Blogs Home / Blogs / आलेख-राजस्थान / राजस्थान में गुहिलों एवं प्रतिहारों का उदय एवं विस्तार
  • राजस्थान में गुहिलों एवं प्रतिहारों का उदय एवं विस्तार

     03.06.2020
    राजस्थान में गुहिलों एवं प्रतिहारों का उदय एवं विस्तार

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान पर प्राचीन काल से विभिन्न क्षत्रिय वंशों के राजा शासन करते आ रहे थे। हर्षवर्द्धन की मृत्यु के बाद क्षत्रिय राजा नेपथ्य में चले जाते हैं तथा उनके स्थान पर राजपूत राजाओं के राज्य अस्तित्व में आने लगते हैं।


    राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय




    हर्षवर्धन की मृत्यु (648 ई.) से लेकर मुहम्मद गौरी के गुलामों द्वारा भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना करने (1206 ई.) तक का काल भारतीय इतिहास में राजपूत काल के नाम से प्रसिद्ध हैै। इस काल में राजस्थान में अनेक राजपूत वंशों ने अपनी सत्ताएं स्थापित कीं जिनमें चौहान, गुहिल, प्रतिहार, परमार, चावड़े, गुर्जर तथा राठौड़ प्रमुख थे। इस काल में राजाओं ने सामंतों के माध्यम से शासन किया था, इसलिये इसे सामंतशाही काल भी कहा जाता है।

    राजपूतों को अपनी सत्ता स्थापित करने तथा उसे बनाये रखने के लिये भील, मीणा, मेव आदि जनजातीय समूहों से निरंतर युद्ध करना पड़ा। राजपूतों ने उन्हें परास्त कर उनकी बस्तियां नष्ट कर दीं या फिर उन्हें दबाकर अपने अर्द्ध आश्रित रूप में रखा। कहीं-कहीं उनसे लम्बे समय तक झगड़ा चलता रहा। इन राजपूतों को कुछ विद्वानों ने विदेशी जातियों- हूण, कुषाण, शक, सीथियन तथा खिजर की संतान माना है। कुछ विद्वानों ने इन्हें प्राचीन क्षत्रियों की संतान माना है तो कुछ विद्वान राजपूतों को विदेशी तथा देशी क्षत्रियों का मिश्रित रक्त मानते हैं। राजपूत वंशों ने अपने आपको सूर्यवंशी अथवा चंद्रवंशी घोषित किया जैसा कि प्राचीन भारतीय क्षत्रियों ने किया था। एक जनश्रुति के अनुसार जब परशुराम ने क्षत्रियों का विनाश कर दिया तब समाज में अव्यवस्था फैल गयी तथा लोग कर्तव्य भ्रष्ट हो गये। इससे देवता बड़े दुखी हुए और आबू पर्वत पर एक विशाल अग्निकुण्ड से देवताओं ने चार योद्धाओं- प्रतिहार, चौलुक्य, चाहमान तथा परमार उत्पन्न किये जिन्होंने अपने शासन स्थापित कर देश तथा धर्म की रक्षा की। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1994-इतिहास, अनुश्रुति के अनुसार आबू पर्वत पर यज्ञीय अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने वाले राजवंशों का उल्लेख कीजिये।)

    एक अन्य मत के अनुसार जब बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के कारण जाति व्यवस्था टूटने लगी, वर्णाश्रम धर्म पालन में शिथिलता आ गयी और चारों ओर अंतर्जातीय विवाह होने लगे तब राजस्थान के क्षत्रियों ने अपनी रक्त शुद्धता बनाये रखने के लिये केवल राजस्थान के क्षत्रिय वंशों में ही विवाह सम्बन्ध करने आरंभ किये। इस प्रकार शेष भारत के अन्य क्षत्रियों से अलग राजस्थान के क्षत्रियों की एक विशिष्ट इकाई बन गयी। ये क्षत्रिय राजपूत कहलाये। एक मत इस सम्बन्ध में यह भी है कि हर्ष की मृत्यु के बाद कोई केंद्रीय सत्ता न रही। उस काल में अरब तथा इस्लाम के आक्रमणों का प्रतिरोध करने के लिये राजस्थान के क्षत्रियों ने मिलकर आबू पर्वत पर एक सम्मेलन किया जिसका नेतृत्व प्रतिहार, चौलुक्य, चाहमान तथा परमार नामक वीरों ने किया तथा यज्ञ करके अग्नि के समक्ष राष्ट्र की स्वतंत्रता एवं धर्म की रक्षा के लिये आजीवन संघर्ष की शपथ ग्रहण की। यह तथ्य अधिक सही जान पड़ता है क्योंकि इन राजपूतों ने छः शताब्दियों तक (अर्थात् छठी शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक) मुसलमानों से विकट लोहा लिया और मुसलमानों को पूरे देश में कहीं भी सत्ता नहीं जमाने दी। उसके बाद की अगली छः शताब्दियों में (अर्थात् ई.1206 में दिल्ली पर गुलाम वंश की सत्ता स्थापित होने से लेकर अंग्रेजों द्वारा सत्ता स्थापित करने तक) ये राजपूत कहीं तो मुसलमानों के अधीन रहकर, कहीं उनके साथ-साथ तो कहीं पूर्णतः स्वतंत्र रहकर शासन करते रहे।

