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  • पानी की कहानी : भारतीय पुराणों की जुबानी

     06.06.2017
    पानी की कहानी : भारतीय पुराणों की जुबानी

    सौर मण्डल के जिस ग्रह पर हम रहते हैं उसे पृथ्वी कहना भ्रामक सा लगता है। धरती का 70.8 प्रतिशत धरातल जल से ढका हुआ है तथा पूरे सौर मण्डल में यही एक मात्र ऐसा ग्रह है जिसका विशिष्ट लक्षण जल का इतनी अधिक मात्रा में होना है। इसलिये इसे जलग्रह कहना अधिक तर्क संगत प्रतीत होता है। चूंकि जल के अतिरिक्त अन्य चारों महाभूत- आकाश, वायु, अग्नि एवं मिट्टी अन्य आकाशीय पिण्डों पर भी उपलब्ध हैं किंतु उनमें किसी पर भी जीवन नहीं है इसलिये यह कहना असंगत नहीं है कि जल के बिना जीवन संभव नहीं है। पृथ्वी के जलमण्डल में जल का कुल आयतन लगभग 1 अरब 25 करोड़ घन किलोमीटर है। इसकी तुलना में समुद्रतल के ऊपर स्थित संसार के समस्त स्थल खण्डों का कुल आयतन इस जल के आयतन का 18वाँ भाग ही है। यदि संसार में महासागरीय नितलों को सम्मलित करते हुए ठोस भूपर्पटी को समतल कर दिया जाये तो पूरा संसार 3,650 मीटर गहरे जल में डूब जायेगा।

    प्रारंभ में समस्त जीवों का मूल निवास समुद्र ही था। केवल समुद्री जीवों का ही नहीं अपितु आज स्थल पर जो जीव निवास कर रहे हैं, वे सब लाखों-करोड़ों साल समुद्र में बिताने के बाद ही स्थल पर आये हैं। आज भी समुद्र में जीवों की 1 लाख 40 हजार प्रजातियां रहती हैं। इतने विशाल जलीय भण्डारण के होते हुए भी तथा समुद्रों से इतना गहरा सम्बन्ध होते हुए भी आज धरती का हर प्राणी पानी के लिये तरस रहा है। दुनिया के अनेक देशों में पीने के पानी के लिये हाहाकार मचा हुआ है। भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में पानी की राशनिंग हो रही है और आदमी अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। इस स्थिति पर कबीर की एक उक्ति सटीक बैठती है- पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवे हाँसी।

    धरती का 97 प्रतिशत पानी समुद्रों में है तथा 3 प्रतिशत पानी स्थल भाग पर धरती के ऊपर, ग्लेशियरों, धु्रवों, नदियों तथा भूगर्भ में जमा है। प्रत्येक वर्ष लगभग 3 लाख 30 हजार घन किलोमीटर पानी समुद्री वाष्प के रूप में वायुमण्डल में पहुँचता है और वृष्टि के रूप में स्थलीय भूभाग एवं समुद्र पर बरसता है। यही जल ग्लेशियरों से पिघलने वाली हिम के लिये जल का पुनर्भरण करता है, नदियों को प्राप्त होता है, भूगर्भीय जल का पुनर्भरण करता है, झीलों और तालाबों को शुद्ध जल (फ्रैश वाटर) की आपूर्ति करता है और स्थलीय भूभाग पर जीवन को रचता हुआ फिर से समुद्र में लौट जाता है। एक तरह से समुद्र इस पूरी धरती को एक मशीन में बदल देता है, एक ऐसी मशीन जो जीवन का निर्माण करती है। एक ऐसी मशीन जो स्थलीय भूभाग को शुद्ध जल उपलब्ध करवाती है।

    आज स्थलीय भूभाग पर शुद्ध जल की जो कमी आई है उसके लिये तीन बड़े कारण बताये जा रहे हैं- (1.) जंगलों के कटने तथा वायुमण्डल में विषैली गैसों के बढ़ने से हुई तापमान वृद्धि के कारण ग्लेशियरों का पिघलकर नष्ट होना। (2.) धरती पर मनुष्य की आबादी बढ़ जाने से जल का उपभोग एवं आवश्यकता बढ़ जाना तथा (3.) स्थलीय भाग पर उपलब्ध जल का कुप्रबंधन होना।

