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  • राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (भाग - 1)

     07.06.2017
    राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (भाग - 1)

    कर्नल टॉड का जन्म 20 मार्च 1782 को इंगलैण्ड के इंग्लिस्टन नामक स्थान पर हुआ था। उसके किसी पूर्वज ने स्कॉटलैण्ड के राजा रॉबर्ट दी ब्रूस के बच्चों को इंगलैण्ड के राजा की कैद से छुड़ाया था इस कारण टॉड परिवार को नाइटबैरोनेट की उपाधि तथ लोमड़ी का चिह्न धारण करने का अधिकार मिला हुआ था। जब जेम्स टॉड 17 वर्ष का हुआ तो ई. 1799 में वह ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सैनिक अधिकारी के रूप में बंगाल भेज दिया गया।

    वहाँ कुछ दिनों के लिये उसे नौसैनिक के रूप में भी काम करने का अनुभव प्राप्त हुआ। अगले ही वर्ष वह पैदल सेना में लैफ्टीनेंट के पद पर नियुक्त किया गया। वहाँ से उसकी नियुक्ति पहले कलकत्ता, फिर बंगाल तथा फिर दिल्ली में हुई। ई. 1801 में उसे दिल्ली के पास एक पुरानी नहर की पैमाइश करने का काम दिया गया। ई. 1805 में मिस्टर ग्रीम मर्सर को कम्पनी सरकार की तरफ से दौलतराव सिंधिया के दरबार में भेजा गया। कर्नल टॉड भी भारतीय राजाओं के ठाठ बाट देखने की लालसा में मर्सर के साथ हो लिया। यह वह समय था जब यूरोपीय अधिकारियों को राजपूताना एवं उसके आसपास के प्रदेश के भूगोल का बहुत ही कम ज्ञान था। उन्होंने जो नक्शे बना रखे थे उनमें अनुमान से नाम लिखे गये थे। उन नक्शों की स्थिति यह थी कि उनमें चित्तौड़गढ़ को उदयपुर के पश्चिम में दर्शाया गया था जो कि वास्तव में पूर्व में है। अंग्रेजों का अनुमान था कि राजपूताना की नदियां दक्षिण की तरफ बहती हुई नर्मदा से मिल जाती हैं।

    इस भूल को तो हिन्दुस्तान के भूगोल के प्रथम शोधकर्ता मि. रेलन ने शुद्ध किया किंतु शेष अपूर्णतायें ज्यों की त्यों बनी रहीं। जिस समय मर्सर दिल्ली से चला उस समय सिंधिया उदयपुर में था। इसलिये मर्सर को दिल्ली से आगरा तथा जयपुर होते हुए उदयपुर पहुँचना था। ई. 1791 में कम्पनी सरकार का गवर्नर कर्नल पामर जिस मार्ग से उदयपुर गया था उस मार्ग का एक नक्शा डॉक्टर हंटर ने बनाया था। मर्सर के पास वही नक्शा था। जब मर्सर के साथ जेम्स टॉड को भी अनुमति मिली तो टॉड ने उस नक्शे की जांच करने का मानस बनाया। जिस दिन वह दिल्ली से रवाना हुआ उसी दिन से वह अपने मार्ग को नाप-नाप कर नक्शे में अंकित करने लगा। जून 1806 में टॉड मर्सर के साथ उदयपुर पहुँचा। जब दिल्ली से उदयपुर तक का नक्शा तैयार हो गया तो टॉड की इच्छा हुई कि वह उदयपुर के आसपास के क्षेत्र को भी देखे और नापे।

    सिंधिया की सेना उदयपुर से चलकर चित्तौड़ गढ़ के मार्ग से होती हुई मालवा पार करके बुंदेलखण्ड पहुंची। टॉड भी इसी सेना के साथ लग लिया। इस पूरी यात्रा में टॉड न केवल नक्शे तैयार करता रहा अपितु उसने मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक स्थान का इतिहास, जनश्रुति तथा शिलालेख आदि का संग्रह करना भी आरंभ कर दिया। इसके बाद तो टॉड ने इन कामों को करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। वह अपनी प्रत्येक यात्रा में यही करता रहता था जिससे उसके पास राजपूताने के इतिहास की विपुल सामग्री एकत्रित हो गयी जिसका उपायोग उसने " एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान" नामक पुस्तक लिखने में किया। आगे चलकर इसी पुस्तक के नाम पर इस प्रदेश का नाम राजस्थान पड़ा। इस प्रकार राजस्थान का नामकरण करने का श्रेय भी कर्नल टॉड को जाता है। उससे पहले इस क्षेत्र को राजपूताना कहा जाता था।

