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     04.06.2018
    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण का विचार जीवन के हर अंग पर रहा है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण चाहिए तो केवल ये दो कहावतें देख लेनी पर्याप्त होंगी-

    संतोषी सदा सुखी।

    सादा जीवन उच्च विचार।


    जब मनुष्य संतोष से जीना सीख जाएगा और जीवन में सादगी को धारण करने का अभ्यास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण के लिए उसे अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। किंतु आज हमने ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में, चक दे इण्डिया और तेरी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे ? जैसी बातों के बहकावे में आकर संतोष और सादा जीवन पर आधारित जीवन शैली त्याग दी है।

    यदि संस्कृत वांगमय में झांक कर देखे तो ऐसी उक्तियां भरी पड़ी हैं जिन्हें अपने जीवन में ढालें तो पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य स्वतः सिद्ध हो जाएगा- अथर्ववेद का सूक्तकार कहता है-

    ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः।’

    जब व्यक्ति पृथ्वी को अपनी माता समझ लेता है, तो उसे वह नुक्सान कैसे पहुंचा सकता है। उपनिषद कहता है-

    ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः।

    अर्थात् ज्ञान प्राप्त किए बिना मुक्ति नहीं होती। यह ज्ञान कौनसा है ? यह प्रकृति की व्यवस्था का ज्ञान है। इसके बिना किसी मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती। प्रकृति क्या है? इसे कौन चलाता है? उसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे अपने अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है? आदि बातों को जानना ही तो वास्तविक ज्ञान है। मानव द्वारा आज तक संचित समस्त ज्ञान तथा आने वाले युगों में अर्जित किया जाने वाला ज्ञान प्रकृति और उसके रहस्यों को जानने तक ही तो सीमित है।

    जब कोई मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था के ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण उसके जीवन का ध्येय बन जाएगा। पर्यावरण केवल वनस्पतियों और वायुमण्डल में उपस्थित गैसों को ही नहीं कहते। पर्यावरण में वे पांचों तत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश भी आते हैं जिनसे यह प्रकृति बनी है।

    पर्यावरण में वनस्पति जगत, जीव जगत, वायुमण्डल, धरती तक पहुंचने वाली सूर्य किरणें, अंतरिक्ष से आने वाले विकीरण आदि विभिन्न तत्व भी आते हैं। ये एक दूसरे से सम्बद्ध हैं, ये एक दूसरे को सहारा देते हैं और नियंत्रित करते हैं।

    जब हम किसी जीव-जंतु को मारते हैं तो हमें यह जानना चाहिए कि हम उस समय केवल एक जीव को नहीं मार रहे होते अपितु ऐसा करके हम जीव जगत के साथ-साथ वायुमण्डल, वनस्पति मण्डल और अंतरिक्षीय शक्तियों पर भी प्रहार कर रहे होते हैं, प्रकृति के मूलाधार पांचों तत्वों को भी कुपित कर रहे होते हैं।

    केवल पेड़ को मारने से ही जीव नहीं मरता, जीव को मारने से पेड़ भी मरता है, यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, किंतु यह सच्चाई है जिसे विज्ञान से लेकर हमारा अध्यात्म तक मानता है।

    यहां मैं यह कह रहा हूं कि केवल पेड़ को मारने से हिरण नहीं मरता, हिरण को मारने से पेड़ भी मरता है।

    क्योंकि केवल वृक्ष जीव का सहारा नहीं है, जीव और वृक्ष दोनों एक दूसरे का सहारा हैं। जब हम किसी पहाड़ को काटते हैं तो भी प्रकृति में ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसी कि जंगल में आग लगाने पर होती है। यह ठीक वैसा ही है कि जंगल से शेर को समाप्त कर देने से पूरे जंगल के ही सूख जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

    मुगल एवं ब्रिटिश काल में पूरे भारत में शेरों का बड़ी संख्या में शिकार हुआ, आज जंगलों की क्या हालत है, हमारे सामने है।