    इन तीनों कारणों का विश्लेषण करें तो हम पायेंगे कि इन तीनों ही कारणों के लिये आदमी जिम्मेदार है। क्या वास्तव में धरती पर आये शुद्ध जल के संकट का कारण यही है? किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले हमें कुछ तथ्यों पर विचार कर लेना चाहिये।

    हम जानते हैं कि पिछले छः लाख सालों से लेकर आज से 10 हजार साल पूर्व तक के काल में एशिया, यूरोप और उत्तरी अमरीका के उत्तरी भागों की जलवायु बारी बारी से बहुत ठण्डी और गरम होती रही। ठण्डी जलवायु के कालों में उन प्रदेशों पर जो अब समशीतोष्ण कटिबंध में हैं, उत्तरी धु्रव का हिम आवरण दक्षिण की ओर बर्फ की एक लम्बी चादर में फैल जाता था और हिमालय में हिमनदी बिल्कुल तलहटी तक पहुँच जाती थी।

    प्लीस्टोसीन पीरियड जो कि आज से छः लाख वर्ष पहले शुरु हुआ और आज से 10 हजार साल पहले तक चला, इसमें धरती पर कम से कम चार हिम युग आये। प्रत्येक दो कालों के बीच मंद या थोड़ा गर्म अंतर्हिम काल आया। इस प्रकार कुल तीन अंतर्हिम काल आये जिनमें आदमी ने बार-बार अपना स्थान बदला। जब अधिक सर्दी का दौर आता तो आदमी दक्षिणी प्रदेशों में चला जाता और जब अधिक गर्मी पड़ती तो वह उत्तरी प्रदेशों में आकर रहने लगता। हिम युग की सर्दी के कारण वनस्पति भी नष्ट हो जाती थी जिसके कारण पशु भी लगातार उन प्रदेशों के लिये पलायन करते रहते थे जहाँ गर्मी के कारण घास के मैदानों का विकास हो जाता था।

    हालांकि आदमी धरती पर आज से लगभग 20 लाख साल पहले आ चुका था किंतु हमारी प्रजाति का आदमी अर्थात् होमो सेपियन का उदय हिम युगों की इसी आवाजाही के बीच आज से लगभग 40 हजार साल पहले से लेकर 30 हजार साल पहले के किसी काल में आया। यह चौथे हिम युग का अंतिम दौर था। आज से दस हजार साल पहले चौथा हिम युग समाप्त हो गया और गर्म युग की शुरुआत हुई। इस गर्म युग में ही आदमी ने तेजी से अपना मानसिक विकास किया और उसने कृषि, पशुपालन तथा समाज को व्यवस्थित किया।

    कहा जाता है कि आज से 450 करोड़ वर्ष पहले जब धरती ठण्डी हुई तब उसके गर्भ में स्थान-स्थान पर मीठा पानी जम गया। यह अवधारणा गलत प्रतीत होती है। यदि धरती के गर्भ में उस समय का पानी जमता तो वह खारा ही होता क्योंकि धरती समुद्र के गर्भ में से निकल कर आई थी और ठण्डी होने की प्रक्रिया में धरती के भूगर्भ में जो पानी जमा होता, वह शुद्ध जल न होकर खारा समुद्रीय जल होता। धरती के गर्भ में शुद्ध जल का प्रवेश चार हिम युगों के बीच आने वाले तीन गर्म युगों में हुई वर्षा के कारण तथा गर्म युग में हिम ग्लैशियरों के पिघलने से बनी नदियों का जल भूगर्भ की ओर रिसने से हुआ है। जिस प्रकार धरातल के ऊपर का जल विभिन्न नालों, नदियों एवं धाराओं में बहता हुआ समुद्र तक पहुंच जाता है, उसी प्रकार धरती के भीतर भूगर्भ तक रिस कर पहुंचा हुआ जल भी धीरे-धीरे सरकता हुआ अंततः समुद्र में पहुंच जाता है। इस प्रकार भूगर्भीय जल की बहुत बड़ी मात्रा समुद्र में जा मिलती है और भूगर्भ मंथर गति से स्वतः खाली हो जाते हैं। इस प्रकार केवल आदमी ही भूगर्भ के जल कोष को रिक्त करता है, यह बात सही नहीं है।