    अरब से उठी इस्लाम की आंधी में पूरा मध्य एशिया बह गया, देश के देश इस्लाम के अनुयायी हो गये किंतु भारत में लगभग छः शताब्दियों तक हिंदुओं ने राजपूतों के नेतृत्व में मुसलमानों का डटकर प्रतिरोध किया। प्रतिहारों और चौहानों ने मुसलमानों को लगभग देश से बाहर ही रखा। ई.1133 में अर्णोराज चौहान अजमेर की गद्दी पर बैठा। उसके काल में तुर्कों की विशाल सेना ने अजमेर पर आक्रमण किया। अर्णोराज ने कई लाख तुर्कों का वध किया। उसके वंशज पृथ्वीराज तृतीय ने भारत भूमि पर चढ़कर आये मुहम्मद गौरी को कई बार छोटे-बड़े युद्धों में परास्त किया किंतु अंत में ई.1193 में पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी के हाथों परास्त हुआ और मारा गया। इसके बाद दिल्ली पर तुर्कों का शासन हो गया और दिल्ली सल्तनत का शासन आरंभ हुआ। उत्तर भारत के राजपूत शासक दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों से लोहा लेते रहे किंतु वे अधिक समय तक अपनी स्वतंत्रता को बनाये नहीं रख सके। अजमेर तो कुतुबुद्दीन ऐबक के समय से ही दिल्ली सल्तनत के अधीन था। अल्तमश (इल्तुतमिश) ने जालोर, मण्डोर तथा नाडोल पर अधिकार कर लिया। बलबन ने रणथंभौर व नागौर पर अधिकार करके लाहौर से लेकर रणथंभौर तक का भाग अपने अधीन कर लिया जिसकी राजधानी नागौर में स्थापित की गयी। अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर, चित्तौड़ सिवाना एवं जालौर पर अधिकार कर लिया। इन सभी स्थानों पर उसे कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1996-इतिहास, राजपूताना में किन स्थानों पर अलाउद्दीन खिलजी को कठोरतम संघर्ष करना पड़ा था?)

    राजपूत राज्य एक-एक करके दिल्ली सल्तनत के अधीन होते चले गये किंतु अवसर पाते ही राजपूत राजा अपने राज्य को फिर से प्राप्त करने का प्रयास करते थे। राजपूत भले ही अपने राज्यों की रक्षा न कर सके हों किंतु हिंदू धर्म की रक्षा इन्होंने बड़ी तत्परता से की। इनके 12-13 शताब्दियों के संघर्ष का फल है कि आज भी भारत में गाय की रक्षा के लिये प्राण तक न्यौछावर कर देने के उदाहरण मिलते हैं। यदि ये हिंदू राजा आपस में नहीं लड़े होते तथा उन्होंने मिलकर इस्लाम की ताकत का सामना किया होता तो दुनिया का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास कुछ और ही तरह का होता। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1988-इतिहास, सल्तनत काल में राजस्थान के शासक कहाँ तक तुर्क आक्रांताओं का मुकाबला कर सके?)