    ऐसा कैसे होता है, इस बात को समझने के लिए हमें कोशिका का उदाहरण लेना होगा। यह सम्पूर्ण सृष्टि एक जीवित कोशिका की तरह कार्य करती है। जिस प्रकार एक कोशिका के किसी भी अवयव को भंग करने पर पूरी कोशिका को क्षति पहुंचती है, ठीक वैसा ही धरती या सृष्टि के बारे में है।

    जब उपनिषदों ने आज से हजार साल पहले ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की घोषणा की तो यह केवल धार्मिक या आध्यात्मिक उद्घोष नहीं था, मनुष्य को इस धरती पर कैसे व्यवहार करना चाहिए, कैसा जीवन जीना चाहिए, उसकी गाइड लाइन थी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार अहिंसा का विचार ही रहा है। जब जीवों के प्राण नहीं लिए जाएंगे तो प्रकृति में एक संतुलन स्थापित होगा।

    भारतीय संस्कृति में विगत हजारों वर्षों से स्थापित परम्पराएं, सिद्धांत एवं व्यवहार में लाई जाने वाली ऐसी अनगिनत बातें हैं जिन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए मानव को आनंददायी जीवन की ओर अग्रसर किया है।

    मानव सभ्यता प्रकृति की कोख से प्रकट होती है। उसे जो कुछ भी मिलता है, प्रकृति से ही मिलता है। इस कारण मानव को, प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना होता है। हमारे ऋषियों ने भारतीय संस्कृति का निर्माण इस प्रकार किया कि प्रकृति के मूल कोश को भंग नहीं किया जाए। पेड़, नदी, पर्वत और जंगल; प्रकृति के मूल कोश हैं। उन्हें नष्ट करना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।

    मनुष्य धरती पर आया है तो उसे अपना जीवन जीने के लिए प्रकृति के संसाधन काम में लेने ही होंगे। फिर क्या किया जाए ?

    इसका एक मात्र उपाय है कि प्रकृति के किसी भी संसाधन को इस प्रकार काम में लिया जाए कि उसकी रीसाइक्लिंग हो सके। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल को प्लास्टिक और पॉलिथीन ने रिप्लेस किया। प्लास्टिक या पॉलिथीन का प्रयोग प्रकृति के मूल कोश को खर्च करने जैसा है जबकि मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    बहुत से लोग कहेंगे कि आज के युग मेें मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग अव्यावहारिक है। यह ठीक वैसा ही है जैसे हवाई जहाज की जगह बैलगाड़ी को अपनाया जाए। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग इसलिए अव्यावहारिक है, क्योंकि ऐसा हम सोचते हैं। जिस दिन हम सोचेंगे कि यह किया जा सकता है, उस दिन यह व्यावहारिक हो जाएगा। दक्षिण भारत में आज भी केले के पत्ते का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता है।

    मेरी उम्र कोई बहुत अधिक नहीं हुई है किंतु मैने अपनी आंखों से उस परम्परा को देखा है, जिसमें शादी-विवाह में जीमण के लिए गांव के लोग अपने घरों से बर्तन लेकर जाते थे। मैंने अपनी आंखों से मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग ठीक उसी रूप में देखा है, जिस रूप में आज प्लास्टिक और पॉलिथीन हो रहा है।

    मैंने अपनी आंखों से उस संस्कृति को देखा है जब निमंत्रण देने के लिए पीले चावल दिए जाते थे। और आज............। आज किसी परिवार में विवाह होता है तो हजार-हजार की संख्या में निमंत्रण पत्र छपते हैं। क्या हजार-हजार की संख्या में छपने वाला निमंत्रण पत्र, कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण की हत्या करने जैसा नहीं है !

    हमारे सामने दो रास्ते हैं, या तो प्रकृति के संसाधनों को बचाएं या फिर उन्हें आज ही उपभोग करके नष्ट कर दें और अपने बच्चों को कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण से वंचित करके चले जाएं। उनके लिए एक ऐसी दुनिया छोड़ जाएं जो सूरज की गर्मी से झुलस रही होगी, जिसमें पानी नहीं होगा, जिसमें कचरे और प्लास्टिक के ढेर होंगे। जहां गायें घास नहीं, प्लास्टिक खा रही होंगी। वो दुनिया कितनी वीरान होगी जिसमें लिखने पढ़ने के लिए कागज नहीं होगा! केवल इण्टरनेट और इलेक्ट्रोनिक गेजेट्स होंगे।

    बात यहाँ समाप्त नहीं होती। यहां से शुरु होती है। प्लास्टिक खाकर गाय जीवित नहीं रहेगी, बिना गाय के दूध नहीं मिलेगा, बिना दूध के बच्चे कैसे बनेंगे ! ये दुनिया कैसी होगी! मैं आपको अपना आंखों देखा अनुभव बताता हूँ कि बिना गाय के दुनिया कैसी होगी !

