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  • क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

     11.04.2018
    क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

    क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

    दो अप्रैल 2018 को दलित आंदोलन के दौरान भारत-बंद, धरना, प्रदर्शन, जुलूस आदि कार्यक्रम हुए। ये कार्यक्रम कई स्थानों पर हिंसक हो गए। आग लगी, लोगों के घर जले, सिर फूटे, कुछ लोग मरे भी।

    कहा जा रहा है कि इसके पीछे कांग्रेस ने राजनीतिक रोटियां सेकीं।

    क्या वाकई में इसके पीछे कांग्रेस थी !

    इस प्रश्न पर विचार-विमर्श करने से पहले कुछ मूलभूत बातों पर विचार किया जाना चाहिए।

    भारत के सामाजिक ढांचे में कुछ दरारें हैं जिनका लाभ कभी देश विरोधी तो कभी सत्ता विरोधी शक्तियों ने उठाया है। पहले इसका लाभ महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी तथा बाबर ने उठाया, बाद में अंग्रेजों ने उठाया और मीडिया में आरोप लग रहा है कि अब कांग्रेस उठाना चाहती है !

    इस समस्या के इतिहास में थोड़ा और पीछे चलते हैं।

    जब कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था, श्रम आधारित जाति व्यवस्था में बदली तो समाज को उसके लाभ और हानि दोनों ही मिले। श्रम आधारित जाति व्यवस्था का लाभ श्रम कौशल से जुड़ा हुआ था जबकि इस व्यवस्था का नुक्सान कुछ अतिवादियों, मूर्खों एवं बुरी प्रवृत्ति के लोगों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध संगठित होकर षड़यंत्र करने के रूप में हुआ।

    जाति व्यवस्था ने अस्पृश्यता जैसे घृणित विचार को जन्म दिया। इसके कारण कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हुईं।

    भारत को आजादी मिलने तक देश में जातिवाद एक सामाजिक समस्या थी किंतु देश की आजादी के बाद यह राजनीतिक समस्या बन गई।

    जातिवादी व्यवस्था ने एससी-एसटी आरक्षण को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने मण्डल कमीशन को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने ओबीसी आरक्षण को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा जैसे शब्दों को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने बुरी प्रवृत्ति के लोगों को समूचे हिन्दू धर्म को बुरा बताने का अवसर दिया। जातिवादी व्यवस्था ने जाट आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, पटेल आंदोलन और दलित आंदोलन को जन्म दिया।

    जाति व्यस्था की आड़ में कुछ बुरे लोगों को हिन्दू धर्म के विरुद्ध विष वमन करने तथा उसे असहिष्णु, हिंसक और शोषकों का धर्म कहने का दुस्साहस हुआ। हिन्दू धर्म की अच्छाइयों की चर्चा बंद कर दी गई और समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता तथा समानता जैसे राजनीतिक मुहावरे गढ़ लिए गए।

    नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक हिन्दू संगठनों को गांधीजी का हत्यारा बताकर देशवासियों को हिन्दू संगठनों के विरुद्ध भड़काते रहे। राहुल गांधी तो आर एस एस पर गांधीजी की हत्या का आरोप दोहरा कर मुकदमा तक झेल रहे हैं।

    आज भी कांग्रेस के महासचिव अशोक गहलोत यही कहते हैं कि बीजेपी घृणा फैलाने वाली राजनीति करती है। देश का बहुसंख्यक हिन्दू अब इन बातों को पसंद नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि इन जुमलों की आड़ में अल्पसंख्यकों के वोट बटोरे जाते हैं। इसलिए देश का बहुसंख्यक हिन्दू, कांग्रेस से विमुख हो गया और केन्द्र में बीजेपी की सरकार बनी।

    जब देश का बहुसंख्यक हिन्दू, कांग्रेस से विमुख होकर बीजेपी की तरफ मुड़ गया तो कांग्रेस का राजनीतिक आधार ही खिसक गया। जिस अल्पसंख्यक वर्ग को कांग्रेस ने वोट बैंक में बदलकर सत्ता के घोड़े पर चढ़े रहने की आदत बना ली थी, वह घोड़ा धड़ाम से नीचे गिर गया। इसलिए कांग्रेस के समक्ष अब कोई चारा नहीं बचा, सिवाय इसके कि हिन्दू धर्म के वोटरों में सेंध लगाई जाए।