    जब सिंधिया की सेना ने राहटगढ़ पर घेरा डाला तब टॉड अपने थोड़े से सिपाहियों को लेकर बेतवा नदी के किनारों के पास से होता हुआ चंबल तक के अज्ञात स्थानों तक पहुंचा तथा वहाँ से पश्चिम की ओर चलकर कोटा पहुँच गया। उसने चंबल, कालीसिंध, पार्वती, बनास आदि मुख्य नदियों के उद्गम, प्रवाह क्षेत्र तथा उनके संगम स्थलों का पता लगाया। उन दिनों इस पूरे क्षेत्र में लूटमार का बाजार गर्म था। ठग, पिण्डारी, डाकू तथा सैनिक लोग राहगीरों को लूटते फिरते थे। टॉड भी कई बार लूटा गया। अनेक बार उसे अपने डेरे छोड़कर रात्रि में ही भागना पड़ा। कोटा से चलकर टॉड भरतपुर, कठूंमर और सेंतरी होता हुआ जयपुर पहुँचा। वहाँ से टोंक, इन्दरगढ़, गूगल, छपरा, राघूगढ़, अरोन, कुरवा और भोरासा के मार्ग से सागर जा पहुंचा तथा राहटगढ़ आकर सिंधिया की सेना से मिल गया।

    टॉड ने इस पूरे मार्ग के नक्शे तैयार कर लिये। जब सिंधिया ग्वालियर पहुँचा तब भी टॉड उसके पीछे लगा रहा और नक्शे बनाता रहा। ई. 1810 में उसने नक्शे बनाने वाले दो दल तैयार किये। एक दल को सिंध की ओर तथा दूसरे दल को सतलुज नदी के दक्षिणी रेगिस्तान में भेजा गया। पहला दल शेख अब्दुल बरकत के नेतृत्व में उदयपुर से गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, लखपत और सिंध हैदराबाद होता हुआ पश्चिम की ओर सिंधु नदी पारकर ठठ्ठा में पहुंचा तथा नदी के किनारे-किनारे सीवान् तक चला गया। फिर सिंधु नदी से उतर कर बांये किनारे होते हुए खैरपुर पहुंचा। वहाँ से बेखर के टापू में होकर उमरसुमरा के रेगिस्तान से जैसलमेर, मारवाड़ और जयपुर के क्षेत्रों को नापता हुआ नरवर में टॉड से आ मिला। दूसरा दल मदारीलाल के नेतृत्व में सतलज के दक्षिणी रेतीले प्रदेश तथा लगभग संपूर्ण राजपूताना के राज्यों में भेजा गया। मदारीलाल अत्यंत योग्य, विश्वसनीय एवं परिश्रमी व्यक्ति था।

    टॉड उसके द्वारा किये गये कार्य की जांच नहीं करता था किंतु अन्य आदमियों द्वारा किये गये कार्य पर विश्वास नहीं करता था और उनके द्वारा किये गये कार्य की स्वयं जांच करता था। कर्नल टॉड जिस क्षेत्र से भी निकलता, उस क्षेत्र की जानकारी रखने वाले लोगों को अपने पास बुला लेता और उनसे पूछ-पूछ कर जानकारियां लिखता रहता था। इस कारण जब वह अपने घोड़े पर बैठकर यात्रा कर रहा होता था तब उसके दोनों और ओर तथा आगे पीछे उन लोगों के घोड़े चला करते थे जो टॉड को राजपूताने के राज्यों के इतिहास की बातें बताते रहते थे। कर्नल टॉड योग्य अधिकारी था। अपने द्वारा किये गये कार्य की सत्यता की जांच करने के लिये भी उसने एक तरीका ढूंढ निकाला था।