    गुहिल




    हूणों के पराभव के बाद राजस्थान में जिन राजपूत वंशों ने अपने राज्य स्थापित किये उनमें गुहिल वंशीय राजपूत प्रमुख हैं। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इन्हें विशुद्ध सूर्यवंशीय क्षत्रिय माना है। प्रांरभ में गुहिल गुजरात की तरफ से मेवाड़ क्षेत्र में आए और वहीं से ये राजस्थान के अन्य भागों में जाकर बसे। 568 ई. के लगभग ‘गुहिल’ नामक प्रतापी राजा हुआ। आगरा से भूमि में गड़े हुए चांदी के 2000 से भी अधिक सिक्के मिले हैं जिन पर इस राजा का नाम अंकित है। ‘नरवर’ से भी चांदी का एक ऐसा सिक्का मिला है जिस पर ‘श्रीगुहिलपति’ लेख मिला है। इस राजा के वंशज ‘गुहिल’ अथवा ‘गुहिलोत’ कहलाये। लगभग 1400 वर्ष की अवधि में इस वंश के 75 शासकों की श्ृंखला ने निर्विघ्न रूप से मेवाड़ पर शासन किया। भारत की आजादी के समय यह विश्व का सबसे पुराना राजवंश था। इस वंश ने शौर्य और पराक्रम की दुनिया में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। भारतीय शासकों में महाराणा का स्थान सबसे उच्च रहा है।

    इसी वंश में उत्पन्न ‘बापा रावल’ अथवा ‘कालभोज’ नामक राजा का सोने का सिक्का भी मिला है जो उसके समृद्ध तथा शक्तिशाली होने की घोषणा करता है। बापा रावल, शैव सम्प्रदाय के कनफड़े साधु हारीत ऋषि का शिष्य था। इसलिये उसने शैव सम्प्रदाय को अपना राजधर्म बनाया। उसने 713 ई. के बाद के किसी वर्ष में मौर्यवंशी राजा मान मोरी से चित्तौड़ का दुर्ग हस्तगत किया। बापा के बाद शिलादित्य, अपराजित, कालभोज, खम्भाण (प्रथम), भर्तृभट्ट, अल्लट तथा नरवाहन आदि राजा हुए। इनमे से कुछ को भीलों से निरंतर संघर्ष करना पड़ा तथा जय-पराजय के अनेक उतार-चढ़ाव देखने पड़े। ये राजा कभी नागदा, कभी आहाड़ तथा कभी चित्तौड़ को अपनी राजधानी बनाकर राज्य करते रहे। गुहिल राजा, अपने राज्य के विस्तार के लिये अपने पड़ौसी राजाओं से संघर्ष करते, लड़ते-भिड़ते आगे बढ़ते रहे। इस कारण उनका राज्य कभी आगरा के पास दिखाई देता तो कभी खिसक कर चाटसू होता हुआ गुजरात में चला जाता। कभी-कभी तो गुहिलों का राज्य सिमट कर इतना छोटा रह जाता कि किसी तरह अस्तित्व भर बचा रहता था।

    बारहवीं शताब्दी ईस्वी में इस वंश में ‘रण सिंह’ अथवा ‘कर्णसिंह’ नामक राजा हुआ। कर्णसिंह से गुहिलोतों की दो शाखाएं निकलीं। एक शाखा रावल कहलाती थी जिसका चित्तौड़ पर शासन था और दूसरी शाखा राणा कहलाती थी जिसका सीसोद की जागीर पर अधिकार था। इन राजाओं को रघुवंश की कीर्ति फैलाने वाला बताया गया है। दसवीं शताब्दी में नरवाहन से लेकर 13वीं शताब्दी में जैत्रसिंह के मेवाड़ की गद्दी पर बैठने तक का काल गुहिलों के पराभव का काल है। ये राजा किसी तरह अपना अस्तित्व बनाये रखने में सफल रहे किंतु उनका शौर्य, पराक्रम और वैभव क्षीण रहा। विक्रम संवत 1331 (1274 ई.) की चित्तौड़ प्रशस्ति से गुहिल वंश की अनेक शाखाओं का पता चलता है। मुहता नैणसी तथा कर्नल टॉड ने भी इनकी 24 शाखाओं का उल्लेख किया है। इनमें से कल्याणपुर के गुहिल, चाटसू के गुहिल, मालवा, वागड़, धोड़, काठियावाड़, मारवाड़ तथा मेवाड़ के गुहिल प्रमुख हैं। जैत्रसिंह 1213 ई. में मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। उसने गुहिलों की डूबती नौका का पुनरुद्वार किया। उसका पुत्र तेजसिंह, पौत्र समरसिंह तथा प्रपौत्र रतनसिंह भी प्रतापी राजा हुए।

