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  • बचाना होगा भारत के पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को

     07.06.2017
    बचाना होगा भारत के पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को

    लंदन के लेगटम संस्थान और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन ने उनासी मानकों के आधार पर विश्व के एक सौ चार देशों का रिपोर्ट कार्ड तैयार किया है। इन देशों में विश्व की नब्बे प्रतिशत आबादी रहती है और इस सूची में भारत को पैंतालीसवां स्थान मिला है। सामाजिक मूल्यों के मामले में भारत को विश्व में पहले स्थान पर रखा गया है। यदि इस सूची में से विकसित देशों को निकाल दें तो विकासशील देशों की सूची में भारत को प्रथम दस शीर्ष देशों में स्थान मिला है। देश का सामाजिक ढांचा, परिवार व्यवस्था, मैत्री भावना, सरकार के आर्थिक सिद्धांत, उद्यमों के लिये अनुकूल वातावरण, विभिन्न संस्थाओं में लोकतंत्र, देश की शासन व्यवस्था, आम आदमी का स्वास्थ्य, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक मूल्य और सुरक्षा आदि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मानक हैं जिनकी कसौटी पर भारत संसार में पैंतानीसवें स्थान पर ठहराया गया है और चीन पिचहत्तरवें स्थान पर। भारत के अन्य पड़ौसी देशों- पाकिस्तान, बांगलादेश, अफगानिस्तान, बर्मा, श्रीलंका, नेपाल और भूटान आदि की स्थिति तो और भी खराब है। ऐसा कैसे हुआ? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिये एक ही उदाहरण देखना काफी होगा। पिछले दिनों जब चीन ने अपना साठवां स्थापना दिवस मनाया था तब राष्ट्रीय फौजी परेड में भाग ले रहे सैनिकों की कॉलर पर नुकीली आलपिनें लगा दी थीं ताकि परेड के दौरान सैनिकों की गर्दन बिल्कुल सीधी रहे। किसी भी नागरिक को इस फौजी परेड को देखने के लिये अनुमति नहीं दी गई थी। लोगों को घरों से निकलने से मना कर दिया गया था, बीजिंग में कर्फ्यू जैसी स्थिति थी। लोग यह परेड केवल अपने टी.वी. चैनलों पर ही देख सकते थे। इसके विपरीत हर साल नई दिल्ली में आयोजित होने वाली गणतंत्र दिवस परेड में भारत के सिपाही गर्व से सीना फुलाकर और गर्दन सीधी करके चलते हैं, हजारों नागरिक हाथ में तिरंगी झण्डियां लेकर इन सिपाहियों का स्वागत करते हैं और करतल ध्वनि से उनका हौंसला बढ़ाते हैं। यही कारण है कि कारगिल, शियाचिन और लद्दाख के बर्फीले पहाड़ों से लेकर बाड़मेर और जैसलमेर के धोरों, बांगला देश के कटे फटे नदी मुहानों और अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक के समूचे तटवर्ती क्षेत्र में भारत के सिपाही अपने प्राणों पर खेलकर भारत माता की सीमाओं की रक्षा करते हैं। हमारी सरकार सैनिकों के कॉलर पर तीखी पिनें चुभोकर उनकी गर्दन सीधी नहीं करती, देश प्रेम का भाव ही सिपाही की गर्दन को सीधा रखता है। इसी अंतर ने हमें पैंतालीसवें और चीन को पिचहत्तरवें स्थान पर रखा है। लंदन की लेगटम प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट में भारत की परिवारिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की प्रशंसा में बहुत कुछ कहा गया है। वस्तुतः भारत की परिवार व्यवस्था संसार की सबसे अच्छी परिवार व्यवस्था रही है। भारतीय पति-पत्नी का दायित्व बोध से भरा जीवन पूरे परिवार के लिये समर्पित रहता है। इसी समर्पण से भारतीय परिवारों को समृद्ध और सुखी रहने के लिये आवश्यक ऊर्जा मिलती है। जबकि आर्थिक रूप से समृद्ध देशों में पति-पत्नी एक बैरक में रहने वाले दो सिपाहियों की तरह रहते हैं, जो दिन में तो अपने-अपने काम पर चले जाते हैं, रात को दाम्पत्य जीवन जीते हैं और उनके छोटे बच्चे क्रैश में तथा बड़े बच्चे डे बोर्डिंग में पलते हैं। पश्चिमी देशों की औरतें अपने लिये अलग बैंक बैलेंस रखती हैं। उनके आभूषणों पर केवल उन्हीं का अधिकार होता है। आर्थिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने के कारण उनमें अहमन्यता का भाव होता है और वे अपने पहले, दूसरे या तीसरे पति को तलाक देकर अगला पुरुष ढूंढने में अधिक सोच विचार नहीं करतीं। इसके विपरीत आम भारतीय स्त्री विवाह के बाद पूरा जीवन एक ही परिवार में व्यतीक करती है। जैसे-जैसे उसकी आयु जैसे जैसे बढ़ती जाती है, परिवार में उसका सम्मान और अधिकार भी बढ़ते जाते हैं। भारतीय स्त्रियां धन-सम्पत्ति और अधिकारों के लिये किसी से स्पर्धा नहीं करती हैं, जो पूरे परिवार का है, वह सब कुछ उसका भी है। पारम्परिक रूप से भारतीय औरत अपने लिये अलग बैंक खाते नहीं रखती है, उसके आभूषण