    देश की प्रत्येक राजनीतिक पार्टी जानती है कि हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है ! जाति को जाति से लड़ाओ, और हिन्दू धर्म की एक-जुटता को चटखा दो। हिन्दू धर्म को जाति के नाम पर आसानी से कई टुकड़ों में बांटकर कुछ टुकड़ों को अपनी ओर किया जा सकता है। एससी, एसटी, ओबीसी, जनरल, अल्पसंख्यक जैसे बड़े टुकड़े तो थोड़े से ही परिश्रम से अलग किए जा सकते हैं।

    इस बैकग्राउण्ड के बाद अब हम अपने मूल विषय पर लौटते हैं। दलित आंदोलन के दौरान कुछ अजीबोगरीब घटनाएं हुईं जिनके कारण कांग्रेस पर दलित आंदोलन भड़काने के आरोप लगाए गए। दलितों का यह आंदोलन इस बात को लेकर हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी दलित द्वारा किसी सवर्ण के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करवाने मात्र से सवर्ण व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं हो, पहले जांच हो तथा जांच के तथ्यों के आधार पर गिरफ्तारी हो ।

    दलित आंदोलन के नेताओं ने मुद्दे को भटकाया और उसे आरक्षण के मुद्दे में बदल दिया। कांग्रेस ने भी यही किया। दलित आंदोलन के नेताओं द्वारा सड़कों पर चल रहे जुलूसों में बार-बार कहा गया कि बीजेपी, दलितों का आरक्षण समाप्त कर रही है, जबकि बीजेपी बारबार दोहरा रही थी कि आरक्षण समाप्त नहीं होगा। राहुल गांधी लगातार दोहराते रहे कि बीजेपी दलित विरोधी है, बीजेपी आरक्षण समाप्त करना चाहती है। यह भी कहा गया कि गुजरात से शुरू हुआ दलित आंदोलन भगवा राजनीति के लिए कफ़न साबित होगा !

    इस आंदोलन के दौरान कुछ स्थानों पर हनुमानजी आदि देवी देवताओं की मूर्तियों पर सार्वजनिक रूप से जूते मारे गए और उन पर थूका गया। कुछ स्थानों पर सवर्णों के घर जलाए गए। प्रतिक्रिया में कुछ दलितों के घर भी जलाए गए। सोशियल मीडिया में हिन्दू धर्म के विरुद्ध घृणा फैलाने का दौर चला।

    राजस्थान में बीजेपी की एक एससी महिला एमएलए का घर भी जलाया गया। उन्होंने आरोप लगाया है कि कांग्रेस के स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों ने उनके घर को आग लगाई। अन्य स्थानों से भी कुछ ऐसी बातें सामने आईं।

    यह तो प्रत्येक घटना की पुलिस जांच होने पर ही पता लग सकेगा कि किसी भी घटना में कांग्रेस का हाथ था या नहीं, तब तक जितने मुंह, उतनी बातें होंगी। इस बीच बीजेपी के कुछ दलित सांसद भी अपनी ही पार्टी के विरुद्ध शिकायतों का पिटारा खोलकर बैठ गए हैं। यह तो वक्त ही बताएगा कि उनकी शिकायतें कितनी सही हैं और कितनी गलत!

    कांग्रेस देश की बहुत जिम्मेदार तथा प्रतिष्ठित पार्टी है, उसके नेतृत्व में देश ने आजादी की लड़ाई लड़ी और आजादी पाई। कांग्रेस ने देश पर 60 से अधिक वर्षों तक शासन किया। कांग्रेसी सरकारों के नेतृत्व में देश ने दुश्मनों को युद्धों में पराजित किया। अतः उससे किसी भी तरह की गैर जिम्मेदार हरकत की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए आवश्यक है कि कांग्रेस भी देश को गंभीर स्वर में स्वयं को निर्दोष बताने का प्रयास करे।

    दलित नेताओं को भी विचार करना चाहिए कि वे अपने समाज की अशिक्षा और निर्धनता का लाभ उठाकर उन्हें सरकार, समाज अथवा धर्म के विरुद्ध न भड़काएं। यह कैसे संभव है कि हम अपने देश से प्रेम करने का दंभ भरें और देशवासियों से घृणा करें!

    इससे पहले कि प्रत्येक जाति स्वयं को एक राष्ट्र समझे और हम पूरी दुनिया के समक्ष दया के लिए गिड़गिड़ाएं, हमें जिम्मेदार नागरिकों की तरह व्यवहार करना होगा। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी तो और भी ज्यादा है।
    प्रेम से ही प्रेम उत्पन्न होता है, घृणा से किसी को भी अंत में कुछ प्राप्त नहीं होता।


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