    वह जिस किसी भी क्षेत्र में जाता उस क्षेत्र में डाक लाने ले जाने वाले लोगों से अवश्य सम्पर्क किया तथा अपने काम की सत्यता जांचने के लिये उन डाकियों के विवरण को काम में लिया। 1813 में टॉड को कर्नल बनाया गया। 1815 तक 10 वर्ष के असाधारण परिश्रम में कर्नल टॉड के पास नक्शों की 11 जिल्दें तैयार हो गयीं। ई. 1815 में उसने अपने नक्शों की एक प्रति गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज को भेंट की। हेस्टिंग्ज ने उसके महान परिश्रम की बड़ी प्रशंसा की तथा नक्शों की एक नकल पर अपने हस्ताक्षर करके टॉड को इस आशय के साथ सौंप दी कि यदि भविष्य में इन नक्शों पर कोई अन्य व्यक्ति स्वयं के द्वारा निर्मित होने का दावा प्रस्तुत करे तो उसके खंडन के प्रमाण के रूप में हेस्टिंग्ज के हस्ताक्षर दिखा दिये जायें। ये नक्शे यूरोप भी पहुँचे तथा यूरोप को राजपूताने की रहस्यमयी रियासतों की वास्तविक जानकारी हुई। बाद में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पेशवा के राज्य का बंटवारा किया तथा राजपूताने में पिण्डारियों के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया तब इन नक्शों ने बड़ी मदद की। 1805 से लेकर 1817 तक 12 वर्ष की अवधि में कर्नल टॉड ने लगभग पूरा राजपूताना देख लिया। था। उस काल में राजपूताने के भूगोल, इतिहास तथा राजपूताने की राजनीतिक परिस्थितियों की जितनी जानकारी कर्नल टॉड को थी, उतनी ईस्ट इण्डिया कम्पनी में किसी अन्य अधिकारी को नहीं थी।

    इस समय राजपूताना में 17 छोटी-बड़ी हिन्दू रियासतें थीं जिनके शासक हजारों साल से आपस में युद्ध करके एक दूसरे को कमजोर करते आये थे। मुगलों के लगभग 200 वर्ष शासन काल में उदयपुर को छोड़कर शेष रियासतें मुगलों के संरक्षण में रही थीं। जिसके कारण इन रियासतों के परस्पर युद्ध लगभग बंद से हो गये थे किंतु मुगलों के कमजोर पड़ते ही ये फिर से लड़ने लगे थे। इन रियासतों के जागीरदार भी राजाओं की नाक में दम किये रहते। राजमहलों के षड़यन्त्रों के कारण राज्य का वातावरण अत्यन्त विषाक्त रहता था। प्रत्येक राजकुमार अपने पिता के बाद राजा बनना चाहता था जिससे राज्य के भीतर भी युद्ध हो जाते थे। मुगलों के पतन के बाद मराठों, डाकुओं और पिण्डारियों ने इन राजपूत रियासतों की हालत खराब कर रखी थी। वे गरीब असहाय जनता को लूटते ही थे, राजाओं के महलों में भी घुस जाते और राजमहलों तक को लूट लेते थे तथा कई लोगों की हत्याएं कर देते थे। जोधपुर, जयपुर, मेवाड़, आदि सभी बड़े राज्य इनसे त्रस्त थे।

    ई. 1807 तक 1813 तक लॉर्ड मिण्टो ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल था, उसने देशी राज्यों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनायी जिससे मराठों और पिण्डारियों को राजपूताना में नंगा नाच करने की छूट मिल गयी। राजपूताना लुटेरों का घर बन गया। ई. 1806 में कर्नल टॉड मेवाड़ से होकर गुजरा। उसने उस समय के राजपूताने की दशा का वर्णन करते हुए लिखा है- "जहाजपुर होकर कुंभलमेर जाते समय मुझे एक सौ चालीस मील में दो कस्बों के सिवा और कहीं मनुष्य के पैरों के चिह्न तक नहीं दिखाई दिये। जगह-जगह बबूल के पेड़ खड़े थे और रास्तों पर घास उग रही थी। उजड़े गावों में चीते, सूअर आदि वन्य पशुओं ने अपने रहने के स्थान बना रखे थे। उदयपुर में जहाँ पहले पचास हजार घर आबाद थे अब केवल तीन हजार रह गये थे। मेर और भील पहाड़ियों से निकल कर यात्रियों को लूटते थे।"

    कर्नल टॉड को महान राजपूताने की दुर्दशा पर बड़ा तरस आया जब उसने देखा कि राजपूत राजाओं में महान गुणों का वास होते हुए भी तनिक भी एकता नहीं है। जैसे ही किसी राजा या राजकुमार में विवाद हुआ, वे सीधे मराठों की शरण में जा पहुँचते थे या फिर पिण्डारियों की सेवाएं प्राप्त करते थे। इस कारण राजा, प्रजा, राज्य एवं राजवंश जर्जर होते चले जा रहे थे। टॉड ने निश्चय किया कि इस महान प्रदेश को मराठों और पिण्डारियों के उत्पात से बचाना चाहिये तथा राजपूताने को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेवाएं प्रदान की जानी चाहिये। कर्नल टॉड ने 1814-15 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के उच्च अधिकारियों को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि इन पिण्डारियों को कुचला जाये अन्यथा राजपूताना नष्ट हो जायेगा। कम्पनी सरकार ने टॉड से पिण्डारियों के विरुद्ध की जाने वाली लड़ाई की पूरी योजना बनवाई। टॉड ने पिण्डारियों की सामरिक शक्ति, उनके दबदबे वाले क्षेत्र तथा राजपूताने की स्थिति को ध्यान में रखकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की और उसे सरकार को भेज दिया। इस योजना को बनाने में कर्नल टॉड द्वारा निर्मित नक्शों ने बड़ी सहायता की। सरकार ने कर्नल टॉड का बड़ा आभार व्यक्त किया। ई. 1817 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल मार्कीस ऑफ हेस्टिंग्स ने पिण्डारियों को नष्ट करने का निर्णय लिया। मेजर जनरल सर ऑक्टरलोनी, जनरल डॉनकिन, जनरल मार्शल, जनरल ऐडम्स और जनरल ब्राउन को राजपूताना एवं मध्य भारत में पिण्डारियों को घेर कर मारने का काम सौंपा गया। इन जनरलों ने पूरा राजपूताना और मध्य भारत घेर लिया। जब कर्नल टॉड को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने कम्पनी सरकार को लिखा कि मुझे भी पिण्डारियों को कुचलने के कार्य पर लगाया जाये। गवर्नर जनरल ने टॉड का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

    पहले तो गवर्नर जनरल ने टॉड को मेजर जनरल ऑक्टरलोनी के अधीन नियुक्त करने का विचार किया किंतु टॉड की महत्ता को देखते हुए उन्हें स्वतंत्र प्रभार देकर हाड़ौती क्षेत्र में रांवटा नामक स्थान पर नियुक्त किया गया। कर्नल टॉड का काम था राजपूताना तथा मध्य भारत को घेर कर खड़े जनरलों के बीच समन्वय स्थापित करना, उन्हें आगे की कार्यवाही के बारे में सुझाव देना तथा पिण्डारियों एवं मराठों की गतिविधियों की जानकारी उन तक पहुँचाना। कर्नल टॉड की सम्मति से ही अंग्रेज जनरलों ने अपनी सेनाओं का प्रयाण नियत किया।

    टॉड ने व्यवस्था की कि प्रतिदिन उसे कम से कम 20 स्थानों से पिण्डारियों की हलचल के सम्बन्ध में सूचनाएं प्राप्त हों। टॉड इन सूचनाओं का सार निकालकर कर विभिन्न जनरलों को भेज देता था। एक बार टॉड को सूचना मिली कि करीम खां पिण्डारी का बेटा 1500 पिण्डारियों के साथ रांवटा से 30 मील दूरी पर कालीसिंध के निकट आ पहुँचा है। उस समय टॉड के पास मात्र 32 सैनिक ही थे। उन दिनों कोटा राज्य का फौजदार झाला जालिमसिंह रावटा में मुकाम कर रहा था। टॉड तुरंत ही जालिमसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ तथा पिण्डारियों के विरुद्ध कोटा राज्य से सहायता मांगी।

