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  • वैदिक युग से राजपूत युग तक राजस्थान में सामाजिक व्यवस्था

     03.06.2020
    वैदिक युग से राजपूत युग तक राजस्थान में सामाजिक व्यवस्था

    वर्ण व्यवस्था

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    ऋग्वैदिक काल में भारतीय समाज में दो वर्ण थे। पहला वर्ण गौर वर्ण के लोगों का था जो आर्य कहलाते थे। दूसरा वर्ग कृष्ण वर्ण के लोगों का था जो अनार्य कहलाते थे। ऋग्वेद में ब्राह्मण और क्षत्रिय शब्दों का प्रयोग तो बार-बार हुआ है किंतु केवल एक ही सूक्त ऐसा है जिसमें चतुर्वर्णों का उल्लेख मिलता है। इस सूक्त में कहा गया है कि परम पुरुष के मुख से ब्राह्मण की, भुजाओं से क्षत्रिय की, जांघों से वैश्य की और पैरों से शूद्रों की उत्त्पत्ति हुई।

    इस रूपक का आशय जातियों की श्रेष्ठता का क्रम निर्धारित करना नहीं है अपितु प्रत्येक जाति के कार्य की स्थिति को स्पष्ट करना है। यह रूपक बताता है कि ब्राह्मण का कार्य देश के मुख के समान है। अर्थात् यज्ञ-हवन, नीति निर्देशन, उपदेश तथा शिक्षण का कार्य करने वाले ब्राह्मण हैं। क्षत्रिय देश की भुजाएं हैं। अर्थात् वे बाहुबल से प्रजा की रक्षा करते हैं। समाज रूपी शरीर के मुख और बाहुओं से नीचे अर्थात् पेट से लेकर जांघ तक का कार्य वैश्य करते हैं अर्थात् कृषि पशुपालन एवं व्यापार के माध्यम से वे प्रजा का पेट भरते हैं। शूद्रों का कार्य देश को गति देना है। वे निर्माण, सेवा और अन्य कार्यों के माध्यम से समाज को गति प्रदान करते हैं।

    वैदिक काल में जातीय श्रेष्ठता का विचार उत्पन्न नहीं हुआ था। सभी आर्य परस्पर बराबर थे। कोई भी आर्य अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार एक कर्म को त्याग कर दूसरा कर्म अपना सकता था। अंगिरा ऋषि लकड़ी का कार्य करते थे। उनके वंशज मध्यकाल में जातियों का निर्माण होने पर ‘सः अंगिरा’ अर्थात् ‘वह जो अंगिरा है’ अर्थात् जांगिड़ कहलाये।

    उत्तर वैदिक युग के सम्पूर्ण संस्कृत वांगमय से लेकर राजपूत काल के शिलालेखों तक में आर्यों के चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तथा चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास का उल्लेख मिलता है। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, इन वर्णों में कई भेद और विभेद भी दृष्टि गोचर होने लगे।

    स्कंदपुराण में पंचगौड़, पंचद्रविड़, पुष्करणा और श्रीमाली ब्राह्मणों का बोध होता है जो ब्राह्मणों में श्रेष्ठ माने जाते थे। राजस्थान के कई ब्राह्मण अपने आप को पूर्वी भारत के ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानते थे। क्योंकि पूर्वी ब्राह्मणों में से कुछ मांसाहारी होते थे।

    श्रेष्ठ ब्राह्मण, निम्न समझे जाने वाले ब्राह्मणों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं करते थे। इस काल में गोत्र एवं प्रवर भी अलग-अलग होने लग गये थे। कुछ ब्राह्मण पुरोहिताई के काम में, कुछ राजकीय सेवा में, कुछ अध्यापन में तथा कुछ ब्राह्मण व्यापार कर्म में भी लगे हुए थे।

    वैदिक काल में देश व प्रजा की रक्षा के लिये युद्ध करने वाले क्षत्रिय कहलाते थे। राजपूत काल में यह वर्ण राजपूत कहलाने लगा था। इनमें से चौहान, प्रतिहार, परमार, गुहिल आदि राजपूत वंश ब्राह्मणों में से ही निकले थे। कान्हड़ दे प्रबंध में राजपूतों के छत्तीस कुलों का उल्लेख किया गया है एवं 16 कुलों का वर्णन किया गया है। राजपूत काल में चौहान, प्रतिहार, परमार, गुहिल एवं राठौड़ राजपूत वंश अधिक प्रभावशाली थे।

    व्यापार, वाणिज्य, कृषि कर्म, पशुपालन आदि आर्थिक गतिविधियों में संलग्न समुदाय वैदिक काल में वैश्य कहलाता था। वैदिक काल में यह एक समृद्ध वर्ण था तथा राजपूत काल में भी इस वर्ण के कार्य एवं सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था।

    अनेक राजा एवं राजपुत्र श्रेष्ठि कन्याओं से विवाह करते थे। इस कारण वैश्य समुदाय का राज्यकार्यों में भी हस्तक्षेप रहता था। राजकीय कोठारों, भण्डारों एवं कोषागारों को संभालने का कार्य भी वैश्य समुदाय ही करता था। राजपूत काल में अग्रवाल, माहेश्वरी, जैसवाल, खण्डेलवाल और ओसवाल प्रभावशाली वैश्य थे। इन सभी वैश्य समुदायों का उद्भव क्षत्रियों से ही माना जाता है।

    ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य समुदाय से इतर जातियों को शूद्र कहा जाता था। इनमें कुम्हार, दर्जी, तेली, तम्बोली, नाई, लुहार, सुनार, ठठेरा आदि जातियाँ गिनी जाती थीं। शूद्र वर्ग को भी समाज में पर्याप्त आदर मिलता था। इनमें से अधिकतर जातियाँ खेती का काम भी करती थीं इस कारण इनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति ठीक थी।