    कहा जा रहा है कि आदमी निरंतर जंगलों को काट रहा है जिससे वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा कम होकर कार्बन गैसों की मात्रा बढ़ रही है। इसी प्रकार आदमी के द्वारा लगाये गये कारखाने से निरंतर वायुमण्डल में छोड़ी जा रहीं कार्बन डाई ऑक्साईड तथा उसके जैसी गैसों के कारण धरती का तापक्रम बढ़ रहा है और क्लोरो फ्लोरो कार्बन तथा उसके जैसी गैसों के कारण ओजोन की परत में छिद्र हो रहे हैं जिनसे धरती पर सूर्य किरणों के हानिकारक विकिरण धरती पर आकर इसका वातावरण गर्म कर रहे हैं। यह बात अक्षंरशः सत्य है कि इन गैसों का यही प्रभाव होता है किंतु वर्तमान में धरती के गर्म होने के लिये पूरी तरह से जंगलों की कटाई अथवा कार्बन गैसों के स्तर में हुई वृद्धि को जिम्मेदार नहीं ठहरया जा सकता।

    धरती के ठण्डी और गर्म होने की अवस्थाएं बार-बार आती रहती हैं। पिछले दस हजार साल से धरती गर्म युग में है इसके कारण नदियाँ लगातार सूखती रही हैं, भूगर्भ का जल समाप्त होता रहा है तथा वर्षा के अभाव के कारण अकाल और सूखे पड़ते रहे हैं। हम कुछ उदाहरणों से इस बात को समझ सकते हैं।

    ऋग्वैदिक काल में सरस्वती महानद के रूप में प्रवाहित होती थी। वह स्थान-स्थान पर ‘सर’ अर्थात् झील बनाकर चलती थी। उन झीलों में से कुछ को कुरुक्षेत्र रीजन में आज भी देखा जा सकता है। इनमें से एक को महाभारत काल में ब्रह्म सरोवर कहा गया है जिसमें महाभारत के युद्ध के बाद धृतराष्ट्र ने मृतक पुत्रों एवं पौत्रों का तर्पण किया। आज उन्हीं सरोवरों को कुण्ड कहा जाता है।

    ऋग्वैदिक काल में इसी सरस्वती की एक धारा राजस्थान में कालीबंगा तक बहकर आती थी और यह क्षेत्र सारस्वान कहलाता था।

    मानव के ज्ञात इतिहास में धरती पर पहला बड़ा जल प्लावन ईसा से लगभग 3102 साल पहले आया। जब जल प्रलय समाप्त हो गया तब सरस्वती की दिशा उलट गई। अर्थात् इस नदी की मुख्य धारा अपने पहले के बहाव क्षेत्र में बहने के स्थान पर दिल्ली से कुछ ऊपर एक छोटी पहाड़ी नदी की तेज धारा में मिलकर दक्षिण-पूर्व की ओर बहने लगी और यमुना का जन्म हुआ। यमुना का अर्थ है यम की बहिन अर्थात् उसने सरस्वती का पानी निगल लिया था इसलिये वह सरस्वती को मृत्यु देने वाली अर्थात् यमुना कहलाई। गंगा और यमुना जहां प्रयाग में मिलती हैं, उस स्थल को देखकर अनुमान होता है कि इनमें से यमुना बड़ी नदी है किंतु आज वास्तविक स्थिति यह है कि गंगा, यमुना से बड़ी है।

