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  • पश्चिमी राजस्थान में आयुर्वेद तथा पुरातत्व को पर्यटन का प्रमुख आधार बनाया जाये

     07.06.2017
    पश्चिमी राजस्थान में आयुर्वेद तथा पुरातत्व को पर्यटन का प्रमुख आधार बनाया जाये

    वर्तमान में पश्चिमी राजस्थान में रियासती इतिहास पर्यटन का प्रमुख आधार बना हुआ है जिसके चलते राजस्थान में आने वाले पर्यटकों को रियासत कालीन महलों, दुर्गों, हवेलियों तथा अन्य राजकीय भवनों की सैर करवाई जाती है। राजस्थान में आने वाले पर्यटकों को प्राचीन किलों तथा राजसी प्रासादों के साथ-साथ रेतीले धोरों, संगीत लहरियों, लोक नृत्यों, विशिष्ट व्यंजनों, तीज त्यौयारों तथा उत्सवों से भी परिचय करवाया जाता है तथा इन्हेें भी रियासती इतिहास में लपेट कर परोसा जाता है। निःसंदेह रियासत कालीन इतिहास बीते युग की गौरवशाली धरोहर है तथा जिन भवनों के आसपास वह इतिहास घटित हुआ है वह हर तरह से दर्शनीय हैं किंतु राजस्थान केवल इतना ही नहीं है। राजस्थान आने वाले विश्व भर के पर्यटकों में से बहुतों ने अपने देशों को लौटकर पर्यटन के सम्बन्ध में जो पुस्तकें, लेख तथा टूरिस्ट गाइडें लिखी हैं उनमें यहाँ की विपुल सांस्कृतिक थाती का बड़े ही रोमांचक अंदाज में वर्णन किया है किंतु अब इसे नयी दिशा देने की आवश्यकता है जिसकी की विपुल संभावनाएं मौजूद हैं। जब हम यह कहते हैं कि राजस्थान में पर्यटन की विपुल संभावनाएं हैं तो उसके गहरे अर्थ निकलते हैं। आज पर्यटन की पारंपरिक अवधारणा मिटती जा रही है। चाहे देशी पर्यटक हो अथवा विदेशी, वह जानना चाहता है कि आज के राजस्थान ने उसके लिये क्या कुछ नया संजोया है। आज समूचा विश्व तेजी से औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ रहा है जिससे पर्यावरण प्रदूषण की समस्याएं बढ़ गयी हैं किंतु कुछ अपवादों को छोड़कर राजस्थान आज भी अपनी स्वच्छ हवाओं, निर्मला धूप और रोगनाशक जल को प्रदूषण रहित बनाये हुए है। यहाँ का स्वास्थ्यवर्धक जलवायु पर्यटकों के लिये आकर्षण को द्विगुणित कर सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि पर्यटकों तक यह बात पहुँचायी जाये। राजस्थान में फैला शुष्क रेगिस्तान, अरावली की विस्तृत पहाडि़यां, मेवाड़ में विस्तृत मालवा का पठार तथा चम्बल के किनारे, आयुर्वेद की दृष्टि से एक सुखद अजूबे को समेटे हुए है। जो जड़ी बूटियां इस विविध क्षेत्र में मिलती हैं उनका उपयोग विश्व स्तर के पर्यटकों को लुभाने के लिये किया जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उन जड़ी बूटियों के जिन परम्परागत नुस्खों को आधुनिक चिकित्सा की सुविधाजनक क्रियाविधियों के कारण भूल गये हैं, उन्हें फिर से स्मरण करें। उनके सरल उपयोगों को दुनिया के सामने लायें। उन दिव्य औषधियों की वाटिकाएं स्थापित करें तथा उनमें अपने पर्यटकों को जीवंत प्रदर्शन दें। आयुर्वेद के परम्परागत तरीकों यथा शरीर की तेल मालिश, व्यायाम, योगाभ्यास, कल्पविधियों को भी हम पर्यटन से जोड़ सकते हैं। हम ऐसे केन्द्र स्थापित कर सकते हैं जहाँ पर्यटकों को ये सुविधायें सहज रूप से सुलभ हों। पुरातत्व तथा प्रागैतिहासिक केंद्रों को अभी तक पर्यटकों के सामने नहीं लाया जा सका है। लूणी, बेड़च, गंभीरी, कांटली तथा चम्बल आदि नदियों के तटों पर, डीडवाना, लूणकरण, पचपद्रा तथा सांभर आदि झीलों के किनारों से अनेक ऐसे स्थलों का पता चला था जहाँ से प्रागैतिहासिक काल की पुरा सामग्री प्राप्त हुई थी। इसी प्रकार बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा क्षेत्र से प्राचीन आर्य बस्तियों के झौंपड़े प्राप्त हुए। जालोर के ऐलाणा क्षेत्र से तृतीय कांस्यकालीन सभ्यता के अवशेष मिले और जोधपुर के बाहर भीमभड़क से आदिम युगीन शैलचित्र प्राप्त हुए। दुर्भाग्य से पुरासामग्री को उसके मूल स्थान से हटा दिया गया और उन्हें संग्रहालयों मंे भेज दिया गया। पर्यटक इस सामग्री को एक स्थान पर रखा हुआ देखकर उस परिवेश का आनंद नहीं ले सकता जिसमें कि उन्हें मूल रूप से पाया गया था। यदि इस सामग्री को उसके मूल स्थान पर ही रखा जाता और वहाँ पर्यटन की सुविधायें विकसित करके पर्यटक को ले जाया जाता तो इन स्थानों का रोमांच अधिक होता। आज भी इस भूल को सुधारा जा सकता है। हम मण्डोर के प्रतिहारकालीन दुर्ग को भी पुरातत्व विषयक पर्यटन स्थल मंे विकसित कर सकते हैं जहाँ से प्रतिहार कालीन, पूर्व प्रतिहार कालीन तथा उससे भी पूर्व गुप्तकालीन स्थापत्य तथा शिल्प के अवशेष प्राप्त हुए हैं तथा अब भी हो रहे हैं। मण्डोर क्षेत्र की सातवीं शताब्दी की प्राचीन बावड़ी, जयपुर की आठवीं शताब्दी की बावड़ी, भीनमाल की अति प्राचीन जैकोब (यक्षकूप) बावड़ी तथा पूरे राजस्थान में फैली ऐसी ही कलात्मक बावडि़यां भी देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का विषय हो सकती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम पर्यटकों को बतायें कि ये बावडि़यां भारत भर में अपना विशिष्ट स्थान क्यों रखती हैं तथा इनका इतिहास क्या है! यदि हम पर्यटकों को बतायें कि बावड़ी निर्माण की शिल्पकला पहली शताब्दी के लगभग शक जाति कर्क देश से अपने साथ पश्चिमी राजस्थान में लायी थी जो आज भी इस क्षेत्र में किसी समय शकों का शासन होने के गिने चुने प्रमाणों में से एक हैं। इसी कारण इन्हें संस्कृत साहित्य में शकंधु तथा कर्कंधु अर्थात शकों का कुंआ तथा कर्क देश का कुंआ कहा गया है। यक्ष पूजन की परम्परा भी शकों के साथ भारत में आयी थी। यही कारण है कि प्राचीन बावड़यों के आस पास यक्षों की मूर्तियां पायी जाती थीं। इस प्रकार यदि राजस्थान के विशिष्ट एवं दुर्लभ जीव जंतुओं यथा पीवणा सांप, झाउ चूहा, नेवला, स्याली, के छोटे-छोटे जंतुआलय बनाये जायें तथा उन प्रजातियों के वैशिष्ट्य से पर्यटकों को परिचित कराया जाये तो ये भी अच्छे केंद्रों के रूप में विकसित हो सकते हैं। इन केन्द्रों को भारत भर के उन विद्यालयों एवं महाविद्यालयों से भी जोड़ा जा सकता है जो अपने छात्र-छात्राओं को वैज्ञानिक अथवा पुरातत्व विषयक भ्रमणों पर ले जाते हैं। -मोहनलाल गुप्ता


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