    उस समय जालिमसिंह 70 साल का हो चुका था तथा उसकी दोनों आँखों ने काम करना बंद कर दिया था किंतु उसका विवेक पूरी तरह जाग्रत था। जालिमसिंह ने उसी समय 250 सिपाही टॉड के साथ कर दिये। कर्नल टॉड ने कुल 282 सिपाहियों के साथ 1500 पिण्डारियों पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में 150 पिण्डारी मारे गये तथा शेष जान बचाकर भाग खड़े हुए। टॉड ने पिण्डारियों के डेरे लूट लिये तथा उनके बहुत से हाथी, घोड़े तथा ऊंट छीन लिये। टॉड को यहाँ से काफी धन भी प्राप्त हुआ जिससे टॉड ने कोटा से 6 मील दूर चंद्रभागा नदी पर एक पुल बनवा दिया जिसका नाम हेस्टिंग्स ब्रिज रखा। पिण्डारियों और मरहठों का उपद्रव मिटने पर कम्पनी सरकार ने राजपूताना के राज्यों से संधि करने का काम आरंभ किया।

    कर्नल टॉड को उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी तथा जैसलमेर राज्यों का पोलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किया गया तथा उनका मुख्यालय उदयपुर में स्थापित किया गया। फरवरी 1818 में कर्नल टॉड उदयपुर के लिये रवाना हुआ। टॉड ने लिखा है कि इस बार तो मेवाड़ की दशा 1806 ई. की दशा से भी अधिक बुरी थी। भीलवाड़ा में जहाँ पहले 6000 घरों की बस्ती थी, अब वहाँ एक भी मनुष्य नहीं रहता था। बहुत से लोग मराठों के भय से मेवाड़ छोड़कर मालवा तथा हाड़ौती आदि स्थानों को चले गये थे। राज्य की आय बहुत घट गयी थी, सरदारों ने खालसे के बहुत से गाँव दबा लिये थे। मेवाड़ राज्य से जो संधि हुई थी उसमें मेवाड़ राज्य को आंतरिक एवं बाह्य शत्रुओं से अभय मिल गया तथा बदले में मेवाड़ के महाराणा ने आवश्यकता होने पर अपने राज्य के समस्त सैनिक संसाधन अंग्रेजों को सुपुर्द करने स्वीकार कर लिये।

    अंग्रेजों को वार्षिक खिराज देने के सम्बन्ध में तय हुआ कि प्रथम पाँच वर्ष तक तो मेवाड़ के राजस्व में से एक चौथाई भाग खिराज के रूप में लिया जायेगा और इसके बाद 3/8 भाग वसूल किया जायेगा। फरवरी 1818 में कप्तान टॉड उदयपुर आया तो महाराणा ने उसका बड़ा भव्य स्वागत किया। एक दिन महाराणा ने सब सरदारों को बुलाकर बड़ा दरबार किया। इस दरबार में टॉड ने महाराणा से पूछा कि जो सरदार आपके विरोधी हों, उनके नाम बताईये, अंग्रेजी सरकार उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये तैयार है। महाराणा भीमसिंह ने यहाँ भी उदारता दिखायी और बोला- "मैंने अब तक के सारे अपराध क्षमा कर दिये हैं किंतु अब जो लोग भविष्य में कसूर करेंगे, उसकी सूचना आपको दी जायेगी।"

    राजपूताना की हिन्दू रियासतें अत्यंत प्राचीन काल से अस्तित्व में थीं। इन पर शासन करने वाले नृवंशों में समय-समय पर बदलाव होता रहा था जिसके साथ उनके आकारों में भी परिवर्तन आता गया था। इन रियासतों में प्रशासन का तरीका अत्यंत प्राचीन था जिनमें शक, कुषाण, हूण, मुस्लिम तथा मंगोल आदि जातियों के प्रशासनिक तौर तरीकों का घाल मेल होता चला गया था। जब यूरोपीय जातियों का भारत में आगमन हुआ तब भी राजपूताना की रियासतें पुरातन हिन्दू प्रविधियों एवं मुगल शासन विधियों से ही प्रशासित होती रहीं। रियासतों में राजाओं का निरंकुश शासन था किंतु उनसे भी अधिक निरंकुशता राजाओं के अधीन रहकर जागीरों का प्रशासन करने वाले जागीरदारों तथा ठिकाणों में व्याप्त थी। चूंकि प्रशासन व्यक्तिगत प्रकृति का था इसलिये राजा अथवा जागीरदार के व्यक्तित्व के आधार पर ही शासन अच्छा या बुरा हो जाता था। अच्छे राजाओं तथा जागीरदारों ने अच्छा शासन देने का प्रयास किया किंतु जैसे ही बुरे व्यक्ति का शासन हुआ, उसके साथ ही शासन भी बुरा हो जाता था।