    पुराणों में वर्णित तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अगस्त्य और वसिष्ठ ऋषियों के समय तक अर्थात् 2350 ई. पूर्व तक सरस्वती की पुरानी धारा में कुछ जल बहता था जो विनाशन नामक स्थान तक आकर लुप्त होता था। सरस्वती की मुख्य धारा के यमुना में मिल जाने से सरस्वती के पुराने तटों पर बसी हुई मानव बस्तियां उजड़ गईं जिनमें कालीबंगा, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो आदि के नाम लिये जा सकते हैं। सरस्वती के तट पर बने ऋषियों के आश्रम उजड़ गये। अधिकांश ऋषि भयानक सूखे, अकाल और अनावृष्टि के कारण मर गये।

    लगभग 100 साल बाद सप्त ऋषियों के काल में सरस्वती का पुराना स्वर्ण काल लौटा पर वह सरस्वती तट तक सीमित नहीं था, उसका प्रभाव सारे उत्तरी भारत में था। यह स्थिति पांच सौ साल तक चली। इसमें उत्तरी भारत के लोगों को शुद्ध जल की आपूर्ति प्रचुर मात्रा में हुई। कालीबंगा जैसी पुरानी बस्तियों पर फिर से नई बस्तियां बस गईं। आज भी कालीबंगा की खुदाई में मानव बस्तियों के दो स्तर ठीक एक दूसरे के ऊपर मिलते हैं।

    1800 ई. पूर्व के आसपास एक बार फिर उत्तरी भारत में नदियों ने अपना रूप बदला। सरस्वती फिर सूखने लगी। इस कारण उसके तटों पर खड़े जंगल सूख गये। इस काल का हमारे पुराणों में विशद वर्णन उपलब्ध है जिसमें कहा गया है कि सरस्वती के तट पर ऋषि भूखों मरने लगे तथा अधिकांश ऋषि सरस्वती का तट छोड़कर गंगा-यमुना के मध्य के क्षेत्र में जा बसे। इस काल में पूरे उत्तरी भारत में भयानक अकाल पड़ा। इसी काल के एक उपनिषद में वर्णन आता है कि भूख से बिलबिलाते हुए एक ऋषि ने एक महावत से साबुत उड़द मांगकर खाये।

    वामन पुराण में लिखा है कि ब्रह्मावर्त (आज का हरियाणा और उत्तरी राजस्थान) में सरस्वती के किनारे बड़ी संख्या में ऋषियों के आश्रम स्थित थे। अत्यंत दीर्घ जीवी मार्कण्डेय ऋषि सरस्वती के उद्गम के पास रहते थे। जब प्रलय आया तो मार्कण्डेय ऋषि अपने स्थान से उठकर चल दिये। सरस्वती नदी उनके पीछे-पीछे चली। इसी कारण सरस्वती की ऊपरी धारा का नाम मार्कण्डा पड़ गया। इस रूपक से आशय लगाया जा सकता है कि जब सरस्वती की मुख्य धारा सूखने लगी तो मार्कण्डेय ऋषि ने अपने पूर्व स्थान को त्याग दिया तथा सरस्वती की जिस धारा के तट पर जाकर वे रहे, वह धारा ऋषि के नाम पर मारकण्डा के नाम से जानी गई।

    हिमालय पर्वत पर 3207 फुट की ऊँचाई पर नाहन की चोटी है जिस पर स्थित मारकण्डा नदी का चौड़ा पाट बताता है कि किसी समय यह नदी एक विशाल नद के रूप में प्रवाहित होती थी तथा सरस्वती इसकी सहायक नदी थी। इस सरस्वती को प्राचीन सरस्वती की ही एक धारा समझना चाहिये।

    वैवस्वत मनु के समय में बर्फ पिघलने या मौसम के भीषण परिवर्तन के कारण धरती पर चारों ओर पानी ही पानी हो गया। इसे भारत का दूसरा महा जल प्लावन कहा जा सकता है। निःसंदेह उस समय के हिम ग्लैशियर जनसंख्या के बढ़ने, जंगलों के कटने, कार्बन डाई ऑक्साइड या क्लोरो फ्लोरो कार्बन जैसी गैसों के बढ़ने से नहीं पिघले थे। न ही उस समय ग्रीन हाउस इफैक्ट जैसी किसी चीज ने धरती पर जन्म लिया था।

