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  • थार रेगिस्तान के विशिष्ट व्यंजन !

     07.09.2018
    थार रेगिस्तान के विशिष्ट व्यंजन !

    थार रेगिस्तान के विशिष्ट व्यंजन !

    राजस्थान आएं तो क्या जरूर खाएं !


    राजस्थान का लगभग 61 प्रतिशत भूभाग थार रेगिस्तान का हिस्सा है। अरावली पर्वत के पश्चिम का विशाल भूभाग थार रेगिस्तान का निर्माण करता है।

    जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर, पाली, नागौर, बीकानेर, चूरू, सीकर, झुंझुनूं, गंगानगर, हनुमानगढ़ आदि जिले थार रेगिस्तान में आते हैं।

    यह एक गर्म जलवायु वाला क्षेत्र है जहां गर्मियों में दिन का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक पहुंच जाता है तथा वर्षा बहुत कम होती है। यही कारण है कि थार रेगिस्तान में विशेष प्रकार की वनस्पतियां होती हैं जो पूरी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती।

    थार रेगिस्तान में ऊँट, भेड़ बकरी तथा गाय अधिक संख्या में मिलते हैं जो कम पानी एवं कम वनस्पति में अच्छी तरह से जीवित रहते हैं। इस कारण थार रेगिस्तान में दूध, घी, दही तथा छाछ से कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।

    थार रेगिस्तान के परम्परागत आहार एवं व्यंजन, भारत के शेष हिस्सों से बिल्कुल अलग हैं।

    यहाँ बाजरे या बाजरी की मोटी रोटी अधिक खाई जाती है जिसे सोगरा कहा जाता है। बाजरा या बाजरी का आटा गूंधते समय उसमें नमक एवं पानी थोड़ा अधिक मिलाया जाता है तथा आटे की लोई को पानी की सहायता से हाथ से थपथपाते हुए रोटी में बदल दिया जाता है। इस रोटी को लोहे एवं मिट्टी के तवे पर चूल्हे या गैस की आंच पर सेका जाता है। सोगरे के साथ घी का प्रयोग अधिक होता है।

    गेंहू की मोटी रोटी को टुक्कड़ अथवा टिक्कड़ कहा जाता है। इसे भी चकले पर बेलन की सहायता से बेला नहीं जाता है अपितु चकले पर लोई रखकर उसे हाथ से थपथपाकर रोटी बनाई जाती है। टुक्कड़ के भीतर घी नहीं भरा होता है जबकि टिक्कड़ के भीतर घी भरा हुआ होता है।

    सोगरे, टुक्कड़ अथवा टिक्क्ड़ का चूरा करके उसमें घी और गुड़ मिलाया जाता है जिससे स्वादिष्ट चूरमा बनता है। इनके साथ पचकूटे की सब्जी भी अधिक प्रयोग होती है। पचकूटे की सब्जी ग्वार की फली, काचरा, कैर, कुमटी, गूंदे, सांगरी आदि में से कोई पांच सूखी सब्जियां मिलाकर बनाते हैं। सोगरे, टुक्कड़ एवं टिक्कड़ को दूध, दही, घी, प्याज, लाल मिर्च, लहसुन की चटनी प्याज के हरे पत्तों की सब्जी, सूखी प्याज की सब्जी आदि के साथ भी खाया जाता है जिसे लगावण कहते हैं।

    गेहूं के आटे की पतली चपातियों को सुखा कर खाखरे बनाये जाते हैं। ये पापड़ की तरह पतले होते हैं तथा कई प्रकार से बनाए जाते हैं। सादा खाखरा केवल गेहूं के आटे से बनाया जाता है। जब इन्हें मूंग की दाल के बारीक चूरे के साथ बनाया जाता है तो इन्हें कोरमे के खाखरे कहा जाता है। आटे में तेज मसाला डालकर मसाले वाला खाखरा बनाया जाता है। नमक एवं अजवायन डालकर बनने वाले खाखरे का अजवायन का खाखरा कहते हैं। खाखरे कई दिन तक चलते हैं तथा लगभग एक माह तक खराब नहीं होते। अतः दोपहर के नाश्ते से लेकर यात्रा, तीर्थाटन एवं विदेश गमन में इनका अधिक महत्व होता है। आजकल खाखरों की पैकिंग बाजार में खूब बिकती है।