    इण्डोनेशिया का नाम हमने सुना है। आज से पांच सौ साल पहले इण्डोनेशिया में केवल हिन्दू और बौद्ध निवास करते थे। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। इसके उपरांत भी इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में आज भी 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी निवास करती है। मैंने पिछले वर्ष अपने परिवार के साथ इण्डोनेशिया के कुछ द्वीपों की यात्रा की। हमें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां सड़कों पर गायें नहीं हैं। हमें यह सोचकर दुःख हुआ कि भारत में गाएं सड़कों पर मारी-मारी फिरती हैं।

    हमने जावा, जकार्ता और बाली में अपने 11 दिन के प्रवास के लिए होटल बुक नहीं कराए थे अपितु सर्विस अपार्टमेंट्स बुक करवाए थे ताकि वहाँ हम अपना भोजन स्वयं बना सकें। इसके लिए कच्ची रसोई अपने साथ ले गए थे। जब हमने चाय बनाने के लिए बाजार से दूध खरीदना चाहा तो वहाँ दूध की थैलियां नहीं मिलीं। मालूम हुआ कि यहाँ गायें नहीं हैं इसलिए बाजार में दूध नहीं बिकता। ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैण्ड आदि देशों से लिक्विड वैजीटेबल दूध के डिब्बे आते हैं जो मक्का, सोयाबीन, तेलों और कुछ घासों से बनाए जाते हैं। इस दूध पर लिखा रहता है, बच्चों के लिए हानिकारक। आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस दूध का स्वाद और गुण कैसा होगा !

    हमारे जैसे शुद्ध शाकाहारी भारतीय परिवार को दिन में चार-पांच बार चाय चाहिए और सोने से पहले दूध का एक गिलास चाहिए। बाद में पता चला कि सड़कों पर गायें और बाजार में दूध आएंगे कहां से! गायें तो बूचड़ खानों में ले जाई जाकर लोगों के पेट में पहुंच चुकी हैं।

    हमने पूछा इण्डोनेशिया के एक हिन्दू परिवार से पूछा- आपके बच्चे क्या पीते है !

    उन्होंने कहा- मां का दूध। हमने पूछा- और मां का दूध छूटने पर।

    इस सवाल के जवाब में जो कुछ हमें सुनने का मिला वह बेहद चौंकाने वाला था।

    उन्होंने जवाब दिया कि मां का दूध छोड़ने पर बच्चे चिकन, फिश, पोर्क और राइस खाते हैं।

    जब हमने पूछा कि आप लोग चाय नहीं पीते, इस पर उन्होंने कहा कि हम ब्लैक कॉफी पीते हैं, वह भी केवल गेस्ट के आने पर।

    मेरे पिता केन्द्र सरकार में अच्छे पद पर थे किंतु मुझे याद है कि गर्मियों में स्कूलों की छुट्टियां होने पर हमसे अपनी पिछले साल की कॉपियों से कागज की थैलियां बनवाती थीं और कुछ कॉपियों को पानी में गलाकर उन्हें कूटकर और मुल्तानी मिट्टी मिलाकर छोटी-छोटी टोकरियां बनवाती थी जिन्हें मारवाड़ में ठाठिए कहते थे।

    मां दीपावली आने पर हमें घर में ही रंगीन कागज से कंदील बनाना सिखाती थीं। वे हम भाई-बहिनों को घर में सूत से दरियां बनाना सिखाती थीं। गेहूं के सूखे तनों को पानी में भिगोकर उनसे हाथ के पंखे बनाना सिखाती थीं।