    उपरोक्त चार वर्णों के अतिरिक्त डोम, चमार, चाण्डाल, नट, गांछे, मातंग, मच्छीमार, व्याध, धोबी, चिड़ीमार, जुलाहे आदि जातियाँ अधम और अधमाधम कही जाती थीं। इन्हें अंत्यज अर्थात् अस्पर्श्य माना जाता था। समाज के इस वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी।

    राजपूत काल में अंत्यजों से भी नीची जातियों का एक वर्ग उत्पन्न हो गया था। इन्हें म्लेच्छ कहा जाता था। इन लोगों का पेशा मनुष्यों की हत्या करना, चोरी एवं डकैती करना आदि था। इनमें कबर, भील, मीणा, मेड़ आदि जातियाँ थीं।

    बाद के काल में मुसलमानों एवं ईसाइयों के लिये म्लेच्छ शब्द का प्रयोग होने लगा जिसका अर्थ था वे लोग जो हिन्दू धर्म से इतर अर्थात् विधर्मी हैं। इन जातियों के अतिरिक्त कुछ जातियाँ ऐसी थीं जिन्हें किसी भी वर्ण में नहीं गिना जाता था। इनमें कायस्थ, जाट एवं गूजर प्रमुख थे। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा,1992- इतिहास, वैदिक युग से राजपूत युग तक वर्ण व्यवस्था की उत्त्पत्ति एवं विकास का वर्णन कीजिये।)

    मध्य काल में जातियों की संख्या तेजी से बढ़ी। जातियों में गोत्र निकले, गोत्र में खांपें बनीं और इन्हीं खांपों ने आगे चलकर नई जातियों का निर्माण किया।

    स्त्रियों की दशा

    वैदिक काल में यद्यपि पुत्री की अपेक्षा पुत्र जन्म को श्रेष्ठ माना जाता था तथापि समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत सम्मानजनक थी। वे सभा-समितियों, सामाजिक समारोहों, धार्मिक उत्सवों, वैवाहिक कार्यक्रमों, यज्ञ आदि महत्त्वपूर्ण कार्यों में पुरुषों के समान ही भाग लेती थीं। इस युग में जातियों का निर्माण नहीं हुआ था तथा अलग अलग कर्म करने वाले परिवारों की संतानों के मध्य विवाह होते थे। एक प्रकार से ये विवाह अंतरजातीय विवाह की श्रेणी में आते थे। इस काल में बाल विवाह प्रचलित थे किंतु विधवा विवाह को अच्छा नहीं माना जाता था।

    ऋग्वैदिक काल में एक पत्नी प्रथा प्रचलित थी किंतु प्रभावशाली लोगों की बहुपत्नियां भी होती थीं। राजपूत काल में बहुपत्नी प्रथा अपने चरम पर थी। ऋग्वैदिक काल में पति की मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी को शव के साथ कुछ क्षणों के लिये लेटना हेाता था उसके बाद पुरोहित मंत्र पढ़कर स्त्री को आज्ञा देता था कि नारी उठो और जीवलोक में पुनः लौट आओ किंतु बाद में यह प्रथा सती प्रथा में बदल गयी। राजपूत काल में विधवा स्त्री के लिये सती होना ही श्रेयस्कर समझा जाता था।

    ऋग्वैदिक काल में नियोग प्रथा भी प्रचलित थी जिसमें विधवा स्त्री पुत्र की प्राप्ति के लिये अपने देवर अथवा पति के कुटुम्ब के अन्य सदस्य के साथ पत्नी रूप में रह सकती थी। राजपूत काल में इस तरह की प्रथा समाप्त हो चुकी थी। उच्च कुलों में विधवा विवाह पूरी तरह प्रतिबंधित था किंतु निम्न समझी जानी वाली जातियों में नाता प्रथा का प्रचलन था जिसमें कोई विधवा अपने पति के भाई के साथ पत्नी के रूप में रह सकती थी।

    ऋग्वैदिक काल में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें एक स्त्री एक साथ कई पुरुषों की पत्नी हो सकती थी इसे सहपतिक विवाह प्रणाली कहते थे। महाभारत काल में द्रौपदी का उदाहरण इसी तरह का है। राजपूत काल में यह प्रथा पूरी तरह समाप्त हो गयी थी। एक स्त्री का विवाह एक पुरुष के साथ ही हो सकता था।

    राजपूत काल में स्त्री का वह सामाजिक सम्मान नहीं रह गया था जो वैदिक काल में था। अब स्त्री पूर्णतः पुरुष की अनुगामिनी हो कर रह गयी थी। उसे विधवा विवाह, नियोग अथवा सहपतिक विवाह के अधिकार नहीं रह गये थे। पर्दा प्रथा प्रारंभ हो गयी थी। एक से अधिक पत्नियों का होना गौरव की बात समझी जाती थी। इस समय तक भी स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। सगोत्र विवाह का प्रचलन नहीं था और अनुलोम विवाह ठीक नहीं समझे जाते थे किंतु उनका प्रचलन भी समाज में था। इस काल में उच्च कुल की स्त्रियों के लिये सती होना आवश्यक सा हो गया था। विधवाओं को परिवार की सम्पत्ति पर पूरा अधिकार नहीं था। वे केवल अपने आभूषण और स्त्रीधन की ही अधिकारिणी समझी जाती थीं।
    (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1988-इतिहास, वैदिक युग से राजपूत युग तक स्त्रियों की स्थिति का वर्णन कीजिये।)

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