्य सैन्य इकाई था जिसे भारतीय सेना में लिया गया तथा मोर्चे पर लड़ने के लिये चयनित किया गया। जोधपुर इन्फैण्ट्री युद्ध क्षेत्र में युद्ध के प्रारंभिक चरण में पहुंची। जोधपुर राज्य के सैनिक पांचवी सेना के साथ इटली के सलेरनो में उतरने वाले प्रथम सैनिक थे। जोधपुर वायु प्रशिक्षण केंद्र का भारतीय वायु सेना के पायलटों के प्रशिक्षण के लिये प्रबंधन किया गया। राज्य की ओर से तीन हवाई जहाज एवं एक गल ग्लाईडर ब्रिटिश सरकार को दिये गये। वायसराय युद्ध कोष के लिये राज्य की ओर से 3 लाख रुपये तथा जनता की ओर से 20 हजार रुपये दिये गये।

    जोधपुर राज्य की ओर से 25 हजार रुपये रैडक्रॉस फंड में दिये गये। युद्ध विभाग के लिये जोधपुर रेलवे वैगन निर्माण कारखाने में मीटर गेज के डिब्बे बनाये गये। जोधपुर रेलवे ने फाइटर एयर क्राफ्ट के लिये 4 लाख रुपये दिये। जोधपुर राज्य की जनता की ओर से जोधपुर बॉम्बर के लिये 2 लाख 30 हजार रुपये लंदन भिजवाये गये। राज्य की ओर से 4,71,200 रुपये का सोडियम सल्फेट युद्ध कार्य के लिये उपलब्ध करवाया गया। 1942-43 में जोधपुर की ओर से वायसराय युद्ध कोष के लिये 4 लाख रुपये और भिजवाये गये। इसके अलावा भी बहुत से संसाधन भेजे गये। महाराजा उम्मेदसिंह अपने छोटे भाई के साथ स्वयं युद्ध के मोर्चे पर गये। जब मित्र राष्ट्रों की सेनाएं विजयी हुईं तो जोधपुर में विजय समारोह आयोजित किये गये।

    युद्ध आरंभ के अगले दिन अर्थात् 4 सितम्बर 1939 को बीकानेर महाराजा ने युद्ध क्षेत्र में जाने के सम्बन्ध में पूर्व में किये गये अपने अनुरोधों को दोहराया तथा डेढ़ लाख रुपये ब्रिटेन के सम्राट को भिजवाये और एक हजार पाउंड युद्ध कार्यों के लिये दिये। बीकानेर राज्य के गंगा रिसाला को मध्यपूर्व में लड़ने के लिये भेजा गया। महाराजा गंगासिंह स्वंय रशिया तथा अदन के मोर्चे पर गये। सादुल लाइट इन्फैंट्री को ईराक तथा पर्शिया में लड़ने के लिये भेजा गया। बीकानेर विजय बैटरी ने भी विदेश में जाकर सम्राट की सेनाओं के साथ युद्ध सेवाएं दीं। इस सेना ने अराकान तथा मनिपुर में इन्फैन्ट्री की महत्वपूर्ण सहायता की।

    जयपुर नरेश मानसिंह भी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सम्राट को अपनी निजी सेवाएं तथा अपनी सैनिक सेवाएं अर्पित करने वाले प्रथम राजाओं में से थे। उन्हें विश्वास था कि ब्रिटेन नाजी जर्मनी से अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के लिये नहीं अपितु विश्वशांति तथा सभ्यता के संरक्षण के लिये लड़ रहा था।

    महाराजा का दृढ़ विश्वास था कि इंगलैण्ड विश्व के नागरिकों के प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये लड़ रहा था।