    रतनसिंह 1302 ई. में मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। उसी वर्ष अल्लाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तथा रावल रतनसिंह को धोखे से बंदी बना लिया। उसने रावल के आदमियों को यह संदेश भेजा कि यदि रानी पद्मिनी अल्लाउद्दीन को सौंप दी जाये तो रत्नसिंह को छोड़ दिया जायेगा। गोरा और बादल ने खिलजी से कहलवाया कि आपकी मांग पूरी की जायेगी तथा रानी अपनी 700 दासियों के साथ बादशाह की सेवा में उपस्थित होगी किंतु पहले रानी अपने पति महाराजा रत्नसिंह से मिलेगी। गोरा चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का चाचा था और बादल रानी पद्मिनी का भाई था। बादशाह ने उनकी यह मांग स्वीकार कर ली। रानी के स्थान पर गोरा और बादल तथा दासियों के स्थान पर सिपाही डोलियों में छिप गये। उन्होंने राणा को बादशाह के चंगुल से निकाल कर दुर्ग में भेज दिया और स्वयं शत्रु सिपाहियों को यमलोक पहुंचाते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1991, निम्न के बारे में आप क्या जानते हैं- गोरा बादल?)

    बाद में खिलजी ने दुर्ग पर आक्रमण करके रावल रतनसिंह को मार दिया। रतनसिंह की रानी पड्डावती ने जौहर किया। इसी के साथ गुहिलों की रावल शाखा का अंत हो गया।

    ई. 1326 में गुहिलों की राणा शाखा के राणा हमीर ने पुनः चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। यह शाखा सीसोद गाँव से निकली थी इसलिये इस शाखा के वंशजों को सिसोदिया भी कहते हैं। तब से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक मेवाड़ पर इसी शाखा ने शासन किया।

    गुहिलों की इस शाखा में महाराणा कुंभा प्रतापी राजा हुआ। वह ई.1433 में चित्तौड़ की गद्दी पर बैठा। उसने अनेक युद्ध जीते। कुंभलगढ़ प्रशस्ति में कहा गया है- ‘कुंभकर्ण ने सारंगपुर में असंख्य मुसलमान स्त्रियों को कैद कर लिया। कुंभा ने महमूद का महामद छुड़वाया, उसके नगर को जलाया और अगस्त्य ऋषि के समान अपने खंग रूपी चुल्लू से वह मालव समुद्र को पी गया।’ कुंभा ने माण्डू, बूंदी, नागपुर (नागौर), गागरौन, नरायण, आमेर, मण्डोर, माण्डलगढ़, खाटू और चाटसू को जीता। कुंभा ने मेवाड़ राज्य में बहुत बड़ी संख्या में किले, मंदिर, जलाशय तथा उद्यान आदि बनवाये। मेवाड़ के 84 किलों में से 32 किले कुंभा ने बनवाये। उसने चित्रकूट दुर्ग (चित्तौड़ दुर्ग) को अद्भुत स्वरूप प्रदान किया। उसमें अनेक शिखर बनावाये, तलहटी से दुर्ग तक जाने के लिये रथमार्ग बनवाया। दुर्ग में रामपोल, हनुमान पोल, भैरवपोल, महालक्ष्मी पोल, चामुण्डा पोल, तारापोल और राजपोल नामक दरवाजों का निर्माण करवाया। कुंभा ने कुंभस्वामी और आदिवराह के मंदिर, रामकुंड, जलयंत्र (रहट) सहित कई बावड़ियां तथा तालाब बनवाये। ई. 1515 में उसने कुंभलगढ़ दुर्ग की प्रतिष्ठा करवायी। उस दुर्ग में चार दरवाजे बनवाये, मण्डोर से लाकर हनुमानजी की मूर्ति लगवायी तथा अपने किसी शत्रु के यहाँ से लायी हुई गणपति की मूर्ति स्थापित करवायी। वहीं उसने कुंभ स्वामी का मंदिर, जलाशय तथा एक बाग का निर्माण करवाया। एकलिंगजी के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। उसमें मण्डप, तोरण, ध्वजा, दण्ड तथा कलश बनवाये। आबू छीनकर अचलेश्वर के पास के श्ृंग पर वि. सं. 1509 में अचल दुर्ग की प्रतिष्ठा की। अचलेश्वर के पास कुंभ स्वामी का मंदिर और उसके निकट एक सरोवर तथा चार जलाशय बनवाये। बाडौली का शिवमंदिर, सारणेश्वर का मंदिर, नागदा का सास-बहू मंदिर, चित्तौड़ का सूर्य मंदिर तथा अद्भुतजी का मंदिर भी उसी ने बनवाये जो परवर्ती गुप्तकालीन वास्तु कला से प्रभावित हैं। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1999-इतिहास भारतीय वास्तु के लिये कुंभा के योगदान का वर्णन कीजिये।)

