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  • इस्लामिक स्टेट में सूफी संतों के लिये जगह नहीं होगी!

     03.06.2020
    इस्लामिक स्टेट में सूफी संतों के लिये जगह नहीं होगी!

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    इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया के नाम से चल रहे मध्य एशियाई आतंकी संगठन ने पाकिस्तान में सूफी मत के संत की मजार पर 108 लोगों को मौत के घाट उतार कर एक बार फिर पूरी दुनिया को संदेश दिया है कि इस्लामिक स्टेट में सूफी मत के लिये कोई जगह नहीं होगी। ऊपरी तौर पर तो ऐसा ही लगता है कि यह मामला इतना ही है किंतु मामला केवल इतना ही नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि इस्लामिक स्टेट में किसी भी इंसान के लिये कोई जगह नहीं है। वहां केवल राक्षसों, शैतानों, पिशाचों, हैवानों और रक्त पिपासु जीवों के लिये जगह है। सूफी मत, इस्लाम से भी पुराना है तथा इसकी रहस्यवादी उपासना पद्धति का जन्म स्वतन्त्र रूप से हुआ है किंतु उसने विश्व के लगभग समस्त प्रमुख धार्मिक मतों से रहस्यवादी दर्शन को ग्रहण करके सार्वभौमिक स्वरूप ग्रहण किया है। उस पर भारतीय वेदान्त तथा बौद्ध धर्म का प्रभाव है तो यूनान के अफलातून (अरस्तू) के मत का भी उतना ही प्रभाव है। मसीही धर्म से भी उसने बहुत कुछ लिया है तो पैगम्बर मुहम्मद ने भी उस पर अपनी छाप छोड़ी है। इन सारे धर्मों और मतों में जो कुछ भी रहस्यमयी उपासना पद्धतियां थीं उन सबको सूफियों ने ग्रहण करके अपने लिये एक ऐसे अद्भुत दर्शन की रचना की जो अपने आप में बेजोड़ है। छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाई के। मोहे सुहागन कीनी से मोसे नैना मिलाई के .....। XXX गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस चल खुसरो घर आपने रैना भई विदेस।। ..... इस तरह की मीठी, मनमोहक तथा दिल को छने वाली बातें सूफी मत ही कह सका। मध्य एशिया की शामी जातियों के कबीलों की गोद में सूफी मत ने जन्म लिया तथा प्रेम के बोल बोलते हुए और अपनी मस्ती में नाचते-गाते हुए यह मत पूरी दुनिया में फैल गया। सूफी मत के भीतर बहुत से सम्प्रदाय हो गये जिनमें से 14 सम्प्रदाय भारत में आये। इनमें से भी चार सम्प्रदयों ने भारत में विशेष प्रभाव जमाया। पाकिस्तान में जिस सूफी संत की मजार पर आईसिस ने यह खूनी खेल खेला है, वह भी उसी धरती से सिन्ध पहुंचा जिस धरती पर आईसिस का जन्म हुआ है। सूफी मतों ने इस्लाम से जितना लिया नहीं है, उतना दिया है। इन्होंने ही भारत में इस्लाम के प्रसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। औरंगजेब की तलवार जो काम नहीं कर सकी, सूफियों के प्रेम के तरानों ने वो काम किया। भारत के मुसलमान तो इस्लाम और सूफी मत में अंतर करना भी नहीं जानते। वे अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और नागौर के सुल्तानुत्तारकीन की दरगाह पर उसी शिद्दत से जाते हैं जिस शिद्दत से वे किसी मस्जिद में या हज पर जाते हैं। आईसिस का यह कारनामा ऐसा ही है जैसे किसी पेड़ पर बैठकर उसके तने को काटना। यदि ट्रम्प ऐसे आईसिस को नष्ट करने के लिये संकल्पबद्ध हैं तो अमरीका में उनका विरोध करने वालों पर हैरानी होती है। तथा यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या अमरीका में भी आईसिस अपनी जड़ें गहरी जमा चुका है! क्या वे भी चाहते हैं कि आईसिस का खात्मा न हो, आतंकवाद का खात्मा न हो! कुल मिलाकर अजीब ही है ये दुनिया! यह सोचना भी गैरवाजिब नहीं लगता कि जब आईसिस पाकिस्तान के सिंध प्रदेश में ऐसे रक्तरंजित कारनामों को अंजाम दे सकता है, तो भारत क राजस्थान वहां से अधिक दूरी पर नहीं है। क्या इन क्रूर दैत्यों का ...अगला निशाना हम ही हैं! - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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