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  • भारत के किसान आंदोलन कितने उचित कितने अनुचित!

     03.06.2020
    भारत के किसान आंदोलन कितने उचित कितने अनुचित!

    भारत के किसान आंदोलन कितने उचित कितने अनुचित!

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    जब से केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली नरेन्द्र मोदी सरकार बनी है तब से देश में आंदोलनों की बाढ़ आ गई है तथा यह दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी से देश संभल नहीं रहा। महाराष्ट्र तथा मध्यप्रदेश का किसान आंदोलन इसी पृष्ठभूमि में पैदा हुआ है और यह भस्मासुर की तरह बढ़कर पूरे देश को अपनी चपेट में लेने की तैयारी में है। लोकतंत्र में आंदोलन करना जनता का अधिकार है किंतु राजनीतिक पार्टियों द्वारा जनआंदोलनों को षड़यंत्र के रूप में खड़ा करना, देश के लोकतंत्र का अपहरण करने जैसा है। वर्तमान किसान आंदोलन के विविध आयाम हैं, यह किसान की गरीबी, कर्ज की स्थिति और बढ़ती हुई आत्महत्याओं तक सीमित नहीं हैं। देश में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार, रातों-रात बड़ा नेता बनने की लालसा, चुनावी समर में जीत प्राप्त करने की ललक, शहरों में खड़ी हो रही कोठियों का चमचमाता जंगल, नेताओं, व्यापारियों, ठेकेदारों, पूंजीपतियों के मोटे-मोटे बैंक बैलेंस, सड़कों पर दौड़ती महंगी गाड़ियों के काफिले, सरकारी नौकरों के काले कारनामे और ऐसे ही सैंकड़ों कारणों का मिलाजुला परिणाम है आज के किसान आंदोलन!

    जब किसी रोग का उपचार किया जाता है तो पहला चरण उस रोग को ढंग से पहचानने का होता है। किसान आंदोलनों को भी ढंग से समझना होगा। रोग के उपचार का दूसरा चरण रोग के विषाणुओं, पीप-मवाद, कील-कांटे आदि को शरीर से निकालने के लिए ऑपरेशन करना, दवा देना, इंजेक्शन लगाना आदि उपायों का होता है। किसान आंदोलनों में भी जो विषाणु, पीप और मवाद हैं उन्हें निकालकर दूर करने की आवश्यकता है। रोग उपचार का तीसर चरण सुपथ्य तथा पौष्टिक आहार होता है। किसान आंदोलनों का अंतिम चरण भी किसानों को हर तरह से मजबूत बनाने का होना चाहिए।

    क्या इस देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी में इतना साहस है जो किसान आंदोलन की वास्तविकता को पहचानकर, उसका इलाज कर सके! जब तक पहले दो चरण नहीं होंगे, तब तक तीसरा चरण नहीं आएगा। अर्थात् जिस प्रकार रोगी के घाव में मवाद पड़ा हो तो उसकी चमड़ी की प्लास्टिक थेरेपी करने से या प्लास्टर से ढंक देने से जो परिणाम आएंगे, वैसे ही परिणाम किसान आंदोलनों को शांत करने के प्रयासों के आएंगे। सबसे पहले तो किसानों की ही बात करें कि सरकारें उनके लिए क्या करती रही हैं! मैं यहा कुछ उदाहरण दे रहा हूँ।

    फसल बीमा योजना

    खेती का नष्ट हो जाना किसानों की सबसे बड़ी समस्या है। सरकार फसल बीमा योजना के माध्यम से किसानों को सुरक्षा कवर उपलब्ध कराती है। किसान को रबी की फसल के लिए 1.5 प्रतिशत तथा खरीफ की फसल के लिए 2 प्रतिशम प्रीमियम देना होता है। महाराष्ट्र में 2015-16 की रबी फसल के लिए मार्च 2017 में 26.88 लाख किसानों को फसल खराबे की क्षतिपूर्ति के लिए 893.83 करोड़ रुपया स्वीकृत किया गया। मध्य प्रदेश में 2015 की खरीफ के फसल बीमा मुआवजे के लिए 9000 करोड़ रुपए वितरित किए गए। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने 10 दिसम्बर 2016 को 2015 की खरीफ फसलों के खराबे के लिए 20.46 लाख किसानों को 4416 करोड़ रुपए का मुअवजा एक ही दिन में वितरित किया। दूसरे राज्यों के उदाहरण भी इसी प्रकार के हैं।

