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  • चित्तौड़ दुर्ग का कालिका माता मंदिर वास्तव में आठवीं शताब्दी का सूर्य मंदिर है!

     03.06.2020
    चित्तौड़ दुर्ग का कालिका माता मंदिर वास्तव में आठवीं शताब्दी का सूर्य मंदिर है!

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    भारत में सूर्य पूजा सदियों से प्रचलित रही है। आज जिस देवत्रयी में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सम्मिलित किया जाता है, वस्तुतः किसी समय सूर्य, विष्णु और महेश को सम्मिलित किया जाता था। सिरोही जिले का वसंतगढ़ सूर्य मंदिर अब खण्डहर रूप में ही बचा है किंतु राजस्थान में आज भी बहुत से प्राचीन सूर्य मंदिर स्थित हैं।

    चित्तौड़ गढ़ दुग में स्थित कालिका मंदिर भी वस्तुतः आठवीं शताब्दी ईस्वी का सूर्य मंदिर है जिसे अब कालिका माता मंदिर कहते हैं। यह मंदिर, दुर्ग के दक्षिणी भाग में जयमल और पत्ता की हवेलियों के दक्षिण में स्थित है जो ऊँची जगती पर बना हुआ है।

    वर्तमान में देवालय के गर्भगृह में कालिका माता की प्रतिमा प्रतिष्ठित है किंतु मंदिर के जंघा भाग तक के स्थापत्य और मूर्त्यांकन को देखने से स्पष्ट होता है कि मूलतः यह सूर्य मंदिर था। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे दसवीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित होना बताया है। रत्नचंद्र अग्रवाल इसे आठवीं शताब्दी ईस्वी का मानते हैं। शअरी एम. ए. डाक्य ने इसे आठवीं अथवा नौवीं शताब्दी में निर्मित मंदिर स्वीकार किया है। जनश्रुतियों के अनुसार जब आठवीं शताब्दी ईस्वी में बापा रावल ने चित्तौड़ दुर्ग पर अपना अधिकार स्थापित किया था, तब उसी ने अपने कुलदेव सूर्य की सेवा पूजा के लिये इस सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इस दृष्टि से यह मंदिर इस दुर्ग परिसर की सबसे पुरानी रचना सिद्ध होता है।

    इस मंदिर में भगवान सूर्य की श्वेत प्रतिमा स्थापित है जिसके हाथ में चक्र उत्कीर्ण है जो पद्म के समान प्रतिभासित होता है। यह सूर्य की प्रतिमा के हाथ में अनिवार्यतः उकेरा जाता है। वर्तमान में इसी प्रतिमा को काली की प्रतिमा कहा जाता है जो कि सही नहीं है। काली की मूर्ति काले पत्थर की होती है न कि सफेद पत्थर की। काली की प्रतिमा में चक्र का अंकन नहीं होता है। सफेद पत्थर की प्रतिमा के पास काली की एक काले पत्थर की प्रतिमा भी स्थापित है जो कि शास्त्र सम्मत नहीं है, क्योंकि किसी भी मंदिर में प्रधान देवता के एक ही स्वरूप की दो प्रतिमाएं स्थापित नहीं होती हैं।

    मंदिर की जगती अथवा कुर्सी, दुर्ग के धरातल से ऊपर उठी हुई है। मंदिर का पूर्वाभिमुख प्रवेश द्वार और द्वार की तरफ जगती तक चढ़ने के लिये सात-सात सीढि़यों के खण्ड में विभाजित प्रवेश पथ तथा मंदिर के गर्भगृह के भीतर अन्तर-प्रदक्षिणा पथ एवं बाह्य-प्रदक्षिणा पथ बने होने की वास्तु स्थिति एवं इस मंदिर के गर्भगृह के द्वार, ताकों एवं सभा मण्डप इत्यादि भागों पर किया गया मूर्त्यांकन एवं अलंकरण अपने युग की ही नहीं अपितु दक्षिणी राजस्थान के इतिहास के समस्त युगों की अति विशिष्ट स्थापत्य रचना स्वीकारने के लिए बाध्य करते हैं।

    इस मंदिर के गर्भगृह के प्रवेश द्वार के बाहर ऊपर की तरफ सप्ताश्व रथ आरूढ़ सूर्य की प्रतिमा बनी है तथा उसके बांयीं तरफ लक्ष्मी के साथ गरुड़ पर आरूढ़ विष्णु और दाहिनी तरफ नन्दी पर आरूढ़ शिव-पार्वती का मूर्त्यांकन है। गर्भगृह के उत्तर-दक्षिण में बनी ताकों में सप्ताश्व रथ पर आरूढ़ सूर्य की प्रतिमाएं अंकित हैं। गर्भगृह के बाहर एक हाथ में खड्ग तथा दूसरा हाथ अभय मुद्रा में अंकित अश्विनी कुमार; गजारूढ़, वज्र एवं कमल धारी इन्द्र; चतुर्बाहु अग्नि; कमलधारी आसनस्थ सूर्य तथा खट्वांग धारण किए यम की मूर्तियां बनी हैं। अपने वाहन मकर पर आरूढ़ वरुण, अपने वाहन मृग के साथ वायु, अपने वाहन अश्व के साथ चन्द्रमा तथा उत्तरी-पूर्वी दिशा के अधिपति देव ईशान की मूर्तियां भी जड़ी गई हैं।

    मंदिर के बाहरी भाग की ताकों में शिव-पार्वती, वराह, समुद्र मंथन अभिप्राय आदि से सम्बन्धत मूर्तियां लगी हुई हैं। ये सब मूर्तियां एवं मूर्तिपट्ट जिस क्रम एवं प्रक्रिया में लगे हैं, वे इस मंदिर के सूर्य मंदिर के रूप में निर्माण की कहानी कहते हैं। मंदिर का सभामण्डप पारम्परिक स्थूल स्तम्भों पर खड़ा है जिन पर घट पल्लव पत्र लता, मकर, कीर्ति मुख, कीचक अभिप्राय इत्यादि का अलंकरण किया गया है। सभामण्डप अलग-अलग खण्डों में विभक्त है जिनमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कमल पुष्पों को उकेरा गया है जो स्पष्ट रूप से सभा-मण्डप की छत को बनाने की गुप्तकालीन परम्परा की याद दिलाते हैं।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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