    युद्ध आरंभ होने पर जयपुर की प्रथम बैटेलियन मध्य पूर्व में भेजी गयी जहाँ उसे मिश्र, साइप्रस, लीबिया, सीरिया तथा फिलिस्तीन में विभिन्न कामों पर लगाया गया। इसके बाद यह सेना इटली गयी जहाँ उसने जर्मनों के विरुद्ध लड़ते हुए अत्यंत कठिन बिंदु माउंट बफैलो पर अधिकार किया। युद्ध के दौरान प्रदत्त सेवाओं के लिये इस सेना को कई अलंकरण एवं पुरस्कार दिये गये।

    जयपुर नरेश मानसिंह को अपनी सेनाएं मोर्चे पर भेज कर ही संतोष नहीं हुआ। जिस दिन युद्ध आरंभ हुआ, उसी दिन महाराजा ने वायसराय को केबल भेजकर अनुरोध किया कि वह सम्र्राट से प्रार्थना करके मुझे अपने जीवन रक्षकों के साथ युद्ध के मोर्चे पर भिजवाये। वायसराय ने उत्तर भिजवाया कि अच्छा होगा कि वह भारत में ही रहे तथा अपने राज्य में कर्तव्य का निर्वहन करे। 12 सितम्बर को मानसिंह ने बकिंघम पैलेस को केबल किया कि मेरी व्यक्तिगत सेवाएं मेरे प्रिय संप्रभु के निष्पादन पर रखी जायें। बकिंघम पैलेस ने भी वही उत्तर दिया जो वायसराय ने दिया था।

    1940 के पूरे वर्ष में जयपुर नरेश इस अनुरोध को दोहराता रहा। वह ब्रिटिश सम्राट को उसी प्रकार की सेवाएं देना चाहता था जैसी कि उसके पूर्वज मुगलों को देते आये थे। अंत में उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी और अप्रेल 1941 में वह मध्यपूर्व के मोर्चे पर गया जहाँ कि उसकी अपनी रेजीमेण्ट तैनात थी। महाराजा मानसिंह ने सम्राट जॉर्ज षष्ठम् का आभार व्यक्त करते हुए केबल के माध्यम से विश्वास दिलाया कि मेरी तथा मेरे परिवार की अविचलित स्वामिभक्ति तथा शाश्वत निष्ठा महामना सम्राट तथा उनके सिंहासन के प्रति सदैव बनी रहेगी। मानसिंह ने युद्ध आरंभ होते ही वायसराय युद्ध कोष में 3 लाख रुपये भिजवाये। 10 लाख रुपये युद्ध ऋण के लिये दिये। जयपुर राज्य ने द्वितीय विश्वयुद्ध पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च किये।

    उदयपुर के महाराणा भूपालसिंह ने युद्ध आरंभ होते ही 75 हजार रुपये युद्धकोष के लिये भिजवाये तथा युद्ध चलने तक प्रतिवर्ष 50 हजार रुपये भिजवाने का वचन दिया। ई.1940 में मेवाड़ लांसर्स तथा मेवाड़ इन्फेंट्री को मध्यपूर्व में लड़ने के लिये भेजा गया। युद्ध काल में राजसमंद झील का उपयोग नौसैनिक वायुयानों के लिये लैंण्डिंग बेस के रूप में किया गया। ब्रिटिश आर्मी के लिये मेवाड़ी नौजवान भर्ती किये गये तथा सामग्री भी प्रदान की गयी।

    द्वितीय विश्व युद्ध अंग्रेजी साम्राज्य के लिये अत्यंत घातक सिद्ध हुआ। इस समय तक राजा लोग जान गये थे कि यदि उन्हें भारत में अपना अस्तित्व बचाये रखना है तो हर हालत में अंग्रेजों को विजय की ओर ले जाना होगा। इस कारण उन्होंने प्राण प्रण से अंग्रेजों की सहायता की। यद्यपि विजयश्री अंत में अंग्रेजों का ही वरण करने वाली थी किंतु उसने अंग्रेजों के गले में विजयमाला डालने में इतना विलम्ब कर दिया कि अंग्रेजी साम्राज्य का चमकीला सूर्य अस्ताचल की ओर लुढ़क गया।

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