    उन्होंने एक और अद्भुत काम हमें सिखाया। मेरा अनुमान है कि यह कार्य बहुत कम बच्चों को उनकी माताओं ने सिखाया होगा। उन दिनों गैस नहीं थी, गांवों में तो चूल्हे होते थे जिनमें लकड़ी जलती थी और शहरों में अंगीठियां होती थीं जिनमें कोयला जलाया जाता था। मेरी मां बाजार से कोयले की चूरी मंगवाती थीं और उसमें काली मिट्टी तथा गोबर मिलाकर हमसे उनके लड्डू बनवाती थीं। जब ये लड्डू कोयले की अंगीठी में डाले जाते थे तो वे घण्टों तक दहकते रहते थे। इससे कोयले की बचत होती थी और अंगीठी में से धुंआ कम निकलता था।

    जब हम पूछते थे कि आप हमसे गर्मियों की छुट्टियों में इतना काम क्यों करवाती हैं तो वे हंसकर जवाब देतीं कि मैं चाहती हूं कि तुम मेलों में जाने के लिए जेबखर्ची मुझसे नहीं मांगो, स्वयं अपने पैसे से मेला देखकर आओ।

    आज सोचता हूं तो लगता है कि मां भले ही अपनी ओर से हमें स्वावलम्बी होने का मंत्र सिखाती थीं किंतु इस कार्य में पर्यावरण संरक्षण का कितना बड़ा संदेश छिपा हुआ था।

    दुर्भाग्य से आधुनिक समय में हम रेडीमेड संस्कृति की ओर अग्रसर हो गए हैं। हाथ से बने हुए सामान की जगह केवल मशीनों द्वारा किए गए उत्पादन ही हमें स्वीकार्य हैं। हमारी यही प्रवृत्ति प्रकृति एवं पर्यावरण के संतुलन को तेजी से समाप्त कर रही है।

    समय की आवश्यकता है जब हम अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटें जो प्रकृति को माता और पर्यावरण को अपना सुरक्षा चक्र मानती है। जो उदाहरण मैंने दिए हैं, वे हो सकता है आज की तरीख में आउट डेटेड बातें हों किंतु जो विषय आज के लिए प्रासंगिक हैं, उन्हें तो हम कर ही सकते हैं।

    एक उदाहरण लेते हैं। बाजार में बिकने वाली मिठाइयों एवं पान पर चांदी का बर्क लगाया जाता है। वास्तव में यह चांदी का बर्क नहीं है, एल्यूमिनियम का है। जब यह मिठाई और पान के साथ हमारे शरीर में पहुंचता है। इसे बकरे की खाल में रखकर कूटा जाता है। मनुष्य की आंते इस बर्क को अवशोषित करने का प्रयास करती हैं और लीवर से निकला जूस इसे पचाने का प्रयास करता है। जब आंतें और लीवर इस काम को नहीं कर पाते तो यह बर्क किडनी तक पहुंचता है। किडनी इसे छानने का प्रयास करती है किंतु यह छनता नहीं है इससे किडनी पर जोर पड़ता है किडनी को अधिक काम करना पड़ता है। अंत में हमारे मल-मूत्र के साथ निकला हुआ बर्क सीवरेज चैनल के माध्यम से भूमि में प्रवेश करता है और मिट्टी को खराब करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जब मिट्टी खराब होती है तो पूरे पर्यावरण चक्र में विक्षोभ होता है।

    क्या हम बर्क को खाना छोड़ सकते हैं। यदि समस्त मनुष्य बर्क खाना छोड़ दें तो देश की मिट्टी पर इसका कितना सकारात्मक प्रभाव होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यदि यह बर्क सोने या चांदी का भी होता तो भी यह मनुष्य की आंतों, लीवर और किडनी को इसी तरह नुक्सान पहुंचाता। हमारे केवल इस एक छोटे से कदम से पर्यावरण का संरक्षण होगा।