    किसान दुर्घटना बीमा

    किसानों को खेतों में काम करते हुए घायल हो जाने या मृत्यु हो जाने पर अलग से बीमा योजनाएं हैं जिनमें राज्य सरकारें किसान परिवारों को समुचित मुआवजा देती हैं।

    शून्य ब्याज दर पर किसानों को ऋण

    पिछले लगभग एक दशक से विभिन्न राज्यों के किसानों को सहकारी समितियों के माध्यम से ब्याज-मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। यदि कोई किसान ऋण लेकर समय पर चुका देता है तो उसे ब्याज नहीं देना होता है।

    मनरेगा

    किसान जिन दिनों में खाली होता है, उसके परिवार को मनरेगा योजना में प्रति वर्ष 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। कोई भी किसान परिवार इस योजना में रोजगार मांग सकता है। यदि सरकार रोजगार नहीं दे पाती है तो उसे घर बैठे भुगतान किया जाता है। यह कानूनन अनिवार्य है।

    अपना खेत अपना काम योजना

    इस योजना में सरकार सीमांत एवं लघु कृषकों के खेतों पर साढ़े तीन लाख रुपए तक के कार्य अपनी लागत पर करवाती है। किसान अपने खेत पर मेंढबंदी, भूमि सुधार, टांका निर्माण आदि कार्य करवा सकते हैं। तीन-चार किसान मिलकर अपने लिए अलग से कुंआ खुदवा सकते हैं।

    अन्य योजनाएं

    जब किसान अपना माल लेकर मण्डी में जाता है तो उसके लिए कृषि मण्डी एवं कृषि विभाग के माध्यम से कलेवा योजना, अक्षत योजना, किसान हॉस्टल आदि योजनाएं चलाई जा रही हैं जिनका लाभ देश के करोड़ों किसान उठाते रहे हैं। किसानों को भी आम नागरिक की तरह सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपचार एवं दवाएं मिलती हैं। उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में निःशुल्क पढ़ते हैं। उनके बच्चों को भी मिड डे मील के तहत एक समय का भोजन निःशुल्क मिलता है। सामाजिक पेंशन योजनाओं के तहत निर्धन परिवारों को जिनमें वृद्ध, विधवा, विकलांग, बेसहारा, परित्यक्ता शामिल हैं, प्रतिमाह पेंशन मिलती हैं। अनुसूचित जाति-जन जाति के किसानों को हॉस्टलों में निशुल्क अधिवास, भोजन, चिकित्सा, वस्त्र, शिक्षण सामग्री आदि मिलती है। प्रसव की स्थिति में निशुल्क प्रसव एवं दवाएं मिलती हैं। झौंपड़ी में आग लग जाए, प्राकृतिक आपदा या अग्निकाण्ड में जानवर मर जाएं तो उनके लिए भी मुआवजा मिलता है। सड़क दुर्घटना में मरे व्यक्तियों के परिवारों को अलग से मुआवजा मिलता है। सब योजनाओं का उल्लेख यहां नहीं किया जा सकता।

    समस्या क्या है !

    इन सब योजनाओं के बावजूद यदि देश का किसाना भूखा है, गरीब है, आत्महत्या कर रहा है, तो उसका इलाज कृषि ऋण माफ करना नहीं है, अपितु जो नेता, पूंजीपति, व्यापारी, सरकारी नौकरशाह सरकार के लाखों करोड़ रुपए हर साल डकार रहे हैं, उस रुपए को सरकारी खजाने में वापस लाने की जरूरत है ताकि किसानों एवं आम आदमी के लिए चल रही योजनाओं को और अधिक सशक्त बनाया जा सके। वर्ष 1947 से लेकर 2010 तक भारत में 910 लाख करोड़ रुपये के घोटाले हुए। वर्ष 2010 से 2013 के बीच देश में हुए कुछ प्रमुख घोटालों में 1.86 लाख करोड़ रुपए का कोल स्कैम, 1.76 लाख करोड़ रुपए का टूजी स्कैम, 70 हजार करोड़ रुपए का कॉमनवैल्थ गेम्स स्कैम, 80 हजार करोड़ रुपए का सैन्य-शस्त्र खरीद घोटाला, 1.5 लाख करोड़ रुपए का महाराष्ट्र का वक्फ बोर्ड लैण्ड स्कैम, 40 हजार करोड़ रुपए का पश्चिम बंगाल का शारदा चिटफण्ड घोटाला, 14 हजार करोड़ रुपए का सत्यम स्कैम, 18 हजार करोड़ रुपए का नेवी वार रूम लीक स्कैण्डल, 10 हजार करोड़ रुपए का यूपी का एनआरएचएम घोटाला सहिल कई लाख करोड़ रुपए के घोटाले हुए जिनकी सही-सही गिनती करनी मुश्किल है। नेशनल हेराल्ड प्रकरण में 2000 करोड़ रुपए का घोटाला करने का सीधा आरोप सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर है।

