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  • राजस्थान में राठौड़ वंश का उदय

     03.06.2020
    राजस्थान में राठौड़ वंश का उदय

    राजस्थान में राठौड़ वंश का उदय

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    राठौड़ों को संस्कृत में राष्ट्रकूट कहा जाता है, जिसका प्राकृत रूप रट्टउड है। अशोक के शिलालेखों में रिस्टिक, लटिक तथा रटिक शब्दों का प्रयोग किया गया है जो राष्ट्रकूट से मिलते जुलते हैं। ये राष्ट्रकूट अपने आपको आदर देने के लिये महाराष्ट्र या महाराष्ट्रिक कहने लगे जिसका प्राकृत रूप मराठी तथा मराठा हुआ। कुछ भाटों की मान्यता है कि राठौड़ हिरण्याकश्यप की संतान हैं। जोधपुर की ख्यात में इन्हें राजा विश्वुतमान के पुत्र राजा वृहदबल से पैदा होना लिखा है। इन्हें सूर्यवंशी तथा ब्राह्मणवंशी भी बताया जाता है। नैणसी इन्हें कन्नौज के शासक जयचंद्र की संतान मानता है।


    राष्ट्रौढ़ वंश महाकाव्य में इन्हें भगवान शिव के शीश पर स्थित चंद्रमा से उत्पन्न होना बताया गया है। राठौड़ों की विभिन्न शाखाओं में दक्षिण के राष्ट्रकूट बड़े प्रसिद्ध हैं। राजस्थान के राठौड़ों में हस्तिकुण्डी, धनोप, वागड़, जोधपुर तथा बीकानेर के राठौड़ बड़े प्रसिद्ध हैं। मारवाड़ के राठौड़ अपने आप को अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के राजा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के पुत्र कुश की संतान मानते हैं।

    मारवाड़ के राठौड़ कन्नौज या बदायूं से आये थे जहाँ इन्होंने दो शताब्दियों तक राज्य किया था। पहले ये दक्षिण में राज्य करते थे। वहाँ से इन्होंने प्रतिहारों पर आक्रमण कर उनसे कन्नौज छीना। ईस्वी 1170 में कन्नौज की गद्दी पर जयचंद्र गहरवार बैठा जिसका झगड़ा पृथ्वीराज चौहान से हुआ। जयचंद ने मुहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण भेजा ताकि वह पृथ्वीराज चौहान से अपनी पराजय का बदला ले सके। तराइन के दूसरे युद्ध ई. 1192 में गौरी ने पृथ्वीराज को मार डाला। ई. 1194 में गौरी ने जयचंद्र पर आक्रमण कर उसे भी मार डाला।

    जयचंद्र का पुत्र हरिश्चंद्र 18 वर्ष का आयु में कन्नौज की गद्दी पर बैठा। ई. 1226 में अल्तुतमिश ने कन्नौज पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया। हरिश्चंद्र फर्रूखाबाद जिले के महुई गाँव में आ गया। हरिश्चंद्र का कनिष्ठ पुत्र सेतराम था जिसका पुत्र सीहा हुआ। सीहा ने महुई में काली नदी के तट पर एक दुर्ग बनवाया किंतु जब फर्रूखाबाद पर भी मुसलमानों का अधिकार हो गया तो सीहा ने उस स्थान को छोड़कर द्वारिका के लिये प्रस्थान किया। मार्ग में जब वह पुष्कर में ठहरा हुआ था तब वहाँ पर तीर्थयात्रा को आये हुए भीनमाल के ब्राह्मणों से उसकी भेंट हुई। उन दिनों मुल्तान के मुसलमान भीनमाल पर चढ़ाई कर लूट खसोट किया करते थे। ब्राह्मणों ने सीहा से सहायता मांगी। सीहा ने ब्राह्मणों की प्रार्थना स्वीकार कर भीनमाल पर आक्रमण कर मुसलमानों को भगा दिया। इस विषय में मारवाड़ में एक दोहा कहा जाता है-

    भीनमाल लीधी भिड़े सीहै सेल बजाय,

    दत दीन्हो सत संग्रह्यौ, ओ जस कदै न जाय।।


    अर्थात् सीहा ने तलवार के जोर पर भीनमाल पर अधिकार कर उसे ब्राह्मणों को दान में देकर जो पुण्य अर्जित किया, उसका यश सदा अमर रहेगा।