    विजय स्तम्भ : मालवा के सुल्तान मोहम्मद पर अपनी अप्रतिम विजय की स्मृति में महाराणा कुंभा ने चित्तौड़ में विश्व प्रसिद्ध विजय स्तंभ बनवाया। इसका निर्माण प्रख्यात शिल्पी मण्डन के निर्देशन में हुआ। (अधिशासी अधिकारी भर्ती संवीक्षा भर्ती परीक्षा 2008, मण्डन किस दुर्ग का शिल्पी था?) कुंभा ने जय और अपराजित के मतानुसार कीर्ति स्तंभों की रचना का एक ग्रंथ बनाया और उसे शिलाओं पर खुदवाकर अपने विजय स्तंभ के नीचे के हिस्से में बाहरी तरफ लगवाया। कवि अत्रि तथा कवि महेश ने विजय स्तम्भ की प्रशस्ति की रचना की। इस विजय स्तंभ को वि.सं.1497 (ई.1440) में बनवाना आरंभ किया गया तथा यह वि. सं.1505 (ई.1448) में बनकर तैयार हुआ। विजय स्तंभ पर उत्कीर्ण लेख के अनुसार इसे महाराणा ने अपने इष्टदेव विष्णु के निमित्त बनवाया था। यह भारत में पाया जाने वाला एक मात्र कीर्ति स्तंभ है जो भीतर और बाहर से मूर्तियों से लदा हुआ है। यह विजय स्तंभ 12 फुट ऊंचे और 2 फुट गुणा दो फुट के चौकोर चबूतरे पर स्थित है। इसकी लम्बाई 30 फुट और ऊँचाई 122 फुट है। इसमें कुल 9 मंजिलें हैं। नीचे और ऊपर की ओर चौड़ी मंजिलें हैं और बीच में कुछ संकरी मंजिलें हैं। इस विजय स्तंभ को कई विद्वानों ने हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों से सजाया हुआ एक व्यवस्थित संग्रहालय कहा है। आज इस स्तंभ की अनेक मूर्तियां खण्डित अवस्था में हैं जिससे स्पष्ट है कि इसे बाद में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नष्ट करने का प्रयास किया गया। इस विजय स्तंभ पर उत्कीर्ण मूर्तियों के माध्यम से 15 शताब्दी के जनजीवन की झांकी भी देखने को मिलती है। फर्ग्यूसन ने इसे रोम के ट्राजन टॉवर से तथा कर्नल टॉड ने इसे कुतुबमीनार से श्रेष्ठ बताया है। 

    कुंभा ने संगीतराज, संगीत मीमांसा, सूडप्रबंध नामक संगीत ग्रंथों की रचना की। उसने चण्डी शतक की व्याख्या लिखी तथा गीत गोविंद पर रसिक प्रिया नामक टीका लिखी। उसने संगीत रत्नाकर की टीका की तथा भिन्न-भिन्न तालों के साथ गायी जाने वाली अनेक देव स्तुतियां बनाईं। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1991-इतिहास, महाराणा कुंभा द्वारा रचित ग्रंथों के नाम लिखिये।) वह कवियों का शिरोमणि, वीणावादन में अत्यंत निपुण तथा नाट्य शास्त्र का बहुत अच्छा ज्ञाता था। वह नव्य भरत (अभिनव भरताचार्य) कहलाता था तथा नंदिकेश्वर के मत का अनुसरण करता था। उसने चार नाटकों की रचना की जिनमें महाराष्ट्री, कर्नाटकी तथा मेवाड़ी भाषाओं का भी प्रयोग किया। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा,1988- इतिहास, कुंभा के समय की सांस्कृतिक गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण दीजिये।) उसके आश्रय में सूत्रधार मण्डन ने देवता मूर्ति प्रकरण, प्रासाद मंडन, राजवल्लभ, रूपमंडन, वास्तुमंडन, वास्तुशास्त्र, वास्तुसार और रूपावतार नामक ग्रंथों की रचना की। मण्डन के भाई नाथा ने वास्तु मंजरी और मंडन के पुत्र गोविंद ने उद्धार धोरणी, कलानिधि तथा द्वार दीपिका नामक ग्रंथों की रचना की। कुंभा के समय के 60 से अधिक शिलालेख मिले हैं। यदि इनका संग्रह किया जाये तो 200 पृष्ठों से भी अधिक मोटी पुस्तक बन सकती है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, साहित्य के संरक्षक के रूप में राणा कुंभा का मूल्यांकन कीजिये।) कन्ह व्यास द्वारा रचित एकलिंग माहात्म्य से कुंभा की साहित्यिक रचनाओं के बारे में ज्ञात होता है। विजय स्तम्भ पर उत्कीर्ण प्रशस्ति से भी कुंभा के लेखन के सम्बन्ध में जानकारी मिलती है। (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा, सामान्य ज्ञान, 2008, वह कौनसा अभिलेख है जो कुंभा के लेखन पर प्रकाश डालता है-कुंभलगढ़ शिलालेख 1460 ई./कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति 1460 ई./जगन्नाथ राय शिलालेख 1652 ई./राजप्रशस्ति 1676 ई. ?) 

