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  • युवाओं को संवदेना विहीन बनाती है रैगिंग!

     03.06.2020
    युवाओं को संवदेना विहीन बनाती है रैगिंग!

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    रैगिंग पाश्चात्य जीवन शैली की कुछ अत्यंत बुरी बुराइयों में से है, जिसे भारतीयों ने कुछ अन्य बुराईयों की तरह जबर्दस्ती ओढ़ लिया है। यह अपने आप में इतनी बुरी है कि हम विगत कई वर्षाें से प्रयास करने के उपरांत भी इसे महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से समाप्त नहीं कर पाये हैं। इसका क्या कारण है! रैगिंग के जारी रहने का सबसे बड़ा कारण स्वयं रैगिंग ही है।

    जो युवा एक बार रैगिंग का शिकार हो जाते हैं, उनके मन से मानवीय संवेदनाएं नष्ट हो जाती हैं और वे अपनी रैगिंग का बदला दूसरे युवाओं से लेने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसी मानसिकता के चलते रैगिंग को समाप्त नहीं किया जा सका है।

    भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने देश के समस्त शिक्षण संस्थाओं को निर्देश दे रखे हैं कि वे अपनी संस्थाओं को रैगिंग से मुक्त रखें। इन आदेशों के परिप्रेक्ष्य में अधिकांश शिक्षण संस्थाओं में रैगिंग के विरुद्ध कुछ कदम भी उठाये हैं किंतु रैगिंग के शिकार हो चुके युवाओं के क्रूर व्यवहार के कारण रैगिंग बदस्तूर जारी है। यह बुराई तकनीकी, व्यावसायिक एवं चिकित्सा शिक्षण संस्थाओं में कैंसर का रूप ले चुकी है। विगत कुछ वर्षों में देश के अनेक शहरों में स्थित शिक्षण संस्थाओं में नवीन प्रवेश लेने वाले बच्चों को रैगिंग की काली छाया ने डस लिया। कई बच्चे हमेशा के लिये शिक्षण संस्था छोड़कर चले गये तो कुछ बच्चों को प्राणों से भी हाथ धोने पड़े।

    जो छात्र पिछली साल रैगिंग का शिकार हुए थे अब वही छात्र अपनी रैगिंग का बदला लेने के लिये नये छात्रों का बड़ी क्रूर मानसिकता के साथ स्वागत करने को उत्सुक दिखायी देते हैं। रैगिंग के दौरान बच्चों के साथ गाली-गलौच तथा मारपीट की जाती है जिसके साथ तर्क दिया जाता है कि इससे बच्चे बोल्ड बनेंगे और उनका दब्बूपन जाता रहेगा। यह तर्क सभ्य समाज मंे किसी भी समझदार व्यक्ति के गले उतरने वाला नहीं है। गाली, लात और घूंसे खाकर आदमी बोल्ड कैसे बनेगा? ऐसे व्यक्ति के भीतर तो एक ऐसी सहमी हुई कुण्ठित पसर्नलटी जन्म लेगी जो अपने से कमजोर लोगों पर हाथ उठाकर अपने अहम को संतुष्ट करना चाहेगी।

    अक्सर हम देखते हैं कि बात केवल गाली-गलौच या लात-घूंसों तक सीमित नहीं रहती। लड़कों के कपड़े उतरवाना, उन्हें हॉस्टल की बालकनी से रस्सी बांधकर लटका देना, धारा प्रवाह गंदी गालियां बोलने के लिये विवश करना, मुर्गे बनाना, घण्टों धूप में खड़े रखना, सिगरेट पिलाना, हीटर पर बैठने के लिये मजबूर करना जैसी क्रूर हरकतें होती हैं। आजकल तो इस तरह की शारीरिक प्रताड़ना पुलिस थानों में भी नहीं हो सकती जैसी कि शिक्षण संस्थाओं में हो रही है। तर्क यह भी दिया जाता है कि यदि रैगिंग नहीं होगी तो जूनियर बच्चे अपने सीनियर्स में घुल-मिल नहीं पायेंगे। गाली-गलौच और लात घूसों के बल पर दूसरे लोगों को अपने समूह में शामिल करना एक विचित्र तर्क जैसा लगता है। यह तो आतंक के बल पर दोस्ती गांठने जैसा है। घुलने मिलने के लिये शालीन व्यवहार, मधुर वाणी और परस्पर सहयोग जैसे गुण आवश्यक होते हैं न कि दुर्व्यवहार।

    रैगिंग के शिकार युवा केवल कॉलेज कैम्पस में अपने से जूनियर छात्रों की रैगिंग लेकर ही संतुष्ट नहीं होते। उनमें से बहुत से युवा हमेशा के लिये दूसरों के प्रति संवदेना विहीन हो जाते हैं। वे सड़क, कार्यालय, परिवार एवं रिश्तेदारी में भी दूसरों को पीडि़त करने में सुख का आनंद अनुभव करते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा नागरिक, अच्छा कार्मिक, अच्छा पिता, अच्छा दोस्त और अच्छा इंसान बनाना चाहते हैं तो हमें घर से ही शुरुआत करनी होगी और बच्चों को रैगिंग से दूर रहने के लिये प्रेरित करना होगा। जिन बच्चों की रैगिंग हो चुकी है, उन्हें बारबार समझाना होगा कि जो आपके साथ हुआ, उसे बुरे स्वप्न की तरह भूल जाओ तथा स्वयं किसी की रैगिंग मत लो।

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