    पल्लीवाल ब्राह्मणों की प्रार्थना पर सीहा ने पाली पर अधिकार कर मीणा, भील, मेर आदि लुटेरों से उनकी रक्षा की तथा वहीं बस गया। धीरे-धीरे आसपास के गाँवों पर उसका अधिकार हो गया। पाली तब सोनगरा चौहानों के राज्य में था। वि. सं.1330 में लूनी नदी के किनारे खेड़ में सिंध के मुसलमान लुटेरों से लड़ते हुए राव सीहा वीरगति को प्राप्त हुआ। सीहा के साथ उसकी रानी पार्वती देवी सती हुई। उसके तीन पुत्र आसथान, सोनंग तथा अज थे। जीवनपर्यंत ब्राह्मणों की रक्षा करने और उसी काम में अपना जीवन होम कर देने के कारण सीहा को ब्राह्मणों का आशीर्वाद फला और उसके वंशजों ने मारवाड़ में प्रबल प्रतापी राज्य की स्थापना की।

    मालानी राठौड़

    चौदहवीं शताब्दी में सीहा का वंशज मल्लीनाथ वर्तमान बाड़मेर जिले के पूर्वी छोर का राजा हुआ जिसे मल्लीनाथ के नाम पर मालानी प्रदेश कहते हैं। मल्लीनाथ के वंशज मालानी राठौड़ कहलाये।

    जोधपुर के राठौड़

    मालानी के राठौड़ राजा मल्लीनाथ का छोटा भाई वीरम था जो महेवा में गुढ़ा (छोटा गढ़) बांध कर रहता था। मल्लीनाथ के पुत्रों और वीरम के बीच झगड़ा रहता था। इस कारण वीरम महेवा छोड़कर पहले तो जैसलमेर पहुँचा। फिर वहाँ से चलकर नागौर आया और नगौर के खान शासक को परास्त करके नागौर को लूटता हुआ जांगलू (बीकानेर जिले में) चला गया। उसने लाडनूं के मोहिलों को परास्त किया तथा ई. 1383 में जोहियों के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया। वीरम का पुत्र चामुण्डराय, राव चूण्डा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

    ई.1444 में प्रतिहारों की इंदा शाखा के मुखिया ने चूण्डा से अपनी बेटी का विवाह किया तथा मण्डोर का किला मुसलमानों से छीनकर चूण्डा को दहेज में दे दिया। चूण्डा का ज्येष्ठ पुत्र रणमल मण्डोर का शासक हुआ।

    रणमल के पुत्र राव जोधा ने ई.1459 में जोधपुर दुर्ग की नींव रखी। इसके बाद देश की स्वतंत्रता तक यही वंश जोधपुर राज्य पर शासन करता रहा। इस वंश में जसवंतसिंह (प्रथम) बड़ा प्रतापी राजा हुआ। उससे औरंगजेब भी भय खाता था। स्थापत्य कला में उत्कृष्ट रुचि का प्रदर्शन करने के कारण जसवंतसिंह (प्रथम) को हिन्दुषत् भी कहा जाता है। उसकी मृत्यु के बाद औरंगजेब ने ई.1678 में मारवाड़ खालसा कर लिया किंतु वीर दुर्गादास राठौड़ तथा उनके साथियों ने पहले ई.1707 में तथा फिर ई.1708 में मुगलों को जोधपुर से मार भगाया। जोधपुर पर फिर से जसवंतसिंह के वंश का शासन हो गया।


    बीकानेर के राठौड़

    जोधपुर नरेश राव जोधा के 17 पुत्र तथा 7 पुत्रियां थीं। जोधा के पुत्रों में बीका का स्थान दूसरा था। राव जोधा के कहने पर राव बीका जांगल देश की ओर चला गया और 23 वर्ष के अथक परिश्रम से उसने जांगल क्षेत्र में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। राव जोधा की मृत्यु के बाद जोधा का तीसरा पुत्र सातल जोधपुर का राजा हुआ। सातल के मरने पर जोधा का अन्य पुत्र सूजा जोधपुर की गद्दी पर बैठा। इस बीच बीका ने जोधपुर की गद्दी पर अपना अधिकार जताते हुए जोधपुर राज्य पर आक्रमण कर दिया। बीका ने सूजा को परास्त करके जोधपुर राज्य के सारे राजकीय चिह्न छीन लिये किंतु राजमाता के समझाने पर बीका फिर से बीकानेर चला गया। तब से लेकर भारत के स्वतंत्र होने तक बीका के वंशज बीकानेर पर शासन करते रहे। राठौड़ों की इस शाखा में कर्णसिंह प्रतापी राजा हुआ। औरंगजेब ने उसे राज्यच्युत करके औरंगाबाद भेज दिया जहाँ उसकी मृत्यु हुई। नागौर के राव अमरसिंह राठौड़ से इसी कर्णसिंह की बहुचर्चित लड़ाई हुई थी जिसे ‘मतीरे की राड़’ भी कहते हैं। इस युद्ध की परिणति अमरसिंह राठौड़ की मृत्यु में हुई।