    कुंभा के बाद इस वंश में महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप तथा महाराणा राजसिंह अत्यंत प्रबल प्रतापी राजा हुए जिनके भय से मुगल सल्तनत निरंतर भयभीत रहती थी। सिसोदिया शाखा से निकले वंशजों ने बाद में डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ (देवलिया) तथा शाहपुरा में नवीन राज्यों की स्थापना की। कहा जाता है कि छत्रपति शिवाजी का वंश तथा नेपाल का वर्तमान राजवंश भी गुहिलों से निकले हैं।




    प्रतिहार



    आठवीं से दसवीं शताब्दी तक राजस्थान के प्रतिहारों की तुलना में कोई अन्य प्रतापी हिन्दू वंश नहीं रहा। (आर.ए.एस. प्रारम्भिक परीक्षा, इतिहास 2007, 9वीं एवं 10वीं शताब्दी में उत्तरी भारत के सबसे अधिक शक्तिशाली कौन थे?) इस राजवंश ने राजस्थान से लेकर बंगाल तक शासन किया। इन राजाओं की कीर्ति गुर्जर प्रदेश से विस्तारित हुई, इस कारण इन्हें ‘गुर्जर प्रतिहार’ भी कहा जाता है। इनकी प्रारंभिक राजधानियां भीनमाल तथा जालोर थीं। मण्डोर, कन्नौज, उज्जैन, भड़ौंच तथा राजगढ़ भी इनकी राजधानियां रहीं। मूथा नैणसी ने प्रतिहारों की 26 शाखाओं का वर्णन किया है। ओझा ने गुजरात, काठियावाड़, राजपूताना, मध्यभारत एवं सतलज से लगाकर बिहार तक का क्षेत्र प्रतिहारों के अधीन बताया है।

    मण्डोर के प्रतिहार : घटियाला से प्राप्त शिलालेखों के अनुसार हरिश्चन्द्र नामक ब्राह्मण का विवाह क्षत्रिय कन्या भद्रा से हुआ था जिससे प्राप्त संतान प्रतिहारों के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसी ब्राह्मण की दूसरी पत्नी से जो संतानें हुई। वे ब्राह्मण प्रतिहार कहलाईं। भद्रा से चार पुत्र हुए जो भोगभट्ट, कदक, रज्जिल तथा दद्द नाम से प्रसिद्ध हुए। इन चारों भाइयों ने माण्डव्यपुर (मण्डोर) को जीतकर चारों ओर परकोटा खिंचवाया। यद्यपि रज्जिल भद्रा का तीसरा पुत्र था तथापि मण्डोर के प्रतिहारों की वंशावली यहीं से प्रारंभ होती है।

    जालोर के प्रतिहार : जालोर, अवंति तथा कन्नौज के प्रतिहारों की नामावली नागभट्ट से प्रारंभ होती है। यह नागभट्ट, नागावलोक तथा नाहड़राव आदि नामों से भी जाना जाता है। मण्डोर के प्रतिहार इसके अधीन सामंत थे। यह नागभट् मण्डोर शाखा के प्रतिहारों में से था जिसके जालोर-भीनमाल क्षेत्र पर अधिकार कर लेने से प्रतिहारों की वास्तविक सत्ता का केंद्र मण्डोर से हटकर जालोर-भीनमाल क्षेत्र हो गया था।