    काठक संहिता, तैत्तरीय संहिता, तैत्तरीय ब्राह्मण तथा शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि एक बार सारी पृथ्वी पर सर्वंतक अग्नि से भयंकर दाह हुआ। तदनन्तर एक वर्ष की अतिवृष्टि से महान् जन प्लावन आया। सारी पृथ्वी जल निमग्न हो गई। वृष्टि की समाप्ति पर जल के शनैःशनैः नीचे होने से कमलाकार पृथ्वी प्रकट होने लगी। इस समय उन जलों में श्री ब्रह्माजी ने योगज शरीर धारण किया। सृष्टि वृद्धि को प्राप्त हुई। तब बहुत काल के पश्चात् समुद्रों के जलों के ऊँचा हो जाने से एक दूसरा जल प्लावन वैवस्वत मनु और यम के समय आया।

    इन दो महा जल प्लावनों के अतिरिक्त लघु जल प्लावन भी संसार में आते ही रहे हैं। ईसा से 1400 साल पहले आये एक ऐसे ही जल प्लावन में कृष्णजी की द्वारिका समुद्र में समा गई। विभाीषणजी की लंका भी एक ऐसे ही जल प्लावन के कारण समुद्र में डूब गई। तमिल साहित्य में वर्णित दो जल प्लावनों में से एक जल प्लावन में दक्षिण में स्थित कपाटपुरम् तथा दूसरे जल प्लावन में पुरानी मदुरा जल में डूब गई थी। कश्मीर के नीलमत पुराण में कश्मीर में आये प्रलय का विशद वर्णन है ।

    स्पष्ट है कि इन सारे जल प्लावनों का कारण वायुमण्डल के तापमान में अत्यधिक वृद्धि होना रहा होगा किंतु तापमान में वृद्धि किसी मानवीय कारण से नहीं आई होगी। न जनसंख्या बढ़ने से, न जंगलों की कटाई से और न सीओटू या सीएफसी में वृद्धि से।

    ताण्ड्य महाब्राह्मण में सरस्वती के लुप्त होने का उल्लेख है जबकि जैमिनी ब्राह्मण में उसके लुप्त होकर पुनः प्रकट होने का उल्लेख है। ऐतरेय ब्राह्मण सरस्वती की स्थिति मरुप्रदेश से कुछ दूरी पर बताता है। एक पुराण में सरस्वती की स्थिति रेत में पड़ी उस नौका के समान बताई गई है जिसके तल में छेद हैं। माना जाता है कि सरस्वती धरती में घुस गई। कालीदास ने भी सरस्वती को अंतःसलिला कहकर सम्बोधित किया है।

    भूकम्प भी भूगर्भीय जल के स्तर को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। लातूर के भूकम्प के दौरान महाराष्ट्र में कई स्थानों पर जल की धाराएं फूट पड़ी थीं। कुछ वर्ष पहले आया सुनामी भी समुद्री क्षेत्र में आया एक भूकम्प ही था। इसी प्रकार बाड़मेर क्षेत्र में विगत दो माह पूर्व आये भूकम्प के बाद वैज्ञानिकों ने चिंता जताई थी कि इससे इस क्षेत्र का तेल बहकर पाकिस्तान की ओर सरक सकता है।

    ये सारे उदाहरण गिनाने का उद्देश्य यह है कि हम आज शुद्ध जल की चिंता में इसे केवल मनुष्य जन्य समस्या मानकर अपने आप को कुछ उपायों तक ही सीमित न कर लें जिनमें जंगलों के क्षेत्रफल में वृद्धि, कार्बन गैसों के उत्सर्जन में कमी या जनसंख्या वृद्धि पर रोक जैसे छोटे उपाय सम्मिलित हैं। ये उपाय तो किये ही जाने चाहिये किंतु आने वाले कल के लिये जल संकट का समाधान करने के लिये हमें कुछ बड़े उपाय भी करने ही होंगे।

