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  • तब पाकिस्तान भारत-पाक वार्ताओं को पटरी से उतारा करता था और आज भारत ने पटरी ही उखाड़कर फैंक दी है!

     06.10.2019
    तब पाकिस्तान भारत-पाक वार्ताओं को पटरी से उतारा करता था और आज भारत ने पटरी ही उखाड़कर फैंक दी है!

    इस कारण हो रही है इमरान की जल्दी विदाई!


    एक समय था जब पाकिस्तान के राजनेता भारत-पाक वार्ताओं को एक अंतहीन भ्रामक राजनीतिक कवायद बनाकर उसे बार-बार पटरी से उतार दिया करते थे और पाकिस्तानी जनता को बेवकूफ बनाकर सत्ता में बने रहने का प्रयास किया करते थे। आज के दौर में भारत सरकार ने भारत-पाक वार्त्ता की वह पटरी ही उखाड़ फैंकी है जिसके कारण इमारान खान जैसे पाकिस्तानी नेताओं को वह संजीवनी ही प्राप्त नहीं हो पा रही जिसके माध्यम से वे पाकिस्तानी जनता को बेवकूफ बनाकर गद्दी पर बने रह सकें। इसी कारण इमरान खान की विदाई इतनी जल्दी हो रही है।

    पाकिस्तान ने अपने पैरों में खुद ही कुल्हाड़ी मारकर इन दुर्दिनों को न्यौता दिया है। मैं डॉ. मनमोहनसिंह तथा अटलबिहारी वाजपेयी की सरकारों के समय हुई कुछ पुरानी घटनाओं का उल्लेख करना चाहूंगा। जब वर्ष 2008 में हुए 26/11 के मुम्बई हमले के 15 माह बाद भारत-पाक वार्ता को फिर से आरंभ करने के लिये यू एन ओ का दबाव आया और प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने इस वार्ता को फिर से आरंभ करने का प्रस्ताव अपने मंत्रिमण्डल की बैठक में रखा तो मंत्रिमण्डल के सदस्यों में इस प्रस्ताव का विरोध करने वालों की संख्या अधिक थी।

    स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह 16 जून 2009 को जब रूस में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से मिले तो मनमोहनसिंह के मुंह से अचानक निकल गया कि मुझे आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई है किंतु मुझे यह कहते हुए खेद है कि हमारी सरकार को अपने देश के लोगों की तरफ से आपसे वार्ता करने का बहुत ही कम अधिकार मिला हुआ है क्योंकि जो कुछ भी भारत के विरुद्ध आतंकवाद को रोकने के लिये आपकी तरफ से किया जाना चाहिये था, आपने उसमें से कुछ भी नहीं किया है। यहां तक कि आपने यह आश्वासन एक बार भी नहीं दिया है कि पाकिस्तानी धरती का इस्तेमाल भारत के विरुद्ध आतंकवाद फैलाने के लिये नहीं होने दिया जायेगा।

    बाद में मनमोहनसिंह ने सफाई दी कि मुझे ध्यान नहीं रहा कि मीडिया भी वहां खड़ा हुआ है। इस घटना के बाद संभवतः पाकिस्तान मन ही मन संकल्प कर चुका था कि वह भारतीय प्रधानमंत्री के इन शब्दों का बदला लेगा।

    इसलिये जब 15 जुलाई 2010 को भारतीय विदेश राज्यमंत्री एस. एम. कृष्णा इस्लामाबाद गये तो पाकिस्तानी विदेश मंत्री एस. एम. कुरैशी ने कृष्णा को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुरैशी ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को वक्तव्य दिया कि कृष्णा के पास इस वार्ता के लिये अधिकार नहीं थे। प्रत्येक बात टेलिफोन पर भारत में बैठै किसी व्यक्ति को बताई जाती थी और उससे मिले निर्देश के बाद कोई वाक्य बोला जाता था। बाद में कुरैशी ने सफाई दी कि मैंने ऐसा नहीं कहा।