    इस शाखा के प्रतिहारों ने चावड़ों से वह लगभग पूरा प्रदेश छीन लिया जो चावड़ों ने गुर्जरों से छीना था। गुर्जरात्रा क्षेत्र में आ जाने के कारण ये प्रतिहार, गुर्जर प्रतिहारों के नाम से जाने गये। इन प्रतिहारों ने राष्ट्रकूटों, अरबों तथा पालों सहित अनेक वंशों के राजाओं को परास्त किया। कई बार प्रतिहारों की भी इन युद्धों में भयानक पराजय हुई किंतु धैर्य और पराक्रम के बल पर प्रतिहारों ने न केवल अपना अस्तित्व बनाये रखा अपितु गुजरात से लेकर बंगाल तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया। नागभट्ट ने भीनमाल, जालोर, गुजरात, आबू एवं मध्य भारत के कुछ अन्य क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया। नागभट्ट के बाद उसका पुत्र देवराज गद्दी पर बैठा। उसने ग्वालियर तक अपना राज्य विस्तार किया। देवराज की मृत्यु के बाद उसका पुत्र वत्सराज गद्दी पर बैठा। उसने मध्यभारत की भण्डि जाति को तथा कान्यकुब्ज के नरेश इन्द्रायुध को पराजित किया। राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से परास्त होकर वत्सराज को मरुस्थल में शरण लेनी पड़ी तथा अपनी राजधानी भीनमाल से हटाकर जालोर ले जानी पड़ी। वत्सराज के बाद उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय जालोर की गद्दी पर बैठा। अपने 38 वर्ष के शासनकाल में नागभट्ट द्वितीय ने प्रतिहार राज्य को एक शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया। उसने कन्नौज के आयुध वंश तथा बंगाल के पाल वंश को परास्त किया।

    मण्डोर का प्रतिहार शासक ‘कक्क ’ नागभट्ट द्वितीय का सामंत था जिसने गौड़ वंश को परास्त कर प्रतिहार वंश का सूर्य और भी ऊँचा कर दिया। नागभट्ट द्वितीय ने आनर्त, मालवा, किरात, तुरुष्क, वत्स, मत्स्य तथा बंग तक अपना राज्य फैलाया। ग्वालियर अभिलेख के अनुसार जिस प्रकार पतंगे अग्नि में गिरते हैं उसी प्रकार आन्ध्र, सिंधु, विदर्भ और कलिंग नरेश नागभट्ट द्वितीय की ओर खिंचते हुए आये। इस अभिलेख से अनुमान होता है कि इन नरेशों का समर्थन भी नागभट्ट को प्राप्त था। बुचकला अभिलेख में उसे परम भट्टारक महाराजधिराज परमेश्वर का विरद दिया गया है। नागभट्ट द्वितीय ने कान्यकुब्ज को अपनी राजधानी बनाया। इस प्रतापी नागभट्ट को राष्ट्रकूट नरेश गोविंद तृतीय ने परास्त कर दिया।

    राधनपुर ताम्रपत्र के अनुसार गोविंद तृतीय के भय से नागभट्ट अदृश्य हो गया ताकि स्वप्न में भी उसे युद्ध के दर्शन न हों। गोविंद के लौट जाने के बाद नागभट्ट ने फिर से अपनी शक्ति का संचय किया। नागभट्ट देवी भगवती की भक्ति के लिये प्रसिद्ध था, उसने गंगा 
    में जल समाधि ली। उसके बाद उसका पुत्र रामभद्र सिंहासन पर बैठा जो अत्यंत निर्बल सिद्ध हुआ। उसके काल में अनेक प्रांत प्रतिहारों के हाथ से निकल गये।

    रामभद्र के पुत्र भोज ने अपने पिता की हत्या कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया। यह भोज इतिहास में मिहिर भोज तथा भोज प्रथम के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी माता का नाम अप्पा देवी था। भोज ने वराह का विरुद्ध धारण किया। उसके दिये हुए अनेक दानपत्र राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, मालवा, गुजरात तथा बंगाल में मिले हैं। यह राजा प्रतिहार वंश का ही नहीं अपितु प्राचीन भारत वर्ष का महान शासक माना जाता है। यह राजा भी अपने पूर्वजों की भांति राष्ट्रकूटों से परास्त हुआ। बगुम्रा अभिलेख कहता है कि मिहिर ने सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त की किंतु ध्रुव द्वितीय ने उसे सरलता से हरा दिया। मिहिरभोज ने बंगाल के पालवंश के सर्वाधिक पराक्रमी और शक्तिशाली राजा देवपाल को परास्त किया तथा राष्ट्रकूट राजा कृष्ण द्वितीय से युद्ध कर राष्ट्रकूटों के समक्ष अपनी स्थिति प्रतिष्ठा जनक कर ली। 851 ई. में सुलेमान नामक एक अरब यात्री ने मिहिर भोज की बड़ी प्रशंसा की है। वह कहता है- जुज्र (गुर्जर) नरेश भोज के पास एक विशाल अश्व सेना थी। ऐसी विशाल सेना भारत के किसी अन्य नरेश के पास नहीं थी। वह इस्लाम का शत्रु था। उसके राज्य में सोने-चांदी की बहुत सी खानें थीं तथा उसका राज्य चोरी-डकैती के भय से मुक्त था।