    इनमें सबसे बड़ा और पहला उपाय हो सकता है कृत्रिम वर्षा की क्षमता अर्जित करने के लिये वैज्ञानिक उपायों की खोज। आज सिल्वर के यौगिक तथा सोडियम कणों को आकाश में फैलाकर किसी सीमा तक कृत्रिम वर्षा के उपाय खोज लिये गये हैं किंतु इसके सस्ते, सुगम और पूरी तरह विश्वसनीय उपायों की खोज अभी होनी शेष है।

    दूसरा उपाय है मरुस्थल में कृत्रिम वृक्षों के माध्यम से मानसून को आकर्षित करने वाले पर्यावरणीय बदलाव। इजराइल आदि कुछ देशों में इस पद्धति का सफलता पूर्वक उपयोग किया जा रहा है।

    तीसरा उपाय है नदियों के प्राचीन प्रवाह क्षेत्र खोज निकालना। उपग्रहों से प्राप्त चित्रों ने हमें सरस्वती के पांच प्रवाह क्षेत्रों की जानकारी दी है। इसी प्रकार यमुना के तीन प्रवाह क्षेत्रों की जानकारी दी है। ये नदियां इनमें से प्रत्येक मार्ग पर हजारों वर्षों तक बहती रहीं। इस अवधि में उनका जल रिस-रिस कर भूगर्भ में जमा होता रहा। यदि इन नदियों के प्राचीन मार्गों पर 600-700 मीटर की गहराई तक खुदाई की जाये तो इन नदियों से रिस कर जमा हुए पानी के पॉकेट आज भी खोज निकाले जा सकते हैं जो लम्बे समय तक मानव सभ्यता के लिये शुद्ध जल उपलब्ध करवा सकते हैं।

    ऑयल एण्ड नेचुरल गैस एजेंसी ने सरस्वती नदी की खोज का काम हाथ में लिया है। इसे सरस्वती परियोजना कहा जाता है। इसके तहत ओ एन जी सी थार मरुस्थल में 10 कुंए खोदेगी। अब तक जैसलमेर जिले के डाबला गाँव के निकट एक कुआँ खोदा जा चुका है। इस पर एक करोड़ रुपये की लागत आयी है। इस कुएं में मीठा एवं ताजा पानी निकला हैै। अब इस परियोजना का कार्यक्षेत्र हरियाणा एवं गुजरात तक विस्तृत किया जा रहा है। ओ एन जी सी ने रिमोट सेंसिंग सेंटर, सी पी डब्लू डी एवं जी डब्लू डी से डाटा लेकर इस कार्य को आरंभ किया है। सी पी डब्लू डी एवं जी डब्लू डी इस क्षेत्र में 170 मीटर की गहराई वाले 21 कुंए खोद चुकी हैं किंतु कहीं भी सरस्वती नदी के प्रवाह के अतिरिक्त जल नहीं निकला। ओ एन जी सी अब यहाँ 600 मीटर की गहराई के कुंए खोदेगी। इन कुंओं की खुदाई पर सामान्य कुंओं की अपेक्षा 50 गुना अधिक व्यय होता है। ओ.एन.जी.सी. 10 कुंओं पर लगभग 10 करोड़ रुपये व्यय करेगी तथा खोदे गये कुंओं को राज्य सरकार को समर्पित करेगी। राज्य सरकार इन कुंओं को पी एच ई डी को सौंपेगी।