    भारतीय संस्कृति शारीरिक श्रम पर आधारित है। गांवों में आज भी महिलाएं प्रातःकाल में चक्की चलाकर अनाज पीसती हैं। घरों में ही पापड़, बड़ियां, राबोड़ी, खीचिये, खीच, राबड़ी, आदि विविधि व्यंजन बनाती हैं। बाजरे, ज्वार तथा गेहूं की रोटियां, टुक्कड़ अथवा सोगरे को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, घी तथा छाछ जैसी घरेलू लगावण के साथ खाया जाता है जबकि पश्चिम की संस्कृति से आई ब्रेड के लिये महंगे बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाय पूंजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं।

    ऐसी संस्कृति जिसमें शारीरिक श्रम का अभाव हो, यूज एण्ड थ्रो कल्चर तथा डिस्पोजेबल कल्चर, को बढ़ावा देती है। उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति की प्रवृत्ति है।

    शादी विवाह में पहले मिट्टी के सकोरों और रामझारों का प्रयोग होता था। आज प्लास्टिक तथा थर्मोकोल के गिलास प्रयुक्त होते हैं। ये गिलास मिट्टी में गलकर नष्ट नहीं होते। एक-एक शादी में पांच-दस हजार गिलासों का ढेर लगना मामूली बात है।

    हमें एक शादी में इतने लोग क्यों बुलाने चाहिए। यह हम केवल इतना समझ लें कि विवाह एक पारिवारिक उत्सव है न कि सामाजिक फंक्शन न कि दशहरे का मेला, तो हमराी तरफ से यह, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुत बड़ा योगदान होगा।

    फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर है।

    शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिये कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिये अधिक विनाशकारी है।

    उत्तर भारत में कुछ स्थानों पर यह परम्परा थी कि जब लड़की के पीहर वाले अपनी बहन के ससुराल मायरा भरने जाते थे तो वहाँ तालाब से मिट्टी खोदकर बाहर निकालते थे। अब यह काम सरकार करवाती है। पंजाब में यह परम्परा थी कि लड़की जब विवाह के पश्चात् ससुराल जाती थी तो उससे एक पेड़ लगवाते थे। लड़की जब ससुराल से अपने पीहर आती थी और इस पेड़ को देखती थी, पेड़ हरा-भरा मिलता था तो लड़की समझ जाती थी कि उसके पीहर में आज भी उससे प्रेम किया जाता है, उसके लगाए बिरवे को भाई और भाभियां स्नेह जल से सींच कर पाल रही हैं।

    हमारे पुरखों ने वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, कीड़ीनगरा सींचने, गर्मियों में पक्षियों के लिये पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने, प्रतिदिन पीपल तथा तुलसी सींचने, सूर्यदेव को अर्घ्य देने एवं विशिष्ट पर्वों एवं व्रतों पर चंद्रदेव को अर्घ्य देने, द्वितीया को चंद्र दर्शन करने जैसे धार्मिक विधान बनाए जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न हो।

    प्राकृतिक शक्तियों द्वारा जो कुछ भी निर्मित किया जाता है एवं वनस्पति जगत द्वारा जो कुछ भी उपलब्ध कराया जाता है, उस सबका उपभोक्ता जीव जगत है। जीव जगत में भी मनुष्य ऐसा प्राणी है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले एवं उपलब्ध कराये जाने वाले संसाधनों को अंतिम उपभोक्ता की तरह प्रयुक्त करता है।

    यही कारण है कि मनुष्य इस प्रकृति का पुत्र होते हुए भी, प्रकृति में उपलब्ध हर वस्तु का स्वामी है या नेचुरल रिसोर्सेज नामक कम्पनी का सबसे बड़ा शेयर होल्डर है। स्वाभाविक है कि मालिक या सबसे बड़े शेयर होल्डर को अधिक जिम्मेदारी का प्रदर्शन करना होता है। व्यवहार रूप में उसे प्राकृतिक संसाधनों का मालिक बनकर नहीं अपितु सेवक बनकर रहना होगा, तभी हम पर्यावरण का सच्चे अर्थों में संरक्षण कर सकते हैं।

    संत पीपा के इस दोहे पर अपनी मानसिकता को जांचकर देखें जो मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है-

    स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास।

    पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।


    हम प्रकृति के सेवक होकर रहें न कि स्वामी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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