    स्कंद पुराण के अनुसार मिहिरभोज ने तीर्थ यात्रा करने के लिये अपना राज्य अपने पुत्र महेंद्रपाल प्रथम को सौंप दिया। महेंद्रपाल प्रथम को अतीन्द्रपाल, महीशपाल, महेन्द्रयुध, रघुकुल चूड़ामणि, निर्भयराज तथा निर्भय नरेंद्र आदि विरुदों से विभूषित किया गया है। उसने परमभट्टारक महाराजधिराज परमेश्वर की उपाधियां धारण कीं। यह राजा अपने पूर्वजों की भांति विद्वान था। उसके राजकवि एवं राजगुरु राजशेखर ने कर्पूरमंजरी, हरविलास तथा भुवनकोष आदि ग्रंथों की रचना की। (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2013, सामान्य ज्ञान, महान संस्कृत कवि एवं नाटककार राजशेखर निम्न में से किसके दरबार से सम्बन्धित था- 1. राजा भोज, 2. महिपाल, 3. महेन्द्रपाल प्रथम, 4. इन्द्र तृतीय।)

    महेंद्रपाल प्रथम के बाद भोज द्वितीय गद्दी पर बैठा। भोज द्वितीय को कलचुरि नरेश कोक्क ल ने परास्त किया। भोज की इस पराजय के बाद उसके भाई महीपाल प्रथम ने गद्दी के लिये झगड़ा किया तथा भोज को राज्यच्युत कर दिया। महीपाल प्रथम प्रतापी राजा हुआ। उसने उज्जैन तथा कर्नाटक पर विजय प्राप्त की। राजशेखर ने महीपाल की केरल तथा कुन्तल (कर्नाटक) विजयों का उल्लेख किया है। उसके काल में राष्ट्रकूट आपसी संघर्ष के कारण कमजोर हो गये थे जिसका लाभ महीपाल प्रथम ने उठाया किंतु फिर भी राष्ट्रकूट राजा अमोघ वर्ष तृतीय के युवराज कृष्ण तृतीय ने महीपाल प्रथम को परास्त कर दिया।

    महीपाल का सामंत भामनदेव गोरखपुर पर, सामंत धरणीवराह सौराष्ट्र पर तथा गुहिलवंशीय सामंत भट जयपुर क्षेत्र पर शासन करते थे। इसके बाद महेंद्रपाल द्वितीय, देवपाल, विनायकपाल, महीपाल द्वितीय तथा विजयपाल आदि राजा हुए। ये सभी राजा निर्बल हुए। इनके काल में खजुराहो के चंदेल, शाकम्भरी के चाहमान, जयपुर के गुहिल तथा मध्य भारत के परमारों ने अपनी ताकत बढ़ा ली। विजयपाल के शासनकाल में राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय के पुत्र गंगावाड़ी ने प्रतिहार राज्य पर आक्रमण कर विजयपाल को पराजित कर दिया। इस विजय के उपलक्ष्य में गंगावाड़ी ने गुर्जरराज की उपाधि धारण की।

    प्रतिहारों की सेवाओं को भारतीय इतिहास कभी भुला नहीं सकता। जब अरबों के आक्रमणों से दक्षिणी यूरोप तथा उत्तरी अमरीका कुछ ही वर्षों में अपनी स्वतंत्रता खो बैठे थे, तब प्रतिहारों ने अरबों को भारत भूमि से लगभग बाहर ही रखा। त्रस्त जनता का उद्धार करने तथा शत्रु से समाज की रक्षा करने के कारण ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट प्रथम को नारायण कहा गया है।

    प्रतिहारों ने लगभग सम्पूर्ण मध्य भारत को एक वंश के अधीन लाकर राष्ट्र के एकीकरण का कार्य किया। उत्तरी भारत में मौर्यों, गुप्तों तथा मौखरियों को छोड़कर किसी वंश ने इतने लम्बे काल तक इतने विस्तृत प्रदेश पर शासन नहीं किया। प्रतिहारों के शिलालेख, दानपत्र, काव्य ग्रंथ जैसे- कुवलयमाला, हरिवंश पुराण, कर्पूरमंजरी, विद्वशाल भंजिका आदि समृद्ध संस्कृत साहित्य उपलब्ध है। कवि राजशेखर इस काल की महान विभूति था जिसने इस काल को अमर बना दिया। प्रतिहारों ने राजस्थान, गुजरात, कन्नौज, मालवा तथा खजुराहो आदि में विष्णु, शिव तथा शक्ति के अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×