    नदियों को जोड़ने की बात भी बार-बार राष्ट्रीय स्तर पर की जाती है। इस दिशा में अब तक कुछ भी ठोस नीति नहीं अपनाई गई है। भारत से निकलने वाली नदियों का पानी पाकिस्तान से हुए समझौतों में निर्धारित मात्रा से भी अधिक मात्रा में बहकर पाकिस्तान की ओर जा रहा है। पूर्णतः भारत में बहने वाली नदियों यथा गंगा, यमुना, कोसी आदि नदियों में आया बाढ़ का पानी भी व्यर्थ बहकर समुद्र तल की ओर जा रहा है। चीन की ओर से बहकर आने वाली ब्रह्मपुत्र महानद सहित सैंकड़ों छोटी-बड़ी नदियों में आने वाले अतिरिक्त पानी को भी भारत की नदियों में डाला जा सकता है किंतु राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में चिंतन का पूर्ण अभाव दिखाई देता है। इस बीच चीन ने सैंकड़ों नदियों का पानी चीन में ही रोक कर बांध बना लिये हैं और वह बड़े पैमाने पर बिजली पैदा कर रहा है और उस पानी को सिंचाई के काम में ले रहा है। यहाँ तक कि वह भारत के साथ पूर्व में विकसित हुई समझ एवं संधियों का पालन भी नहीं कर रहा है।

    समुद्र के खारे पानी को शुद्ध जल में बदलकर उसका मानव बस्तियों तक परिवहन किया जाना भी इस समस्या का एक हल हो सकता है। समुद्र के जल को मीठे पानी में बदलने की दो विधियां खोजी जा चुकी हैं। पहली विधि में समुद्र के जल में सोडियम हाइपो क्लोराइड मिलाया जाता है जिससे समुद्रीय लवणों के बड़े कण बन जाते हैं और वे गुरुत्वाकर्षण के कारण तल में बैठ जाते हैं इसमें अन्य रसायनों को मिलाकर पानी की अन्य अशुद्धियों को दूर कर लिया जाता है। दूसरी विधि बड़ी ही रोचक है तथा अभी परीक्षणों की प्रारंभिक अवस्था में है।

    समुद्र के पानी में अपने आप आग लग जाती है जिसे बड़वानल कहा जाता है। भारतीय पौराणिक साहित्य में इसका वर्णन आया है जिसे अब तक वैज्ञानिक कपोल कल्पना समझते थे। वस्तुतः ऐसा इसलिये होता है कि समुद्री पानी के अणु किसी कारण हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विघटित हो जाते हैं। इसके बाद हाइड्रोजन जलती है तथा ऑक्सीजन उसे जलाती है। वैज्ञानिक अब तक उसका कारण नहीं समझ पाये थे किंतु हाल ही के दिनों में यह बात सामने आई है कि जब समुद्र का लवणयुक्त जल एक विशेष रेडियो फ्रीक्वेंसी के क्षेत्र में रखा जाता है तो पानी के अणु, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में बदल जाते हैं। वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग को प्रयोगशालाओं में सफलतापूर्वक करके देख लिया है तथा यह भी पता लगा लिया है कि इस रेडियो फ्रीक्वेंसी में केवल समुद्र का जल रखने पर ही ऐसा होता है, शुद्ध जल को रखने से नहीं। इस प्रयोग के दूसरे हिस्से में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिलाकर फिर से पानी का अणु बना लिया जाता है तथा इस प्रकार आसुत जल (डिस्टिल वाटर) प्राप्त होता है।

    हाल ही में कुछ और खोजें भी हुई हैं जिनका उपयोग समुद्री पानी को मीठा करने में किया जा सकता है। समुद्र की सतह पर जब सूर्य की किरणें गिरती हैं तो समुद्र का पानी गर्म हो जाता है। इस कारण समुद्र की ऊपरी परत का तापक्रम नीचे की परत से अधिक हो जाता है। दो परतों के बीच तापमान के इस अंतर को बिजली में बदला जा सकता है। इस तापीय अंतर से बिजली बनाई जा सकती है। बिजली बनाने की इस प्रक्रिया में एक स्टेज पर समुद्री पानी को भाप में बदला जाता है। इस भाप को ठण्डा करने से आसुत जल प्राप्त होता है जिसे ठण्डा करके अलग प्राप्त किया जा सकता है तथा मानवीय बस्तियों में पहुँचाया जा सकता है।