    जब वार्ता की पृष्ठभूमि रक्त-रंजित हो और वातावरण इतने सारे अविश्वासों से भरा हुआ हो तो उसके सार्थक परिणाम कैसे आ सकते हैं, इसका अनुमान लगाना कोई कठिन बात नहीं है। यह एक अलग बात है कि यदि डॉ. मनमोहनसिंह ने जरदारी को कुछ भी उलाहना नहीं दिया होता, तब भी पाकिस्तान की ओर से ढाक के तीन पात ही रहने वाले थे क्योंकि न तो पाकिस्तान में जरदारी सरकार की कोई हैसियत थी और न इज्जत ही।

    पाकिस्तान की सरकार को सेना चलाती है और सेना को आई, एस. आई. चलाती है। सेना तथा आई एस आई वास्तविक सत्ता को अपने हाथ में रखने के लिये, कभी भी राजनीतिक तंत्र को पाकिस्तान में शक्तिशाली नहीं बनने देंगी और न भारत के साथ सम्बन्धों को सामान्य होने देंगी। पाकिस्तान बनने के बाद से वहाँ की सेना यही खेल खेलती आई है। नवाब शरीफ के समय में भी क्या हुआ था? जब शरीफ ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय में भारत से सम्बन्ध सामान्य करने की शुरुआत की तब परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को गिरफ्तार करके जेल में ठूंस दिया। पाकिस्तानी सेना और आई एस आई को पाकिस्तानी जनता का भरपूर समर्थन प्राप्त है।

    इसकी पुष्टि कुछ वर्ष पहले पाकिस्तान में एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था द्वारा किये गये सर्वेक्षण से सिद्ध होती है जिसमें पाया गया था कि पाकिस्तान की अधिकांश जनता अमरीका से घृणा करती है और भारत से शत्रुता करती है तथा इन दोनों ही देशों से बदला लेना चाहती है। जब पाकिस्तान की जनता के मन में ही शांति की कामना नहीं हो और वह भारत से बदला लेने पर उतारू हो तब किसी भी वार्ता का सार्थक परिणाम कैसे निकल सकता है ?

    जब जरदारी पाकिस्तान के प्रेसीडेंट थे, तब एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ने पाकिस्तान में किए गए एक सर्वेक्षण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि संसार में जितने नेता और प्रशासक हैं उनमें अपनी जनता को मुसीबत में छोड़कर भाग जाने की सबसे अधिक प्रवृत्ति आसिफ अली जरदारी में है। जब पाकिस्तान में बाढ़ से हजारों लोग मर रहे थे तब जरदारी लंदन के होटलों में मौज मना रहे थे। ऐसे प्रेसीडेंट की सरकार भला भारत से कया बात कर सकती थी!

    अब जब इमरान खान की सरकार भारत के विरुद्ध जिहाद का नारा लगा रही है, एटम बम फैंकने की धमकी दे रही है तो पाकिस्तान की जनता इमरान की बातों में नहीं आ रही है। यहाँ तक कि अब तो पाकिस्तान में फिर से सेना द्वारा तख्तापलट किये जाने की संभावनाएं भी व्यक्त की जा रही हैं।

    मेरा यह स्पष्ट मानना है कि जब तक भारत-पाक वार्त्ताओं का वह अंतहीन दौर शुरु नहीं होगा, तब तक पाकिस्तानी नेताओं के लिए सत्ता में बने रहना और अपनी जनता को अधिक समय तक बेवकूफ बनाए रखना संभव नहीं होगा किंतु अब वह पुराना दौर बीत गया है और पहले वाला पाकिस्तानी खेल इसलिए संभव नहीं है कि भारत की ओर से उस पटरी को ही उखाड़ कर फैंक दिया गया है जिस पटरी पर भारत-पाक वार्त्ताओं की गाड़ियां चला करती थीं।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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