    गेहूँ के आटे, चावल के आटे तथा मक्का के आटे को पानी एवं भाप में उबालकर उनसे गेहूँ, चावल एवं मक्का के अलग-अलग प्रकार के खीचिये बनाये जाते हैं। खीचियों को तेल अथवा घी में तलकर अथवा आग पर सीधे ही भूनकर पापड़ की तरह खाया जाता है।

    थार रेगिस्तान में सब्जियों के रूप में काचरे, कंकेड़े, कुमटी, कैर, सांगरी, ग्वारफली, ग्वारपाठा, टिंडे, खींपोली, लहसुन की चटनी, गट्टे, कढ़ी, पित्तौड़ आदि अधिक प्रयुक्त होते हैं। पापड़ों तथा नमकीन मोटे सेब अर्थात् मोटी भुजिया की सब्जी भी बनती है।

    मोटी भुजिया को थार में खोखे भी कहा जाता है। इसे बनाने में तेल का प्रयोग न के बराबर होता है।

    खट्टी छाछ तथा बाजरी के योग से बनी राबड़ी कहलाती है। खट्टी छाछ एवं मक्का के आटे के योग से घाट बनती है। यह दो-तीन दिनों तक खराब नहीं होती। राब अथवा राबड़ी छाछ में बाजरी के आटे के योग से बनायी जाती है। इसे स्वास्थ्य के लिये अच्छा माना जाता है। यह ग्रीष्म ऋतु का भोजन है।

    बाजरी व मोठ की दाल के योग से खीच बनती है। समझने के लिए इसे बाजरी की तिहारी या पुलाव कहा जा सकता है।

    गेंहूं के दलिये, गुड़ एवं घी के योग से मीठी लापसी बनती है। इसमें घी की अधिक मात्रा उपयोग होता है। इसका स्वाद अनूठा होता है।

    आटे व दाल के योग से बने दाल-ढोकले शहरों व गाँवों 
    में चाव से खाये जाते हैं। इसमें दाल के रूप में सामान्यतः मूंग की छिलके वाली दाल का प्रयोग होता है तथा जब यह आधी उबल जाती है तो उसमें गेहूं, मक्का अथवा बेसन से बनी छोटी-छोटी लाइयां डाल दी जाती हैं जिन्हें ढोकले कहा जाता है। इन लोइयों में नमक, मिर्च, हींग एवं अन्य मसाले पहले से ही मिला लिए जाते हैं।

    थार रेगिस्तान के कुछ मीठे व नमकीन व्यंजनों ने देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इनमें बीकानेर के रसगुल्ले, भुजिया तथा पापड़, जोधपुर की मावे की कचौरी, प्याज की कचौरी, माखनिया लस्सी, मिर्ची बड़े, रबड़ी के लड्डू, ब्यावर की तिलपट्टियां तथा मालपुए, जैसलमेर के गोटमां, किशनगढ़ के पेठे, मेड़ता के दूध पेड़े, सांभर की फीणी, लूनी की केशरबाटी, नावां के गोंद के पापड़, खारची की रबड़ी, खुनखुना की जलेबी, पाली के गंूजा, पुष्कर तथा नागौर के मालपुए आदि प्रसिद्ध हैं।

    दाल-बाटी-चूरमा को थार रेगिस्तान में शहरों से लेकर गांवों एवं ढाणियों में विशिष्ट व्यंजन माना जाता है।

    गाय, भैंस एवं बकरी का दूध बड़े पैमाने पर प्रयुक्त होता है। कुछ चरवाहा जातियाँ सांड (मादा ऊंट) व भेड़ का दूध भी पीने के काम में लेती हैं।

    आटे और नमक का काफी पतला हलुआ पटोलिया कहलाता है। सुपाच्य होने के कारण इसे बीमार मनुष्य को खाने के लिये दिया जाता है।

    आदिवासियों में मक्का का दलिया छाछ में उबाल कर बनाया जाता है। इसे कई दिनों तक खाया जा सकता है।

    राजस्थान में साबत गेहूँ को उबाल कर घूघरी बनाने का भी प्रचलन है। यह मांगलिक अवसरों पर प्रसाद के रूप में वितरित होती है तथा किसी मांगलिक अवसर पर एकत्रित हुई महिलाओं में भी बांटी जाती है।



    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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