    शुद्ध जल का कुप्रबंधन भी निःसंदेह हमारी स्थिति को दयनीय बना रहा है। राजस्थान के सदंर्भ में यदि हम शुद्ध जल की उपलब्धता की बात करें तो बड़ी भयावह स्थिति हमारे सामने आती है। भारत के भूभाग का लगभग 10.5 प्रतिशत, जनसंख्या का लगभग 5.5 प्रतिशत तथा पशु धन का लगभग 11.2 प्रतिशत राजस्थान में उपलब्ध है जबकि भारत के जल संसाधनों का केवल 1 प्रतिशत हिस्सा ही राजस्थान में उपलब्ध है। राजस्थान की जनसंख्या 1901 में 1 करोड़ 3 लाख थी जो सौ वर्षों में बढ़कर 5 करोड़ 65 लाख हो गई है। वर्ष 1960-61 में राजस्थान में पशुओं की संख्या 1 करोड़ 30 लाख थी 2007 में बढ़कर 5 करोड़ 79 लाख हो गई। दूसरी ओर राजस्थान के निर्माण के समय लगभग 13 प्रतिशत भूमि पर वन विस्तार था जो घटकर केवल 9.5 प्रशित रह गया है।

    इस कारण राजस्थान को अपनी जल नीति पर विशेष ध्यान देना होगा जबकि राजस्थान की वर्तमान जलनीति आने वाले समय के लिये बहुत खराब सिद्ध होने वाली है। राजस्थान में देश के केवल 1 प्रतिशत जलसंसाधन हैं जबकि देश का 8 प्रतिशत खाद्यान्न राजस्थान में पैदा किया जाता है। इस प्रकार हमने अपने जल संसाधनों पर 8 गुना अधिक भार डाल रखा है। इसी का परिणाम है कि राजस्थान में भूगर्भीय जल तेजी से नीचे जा रहा है। यह भूगर्भीय जल हमेशा के लिये समाप्त हो रहा है। इसके पुनर्भरण की कोई संभावना नहीं है जब तक कि धरती एक हिम युग में जाकर फिर से गर्म युग में न लौटे।

    यह एक आश्चर्य की ही बात है कि देश में सबसे कम जल संसाधन उपलब्ध होते हुए भी खाद्यान्न उत्पादन के मामले में राजस्थान देश के उन राज्यों में से है जो अपनी आवश्यकता से अधिक अन्न उत्पादित करते हैं। देश में कुल 175 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन होता है जिसमें से 14 मिलियन टन अर्थात् 8 प्रतिशत खाद्यान्न उत्पादन अकेले राजस्थान में होता है। इसी को जल कुप्रबंधन कहते हैं। इस पर तत्काल ध्यान दिया जाना आवश्यक है। सम्पूर्ण राजस्थान की कृषि को तत्काल बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति पर स्थानांतरित कर दिया जाना चाहिये। यद्यपि नर्मदा नहर के माध्यम से इसकी शुरुआत की गई है किंतु यह अपर्याप्त है। इस पद्धति को समस्त नहरी तंत्र के लिये आवश्यक कर दिया जाना चाहिये।

    जल कुप्रबंधन का दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण है भारत के शहरों में केवल शुद्ध जल की आपूर्ति करना। घरों में नलों के माध्यम से पहुंचने वाला शुद्ध जल न केवल पीने के काम आता है अपितु आंगन धोने, कपड़े धोने, बरतन मांजने के काम में भी यही जल लिया जाता है। जबकि राजस्थान में शुद्ध जल के स्रोत तो अत्यल्प हैं। इसलिये घरों के नलों में दो समय जलापूर्ति की जानी चाहिये। यदि सुबह के समय कम समय के लिये शुद्ध जल आपूर्ति किया जाये तो शाम के समय फ्लोराइड युक्त, लवणीय अथवा अन्य अशुद्धियों से युक्त जल की आपूर्ति की जाये। इस व्यवस्था से मानव सभ्यता को शुद्ध जल अधिक समय तक उपलब्ध रह सकेगा।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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