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  • राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!

     03.06.2020
    राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!


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    राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!

    25 जुलाई को देश के नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने पहले भाषण में जवाहरलाल नेहरू का नाम नहीं लिया। गांधी के साथ, जनसंघ के संस्थापक सदस्य दीनदयाल उपाध्याय का नाम लिया तथा शपथ ग्रहण समारोह में राष्ट्रपति भवन में जय श्री राम के नारे लगे। कांग्रेस की दृष्टि में ये ऐसे अपराध हैं जिनकी अपेक्षा धर्म निरपेक्ष देश के राष्ट्रपति से नहीं की जा सकती जिसे संविधान की रक्षा करनी है।

    रामनाथ कोविंद ने तो राम, कृष्ण, बुद्ध, वेदव्यास, चाणक्य, समुद्रगुप्त, विवेकानंद, कबीर, दयानंद, भगतसिंह, सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर आदि हजारों महापुरुषों और सती, सावित्री, अनुसूइया, राधा, सीता, जीजाबाई, लक्ष्मीबाई, दुर्गावती आदि महान नारियों के नाम भी नहीं लिए जिन्होंने इस देश का निर्माण किया तथा जो इस देश की आत्मा में रचते-बसते हैं। क्या कांग्रेस यह कहना चाह रही है कि भारत राष्ट्र का जन्म 15 अगस्त 1947 को हुआ था! उससे पहले तो भारत था ही नहीं ! इसलिए राष्ट्रपति को अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नेहरू का नाम लेना आवश्यक है!

    नेहरू के नाम पर कांग्रेसियों को इतना ही गर्व है तो उनकी उपलब्धियां याद कर लें। उनके समय में पाकिस्तान और चीन ने भारत पर आक्रमण किए। पाकिस्तान और चीन ने कश्मीर का दो-तिहाई हिस्सा दबा लिया। नेहरू की नीतियों के कारण तिब्बत को चीन निगल गया। नेहरू की नीतियों के कारण नेपाल का राजा जो किताबों के बक्से में छिपकर भारत में मिलने आया था, उसे वापस लौटा दिया गया। नेहरू की नीतियों के कारण इजराइल से लगभग आधी शताब्दी तक भारत सरकार अपने सम्बन्ध नहीं बना सकी। नेहरू की नीतियों के कारण कश्मीर में धारा 370 लागू हुई और कश्मीर की समस्या यूएनओ पहुंची। कांग्रेसी नेताओं को नेहरू की नीतियों का और अधिक ज्ञान प्राप्त करना हो तो सरदार पटेल का 7 नवम्बर 1950 का वह पत्र पढ़ लें जिसमें उन्होंने नेहरू को उनकी नीतियों के कारण बुरी तरह लताड़ा है।

    नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कैसे बने, यह भी स्मरण कर लें। 1946 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना जाना था। गांधी सहित पूरा देश जानता था कि इस बार कांग्रेस का जो अध्यक्ष चुना जायेगा, अंग्रेज सरकार उसी को भारत का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाएगी और वही स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री भी बनेगा। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव अधिकृत प्रदेश कांग्रेस कमेटियों द्वारा किया जाता था। उस समय देश में 15 अधिकृत प्रदेश कांग्रेस कमेटियां थीं जिनमें से 12 कमेटियों ने सरदार पटेल को इस पद के लिए चुना तथा तीन कमेटियों ने अलग-अलग नाम दिए जिनमें नेहरू का नाम शामिल नहीं था। मोहनदास गांधी हर कीमत पर नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे क्योंकि मुसलमानों के मामले पर सरदार पटेल को सख्त तथा नेहरू को मुलायम माना जाता था। इसलिए गांधीजी ने जे. बी. कृपलानी के माध्यम से कांग्रेस कमेटियों पर दबाव बनाया कि वे पटेल की जगह नेहरू को चुनें किंतु एक भी कांग्रेस कमेटी ने नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना स्वीकार नहीं किया। इसलिए गांधीजी ने सीधे पटेल से कहा कि वे अपनी दावेदारी छोड़ दें। पटेल ने गांधी की बात मान ली और नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के साथ-साथ देश के पहले प्रधानमंत्री बने।

    कांग्रेस के एक बड़े नेता ने यह भी कहा है कि हमें तो दीनदयाल उपाध्याय की केवल एक ही उपलब्धि ज्ञात है कि 1968 में मुगल सराय रेलव स्टेशन पर ट्रेन के टॉयलेट में उनका शव मिला था। ऐसी बेशर्मी वाली बात करने वाले नेताओं को देश की जनता प्रबल बहुमत से नकार चुकी है। फिर भी वे अपनी जिह्वा से दूसरे दलों के नेताओं के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने से बाज नहीं आते। कांग्रेस को इस बात पर भी आपत्ति है कि राष्ट्रपति भवन में जय श्री राम के नारे क्यों लगे! कांग्रेस जो कुछ कह रही है उसका सीधी अर्थ यह है कि राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम लेना एक पवित्र अनिवार्यता है और जय श्री राम के नारे लगना त्याज्य बुराई ! कांग्रेस इस बात को देश के 100 करोड़ से अधिक रामभक्तों के गले कैसे उतार सकेगी !

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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