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  • गूंगी गुड़िया का आपातकाल

     23.06.2019
    गूंगी गुड़िया का आपातकाल

    गूंगी गुड़िया का आपातकाल


    1966 में लाल बहादुर शास्त्रीजी के आकस्मिक निधन के बाद मोरारजी देसाई ने भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया किंतु कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के. काम राज ने स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप दी। इसके पीछे बड़ा कारण यह था कि इंदिरा गांधी की छवि बहुत शांत स्वभाव की नेता की थी। सार्वजनिक रूप से बहुत कम बोलने के कारण उन्हें राजनीतिक हलकों में गूंगी गुड़िया कहा जाता था। के. कामराज को लगता था कि वे इस गूंगी गुड़िया के माध्यम से अपनी मर्जी से भारत का शासन चला पाएंगे किंतु ऐसा हुआ नहीं।

    शीघ्र ही इंदिरा गांधी ने सिद्ध कर दिया कि इस गूंगी गुड़िया के भीतर दृढ़ इच्छा शक्ति एवं राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बड़े समंदर लहरा रहे हैं जिनके चलते 1969 में राष्ट्रपति के चुनावों में इंदिरा गांधी की उस समय के धुरंधर कांग्रेसियों से सीधी लड़ाई हो गई। मोरारजी देसाई तथा उनका गुट नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति बनाना चाहता था किंतु इंदिरा गांधी वी. वी. गिरि के पक्ष में थीं। जब कांग्रेस ने नीलम संजीव रेड्डी को अपना अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर दिया तब इंदिरा ने वी. वी. गिरि को निर्दलीय प्रत्याषी के रूप् में खड़ा कर दिया तथा कांग्रेसियों से अपील की कि वे अपनी अंतरआत्मा की आवाज पर वोट दें। कांग्रेसी सांसदों एवं विधायकों ने इंदिरा गांधी द्वारा समर्थित वी. वी. गिरि को वोट दिए और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी परास्त हो गए।

    इस झगड़े में कांग्रेस दो हिस्सों बंट गई। मोरारजी देसाई के प्रभाव वाली सिंडीकेट ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस से बाहर निकाल दिया। इंदिरा ने कांग्रेस (आर) बना ली तथा वे सत्ता में बनी रहीं। मोरारजी देसाई की कांग्रेस ओल्ड कांग्रेस कहलाने लगी। मोरारजी गुट के साथ कांग्रेस के केवल 65 सदस्य रहे, शेष सदस्य इंदिरा के पक्ष में रहे तथा इंदिरा ने डीएमके की सहायता से अपनी कुर्सी बचा ली।

    जब मार्च 1971 के आम चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी अपने प्रतिद्वंद्वियों के सामने बहुत कमजोर दिखाई देने लगीं। यहां तक कि उनका खुद का चुनाव जीतना भी मुश्किल दिखाई देने लगा। कुछ साल पहले तक जिस इंदिरा गांधी को राजनीतिक हलकों में गूंगी गुड़िया माना जा रहा था, अब उस गूंगी गुड़िया को सत्ता का चस्का लग चुका था। सत्ता में बने रहने के लिए वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार थी। चुनाव जीतने के लिए श्रीमती गांधी ने साम-दाम-दण्ड-भेद सभी तरह के उपायों का सहारा लिया। इंदिरा गांधी ने न केवल अपने प्रतिद्वंद्वी राजनारायण को परास्त कर दिया अपितु 352 सीटों के भारी बहुमत से सरकार बनाई।

    पराजित प्रत्याशी राजनारायण ने इंदिरागांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया कि उन्होंने असंवैधानिक तरीकों से चुनाव जीता है, उनका चुनाव निरस्त किया जाए। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मुकदमे का फैसला सुनाया और इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर दिया। इस निर्णय के अनुसार दुबारा चुनाव जीतने तक इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं।

    राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति-प्राप्त बिहार के बड़े नेता जयप्रकाश नारायण ने मांग की कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दें। 25 जून 1975 को जयप्रकाश ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध दिल्ली में एक विशाल रैली कि जिसकी सफलता को देखते हुए इंदिरा गांधी घबरा गईं। उसी रात उन्होंने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से कहा कि वे देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में देखते हुए आपात्काल घोषित करें। फखरुद्दीन अली अहमद इंदिरा के दबाव में आ गए। उन्होंने 25-26 जून की रात में आपात्काल की घोषणा कर दी। देश में नागरिक अधिकार रद्द कर दिए गए।

    सरकार के खिलाफ लिखने, बोलने पर रोक लगा दी गई। अखबारों की खबरें सेंसर की जाने लगीं। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, जाॅर्ज फर्नाण्डीस, बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी सहित बहुत से विरोधी नेता जेलों में ठूंस दिए गए। बहुत से पत्रकारों को भी जेल जाना पड़ा। सरकारी विभागों के कर्मचारी यूनियनों के नेताओं को भूमिगत होना पड़ा। बहुत से कर्मचारी नेता ढूंढ-ढूंढ कर जेलों में ठूंस दिए गए जिनमें से बहुतों को पुलिस के अत्याचारों का शिकार होना पड़ा। कम्यूनिस्ट पार्टी इण्डिया ने आपात्काल का स्वागत किया। उन्हें जेलों में पीटा गया, भूखा रखा गया और उनके परिवार वालों को भी अपमानित किया गया। लगता था जैसे लोकतंत्र की हत्या कर दी गई है और देश में अंग्रेजों के जमाने की डिक्टेटरशिप लौट आई है। आजादी की लड़ने वालों ने इस प्रकार के शासन की कल्पना तक नहीं की थी।

    देश में मीसा अर्थात् मेंटीनेंट आॅफ इण्टरनल सिक्योरिटी एक्ट लागू कर दिया गया। इससे एक लाभ यह हुआ कि छोटे गुण्डों से लेकर बड़े अपराधियों और तमाम तरह के असमाजिक तत्वों में भय बैठ गया। लोग अपराध करने से डरने लगे। सरकारी कर्मचारी समय पर अपने कार्यालयों में पहुंचने लगे और रिश्वतखोरी कम हुई। व्यापारी मिलावट करने और कम तोलने से डरने लगे। इस कारण शरीफ एवं ईमानदार जनता को कुछ हद तक राहत भी मिली।

    मार्च 1976 में छठी लोकसभा के चुनाव होने थे किंतु चुनावों को एक साल के लिए स्थगित कर दिया गया। इसी बीच इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी ने देश में जनंसख्या नियंत्रण के लिए राष्ट्रव्यापी नसबंदी अभियान चलाया। संजय उन दिनों इंदिरा के राजनीतिक उत्तराधिकारी समझे जाते थे। इसलिए उनके आदेश सरकारी तंत्र में कानून की तरह लागू होते थे। लोगों की जबर्दस्ती नसबंदी की जाने लगी। सरकारी कर्मचारियों एवं पुलिस ने नसबंदी के लक्ष्य पूरे करने के लिए बहुत से युवाओं की यहां तक कि नवविवाहित, निःसंतान और अविवाहित युवाओं की भी नसबंदी कर दी।

    जब चुनाव समय पर नहीं हुए और लोगों की जबर्दस्ती नसबंदी का काम जोर पकड़ गया तो लोगों में इंदिरा गांधी के विरुद्ध असंतोष भड़कने लगा और देश में चुनाव करवाए जाने की मांग होने लगी। कम्यूनिस्ट पार्टी भी अब आपात्काल का विरोध करने लगी। जनवरी 1977 में सभी राजनीतिक बंदी रिहा कर दिए गए तथा 16 से 19 मार्च 1977 को देश में चुनाव करवाए गए तथा 20 मार्च को हुई जनगणना में इंदिरा गांधी तथा उनकी पार्टी बुरी तरह चुनाव हार गई। 21 मार्च 1977 को आपात्काल हटा दिया गया और देश में फिर से नागरिक अधिकारों की बहाली हुई। इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र के एक काले अध्याय की समाप्ति हुई।

    - डाॅ. मोहन लाल गुप्ता


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