    जब ई.1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने देशी रियासतों के साथ सहायक संधियां कीं तो ब्रिटिश अधिकारियों ने इन रियासतों के प्रशासन को सुधारने का काम अपने हाथ में लिया। ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य यह था कि वे समझते थे कि बेहतर प्रशासन से रियासत में शांति आयेगी जिससे लोगों की आय में वृद्धि होगी और रियासत के राजस्व में बढ़ोतरी होगी। अंग्रेजों को अपना खिराज राज्य के राजस्व में से ही वसूलना होता था। राजपूताना रियासतों में सबसे पहला राज्य मेवाड़ था जिसका प्रशासन मेवाड़ के प्रथम पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल जेम्स टॉड ने अपने हाथ में लिया।

    कप्तान टॉड ने मेवाड़ की आर्थिक दशा सुधारने के लिये सेठ जोरावरमल को इंदौर से उदयपुर बुलाया। सेठ जोरावरमल मूलतः जैसलमेर का ही रहने वाला ओसवाल बनिया था किंतु वह होलकर के इंदौर राज्य में जाकर व्यापार करने से खूब उन्नति कर गया था। उसने बड़े-बड़े शहरों में अपनी दूकानें स्थापित कर ली थीं। इंदौर का राजा उसे कई राजकीय दायित्व भी सौंपता रहता था। उसी ने होलकर तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य समझौता करवाया था। इससे प्रसन्न होकर कम्पनी सरकार तथा होलकर ने उसे कई सम्मान दिये थे। महाराणा ने जोरावरमल से आग्रह किया कि वह उदयपुर में अपनी दूकान स्थापित करे तथा राज्य के कामों में जो रुपये खर्च हों वे तुम्हारी दुकान से दिये जायें और राज्य की सारी आय तुम्हारे यहाँ जमा रहे। जोरावरमल ने टॉड तथा महाराणा का आग्रह स्वीकार करके अपनी दूकान उदयपुर में स्थापित कर ली। उसने नये खेड़े बसाये, किसानों को सहायता दी और चोरों एवं लुटेरों को दण्ड दिलवाकर मेवाड़ राज्य में शांति स्थापित करने में सहायता की। उसका कुशल प्रबंधन देखकर पोलिटिकल एजेण्ट ने अंग्रेजी कोष का प्रबंध भी उसी को सौंप दिया।

    महाराणा ने उसे पालकी तथा छड़ी का सम्मान, बदनोर परगने का पारसोली गाँव तथा सेठ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद कर्नल टॉड ने अपना ध्यान मेरवाड़ा क्षेत्र की ओर लगाया। राजपूताने के ठीक मध्य में स्थित इस पहाड़ी प्रदेश में मेर जाति बड़ी संख्या में रहती थी जो जंगली, युद्धप्रिय और बहुत उपद्रवी थी। इस प्रदेश का कुछ भूभाग मेवाड़ रियासत में, कुछ भूभाग मारवाड़ रियासत में तथा कुछ भाग अजमेर जिले के अंग्रेजी शासन वाले क्षेत्र में आता था। 25 जून 1818 को सिंधिया ने अजमेर अंग्रेजों को सौंप दिया था। इसलिये अंग्रेजी सरकार ने इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिये उसी साल नसीराबाद में सैन्य छावनी स्थापित की। अक्टूबर 1818 में टॉड ने मेरों को दबाने के लिये रूपाहेली के ठाकुर सालिमसिंह की अध्यक्षता में मेवाड़ के बदनोर, देवगढ़, आमेट तथा बनेड़ा ठिकानों की सेनायें भेजीं।

    टॉड ने मेवाड़ के पूर्वोत्तर भाग के समस्त छोटे-बड़े सरदारों, जागीरदारों, भोमियों तथा आसियों आदि को भी मेरवाड़े पर भेजा। मेरों ने पहाड़ों के संकरे रास्तों पर नाकाबंदी करली जिससे घबराकर रूपाहेली के ठाकुर ने पहाड़ों पर आक्रमण करने का निश्चय त्याग दिया तथा मैदानी क्षेत्रों में अपने थाने बैठा दिये।


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