    मेड़तिया राठौड़

    जोधपुर नरेश राव जोधा का पुत्र राव दूदा प्रतापी क्षत्रिय था। जोधा ने दूदा तथा अपने अन्य पुत्र वरसिंह को मेड़ता क्षेत्र प्रदान किया। यह क्षेत्र मुसलमानों ने उजाड़ दिया था। दूदा तथा वरसिंह ने मिलकर मेड़ता को फिर से बसाया। बाद में वरसिंह के छल के कारण दूदा मेड़ता छोड़कर बीकानेर जा बसा। जब वरसिंह की मृत्यु हो गयी तो वरसिंह का पुत्र सीहा मेड़ता की गद्दी पर बैठा। यह निकम्मा शासक था इसलिये मेड़ता के सरदारों ने दूदा को फिर से मेड़ता बुलवाया। दूदा ने वरसिंह को पदच्युत करके मेड़ता पर अधिकार कर लिया। दूदा के बाद वीरमदेव मेड़ता की गद्दी पर बैठा। वीरमदेव राठौड़ों की मेड़तिया शाखा का सबसे प्रबल राजा हुआ किंतु उसके दुर्भाग्य से उस समय जोधपुर की गद्दी पर मालदेव अत्यंत महत्वाकांक्षी राजा हुआ। उसने वीरमदेव का राज्य नष्ट कर दिया। वीरमदेव ने शेरशाह सूरी की सहायता से अपना खोया हुआ राज्य फिर से प्राप्त कर लिया।

    वीरमदेव की मृत्यु के बाद जयमल मेड़ता का स्वामी हुआ। इसी बीच शेरशाह सूरी का सितारा डूब गया जिससे अवसर पाकर मालदेव ने मेड़ता का राज्य फिर से नष्ट कर दिया तथा वीरमदेव का महल तुड़वा कर वहाँ मूलियों की खेती करवा दी। जयमल उदयपुर के महाराणा उदयसिंह की सेवा में चला गया। जब अकबर ने ई.1567 में चित्तौड़ पर आक्रमण किया तब यही जयमल चित्तौड़ दुर्ग का अध्यक्ष था। अकबर की गोली से जयमल लंगड़ा हो गया। तब जयमल ने कल्ला राठौड़ के कंधों पर बैठकर युद्ध लड़ा और वीरगति को प्राप्त हुआ। जयमल के बहनोई सिसोदिया फत्ता ने भी इस युद्ध में प्रचण्ड शौर्य का प्रदर्शन किया और रणखेत रहा। अकबर ने आगरा के दुर्ग में प्रवेश द्वार पर जयमल और फत्ता की मूर्तियां लगवाईं। ई.1663 में जब वर्नियर भारत आया तब उसने इन मूर्तियों को देखकर अपना जीवन धन्य माना।

    जयमल की मृत्यु के बाद अकबर ने जयमल के पुत्रों सुरताण एवं केशवदास को आधे-आधे मेड़ता का स्वामी बना दिया। ई.1602 में अकबर ने मेड़ता का परगना जोधपुर नरेश सूरसिंह को दे दिया। इसी के साथ मेड़ता राज्य समाप्त हो गया। मेड़ता की छोटी-छोटी जागीरों पर राव दूदा के वंशज बने रहे।




    राजस्थान के अन्य शासक वंश



    प्राचीन क्षत्रिय वंशों में राजस्थान में शासन करने वाले राजवंशों में दहिया, दाहिमा, तंवर (तोमर), निकुंप, डोडिया, गौड़ तथा यादव वंशों के नाम भी प्रमुख हैं। जिस समय कन्नौज में प्रतिहार शासन करते थे उस समय तंवर दिल्ली पर शासन करते थे। चौहानों से परास्त होकर इस वंश के कई वीर राजस्थान में आये और जयपुर के आसपास बस गये। इनके बसने का स्थान तोरावाटी कहलाता है। यहाँ स्थित पाटन इनका टीकाई ठिकाना था। दहिया राजपूतों की उत्त्पत्ति दधीची ऋषि से मानी गयी है। ये चौहानों के सामंत थे। इस वंश में मेघनाद तथा वैरिसिंह प्रमुख योद्धा हुए। वैरिसिंह के पुत्र चच्च ने 999 ई. में केवायमाता मंदिर का निर्माण करवाया। देरावर पर्वतसर, सावर, घटियानी, हरसोर तथा मारोठ दहियों के प्रमुख ठिकाने थे। निकुंप वंश अलवर-जयपुर के आसपास सामंतों के रूप में शासन करता था। ये डोडिया चौहानों के सामंत थे तथा आंवलदा, गागरौन आदि स्थानों पर बसे हुए थे। भरतपुर, करौली,धौलपुर आदि स्थानों पर यादवों का शासन था। भरतपुर तथा उसके आसपास के क्षेत्र में जाटों ने भी अपना राज्य स्थापित किया।

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