उसके पास न रहकर पूरे परिवार के पास रहते हैं। वह जो खाना बनाती है, उसे परिवार के सारे सदस्य चाव से खाते हैं, बीमार को छोड़कर किसी के लिये अलग से कुछ नहीं बनता। जब वह बीमार हो जाती है तो घर की बहुएं उसके मल मूत्र साफ करने से लेकर उसकी पूरी तीमारदारी करती हैं। बेटे भी माता-पिता की उसी भाव से सेवा करते हैं जैसे मंदिरों में भगवान की पूजा की जाती है। कुछ लोगों को शंका हो सकती है कि यह किस युग की बात है! उन्हें मेरी सलाह है कि भारत के 116 करोड़ लोगों में से केवल कतिपय सम्पन्न शहरियों को देखकर अपनी राय नहीं बनायें, गांवों में आज भी न्यूनाधिक यही स्थिति है। शहरों में भी 80 प्रतिशत से अधिक घरों में आज भी परम्परागत भारतीय परिवार रहते हैं जहाँ औरतें संध्या के समय सिर पर पल्ला रखकर तुलसी के नीचे घी का दिया जलाती हैं और घर की बड़ी-बूढि़यों से अपने लम्बे सुहाग का अशीर्वाद मांगती हैं। ऐसी स्थिति में यदि लेगटम प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट ने सामाजिक मूल्यों के मामलें में भारत को संसार का पहले नम्बर का देश बताया है तो इसमें कौनसे आश्चर्य की बात है! भारत का समाज कम खर्चीला समाज रहा है। घर, परिवार और बच्चों के साथ जीना, गली मुहल्ले में मिल जुल कर उत्सव मनाना, हरि भजन में समय बिताना, कम कमाना और कम आवश्यकतायें खड़ी करना, भारतीय सामाजिक जीवन का आधार रहा है। इसके विपरीत पश्चिमी देशों की जीवन शैली होटलों में शराब पार्टियां करने, औरतों को बगल में लेकर नाचने, महंगी पोशाकें पहनने और अपने खर्चों को अत्यधिक बढ़ा लेने जैसे खर्चीले शौकों पर आधारित रही है। आजकल टी वी चैनलों और फिल्मों के पर्दे पर एक अलग तरह का भारत दिखाया जा रहा है जो हवाई जहाजों में घूमता है, गर्मी के मौसम में भी महंगे ऊनी सूट और टाई पहनता है तथा चिपचिपाते पसीने को रोकने के लिये चौबीसों घण्टे एयरकण्डीशनर में रहता है। टीवी के विज्ञापनों में दिखने वाला भारत, वास्तविक नहीं है। वह भारत की नकली तस्वीर है जो आज के बाजारवाद और उपभोक्तवाद की देन है। आज भी भारत का बहुत बड़ा हिस्सा दिन भर धूप भरी सड़कों पर फल-सब्जी का ठेला लेकर घूमता है, सड़क पर बैठकर पत्थर तोड़ता है, पेड़ के नीचे पाठशालायें लगाता है और किसी दीवार की ओट मंे खड़ा होकर मूत्र त्यागता है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इन लोगों का योगदान एयरकण्डीशनर में छिपकर बैठे लोगों से किसी प्रकार कम नहीं है। इन्हीं लोगों की बदौलत कम खर्चीले समाज का निर्माण होता है। यदि इन सब लोगों को एयर कण्डीशनर में बैठने की आवश्यकता पड़ने लगी तो धरती पर न तो बिजली बचेगी और न बिजली बनाने के लिये कोयला बचेगा। लेगटम प्रोस्पेरिटी इण्डेक्स में भारतीय समाज की इन विशेषताओं को प्रशंसा की दृष्टि से देखा गया है। टी वी पर हर समय चलने वाले सीरियलों में भी एक अलग ही तरह का भारत दिखाया जा रहा है जहाँ बहुएं सास के विरुद्ध और सास बहुओं के विरुद्ध षड़यंत्र कर रही हैं। भाई एक दूसरे की इण्डस्ट्री पर कब्जा करने की योजनाएं बना रहे हैं। बेटियां अपने पिता को शत्रु समझ रही हैं और ननद भाभियां एक दूसरे की जान की दुश्मन बनी हुई हैं। यह कैसा भारत है? कहाँ रहता है यह? आजकल एक भारत और उभर रहा है जिसने इन सारे भारतों को पीछे छोड़ने की कसम खा रखी है। कुछ वर्ष पहले दीपा मेहता ने सिनेमा दर्शकों की जेब ढीली करने के लिये भारतीय महिलाओं में समलैंगिकता की फायर लगाने का प्रयास किया। इसी बीच बेबी खुशबू युवा हो गईं और उन्होंने फिल्म बनाने वालों का ध्यान आकर्षित करने के लिये बयान दिया कि प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के इस युग में भारतीय समाज नारी से कौमार्य की अपेक्षा न करे। परफैक्ट इण्डियन ब्राइड मानी जाने वाली अमृता राव ने जब देखा कि फिल्म निर्माता ठण्डी नायिका के रूप में देख रहे हैं तो उसने हॉट बनने के लिये बयान दे मारा कि शादी के पहले सैक्स में बुराई नहीं। राखी सावंत और संभवना सेठ का तो कहना ही क्या है! हमें लंदन के लेगटम संस्थान और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउण्डेशन का आभारी होना चाहिये कि उन्होंने इतने सारे भारतों के बीच असली भारत को ढूंढ निकाला है और सामाजिक मूल्यों के पैमाने पर भारत को सबसे पहला स्थान दिया है। हमारा भी यह कर्त्तव्य बनता है कि हम नकली भारतों की तरफ चुंधियाई हुई आँखों से देखना छोड़कर असली भारत की तरफ देखना आरंभ करें। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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