    समाधान क्या होना चाहिए !

    देश की सरकार को चाहिए कि इन घोटालों की राशि या सम्पत्ति जिन लोगों के पास पड़ी है, उस सम्पत्ति को उनसे छीनकर देश की जनता को लौटाए। विजय माल्या, सुब्रत रॉय और ललित मोदी जैसे लोगों की सम्पत्तियों को नीलाम करके उसका पैसा किसानों के खेतों तक पहुंचाए। देश के बैंक ऋण का एनपीए 6.15 लाख करोड़ रुपए हो गया, जिन लोगों के पास बैंक का पैसा पड़ा है, उसे वापस बैंकों तक लाया जाए। बैंक के 6 लाख करोड़ रुपए के ऋण डूब जाना, देश के आम आदमी के लिए बहुत बड़ा धक्का है। यदि हालात इसी तरह जारी रहे तो भारतीय बैंक भी एक दिन अमीरीकी बैंकों की तरह लुढ़कते हुए दिखाई देंगे और इन्हें संभालने वाला कोई नहीं मिलेगा।

    भारत के सांसदों एवं पूर्व सांसदों, विधायकों एवं पूर्व विधायकों, आईएएस अधिकारियों, आईपीएस अधिकारियों तथा सभी सेवाओं के प्रथम श्रेणी अधिकारियों के पास कितनी सम्पत्ति है, इसकी जांच करवाई जाए। सिनेमा में नाचने वालों, क्रिकेट का बल्ला बजाने वालों के पास कितनी सम्पत्ति है, जांच कराई जाए। कई पत्रकारों ने दिल्ली में अशोका रोड और पृथ्वीराज रोड जैसी महंगी सड़कों पर सैंकड़ों करोड़ रुपयों के बंगले बनाए हैं, पत्रकार इतना पैसा कैसे कमा सकता है! सरकार इनके नाम जानती है, इनकी सम्पत्ति की भी उसी तरह जांच होनी चाहिए जिस तरह से प्रणव रॉय के घोटालों की हुई है।

    यह तय है कि भारत की सरकारों ने भारतीय खेती को जीवित रखने वाले किसानों के लिए कम प्रबंध नहीं कर रखे हैं किंतु दूसरे रास्ते से जो देश में चोरी हो रही है, उसने किसान के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा किया है। उस चोरी को यदि रोक दिया जाए तो भारत का किसान संभल जाएगा। लेकिन ऐसा होगा नहीं।

    वास्तव में क्या होगा ?

    देश में हर साल कुछ राज्यों में चुनाव होते हैं, 2017 के होकर चुके हैं, 2018 में भी होंगे और 2019 में तो केन्द्र में भी होने हैं। अनुमान है कि 2019 के चुनवों से पहले भारत में 2.19 लाख करोड़ रुपए के कृषि ऋण माफ किए जायेंगे। जब योगी आदित्यनाथ ने यूपी में 36 हजार करोड़ रुपए के ऋण माफ कर दिए तो नरेन्द्र मोदी दूसरे राज्यों के किसानों से कैसे कहेंगे कि आपके ऋण माफ नहीं होंगे! डॉ. मनमोहनसिंह ने भी अपने कार्यकाल में 52 हजार करोड़ रुपए के कृषि ऋण माफ किए थे। यह सिलसिला चलता रहेगा। क्योंकि इस देश में भारतीस सेना के अध्यक्ष के लिए तो सड़क का गुण्डा कहकर भी सड़कों पर शांति देखी जा सकती है किंतु अपने वोट बैंकों को नाराज करके सड़कों पर शांति बनाए नहीं रखी जा सकती।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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